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जैविक खेती के लाभ और उपाय

जैविक खेती
Written by bheru lal gaderi

सन 2004-05 में पहली बार खेती पर राष्ट्रिय परियोजना की शुरुआत की गई। सन 2004-5 में जैविक खेती को करीब 42 हजार हेक्टेयर में अपनाया गया, जिसका रकबा मार्च 2014 तक बढ़कर करीब 11 लाख हेक्टेयर हो गया। इसके अतिरिक्त 34 लाख हेक्टेयर जंगलों से फसल प्राप्त होती हैं। इस तरह कुल 45 लाख हेक्टेयर में जैविक उत्पाद उत्पन्न किये जा रहें हैं।

जैविक खेती

यह एक सर्वविदित तथ्य हैं की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि हैं और कृषकों की मुख्य आय का साधन खेती हैं। हरित क्रांति के समय से बढ़ती हुई जनसंख्या को देखते हुए एवं आय की दृष्टि से उत्पादन बढ़ाना आवश्यक हैं। अधिक उत्पादन के लिए खेती में अधिक मात्रा में रसायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशक का उपयोग करना पड़ता हैं, जिससे सामान्य एवं छोटे कृषक के पास कम जोत में अत्यधिक लागत लग रही हैं और जल, भूमि, वायु और वातावरण भी प्रदूषित हो रहें हैं। साथ ही खाद्द्य पदार्थ जहरीले हो रहे हैं।

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भारत दुनिया में कपास का सबसे बड़ा जैविक उत्पादक हैं। पूरी दुनिया में जैविक कपास का सबसे बड़ा जैविक कपास का 50% उत्पादन समूहों के अंतर्गत आने वाले करीब 6 लाख टन विभिन्न जैविक उत्पाद पैदा करते हैं। 18 लाख टन जैविक उत्पादों में से करीब 561 करोड़ रूपये मूल्य के 54 हजार टन जैविक उत्पादों का निर्यात किया जाता हैं।

जैविक खेती से लाभ

किसान एवं पर्यावरण के लिए जैविक खेती लाभ का सौदा हैं। जैविक खेती से किसानों को कम लागत में उच्च गुणवत्ता पूर्ण फसल प्राप्त हो सकती हैं। इसके अन्य लाभ निन्मलिखित हैं:

  • जैविक खेती से भूमि की गुणवत्ता में सुधार होता हैं। रासयनिक उर्वरक के उपयोग से भूमि बंजरपन की और बढ़ रही हैं। जैविक खादों से उसमे जिन तत्वों की कमी होती हैं, वह पूर्ण हो जाती हैं एवं उसकी गुणवत्ता में अभूतपूर्ण वृद्धि हो सकती हैं।
  • जैविक खादों एवं जैविक कीटनाशकों के उपयोग से जमीन की उपजाऊपन में वृद्धि होती हैं।
  • सिंचाई की कम लागत जैविक खेती में आती हैं क्योंकि जैविक खाद जमीन में लम्बे समय तक नमी बनाये रखते हैं, जिससे सिंचाई की आवश्यकता रसायनिक खेती की अपेक्षा कम पड़ती हैं।
  • रसायनिक खादों के उपयोग से जमीन के अंदर फसल की उत्पादकता बढ़ाने वाले जीवाणु नष्ट हो जाते हैं, जिस कारण फसल की उत्पादकता कम हो जाती हैं। जैविक खाद का उपयोग कर पुनः उस उत्पादकता को प्राप्त किया जा सकता हैं।
  • जैविक खेती से भूमि की जल धारण शक्ति में वृद्धि होती हैं। रसायनिक खाद भूमि के अंदर के पानी को जल्दी सोख लेते हैं, जबकि जैविक खाद जमीन की ऊपरी सतह में नमी बनाकर रखते हैं, जिससे जमीन की जल धारण क्षमता बढ़ती हैं।
  • किसान की खेती की लागत रसायनिक खादों की कीमते आसमान छू रही हैं। जैविक खाद बहुत ही सस्ते दामों में तैयार हो जाता हैं।
  • जैविक खेती से प्रदूषण में कमी आती हैं। रसायनिक खादों एवं कीटनाशकों से पर्यावरण प्रदूषित होता हैं। खेतों के आसपास का वातावरण जहरीला हो जाता हैं, जिससे वहां के वनस्पति, जानवर एवं पशु पक्षी मरने लगते हैं। जैविक खादों एवं कीटनाशकों के प्रयोग से वातावरण शुद्ध होता हैं।
  • जैविक खेती से उत्पादों की गुणवत्ता रसायनिक खेती की तुलना में कई गुना बेहतर होती हैं एवं उच्चे दामों में बाजार में बिकते हैं।
  • स्वास्थ्य की दृष्टि से जैविक उत्पाद सर्वश्रेष्ठ होते हैं एवं इनके प्रयोग से कई प्रकार के रोगों से बचा जा सकता हैं।
  • जैविक उत्पादों की कीमते रसायनिक उत्पादों से कई गुना ज्यादा होती हैं, जिससे किसानों की औसत आय में वृद्धि होती हैं।

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जैविक खेती की एवं रसायनिक खेती की तुलनात्मक उत्पादकता

आकड़े दर्शाते हैं की जैविक खेती से फसलों की उत्पादकता रसायनिक खेती की तुलना में करीब 20-25% तक बढ़ जाती हैं।

जैविक खेती हेतु खाद का निर्माण

रसायनिक खाद फसल के लिए उपयुक्त जीवाणुओं को नष्ट कर देता हैं। इन सूक्ष्म जीवाणुओं के तंत्र को विकसित करने के लिए जैविक खाद का प्रयोग किया जाना चाहिए, जिससे फसल के लिए मित्र जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि, हवा का संचार, पानी को पर्याप्त मात्रा में सोखने की क्षमता में वृद्धि होती हैं। जैविक खाद बनाने की कुछ प्रमुख विधिया निम्न हैं:

नाडेप विधि

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इस विधि में 12 फिट लम्बा, 5 फ़िट चौड़ा एवं 3 फिट गहरा गड्ढा खोदकर उसमे 75% वनस्पति अवशेष, 20% हरी घास व 5% गोबर 200 लीटर पानी में डालकर अच्छे से मिलाते हैं। इस गड्ढे में कुछ छेद करके उनमे पीएसबी एवं एजेक्टोबेक्टर कल्चर गड्ढे के अंदर डालकर उन छिद्रों को बंद कर देते हैं। 15 से 20 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से इस खाद का उपयोग करें। हर 21 दिन बाद इस खाद को दाल सकते हैं।

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वर्मी कम्पोस्ट खाद

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फसल में पोषक तत्वों का संतुलन बनाने में वर्मी कम्पोस्ट खाद की महत्वपूर्ण भूमिका रहती हैं। वर्मी कम्पोस्ट खाद को विशेष प्रकार के केंचुओ से बनाया जाता हैं। इन केंचुओं के माध्यम से अनुपयोगी जैविक वानस्पतिक जीवांशों को अल्प अवधि में मुल्यांकन जैविक खाद का निर्माण करके, इसके उपयोग से मृदा के स्वास्थ्य में आशातीत सुधार होता हैं एवं मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ती हैं, जिससे फसल उत्पादन में स्थिरता के साथ गुणात्मक सुधार होता हैं।

वर्मी कम्पोस्ट में नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश के अतिरिक्त में विभिन्न प्रकार के सूक्ष्म पोषक तत्व भी पाये जाते हैं। वर्मी कम्पोस्ट पोषक तत्व भी पाये जाते हैं। वर्मीकपोस्ट पोषण पदार्थों से भरपूर एक उत्तम जैव उर्वरक हैं। यह केंचुआ आदि कीड़ों के द्वारा वनस्पतियों एवं  भोजन के कचरे आदि को विघटित करके बनाई जाती हैं। वर्मी कम्पोस्ट में बदबू नहीं होती हैं और मक्खी एवं मच्छर  नहीं बनते हैं तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता हैं। तापमान नियंत्रित रहने से जीवाणु क्रियाशील तथा सक्रिय रहते हैं। वर्मी कम्पोस्ट डेढ़ से दो माह के अंदर तैयार हो जाता हैं। इसमें 2.5 से 3% नाइट्रोजन, 1.5 से 2% सल्फर तथा 1.5 से 2% पोटाश पाया जाता हैं।

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हरी खाद

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हरी खाद उस सहायक फसल को कहते हैं, जिसकी खेती मुख्यतः भूमि में पोषक तत्वों को बढ़ाने तथा उसमे जैविक पदार्थों की पूर्ति करने के उद्देश्य से की जाती हैं। प्रायः इस तरह की फसल को इसके हरी स्थिति में ही हल चलाकर मिट्टी में मिला दिया जाता हैं। हरी खाद से भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ती हैं और भूमि की रक्षा होती हैं। मृदा में लगातार दोहन से उसमे उपस्थित पौधे की बढ़वार के लिये आवश्यक तत्व नष्ट होते जा रहे हैं। इनकी क्षतिपूर्ति हेतु व मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बनाये रखने के लिये हरी खाद एक उत्तम विकल्प हैं। बिना गले-सड़े हरे पौधे (दलहनी एवं अन्य फसलों अथवा उनके भाग) को जब मृदा की नत्रजन या जीवांश की मात्रा बढ़ाने के लिये खेत में दबाया जाता हैं, तो इस क्रिया को हरी खाद देना कहते हैं।

मटका खाद

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गौ मूत्र 10 लीटर, गोबर 10 किलो, गुड़ 500 ग्राम, बेसन 500 ग्राम- सभी को मिलाकर मटके में भरकर 10 दिन सड़ाएं फिर 200 लीटर पानी में घोलकर गीली जमीन पर कतारों के बिच छिड़क दें। 15 दिन बाद पुनः इसका छिड़काव करें।

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बायोगैस स्लरी

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गोबर गैस की पाचन क्रिया के बाद बायोगैस सयंत्र में 25% ठोस पदार्थ रूपांतरण गैस के रूप में होता हैं और 75% ठोस पदार्थ का रूपांतरण सयंत्र में 50 किलोग्राम प्रतिदिन या 18.25 टन गोबर एक वर्ष में डाला जाता हैं। उस गोबर में 80% नमीयुक्त करीब 10 टन बायोगैस स्लेरी का खाद प्राप्त होता हैं। ये खेती के लिये अति-उत्तम खाद होता हैं। इसमें 1.5 से 2% नत्रजन, 1% स्फुर एवं 1% पोटाश होता हैं।

बायोगैस सयंत्र में गोबर गैस की पाचन क्रिया के बाद 20% नाइट्रोजन अमोनियम नाइट्रेट के रूप में होता हैं। अतः यदि इसका तुरंत उपयोग खेत में सिंचाई नाली के माध्यम से किया जाये, तो इसका लाभ रसायनिक खाद की तरह फसल पर तुरंत होता हैं और उत्पादन में 10-20% बढ़त हो जाती हैं।

स्लरी के खाद में नत्रजन, स्फुर एवं पोटाश के अतिरिक्त सूक्ष्म पोषण तत्व एवं ह्यूमस भी होता हैं, जिससे मिटटी की सरंचना में सुधार होता हैं तथा जल धारण क्षमता बढ़ती हैं। सुखी खाद असिंचित खेती में 5 टन एवं सिंचित खेती में 10 टन प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होगी। ताजी गोबर गैस स्लरी सिंचित खेती में 3-4 टन प्रति हेक्टेयर में लगेगी। सुखी खाद का उपयोग सिंचाई के दौरान करें। स्लरी के उपयोग से फसलों को तीन वर्ष तक पोषक तत्व धीरे-धीरे उपलब्ध होते रहते हैं।

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जैविक कीट एवं व्याधि नियंत्रण

  1.  देशी गाय के 5 लीटर मटठे में 5 किलो नीम के पत्ते डालकर 10 दिन तक सड़ाये, बाद में नीम की पत्तियों को निचोड़ लें। इस नीम युक्त मिश्रण को छानकर 150 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति एकड़ के मान से समान रूप से फसल पर छिड़काव करें। इससे इल्ली व माहु का प्रभावी नियंत्रण होता हैं।
  2. 5 लीटर मटठे में, 1 किलो नीम के पत्ते व धतूरे के पत्ते डालकर 10 दिन सड़ने दें। इसके बाद मिश्रण को छानकर इल्लियों का नियंत्रण करें।
  3. 5 किलो नीम के पत्ते ३ लीटर पानी में डालकर उबाल ले, जब आधा रह जावे, तब उसे छानकर 150 लीटर पानी में घोल तैयार करें। इस मिश्रण में 2 लीटर गौ-मूत्र मिलावें। अब यह मिश्रण एक एकड़ के मान से फसल पर छिड़के।
  4. 1/2 किलो हरी मिर्च व लहसुन पीसकर 150 लीटर पानी में डालकर छान लें तथा एक एकड़ में इस घोल का छिड़काव करें।
  5. मारुदाना, तुलसी (श्यामा) तथा गेंदे के पौधे फसल के बिच में लगने से इल्ली का नियंत्रण होता हैं।
  6. गोमूत्र, कांच की शीशी में भरकर धुप में रख सकते हैं। जितना पुराना गोमूत्र होगा, उतना अधिक असरधारी होगा। 12-15 मि.मि. गोमूत्र प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रेयर पंप से फसलों में बुवाई के 15 दिन बाद, प्रत्येक 10 दिवस में छिड़काव करने से फसलों में रोग एवं कीड़ों में प्रतिरोधी क्षमता विकसित होती हैं, जिससे प्रकोप की संभावना कम रहती हैं।
  7. 100-500 मि.ली. छाछ 15 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने से किट-व्याधि का नियंत्रण होता हैं। यह उपचार सस्ता, सुलभ, लाभकारी होने से कृषकों में लोकप्रिय हैं।

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जैविक खेती की स्थिति पर नजर

विभिन्न प्रदेशों की सरकारे जैविक खेती को प्रोत्साहित कर रही हैं। मध्यप्रदेश में 1565 गांवों में पूरी तरह से जैविक खेती हो रही है। प्रदेश में 29 लाख हेक्टेयर भूमि जैविक खेती के लिए उपयुक्त पाई गई है। प्रदेश में जैविक क्षेत्रों का चयन किया जा रहा है। बेस लाइन सर्वे कर जैविक खेती करने वाले कृषक समूहों का निर्माण एवं पंजीयन किया जा रहा हैं।

कृषि विभाग द्धारा क्षेत्रों के अनुसार जैविक फसलों का चयन, निःशुल्क मिट्टी का परिक्षण, जैविक खेती के लिए भुसुधार हेतु चुना,रॉक फॉस्फेट, एवं कम्पोस्ट उपयोग हेतु प्रोत्साहन अनुदान, जैविक खाद, एवं जैविक कीट नियंत्रण, प्रोत्साहन अनुदान, ऑनफार्म  जैविक खाद हेतु हेतु कृषकों को सहायता एवं विभागीय अमले व् कृषकों को जैविक खेती की प्रशिक्षण योजना से जैविक खेती के विस्तारीकरण में तेजी आई है।

जैविक खेती से उत्पन फसल न केवल स्वास्थ्य के लिए वरन पर्यावरण के लिए भी अनुकूल होती है। जैविक कृषि पद्धति से सामाजिक समरसता बढ़ कर अप्रत्यक्ष रूप से देश के आर्थिक विकास में सहभागी बन सकती है।

हमारे स्वास्थ्य एवं सर्वांगीण विकास के लिए यह जरुरी है कि प्राकृतिक संसाधन प्रदूषित न हों एवं शुद्ध वातावरण के साथ पोषक आहार मिले, इन सबका आधार सिर्फ जैविक खेती है।

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