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रबी फसलों में जल प्रबन्धन उपयोग एवं महत्व

जल प्रबंधन
Written by bheru lal gaderi

जल प्रबन्धन(Water management) के लिए आवश्यक है की फसल को सही समय पर सही मात्रा में एवं सही तरिके से सिंचाई की जाएं। उचित समय पर आवश्यकतानुसार पानी नहीं देने पर एवं आवश्यकता से अधिक पानी देने पर भूमि की भौतिक दशा खराब हो जाती है तथा उत्पादन भी कम मिलता है।

फसल में सिंचाई करते समय फसल अवस्था, भूमि में नमी मात्रा, भूमि से नमी के वाष्पीकरण की स्थिति एवं पौधों में जल की मात्रा को ध्यान में रखना चाहिए। फसल की बढ़वार के अनुसार जल की आवश्यकता बदलती रहती है। सिमित पानी उपलब्ध होने पर फसल की क्रांतिक अवस्थाओं पर सिंचाई करनी चाहिए। सिंचाई से दिया गया पानी पौधे के उत्तक निर्माण व वाष्पोसर्जन में काम आता है।जब तक पौधे को जल उपलब्ध होता हैं तब तक पौधों की बढ़वार होती रहती है अन्यथा वृद्धि रुक जाती है तथा अंत में पौधे मर जाते है।

भूमि में पर्याप्त नमी की जानकारी

भूमि में पर्याप्त नमी की जानकारी हेतु मुट्ठी में मिट्टी को बंद कर गोला बनाए तथा गोले को थोड़ा ऊपर उछाल कर हाथ में झेलें। यदि गोला टूट जाता है तो नमी कम है और यदि गोला बिना टूटे उसी आकर में रहता है तो प्रयाप्त नमी की निशानी है।

रबी फसलों में जल प्रबन्धन

जल प्रबन्धन को मुख्यत दो भागों में विभक्त किया जा सकता है।

  1. मृदा जल भण्डारण क्षमता बढ़ाना
  2. फसलों में जल उपयोग क्षमता बढ़ाना

मृदा जल भण्डारण क्षमता बढ़ाना :-

फसल के मूल क्षेत्र में सिंचाई द्वारा अथवा वर्षा जल का अधिकतम एवं लम्बे समय तक भण्डारण एवं धारण रखना मृदा जल भण्डारण क्षमता बढ़ाना है। इसके लिए जल एकसार वितरण एवं मृदा जल संचयन शक्ति में वृद्धि समुचित तरीके अपनाकर प्राप्त की जा सकती है।

मृदा जल भण्डारण कुशलता निम्न तरीकों से जा सकती है।

भूमि समतलीकरण

खेत को समतल रखें तथा हल्की ढाल देवें जिससे सिंचाई एक समान  लगेगी, सिंचाई में कम समय लगेगा व मृदा का कटाव भी कम होगा। असमतल खेत में कहीं पानी भरा रह जाएगा और कहीं पानी नहीं पहुंचेगा। इसलिए जहाँ पर पानी भर गया वहां पर फसल पीली पड़ने का डर और जहाँ पर पानी नहीं पहुंचा वहां सूखा रहने का दर।

खेतों में समोच्चरेखीय मेड़े बनाना :-

यदि लम्बे ढाल वाले खेतों को समोच्चरेखीय मेड़ो द्वारा बांध दिया जाए और प्रत्येक भाग को खेत में रोक दे तो भूमि का कटाव नियंत्रित होने के साथ-साथ अधिक उपयोग हो सकेगा। यदि समान्तर मेड़ो को उचित दुरी पर बनाया जाए तो इनका सदुपयोग सिंचाई देने में भी किया जा सकता है विशेषत – खरीफ फसलों में।

खेतों की गहरी जुताई करें

जहाँ तक सम्भव हो सके गर्मियों में तवेदार हेरो या या एम.बी. प्लाऊ से खेतों की गहरी जुताई अवश्य करे। यदि खरीफ में, रबी हेतु खेतों को पड़त रखा हो तो उचित नमी पर खेतों की जुताई करते रहें व प्रत्येक जुताई के बाद पाटा लगावे, जिससे खरपतवार नष्ट हो जाते हैं, रन्ध्राकांश बढ़ता हैं, मृदा की भौतिक दशा में सुधार होता हैं और प्रति इकाई मृदा आयतन में अधिक जल संरक्षित होता हैं इसके लाभदायक प्रभाव से रबी फसल के अंकुरण तथा पौधों की वृद्धि अच्छी होती हैं।

कार्बनिक खादों का प्रयोग करें

कार्बनिक खाद जैसे गोबर की खाद, कम्पोस व वर्मीकम्पोस्ट खाद का प्रयोग खरीफ फसलों से पहले करें। यदि रबी फसलों में इनका प्रयोग करना हो तो खेत की जुताई के समय, बुवाई के लगभग 20-25 दिन पूर्व प्रयोग करें व जुताई कर भूमि में अच्छी तरह मिला देवें। जैविक खादों के प्रयोग से मृदा की भौतिक, रासायनिक व जैविक दशा सुधरेगी जिससे भूमि, उपलब्ध जल की मात्रा को अधिक समय तक भंडारित कर सकती हैं।

उपयुक्त सिंचाई विधि अपनाएं

ज्यादातर कृषक फसलों में परम्परागत तरिके से खेतों में सीधे ही पानी देते हैं जिससे पानी का असमान वितरण होता हैं, साथ ही पानी की अधिक आवश्यकता होती हैं और सिंचाई में समय भी ज्यादा लगता हैं व कई बार लवणीयता की भी समस्या हो जाती हैं। सिंचाई विधियों का चयन मुख्यतया जल की उपलब्धता, मिट्टी के प्रकार, फसल आदि कारणों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

पर्याप्त पानी की उपलब्धता की स्थिति में

बॉर्डर या मेड, पट्टी, कुंड विधि से सिंचाई करें। नहरी तंत्र में 5-8 मीटर चौड़ी और ढलान के अनुसार लम्बाई की क्यारियां बनाकर सिंचाई करें तथा क्यारी 80% पानी से भर जाये तब हमे क्यारी में पानी को रोक देना चाहिए शेष 20% भाग स्वतः ही भर जायेगा। ऐसा करने से पानी की बचत भी होगी और क्यारी के अंत में ज्यादा पानी भरने की संभावना भी कम हो जायेगी।

इस प्रकार हम प्रत्येक क्यारी में 20% पानी बचाकर इस पानी को टेल तक पहुंचा सकते हैं अन्यथा यह पानी व्यर्थ ही बहकर या तो ड्रेन में चला जायेगा या क्यारी में ज्यादा पानी होने पर फसल पिली पड़ जायेगी। अक्सर देखा जाता हैं की नहरी तंत्र में टेल तक पानी पहुँचता ही नहीं या फिर बहुत कम पहुँचता हैं, जिससे किसान सही समय पर फसल को पानी नहीं दे पाता और उसको आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता हैं।

अपर्याप्त पानी होने पर

फव्वारा, बूंद-बूंद सिंचाई काम में लेवे जिससे कम पानी से अधिकतम उत्पादन लिया जा सके।

फसलों की जल उपयोगिता दक्षता बढ़ाना

वर्तमान परिदृश्य में प्रति इकाई जल से अधिकाधिक उपज प्राप्त करना एक महत्वपूर्ण पहलू हैं। फसलों की जल उपयोग(जल प्रबन्धन) दक्षता को बढ़ाने के लिए विभिन्न शस्य क्रियाओं का समन्वित प्रयोग करना चाहिए।

फसलों का चयन

जलवायु क्षेत्र एवं जल उपलब्धता के अनुसार फसलों का चयन करें। भिन्न-भिन्न फसलों की जल मांग अलग-अलग होती हैं। अतः उपलब्ध जल एवं उसकी फसल मांग के अनुसार फसल का चयन करना काफी लाभदायक सिद्ध होता हैं। उदाहरणार्थ- नहर के नजदीकी खेतों में अधिक जल मांग वाली फसलें-गेहूँ, गन्ना, आलूसब्जिया तथा दूरस्थ खेतों में कम जल मांग वाली फसलें- सरसों, चना, मसूर, धनिया, अलसी आदि फसलें लें।

अधिक उपज देने वाली किस्मों को बोये

विभिन्न फसलों की तरह ही एक ही फसल की अलग-अलग किस्मों की जल मांग भी अलग-अलग हो सकती हैं। उन्नत किस्में पानी का दक्षतापूर्व उपयोग करती है। वर्षा आधारित क्षेत्रों हेतु अल्पावधि की किस्मों का चयन करें साथ ही किस्में कीट एवं रोग से प्रतिरोधी भी होनी चाहिए।

खेत की तैयारी

खरीफ फसलों को शीघ्र खेतों से हटाकर खलियान में दाल दें तथा तुरंत आवश्यक जुताई कर शीघ्र पाटा लगा देवे। इससे नमी संरक्षित रहेगी और यदि हो सके तो बुवाई भी सांयकाल के समय करें इससे बोये गये बीज को रात्रि में अधिक नमी प्राप्त हो सकेगी और अंकुरण अच्छा होगा।

सामयिक बुवाई

जहां तक हो सकें, फसलों को उचित समय पर बोये। इससे फसल द्वारा संरक्षित नमी का उपयोग अच्छा होगा एवं उनकी वानस्पतिक वृद्धि भी अच्छी होगी। जैसे की समय पर बोई गई सरसों में मोयला का प्रकोप नहीं होता और अंकुरण भी अच्छा होता हैं।

संतुलित उर्वरक प्रयोग

संतुलित उर्वरक प्रयोग से पौधों द्वारा जल(जल प्रबन्धन) उपयोग में वृद्धि के साथ उपज में भी वृद्धि होती हैं फलस्वरूप उर्वरक जल उपयोग दक्षता बढ़ाने में सहायता करते हैं। मिट्टी परीक्षण अवश्य करवाएं और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी हो तो उनका भी प्रयोग अवश्य करें।

खरपतवारों को नियंत्रित रखे

खरपतवार फसलों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से सबसे ज्यादा हानि पहुंचाते हैं। ये उपलब्ध जल एवं पोषक तत्वों का हास्य कर फसलों को उपलब्ध नहीं होने देते हैं। अतः समय-समय पर समुचित विधियों द्वारा इनका नियंत्रण अवश्य करें।

खरपतवारों द्वारा नमी संरक्षण (इन सिटू मल्चिंग)

यदि हो सकें तो निराई-गुड़ाई द्वारा खरपतवारों को नियंत्रित करें। सिंचाई के बाद, भूमि गुड़ाई करने से जमीन से पानी उड़ने की प्रकिया काफी कम हो जाती हैं, क्योंकि ऊपरी परत टूटने से केपलरी क्रिया भी कम हो जाती हैं। निराई-गुड़ाई द्वारा निकाले गये खरपतवारों को खेत से बाहर न फेंके। यदि उनमे फूल न बने हो तो, फसल की दो कतारों के मध्य खरपतवारों को फैला देवें जिससे यह मल्च का कार्य करेंगे और नमी संरक्षण में सहायक होंगे तथा बाद में सड़कर भूमि में जीवाश्म की मात्रा बढ़ाने में भी सहायक होंगे।

अतः किसान भाई उचित जल प्रबन्धन विधियाँ को अपनाकर पानी का सदुपयोग करते हुए रबी की फसलों में सिंचाई करके उत्पादन को बढ़ा सकते है।

 

 

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