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चना की फसल में प्रमुख कीट एवं रोग व प्रबंधन

चना की फसल में प्रमुख कीट एवं रोग
Written by bheru lal gaderi

चना रबी की सीजन में उगाई जाने वाली दलहनी फसलों में प्रमुख फसल के रुप में उगाया जाता है। इस की खेती सर्वाधिक क्षेत्रफल में की जाती है। राजस्थान में चने की खेती गंगापुर, कोटा, बूंदी, बारां, चूरु, जयपुर, सवाईमाधोपुर, भीलवाड़ा जिले में अधिक की जाती है। चना के उत्पादन में राजस्थान का हनुमानगढ़ जिला अग्रणी एवं क्षेत्रफल की दृष्टि से चूरु जिला सबसे आगे हैं।

चना की फसल में प्रमुख कीट एवं रोग व प्रबंधन

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दलहनी फसलों में चना का उत्पादन प्रति हेक्टेयर अधिक होता है, परंतु समय-समय पर संरक्षण ना हो पाने के कारण किसान इसके वांछित उत्पादन से वंचित रह जाते हैं। अतः पौधों को निम्नलिखित बीमारियों से बचाना आवश्यक हैं।

चना में लगने वाले रोग एवं उनकी रोकथाम

उखड़ा/उखेटा (विल्ट)

यह रोग फ्यूजेरियम ऑक्सिपोरम नामक फफूंद से लगता है। इसके कारण पौधों की पत्तियां पीली पड़ जाती है तथा तने को लंबवत चीरने पर तंबाकू के रंग की एक धारी दिखाई देती है और पौधों की बढवार रुक जाती हैं।

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रोकथाम

  1. रोग रोधी किस्मे जैसे:- पंत जी- 114, सी.-235, हरियाणा चना-1,  सी-214, व जी-24  आदि को उगाए।
  2. जिस खेत में उकठा लगा हो उसमें 3 वर्ष तक चना न लगाएं।
  3. चना की बुआई 25 अक्टूबर से पहले न करें।
  4. बीज को बोने से पहले बेनलेट व थाइरम कि5 ग्राम या 1.25 ग्राम थायरम+1.25 ग्राम ब्रेसिकाल या 2 ग्राम कार्बेंडाजिम प्रति किलोग्राम की दर से बीजोपचार करके बुवाई करें।
  5. बुवाई अपेक्षाकृत 8-9 से से.मी. तक करें।
  6. खेत की जुताई गहरी करें।

अंगमारी या झुलसा

यह रोग भी फफूंद  से लगता है। इसकी पहचान सुबह जब खेत में फसल को देखते हैं तो पौधे कहीं-कहीं पर पीले नजर आते हैं।

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रोकथाम

  1. रोग रोधी किस्मे जैसे:- सी.-235, जी-543, पि.जी.-114, अवरोधी, के.—580, पि.बी.जी.-1, बी.जी.-267, एल.-550 आदि बोये।
  2. स्वस्थ प्रमाणित बीज का उपयोग करें। व 2 ग्राम कार्बेंडाजिम से 1 किग्रा बीज उपचारित करके बुवाई करें।
  3. फसल कटाई के बाद फसल अवशेष खेत से नष्ट कर दे।
  4. बुवाई से पहले बीज को 10 किग्रा कप्तान से उपचारित करें।
  5. उचित फसल चक्र अपने।
  6. प्रभावित पौधों को उखाड़ कर जला दे।

गेरुई

यूरोमाइसिज नामक एक फफूंद द्वारा फैलाई जाती है। यह बीमारी किसी-किसी वर्ष अधिक प्रकोप करती हैं। इसकी पहचान पत्तियों के निचले सतह पर भूरे और गहरे काले रंग के धब्बे देखे जाते हैं। पत्तियों का आकार बदल जाता है। रोगी पत्तियां सूख कर गिर जाती है। बाद में यह धब्बे पत्तियों के डंठल पर भी दिखाई देने लगते हैं। रोग रोधी किस्मे उगाकर इस बीमारी से बचा जा सकता है।

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तना विगलन एवं जड़ विगलन

यह रोग भी कभीकभी खेत में दिखाई देते हैं। दोनों प्रकार के विगलन में पौधों के तने और जोड़ों के उत्तर गल जाते हैं और काले भूरे पड़ जाते हैं।

उपचार

  1. स्वस्थ बीज से स्क्लेरोशिया रहित हो, की बुवाई करें।
  2. रोग रोधी किस्मों की खेती करें जैसे जी गौरव पूसा आदि।
  3. कटाई के बाद फसल अवशेष को जला दे।
  4. भूमि को 10 किलोग्राम कैप्टन प्रति हेक्टर के हिसाब से उपचारित करें।

कुतरा (कटवर्म)

यह चने का भयंकर कीट हैं। यह रबी की सभी दाल वाली फसलो को हानि पहुंचाता है। पौधे के तने को भूमि के पास से खा जाता है और पौधे पर चढ़कर पत्तियों को भी हानि पहुंचाता है। इसकी रोकथाम के लिए हेप्टाक्लोर 5प्रतिशत धूलि 5-10 की.ग्रा. मात्रा प्रति हेक्टेयर कि दर से बुरकनी चाहिए।

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चने का भेदक

इसकी गिडार या सुंडी या इल्ली चने की फलियों में छेद करके दाने को खा जाती हैं।

रोकथाम

  1. इसकी रोकथाम के लिए प्रकाश प्रपंच को चना के खेत में जगह जगह रखकर प्रौढ़ कीटों को पकड़कर नष्ट कर देना चाहिए।
  2. अधिक प्रकोप होने पर मोनोक्रोटोफॉस 36 ई.सी. 1.25 लीटर 500-1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़क दें। यह छिड़काव फसल में 20-25 प्रतिशत पौधों पर फूल आने लगे तो करना चाहिए। यही छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर दूसरी बार भी छिड़कना चाहिए।
  3. छिड़काव ना कर पाने की स्थिति में 5% मेलाथियान 5% धूल 20-25 किग्रा प्रति हेक्टेयर के हिसाब से बुरकने से कीट का नियंत्रण किया जा सकता है।
  4. मिथाइल पैराथियान 2% धूल मे 20-25 की.ग्रा. प्रति हेक्टेयर के हिसाब से बुरकाव करें। इस उपचार से दूसरे किट जैसे माहू, का प्रकोप नहीं होता है।

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रोगों से सुरक्षा

चूर्ण फफूंदी रोग

यह रोग एरिसाइफी पोलिगोनाइ नामक फफूंद द्वारा फैलाया जाता है। नम मौसम इस रोग के लिए अनुकूल होता है। पत्तियों पर सफ़ेद चूर्ण दिखाई देना ही इसकी पहचान हैं । पुष्पाअवस्था में यदि मौसम नम रहता हैं। तो ] इस रोग का आक्रमण भयंकर हो जाता है। इसकी रोकथाम के लिए सलफेक्स 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर 15 दिन बाद करना चाहिए।डाउनी मिल्ड्यू

यह बीमारी भी नम वातावरण में अधिक फैलती है। इसकी रोकथाम के लिए 3 किग्रा डायथेन एम-45 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। जरुरत पड़ने पर 15 दिन बाद में छिड़काव पुनः करना चाहिए।

रतुआ या गेरुई

यह रोग युरोमैसिज फेबि नामक  फफूंद द्वारा फैलाया जाता है। इसकी रोकथाम के लिए निम्न उपाय करें।

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रोगरोधी किस्मे उगाएं

डाईथेन एम-45 डाईथेन-75 2.25 की.ग्रा. को 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करें।

मटर के पौध का कीटों से बचाव

तना छेदक, रोयेंदार गिडार, तंबाकू वाला गिडार मुख्य हैं। इसके अलावा लिफ़ माइनर तथा एफिड भी नुकसान पहुंचाते हैं।

तना छेदक

इसकी रोकथाम के लिए 30 किग्रा फ्यूराडोन का प्रयोग करें। इन्हें बीज बोने से पहले मिट्टी में अच्छी तरह मिला देवें। पत्ती खाने वाली गिडार की रोकथाम के लिए 1.25 लीटर 35 ई.सी. 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर 1 हेक्टेयर में छिड़क देवे।

इसकी रोकथाम के लिए 0.25% कार्बोनिल का उपयोग करें।

नोट:- उपचार के 10 दिन बाद बाजार में बिक्री के लिए तोड़ी जाये।

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एफीड एवं लीफ माइनर

एफिड पत्तियों से रस चूसकर उन्हें कमजोर कर देते हैं तथा लिफ़ माइनर पत्तियों को खाकर उन्हें नष्ट कर देते हैं। इन कीटों की रोकथाम के लिए 2% फोरेट से बीज को उपचारित करने पर फसल की सुरक्षा बुवाई से 40 दिन तक की जा सकती है। इस कीट के लारवा पत्तियों में सुरंग बनाकर उन्हें नष्ट कर देते हैं। यह कीट दिसंबर से मार्च तक अधिक हानि पहुंचाता है।

रोकथाम

इसकी रोकथाम के लिए 1.25 लीटर डाइमिथोएट या ऑक्सिडिमेटोन मिथाइल (मेटासिस्टोक्स) 25 ई.सी. 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए।लीफ माइनर की रोकथाम के लिए मेटासीस्टॉक्स-25 ई.सी., 1.25 लीटर दवा को 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करें। आवश्यकता होने पर 10-12 दिन में पुनः छिड़काव करें।

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