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जलवायु परिवर्तन का कृषि एवं पर्यावरण पर प्रभाव

जलवायु परिवर्तन
Written by bheru lal gaderi

जलवायु परिवर्तन विश्व की सबसे ज्वलंत पर्यावरणीय समस्याओं में से एक हैं। नवम्बर-दिसम्बर मध्य तक ठण्ड का अहसास नहीं होना, फरवरी-मार्च तक सर्दी पड़ना, अगस्त-सितम्बर से वर्षा होना तथा अक्टुम्बर-नवम्बर माह तक गर्मी पड़ना तापक्रम ज्यादा होना, ये सब कुछ मौसम में होने वाले बदलाव के कारण होता हैं। मौसम, किसी भी स्थान की औसत जलवायु होती हैं जिसे कुछ समयावधि के लिए वहां अनुभव किया जाता हैं। इस मौसम को तय करने वाले मानकों में वर्षा, सूर्य, प्रकाश, हवा, नमी व तापमान प्रमुख हैं। मौसम में बदलाव काफी जल्दी होता हैं लेकिन जलवायु में बदलाव आने में काफी समय लगता हैं। और इसलिए ये कम दिखाई देते हैं।

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इस समय पृथ्वी के जलवायु में परिवर्तन हो रहा हैं, कोई नहीं जनता की गर्मी की कितनी मात्रा सुरक्षित हैं। पर हमे यह जरूर पता हैं की जलवायु परिवर्तन लोगों एवं पारिस्थितिक तंत्र को पहले से ही नुकसान पहुंचा रहा हैं। इसकी सच्चाई ग्लेशियरों के पिघलने, ध्रुवीय बर्फ में खंडित होने, परिहिमन क्षेत्र के विगलन, मानसून के तरीकों में परिवर्तन, समुद्र के बढ़ते जलस्तर, बदलते पारिस्थितिक तंत्र एवं घातक गर्म तरंगों में देखी जा सकती हैं। इस परिवर्तन के लिए एक प्रकार से मानवीय क्रिया-कलाप ही जिम्मेदार हैं।

जलवायु परिवर्तन के कारण

जलवायु परिवर्तन के कारणों को दो भागों में बाटा जा सकता हैं। प्राकृतिक एवं मानव निर्मित।

प्राकृतिक कारण

अनेक प्राकृतिक कारण जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार हैं। इनमे प्रमुख हैं-महाद्वीपों का खिसकना, ज्वालामुखी, समुद्री तरंगे और धरती का घुमाव।

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महाद्वीपों का खिसकना

हम आज जिन महाद्वीपों को देख करे हैं, वे इस धरा की उत्पत्ति के साथ ही बने थे तथा इन पर समुद्र में तैरते रहने के कारण इनका खिसकना निरंतर जारी हैं। इस प्रकार की हलचल से समुद्र में तरंगे व वायु प्रवाह उत्पन्न होता हैं। इस प्रकार के बदलावों  से जलवायु में परिवर्तन होते हैं। इस के महाद्वीपों का खिसकना आज भी जारी हैं।

ज्वालामुखी

जब भी कोई ज्वालामुखी फटता हैं, वह काफी मात्रा में सल्फरडाईऑक्साइड, पानी, धूलकण और राख के कणों का वातावरण में उत्सर्जन करता हैं। भले ही ज्वालामुखी थोड़े दिनों तक ही काम करें लेकिन इस दौरान काफी ज्यादा मात्रा में निकली हुई गैसे, जलवायु को लम्बे समय तक प्रभावित कर सकती हैं, गैसे व धूल कण सूर्य की किरणों का मार्ग अवरुद्ध कर  देते  हैं, फलस्वरूप वातावरण का तापमान कम हो जाता हैं।

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पृथ्वी का झुकाव

धरती 23.5 डिग्री के कोण पर अपने कक्षा में झुकी हुई हैं। इसके इस झुकाव में परिवर्तन से मौसम के क्रम में परिवर्तन होता हैं। अधिक झुकाव का अर्थ हैं अधिक गर्मी व अधिक सर्दी और कम झुकाव का अर्थ हैं कम मात्रा में गर्मी व साधारण सर्दी।

समुद्री तरंगे

समुद्र, जलवायु का एक प्रमुख भाग हैं वे पृथ्वी के 71% भाग में फैले हुए हैं। समुद्र द्वारा पृथ्वी की सतह की अपेक्षा दुगुनी दर से सूर्य की किरणों का अवशोषण किया जाता हैं। समुद्री तरंगों के माध्यम से सम्पूर्ण पृथ्वी पर काफी बड़ी मात्रा में ऊष्मा का प्रसार होता हैं।

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मानवीय कारण

ग्रीन हॉउस प्रभाव

पृथ्वी द्वारा सूर्य से ऊर्जा ग्रहण की जाती हैं जिसके चलते धरती की सतह गर्म हो जाती हैं। जब ये ऊर्जा वातावरण से होकर गुजरती हैं, तो कुछ मात्रा में लगभग 30% ऊर्जा वातावरण में ही रह जाती हैं। इस ऊर्जा का कुछ भाग धरती की सतह तथा समुद्र के जरिए परावर्तित होकर पुनः वातावरण में चला जाता हैं। वातावरण की कुछ गैसों द्वारा पूरी पृथ्वी पर एक परत सी बन जाती हैं तथा वे इस ऊर्जा का कुछ भाग भी सोंख लेते हैं। इन गैसों में शामिल होती हैं कार्बन डाई ऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड व जल कण, जो वातावरण 0.1% से भी कम भाग में होते हैं।

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इन गैसों को ग्रीन हॉउस गैस भी कहते हैं। जिस प्रकार से हरे रंग का कांच ऊष्मा को अंदर आने से रोकता हैं, कुछ इसी प्रकार से ये गैसे पृथ्वी के ऊपर परत बनाकर अधिक ऊष्मा से इनकी रक्षा करती हैं। इसी कारण इसे ग्रीन हॉउस प्रभाव कहाँ जाता हैं। ग्रीन हॉउस गैसों की परत पृथ्वी पर इसकी उत्पत्ति के समय से हैं।

कार्बनडाइऑक्साइड

चूँकि अधिकांश मानवीय क्रिया- कलापों के कारण इस प्रकार की अधिकाधिक गैसें वातावरण में छोड़ी जा रही हैं जिससे ये परत मोटी होती जा रही हैं व प्राकृतिक ग्रीन हॉउस का प्रभाव समाप्त हो रहा हैं। कार्बनडाइऑक्साइड तब बनती हैं जब हम किसी भी प्रकार का ईंधन जलाते हैं, जैसे:- कोयला, तेल, प्राकृतिक गैस आदि। इसके आलावा हम वृक्षों को भी नष्ट कर रहें हैं, ऐसे में वृक्षों में संचित कार्बन डाइऑक्साइड भी वातावरण में जा मिलती हैं।

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खेती के कामों में वृद्धि, जमीन के उपयोग में विविधता व अन्य कई स्त्रोतों के कारण वातावरण में मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड गैस का स्त्राव भी अधिक मात्रा में होता हैं। औद्योगिक कारणों से भी नवीन ग्रीनहाउस  प्रभाव की गैसे वातावरण में स्त्रावित हो रही हैं, जैसे क्लोरोफ्लोरो कार्बन, जबकि ऑटोमोबाइल से निकलने वाले धुए के कारण ओजोन परत के निर्माण में संबंध गैसें निकलती हैं। इस प्रकार के परिवर्तनों से सामान्यतः वैश्विक तापमान अथवा जलवायु में परिवर्तन जैसे परिणाम परिलक्षित होते हैं।

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ग्रीन हॉउस में मददगार कारक

  • कोयला, पेट्रोल आदि जीवाश्म ईंधन का उपयोग।
  • अधिक जमीन की चाहत में पेड़ों को काटना।
  • अपघटित न हो सकने वाले सामान अर्थात प्लास्टिक का अधिकाधिक उपयोग करना।
  • खेती में उर्वरक व कीटनाशकों का अधिकाधिक प्रयोग करना।

जलवायु परिवर्तन की वजह से विभिन्न पहलू निम्न प्रकार से प्रभावित हो सकते हैं।

खेती

बढ़ती जनसंख्या के कारण भोजन की मांग में वृद्धि हुई हैं। इससे प्राकृतिक संसाधनों का दबाव बनता हैं। जलवायु में परिवर्तन का सीधा प्रभाव खेती पर पड़ेगा क्योंकि तापमान, वर्षा आदि बदलाव आने से मिटटी की क्षमता, कीटाणु और फैलने वाली बीमारिया अपने सामान्य तरिके से अलग प्रसारित होगी। यह भी कहा जा रहा हैं की भारत में दलहन का उत्पादन कम हो रहा हैं। अति जलवायु परिवर्तन जैसे तापमान में वृद्धि के परिणामस्वरूप आने वाले बाढ़ आदि से खेती का नुकसान बढ़ेगा।

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मौसम

गर्म मौसम होने से वर्षा का चक्र प्रभावित होता हैं। इससे बाढ़ या सूखने का खतरा भी हो सकता हैं। एकाएक तापमान के घटने व बढ़ने से फसल उत्पादन प्रभावित होता हैं। ध्रुवीय ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र के स्तर में वृद्धि की भी आशंका हो सकती हैं। पिछले वर्ष के तुफानो व बवंडरों ने अप्रत्यक्ष रूप से इसके संकेत दे दिये हैं।

समुद्र के जल-स्तर में वृद्धि

जलवायु परिवर्तन का एक और प्रमुख कारक हैं समुद्र के जलस्तर में वृद्धि। समुद्र में गर्म होने, ग्लेशियरों के पिघलने से यह अनुमान लगाया जा रहा हैं की आने वाली सदी के भीतर समुद्र के जल स्तर में लगभग सामने आएँगे जैसे तटीय क्षेत्रों की बर्बादी, जमीन का पानी में जाना, बाढ़, मिटटी का अपरदन, खारे पानी के दुष्य परिणाम आदि। इससे तटीय जीवन अस्त-व्यस्त हो जाएगा, खेती, पेयजल, मत्स्य पालन व मानव बसाव तहस-नहस हो जाएगा।

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स्वास्थ्य

वैश्विक ताप का मानवीय स्वास्थ्य पर भी सीधा असर होगा, इससे गर्मी से सम्बंधित बीमारियां, निर्जलीकरण, संक्रामक बिमारियों का प्रसार, कुपोषण और मानव स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव होगा।

जंगल और वन्य जीवन

प्राणी व शिशु, ये प्राकृतिक वातावरण में रहने वाले हैं व ये जलवायु परिवर्तन के प्रति काफी सवेदनशील होते हैं। यदि जलवायु में परिवर्तन का ये दौर इसी प्रकार से चलता रहा, तो कई जानवर व पौधे लुप्त होने के कगार पर पहुंच जाएंगे।

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जलवायु परिवर्तन का फसलों पर प्रभाव

अध्ययनों के आधार पर कृषि वैज्ञानिको ने पाया की प्रत्येक 10सेल्सियस तापमान बढ़ने पर गेहू का उत्पादन 4-5 करोड़ टन कम हो जाएगा। इसी प्रकार 20 सेल्सियस तापमान बढ़ने से धन का उत्पादन 0.75 टन प्रति हेक्टेयर कम हो जाएगा। कृषि विभाग के अनुसार गेहू की पैदावार का अनुमान 82 मिलियन टन रह जाएगा। जलवायु परिवर्तन से फलों की उत्पादकता ही प्रभावित नहीं होगी वरना उनकी गुणवव्ता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। अनाज में पोषक तत्वों और प्रोटीन की कमी पायी जाएगी जिसके कारण संतुलित भोजन लेने पर भी मनुष्यों का स्वास्थ्य प्रभावित होगा।

जलवायु परिवर्तन का मृदा पर प्रभाव

भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए मिटटी की सरंचना व उसकी उत्पादकता अहम स्थान रखती हैं। तापमान बढ़ने से मिटटी की नमी और कार्यक्षमता प्रभावित होगी। मिटटी में लवणता बढ़ेगी और जैव विविधता घटती जाएगी। बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से जहां एक और मिटटी का क्षरण अधिक होगा वहां दूसरी और सूखे की वजह से बंजरता बढ़ जाएगी।

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जलवायु परिवर्तन का किट व रोगो पर प्रभाव

जलवायु परिवर्तन से किट व रोगों की मात्रा बढ़ेगी। गर्म जलवायु किट पतंगों की प्रजनन क्षमता की वृद्धि में सहायक हैं। कीटों में वृद्धि के साथ ही उनके नियंत्रण हेतु अत्यधिक कीटनाशकों का प्रयोग किया जाएगा जो जानवरों व मनुष्यों में अनेक प्रकार की बिमारियों को जन्म देगा।

जल संसाधनों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

जल संसाधनों पर जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ेगा। जल आपूर्ति की भयंकर समस्या उत्पन्न होगी तथा सूखे व बाढ़ की बारम्बारता में इजाफा होगा। अर्ध शुष्क क्षेत्रों में शुष्क मौसम अधिक लम्बा होगा जिससे फसलों की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। वर्षा की अनिश्चितता भी फसलों के उत्पादन को प्रभावित करेगी तथा जलस्त्रोतों के अधिक दोहन से जल स्त्रोतों पर संकट के बादल मंडराने लगेंगे। अधिक तापमान व वर्षा की कमी से सिंचाई हेतु भू-जल संसाधन का अधिक दोहन किया जाएगा। जिससे धीरे-धीरे भू-जल इतना ज्यादा निचे चला जाएगा की उसका दोहन करना आर्थिक दृष्टि से अलाभकारी सिद्ध होगा जैसा पंजाब, हरियाणा व उतर प्रदेश के बहुत से विकास खण्डों में हो रहा हैं। भारतीय कृषि पर पड़ने वाले जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के अनेक उपाय हैं जिनको अपनाकर हम कुछ हद तक जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से अपनी कृषि को बचा सकते हैं।

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जलवायु प्रभाव को कम करने के प्रमुख उपाय

खेत में जल प्रबंधन

तापमान वृद्धि के साथ फसलों में सिंचाई की अधिक आवश्यकता पड़ती हैं। ऐसे में जमीन का संरक्षण व वर्षा जल को एकत्रित करके सिंचाई हेतु प्रयोग में लाना एक उपयोगी एवं सहयोगी कदम हो सकता हैं। वाटर शेड प्रबंधन के माध्यम से हम वर्षा के पानी को संचित कर सिंचाई के रूप में प्रयोग कर सकते हैं। इससे जहां एक और हमे सिंचाई की सुविधा मिलेगी वही दूसरी और भू-जल पुनर्भरण में भी मदद मिलेगी।

जैविक एवं समग्रित (मिश्रित) खेती

खेतों में रासायनिक खादों व कीटनाशकों के इस्तेमाल से जहां एक और मृदा की उत्पादकता घटती हैं वहीं दूसरी और इनकी मात्रा भोजन श्रंखला के माध्यम से मानव शरीर में पहुंच जाती हैं। जिससे अनेक प्रकार की बीमारियाँ होती हैं। रासायनिक खेती से हरित गैसों के उत्सर्जन में भी इजाफा होता हैं। अतः हमे जैविक खेती करने की तकनीकों पर अधिक से अधिक जोर देना चाहिए। एकल कृषि की बजाय हमे समग्रित कृषि में जोखिम कम होता हैं। समग्रित खेती में अनेक फसलों का उत्पादन किया जाता हैं जिससे यदि एक फसल किसी प्रकोप से समाप्त हो जाए तो दूसरी फसल में किसान की रोजी-रोटी चल सकती हैं।

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फसल उत्पादन में नै तकनीकों का विकास

जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों को मध्यनजर रखते हुए ऐसे बीजों की किस्मों का विकास करना पड़ेगा जो नए मौसम के अनुकूल हो। हमे ऐसी किस्मों को विकसित करना होगा जो अधिक तापमान, सूखे व बाढ़ की विभीषिकाओं को सहन करने में सक्षम हो। हमे लवणता व क्षारीयता को सहन करने वाली किस्मों को भी इजाद करना होगा।

फसली सयोजन में परिवर्तन

जलवायु परिवर्तन की साथ-साथ हमे फसलों के प्रारूप एवं उनके बीज बोने के समय में भी परिवर्तन करना होगा। मिश्रित खेती व इंटरक्रॉपिंग करके जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटा जा सकता हैं। कृषि वानिकी अपनाकर भी हम जलवायु परिवर्तन के खतरों से निजात पा सकते हैं।

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जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से भारतीय कृषि को बचने के लिए हमे अपने संसाधनों का न्याय संगत इस्तेमाल करना होगा व भारतीय जीवन दर्शन को अपनाकर हमे अपने पारंपिक ज्ञान को अमल में लाना पड़ेगा। अब इस बात की सख्त जरूरत हैं की हमे खेती में ऐसे पर्यावरण मित्र तरीकों को अहमियत देनी होगी जिनसे हम अपनी मृदा की उत्पादकता को बरकरार रख सके व अपने प्राकृतिक संसाधनों को बचा सके।

सुरक्षात्मक उपाय

  • जीवाश्म ईंधन के उपयोग में कमी की जाए।
  • प्राकृतिक ऊर्जा के स्त्रोतों को अपनाया जाए, जैसे सोर ऊर्जा, पवन ऊर्जा आदि।
  • पेड़ों को बचाया जाए व अत्यधिक वृक्षारोपण किया जाए।
  • प्लास्टिक अपघटन में कठिन व असम्भव पदार्थों का उपयोग न किया जाए।

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