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जैविक विधि – फसल सुरक्षा की नई तकनीकी

जैविक विधि - फसल सुरक्षा की नई तकनीकी
Written by bheru lal gaderi

जैविक विधि का इतिहास बहुत पुराना है 3000 ईसवी पूर्व के धूमन में गंधक के प्रयोग से कीट पतंगों द्वारा की जा रही हानि को रोका जाता था। तंबाकू का प्रयोग विश्व के रूप में सर्वप्रथम निकोटीन का दमन सन 1763 में किया गया। 1781 में कीटनाशकों के लिए साबुन का भी प्रयोग होने लगा।

जैविक विधि - फसल सुरक्षा की नई तकनीकी

वैज्ञानिक तरीके से जैविक विधि से नियंत्रण का सबसे पहला प्रयास कैलिफोर्निया में वर्ष 1888 में नींबू प्रजाति के पौधों पर लगने वाले कीट के नियंत्रण के लिए अलग-अलग विद्या अपनाई गई। परंतु ऐसा माना जाता है कि रासायनिक कीटनाशकों के अव्यवस्थित एवं अत्यधिक प्रयोग के कारण अनेक समस्याएं जैसे महामारियों तथा कीटों की पुनः उत्पत्ति, भोजन, जल, वायु एवं मृदा में विषावशेष प्राकृतिक मित्र कीटों की हानी और पर्यावरण पर खतरा बढ़ने से ज्यादा आसार होते हैं।

खेती की जैविक विधि कोई नई पद्धति नहीं बल्कि यह भारतीय संस्कृति की पारंपरिक पद्धति है जिसे आधुनिक विज्ञान के समन्वय से पुर्नप्रतिपादित किया गया है। वस्तुतः खेती की यह जैविक विधि फसल चक्र, फसल अवशेष, हरी खाद, कार्बनिक खाद, गोबर की खाद, यांत्रिक खेती, जैविक कीटनाशकों तथा खनिज चट्टानों के प्रयोग पर निर्भर करती है। जिससे भूमि की उत्पादकता तथा उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है साथ ही खाद्य पदार्थ भी शीघ्र पचने वाले स्वादिष्ट तथा गुणकारी होते हैं।

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जैविक विधि से कीट एवं रोग नियंत्रण        

इसके अंतर्गत रोगजनक को प्रत्यक्ष रुप से विभिन्न शस्य क्रियाओं विरोधी फफूंद, शाकाणु तथा विषाणु का उपयोग कर नियंत्रित कर सकते हैं। जबकि अप्रत्यक्ष रुप से विभिन्न संशोधनों का उपयोग करते हैं। इन में मुख्य हैं हरी खाद, गोबर की खाद, हरी तथा सूखी पत्तियों की खाद, अखाद्य खली, नीम की खली, व लकड़ी का बुरादा सहित अन्य जैविक पदार्थों को खेत में जुताई करते वक्त मिलाकर सिंचाई कर देना चाहिए। इन पदार्थों के सड़ने से उत्पन्न कार्बनिक रसायन मृदा में उपस्थित रोगजनकों को मारते हैं तथा साथ ही मृदा को भुरभुरा बनाते हैं जिससे भूमि उपजाऊ होती है।

शस्य क्रियाओं द्वारा नियंत्रण

  • फसल चक्र का उपयोग करके।
  • फसल अवशेषों को नष्ट किया जाए तथा भूमि में पड़े कीड़ों एवं रोग कारकों को नष्ट किया जाए।
  • कीट एवं रोगों के उपयुक्त समय को टालकर बुवाई करें।
  • कीटों एवं इल्लियों के प्रकोप से बचाव हेतु टी आकार की लकड़ी का प्रयोग करना।
  • गर्मी के समय में गहरी जुताई करना।
  • उपयुक्त एवं स्वस्थ प्रजाति के बीजों का चुनाव एवं बीज उपचार करना।

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मृदा उपचार

  • स्केलेरोशियम, राइजोक्टोनिया, फ्यूजीरियम व शाकाणु मृदा में कई रूपों में जैसे क्लेमाइडोस्पोर, कोनिडिया, माइसीलियम आदि रहते हैं। इनकी सक्रियता विभिन्न मृदाओं में अलग-अलग रहती हैं यदि गोबर की खाद भूमि में चली गई हो तो इनमे विरोधी तथा जैविक उपचार की फफूँदे और शाकाणु  अधिक सक्रिय रहती है जब मृदा उपचार किया हो तो उनमें ना तो अधिक नहीं होना चाहिए ना ही कम।
  • ट्राइकोडर्मा स्पेसीज के साथ कार्बेंडाजिम (5 ग्राम 1.5 ग्राम कार्बेन्डाजिम ) के साथ प्रति किलोग्राम उपचार किया जाए तो सोयाबीन में जड़ या तना सड़न रोग का उपचार हो जाता है।

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गोमूत्र

  • गाय के मूत्र में 33 प्रकार के तत्व पाए जाते हैं, इसमें प्रत्येक से वनस्पति पर आने वाले विभिन्न रोगों एवं कीटों का नियंत्रण होता है।
  • गोमूत्र में उपस्थिति गंधक, नत्रजन, फास्फोरस, पोटेशियम, लोहा, चुना, सोडियम आदि तत्व वनस्पति को निरोगी तथा सशक्त रखते हैं।
  • गोमूत्र को 10 लीटर मात्रा को तांबे के बर्तन में 1 किलो नीम के पत्ते के साथ 15 दिन गलाने के बाद उबालकर आधी मात्रा बना दे। इस उबाल को छानकर इसका एक 1 भाग पानी में मिलाकर फसल पर छिड़काव करें।
  • उपरोक्त गोल को अधिक प्रभावी बनाने के लिए इसमें यदि 50 ग्राम लहसुन भी उबालने के साथ मिला दिया जाए तो इससे फसल पर आने वाली सुंडियों से सुरक्षा होती है।
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विषाणु कीटनाशक

  • खेती की मृत इल्लिया सामान्यतः विषाणु के संक्रमण से मर जाती है। इन मृत इल्लियों को इकट्ठा कर चटनी बनाकर पानी में डालकर छिड़काव करने से कीट में विषाणु लग जाता है और यह मर जाते हैं।
  • 500 इल्ली मृत से 100 लीटर पानी का घोल बनाया जा सकता है एक एकड़ के लिए 200 लीटर पानी की आवश्यकता होती है।
  • न्युक्लियर पोलीहाइड्रोसीस वायरस (एन.पी.वि.) कपास की चित्तीदार इल्ली, चने की इल्ली व फौजी कीट के लिए उपलब्ध हैं। एक हेक्टेयर के लिए करीब 400 मि.ली. एन.पी.वि. की आवश्यकता होती है।

बी.टी.

इनके उपयोग से लेपिडोप्टेरा, डिप्टेरा और कोलीएप्टेरा वर्ग के कीटों का नियंत्रण संभव है जैविक कीटनाशक स्थायित्व व प्रक्रिया तुलनात्मक रुप से धीरे हैं।

पादप प्रतिरोधक

पौधों की ऐसी जातियों का विकास करना जो कीट व रोगजनक के संक्रमण को सहन करें या प्रतिरोधक कर सकें इस जैविक विधि में समय बहुत लगता है।

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जैव कीटनाशी

  • बहुत से पौधे ऐसे होते हैं जिनके रस एवं पौधे पत्तियों में कीटनाशी गुण होते हैं जो विभिन्न पौधों में पाए जाने वाले कीटनाशक का प्रयोग कर कीट नियंत्रण किया जा सकता है।
  • ट्रेफिसिया केन्डीज की जड़ों से निकलने वाला पदार्थ होता है जो माहौ या हरा मच्छर आदि के नियंत्रण में उपयोग होता है।
  • डेरिस की सुखी जड़ों के एक भाग को पीसकर उसको चार भाग टाल्क या गंधक के साथ मिलाकर इस भुरकन का 20-30 किग्रा प्रति हैक्टेयर का उपयोग कीट नियंत्रण के रूप में किया जा सकता है।

इसके अलावा राइनोडिज, बैरट्रस एल्बम हेलिओसिस स्केबा, शरीफा और ओनेजोन नामक पौधों का उपयोग कीटनाशकों के रूप में किया जाता है (स्त्रोत:- राष्ट्रीय जैविक खेती परियोजना, ग्वालियर)

सारांश :-

इस प्रकार से जैविक विधि की खेती में कृषि रसायनों को विवेकपूर्ण उपयोग सुझाया जा सकता है जिससे वातावरण प्रदूषित ना हो साथ ही कई ऐसी वनस्पतियां भी फसल सुरक्षा हेतु काफी कारगर सिद्ध हुई है। जैसे लहसून कई कीटों के लिए प्रतिकर्षि का काम करता है इसके अलावा सौंफ, जीरा और काली मिर्च की पत्तियां और बीज के निचोड़ में कीट नियंत्रण करने की क्षमता है। मूंगा या सूरजला की जड़ों में शाकाणु नाशक गुण हैं इससे फल और सब्जियों को परीक्षण करने के लिए इसे उपचार किया जाता है।

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प्रस्तुति

डॉ. प्रवीण कुमार जगा एवं डॉ. योगेश कुमार पटेल,

सहायक प्राध्यापक ज. ने.कृ.वि.वि.,

कृषि महाविद्यालय, गंजबासौदा,

जिला विदिशा (मध्य प्रदेश)

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bheru lal gaderi

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