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जरबेरा की पॉलीहाउस में व्यावसायिक खेती

जरबेरा
Written by bheru lal gaderi

जरबेरा जिसे एस्टेरेसी कुल के अंतर्गत श्रेणीबद्ध किया गया हैं, दक्षिणी अफ़्रीकी मूल का पौधा हैं। इसलिए जरबेरा को “अफ्रीकन डेजी” के नाम से जाना जाता हैं। यह बहुवर्षीय कर्तित पुष्प वाला पौधा हैं एवं कर्तित पुष्पों में इसका महत्वपूर्ण स्थान हैं।जरबेरा की खेती बिना पॉलीहाउस के भी की जा सकती हैं परन्तु खुले स्थान में जरबेरा लगाने पर पौधों की वृद्धि नहीं हो पाती जिसके परिणामस्वरूप फूलों की गुणवव्ता भी अच्छी नहीं होती और बाजार में अच्छा मूल्य नहीं मिल पाता।

जरबेरा

अतः अच्छी गुणवत्ता के फूल लेने के लिए जरबेरा को पॉलीहाउस/ग्रीनहाउस में ही उगाए। पॉलीहाउस एक विशिष्ट आकार की सरचना होती हैं, जिसको 200-400 माइक्रोन मोटाई वाली पराबैंगनी विकिरणों से अवरोधी, सफेद रंग की पारदर्शी प्लास्टिक चादर से ढका जाता हैं। कम क्षेत्र में अधिकतम लाभ कमाने के लिए यह एक उत्तम तकनीक हैं। हालाँकि इसमें प्रारम्भिक खर्च अधिक हैं परन्तु भारत सरकार तथा राज्य सरकारों द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं के माध्यम से अनुदान प्राप्त कर इस दिशा में मजबूती से कदम बढ़ाए जा सकते हैं।

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ग्रीनहाउस में फूलों के उत्पादन की तकनीक भारत के लिए नई हैं। इसी कारण सभी इकाइयों को हालैण्ड, इजराइल तथा अन्य देशों के सहयोग से चलाया गया हैं। भारत में संरक्षित बागवानी की शुरुआत लगभग चार से पांच दशक पहले ही हुई हैं। संरक्षित बागवानी के कई फायदों की वजह से इसका प्रचलन तेजी से बढ़ रहा हैं। इस समय लगभग 550 इकाइयां संरक्षित पुष्प उत्पादन कर रही हैं।

विश्व स्तर पर फूलों की बढ़ती मांग के फलस्वरूप फूलों की खेती का व्यवसायीकरण पिछले दशकों में बढ़ता गया हैं और भारत में व्यापार के लिए फूलों की खेती के महत्व को भी समझा जाने लगा हैं। आज के इस बदलते परिवेश में बागवानी के क्षेत्र में फूल की खेती आर्थिक रूप से भी अत्यंत लाभकारी हैं। जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण हॉलैण्ड हैं जिसकी पूरी अर्थव्यवस्था फूलों के व्यापर तथा निर्यात पर टिकी हैं।

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पॉलीहाउस में जरबेरा की खेती के फायदे

  • पॉलीहाउस में इच्छित वातावरण बनाकर सभी तरह के फूल वर्षभर पैदा किए जा सकते हैं।
  • किसी भी फूल वाली फसल को किसी भी स्थान पर, किसी भी मौसम में पैदा किया जा सकता हैं।
  • पॉलीहाउस में अच्छे गुणवत्तायुक्त फूल पैदा किये जा सकते हैं इसलिए पॉलीहाउस में पैदा किए गए फूल निर्यात के लिए ज्यादा उपयुक्त होते हैं।
  • फसलों में लगने वाले कीट व बिमारियों की आसानी से सुरक्षा।
  • शहरी एवं सीमांत किसानों के लिए लाभकारी।
  • जिन क्षेत्रों में परम्परागत खेती नहीं की जा सकती, उनमे पॉलीहाउस की मदद से फूल पैदा करने की संभावनाए बढ़ जाती हैं।
  • फसलों के आवश्यक एवं संरक्षित वातावरण प्रदान करना।
  • प्रति इकाई क्षेत्र के लिए अधिक उत्पादन।
  • बेश्किमकती फसलों का उत्पादन।

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पॉलीहाउस की कुछ सीमाए भी हैं जैसे

पॉलीहाउस बनवाने में किसानों को प्रारम्भ में ज्यादा पूंजी लगानी पड़ती हैं।

यह केवल व्यावसायिक एवं बागवानी फसलों की दृष्टि से ही उपयोगी हैं, दूसरी फसलों के लिए नहीं।

जलवायु

जरबेरा के पोधो की अच्छी बढ़वार एवं फूलों की गुणवत्ता वातावर्णि  कारकों जैसे:- प्रकाश, तापमान, आपेक्षिक आर्द्रता, कार्बनडाइऑक्साइड आदि पर निर्भर करती हैं। पॉलीहाउस में इन करकों को नियंत्रित किया जा सकता हैं। दिन के मध्य में सूर्य के अधिक प्रकाश एवं तापमान से फसल को बचाने के लिए 60% छायादार नेट अथवा जाली का प्रयोग करें।

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जरबेरा के फूलों को अधिक उत्पादन हेतु दिन का तापमान 18-24 डिग्री सेल्सियस तथा रात का तापमान 12-14 डिग्री सेल्सियस रहना चाहिए। पॉलीहाउस में 60-70% आपेक्षित आर्द्रता अच्छे पुष्प उत्पादन के लिए अच्छी हैं तथा कार्बनडाइऑक्साइड का स्तर 1000-1500 पि.पि.एम. बना रहना चाहिए।

पॉलीहाउस के लिए उपयुक्त किस्में

व्यावसायिक पुष्प उत्पादन के लिए सही किस्मों का चुनाव बहुत जरूरी हैं, इसलिए ऐसी किस्मों का चुनाव करना चाहिए जिनका तना लम्बा, फूल का प्रकार डबल व अधिक पंखुडिया हो। सांगरिया, सनसेट, तारा, जपाका, चोनी, रोजेरियन, रोजुला, ओपरव रोमोना, सलीना, टिकोरा एवं स्टार लाइट आदि जरबेरा की प्रमुख किस्में हैं।

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पुष्प के रंग के आधार पर किस्में

पुष्प का रंग किस्मों का नाम
लाल ब्यूटी, सनी बॉय, संगरिया
संतरी औरनेला, ओपटिमा, सनसेट तारा
सफेद व्हाइट सन, ओलीबिया
पीला अरूबा, गोल्डन फीवर, गोल्डन गेट, गोल्ड सपोट
गुलाबी डाराबेल, पीफयोना, रोजबेला

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प्रवर्धन

जरबेरा का प्रवंर्धन मुख्य रूप से सकर्स द्वारा किया जाता हैं। जून के  महीने में पुरे पौधे को उखाड़ कर उसके सभी सकर्स को हाथ से अलग कर लिया जाता हैं। औसतन एक वर्ष में -5-7 सकर्स प्राप्त किया जा सकते हैं। रोपाई से पहले सकर्स की पत्तियों एवं जड़ों की छटाई कर दी जाती हैं। माइक्रोसंवर्धन द्वारा भी जरबेरा का प्रवर्धन किया जाता हैं। माइक्रोसंवर्धन द्वारा कम समय में एक ही पौधे से अधिक संख्या में स्वस्थ पौधे तैयार किए जा सकते हैं।

बेड तैयार करना

जरबेरा के पौधों को ऊँची क्यारियों में लगाया जाता हैं जो करीब 30 से 45 सेमी. ऊँची होती हैं। क्यारियों की चौड़ाई करीब 1मी. होनी चाहिए जबकि लम्बाई आवश्यकता या पॉलीहाउस के अनुसार रखी जा सकती हैं। क्यारियों के बिच में कम से कम 30 सेमी. का रास्ता होना चाहिए जो की खरपतवार नियंत्रण, गुड़ाई तथा पौधों में खाद-पानी देने में काम आता हैं।

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पौध की तैयारी

जरबेरा के पौधों की रोपाई बसंत ऋतू में(जनवरी से मार्च) तथा गर्मी में(जून से अगस्त) कर सकते हैं। लेकिन बसंत ऋतू में रोपाई उत्तम होती हैं। पौधों की रोपाई पंक्ति से पंक्ति 30-40 सेमी. एवं पौधे से पौधे की दुरी 20-30 सेमी. पर करना चाहिए की पौधे का क्राउन 1-2 सेमी. जमीन में ऊपर होना चाहिए एवं जड़ तंत्र को नहीं छोड़ना चाहिए। प्रत्येक बेड में दो या तीन पंक्तियाँ रखी जाती हैं। रोपाई के उपरांत बौछार द्वारा हल्की सिंचाई करें। पौध की रोपाई करने के 20-25 दिनों तक हजारे के द्वारा हल्का पानी सुबह, दोपहर, शाम तीनों समय देना चाहिए। रोपण के उपरांत पॉलीहाउस में 30-45% आपेक्षित आर्द्रता बनाए रखें।

सिंचाई

भरपूर पैदावार के लिए पानी सही समय पर सही मात्रा में देना बहुत आवश्यक है। ड्रिप सिंचाई प्रणाली एक नवीन पद्धति है, इस पद्धति द्धारा पौधों को उनकी आवश्यकता अनुसार पानी को बून्द-बून्द के रूप में पौधों की जड़ क्षेत्र में उपलब्ध कराया जाता है। ड्रिप सिंचाई प्रणाली में जल के साथ में उर्वरक की भी पर्याप्त मात्रा में बचत होती है। पौधों को पानी की जरुरत मौसम एवं मृदा के प्रकार पर निर्भर करती है। जरबेरा सामान्यतः नमी में रहने वाला पौधा हैं

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इसलिए इसे सिंचाई की लगातार अंतराल के बाद जरुरत होती है। पॉलीहाऊस में सिंचाई ड्रिप सिचाई प्रणाली द्धारा करते है। सिंचाई के लिए ऐसे पानी जिसका पी.एच. मान 6.5 से 7.0 एवं कठोरता 200 पी.पी. से अधिक न हो  का उपयोग करना चाहिए। जल का लवण स्तर 0.7 एम.एम./से.मी. से अधिक नहीं होना चाहिए। जरबेरा के पौधों को प्रति दिन 400 से 700 मी.ली./पौधा पानी की आवश्यकता होती है जो मौसम पर निर्भर करती है।

फर्टिगेशन

सिंचाई जल के साथ पोषक तत्व देने की विधि को फर्टीगेशन कहते है। समय-समय पर इसमें बून्द-बून्द सिंचाई प्रणाली द्धारा पोषक तत्वों को देते रहते है। नाइट्रोजन, फॉस्फोरस एवं पोटाश 12:8:25 ग्राम प्रति वर्ग मीटर की दर से डालना चाहिए। सूक्ष्म तत्वों जैसे आयरन, जिंक, बोरोन, कॉपर, मैग्नीशियम आदि की उचित मात्रा को 0.2 प्रतिशत घोल के रूप में अथवा विलियन का छिड़काव बाजार में उपलब्ध रसायनों जैसे हाइग्रोमिन अथवा फ्लॉवर बूस्टर द्धारा एक महीने के अंतराल पर देते है।

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खरपतवार नियंत्रण

महीने में एक बार निराई-गुड़ाई कर देनी चाहिए जिससे खरपतवारों के साथ-साथ मिट्टी में उपस्थित कवक और जीवाणु बढ़ नहीं पाते है। खरपतवारों हेतु खरपतवारनाशी का प्रयोग न करके खुरपी के द्धारा खरपतवारों को निकल देना चाहिए।

फूलों की कटाई

कटाई की उपयुक्त अवस्था का ज्ञान होना बहुत ही आवश्यक हैं। फूल अतिशीघ्र नाशवान प्रकृति के होते हैं। अतः इनकी कटाई या तो जल्दी सुबह या फिर शाम के समय, जब तापमान कम हो, करनी चाहिए। प्रातः के समय काटे हुए फूल अधिक तरोताजा रहते हैं, यध्यपि शाम के समय काटे हुए फूलों में सर्वाधिक कार्बोहाइड्रेट का संचय होता हैं जो की फूलों की सस्योत्तर दीर्घायु निर्धारित करता हैं। फूलों को मुख्यतः उस समय तोडना चाहिए, जब फूल के एक दो रे-फ्लोरेट्स पूरी तरह से खुल जाए। सामान्तया कटाई का सही समय पौधे की प्रजाति, किस्म, मौसम, मंडी की दुरी तथा उपभोक्ताओं की पसंद पर निर्भर करता हैं।

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उपज

जरबेरा के कर्तित पुष्पों की पैदावार कई कारकों जैसे:- पॉलीहाउस का वातावरण, उगाई जाने वाली किस्म, पौधे की आयु, रख-रखाव तथा प्रति वर्ग मीटर रोपित पौधे की संख्या पर निर्भर करती हैं। जरबेरा की सामान्यतः 24-30 महीने की फसल होती हैं, पौधे को लगाने के बाद 3-4 महीने में फूल आने शुरू हो जाते हैं। पॉलीहाउस में औसतन 250-300 फूल प्रति वर्ग मीटर प्रति वर्ष प्राप्त होते हैं जिनमे 75 से 80% तक प्रथम श्रेणी के पुष्प होते हैं फूल तोड़ने के बाद उनको पानी में 3-4 घंटे के लिए रखना चाहिए।

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कीट एवं रोग नियंत्रण

पॉलीहाउस में उचित प्रबंधन एवं रख-रखाव होने पर फसलों में कीट एवं रोगो का प्रकोप नहीं होता। लेकिन कुछ जैसे सफेद मक्खी, पत्ती-छेदक, चेपा तथा स्पोडोप्टेरा सुंडी का प्रकोप आम बात हैं। इनकी रोकथाम के लिए क्रमशः फासफॉमिडॉन, मेटासीस्टॉकस एवं मोनोक्रोटोफॉस का 1.5 से 2.0 मिली. प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। स्पाडोप्टोरा सुंडी को चुन-चुन कर एकत्र करके २ फिट गहरे गड्ढे में दबा दे। कभी-कभी अधिकाधिक नमी होने के कारण क्राउन विगलन, पाउडरी मिल्ड्यू तथा फ्यूजेरियम की बीमारी आती हैं और इनसे बचाव के लिए क्रमशः कार्बेन्डाजिम, कॉपर ऑक्सीक्लोराइड एवं केप्टान 1.5-2.0% मात्रा के रासायनिक घोल का 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करते रहना चाहिए।

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