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ग्वार की उन्नत खेती एवं उन्नत किस्में व उत्पादन तकनीक

ग्वार की उन्नत खेती
Written by bheru lal gaderi

ग्वार देश के उत्तरी-पश्चिमी राज्यों के अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों में उगाई जाने वाली मुख्य खरीफ फसल है। राजस्थान देश का मुख्य ग्वार उत्पादन प्रदेश है। प्रदेश में मुख्य रूप से बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर, चूरू, एवं हनुमानगढ़ जिलों में ग्वार की खेती की जाती है। राजस्थान में 30.97 लाख हेक्टेयर में ग्वार की खेती की जाती है। 18.46 लाख टन उत्पादन होता है।

ग्वार की उन्नत खेती

ग्वार की उन्नत किस्में

राज्य में ग्वार की खेती के लिए विकसित एवं अनुशंसित किस्मों का विवरण निम्न प्रकार से है।

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आर.जी.सी. – 1038

100-105 दिन में पककर तैयार हो जाती है।  15.5 क्विंटल उपज प्रति हेक्टेयर देती है। इस किस्म में भ्रूणपोष 31-36%, प्रोटीन 28-30% एवं गोंद 28-32% प्राप्त होता है।

आर.जी.सी. – 1066

प्रदेश में खरीफ एवं जायद ऋतुओं में बरानी अवस्था के अंतर्गत रेतीली दोमट मिटटी के लिए उपयुक्त है। पौधों की लम्बाई 86-110 सेंटीमीटर एवं शाखाऐं काम होती है।

मुख्य विशेषताएं

  • इसके फूल 35-37 दिन में निकल आते है जो गुलाबी रंग के होते है।
  • पत्तियाँ चौड़ी, रोमिल एवं चिकने किनारों वाली होती है। फलिया लम्बी(5.5-6.35cm) और दानों के बीच दरार होती है।
  • इसके दानों में 31-32 प्रतिशत गोंद पाया जाता है।
  • जीवाणु झुलसा, जड़ गलन आदि बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक एवं कीट का प्रकोप कम होता है।

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 आर.जी.सी. – 1055

  • ग्वार की यह किस्म 96-106 दिन में पककर तैयार हो जाती है।
  • शुष्क एवं अर्धशुष्क क्षेत्रों की रेतीली भूमियों के लिए उपयुक्त है।
  • पौधे शाखित एवं माध्यम लम्बाई वाले होते है, तथा फलियाँ माध्यम आकार की होती है।
  • दाने गोल, स्लेटी रंग के व मध्यम आकार के होते है। तथा 100 दानों का भार 17 ग्राम होता है।
  • औसत उपज 96 से 28.81 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है

आर.जी.एम. – 112

  • यह किस्म देश के वर्षा आधारित शुष्क एवं अर्धशुष्क क्षेत्रों हेतु तैयार की गई है।
  • यह शीघ्र पकने वाली 92 दिनों तथा अनेक शाखाओं वाली किस्म है।
  • पत्तियाँ हल्की हरी तथा सलेटी रंग की होती है।
  • जीवाणु झुलसा, जड़ गलन आदि बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक एवं कीट का प्रकोप कम होता है।

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आर.जी.सी. – 1031 (ग्वार क्रांति)

  • प्रदेश में खरीफ एवं जायद ऋतुओं में बरानी अवस्था के अंतर्गत समुचित जल निकास वाली रेतीली दोमट मिटटी में ग्वार की इस किस्म से सफलतापूर्वक अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है।
  • सिंचित अवस्था में यह अधिक दाने और चारा देती है।
  • इसके पौधे सीधे लम्बे तथा बहुशाखीय होते है। पत्तियाँ छोड़ी रोगमुक्त तथा डेन सफ़ेद गोल एवं पुष्ट होते है।
  • जीवाणु झुलसा, अल्टरनेरिय झुलसा आदि रोगों के प्रति मध्यम प्रतिरोधकता एवं कीट का प्रभाव लगभग नगण्य होता है।
  • इसके दाने में प्रोटीन, शर्करा, तथा भ्रूण पोष तत्व अधिक मात्रा पाया जाता है।

आर.जी.सी. – 1017

  • यह किस्म 92-96 दिनों में पककर तैयार हो जाती है।
  • बरानी व समुचित जल निकासी वाली भीमियों यह किस्म उपयुक्त पाई गई है।
  • औसत उपज 10-14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।

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आर.जी.सी. – 1002

  • बरानी व समुचित जल निकासी वाली भीमियों यह किस्म उपयुक्त पाई गई है।
  • यह किस्म 80-90 दिनों में पककर तैयार हो जाती है।

आर.जी.सी. – 1003

  • इस किस्म के दाने सुडौल व पत्तियां गहरे हरे रंग की होती है।
  • रोग एवं कीट के प्रति सहनशील होती है।
  • 90 दिन में पकने वाली यह किस्म 8-14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है।

आर.जी.सी. – 986

  • सिंचित एवं अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त
  • 90-130 दिन में पकने वाली यह किस्म 10-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है।
  • इसके फूल गुलाबी रंग के एवं पत्तियां खुरदरी तथा कम कटाव वाली होती है।
  • झुलसा रोग का प्रकोप कम होता है।
  • इसके फूल 40-50 दिनों में आ जाते है।

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आर.जी.सी. – 471 (राजस्थान ग्वार -1)

  • यह प्रजाति पूरे प्रदेश के लिए विकसित की गई है।
  • इसके बीज हल्के भूरे रंग के होते है।
  • जीवाणु झुलसा, अल्टरनेरिय झुलसा आदि रोगों के प्रति मध्यम प्रतिरोधकता एवं कीट का प्रभाव लगभग नगण्य होता है।
  • पकाव एक समय पर होता है।

आर.जी.सी. –  936

  • यह किस्म राजस्थान एवं गुजरात के सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए तैयार की गई है।
  • इसके पौधे शाखित तथा झाड़ीनुमा होते है। पुष्प सफेद, दाने मध्यम मोटाई वाले तथा हल्के गुलाबी होते है।
  • पकाव एक समय पर होता है तथा 85-90 दिन में पककर तैयार हो जाती है।

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आर.जी.सी. –  197

नागौर की स्थानीय किस्म से विकसित की गई है तथा पौधा एक शाखीय जिसमे फलियां गुचो में लगती है।

खेत की तैयारी

साधरणतया ग्वार की खेती सिंचित और असिंचित दोनों ही परीस्थितियों में किसी भी प्रकार की भूमियों में की जा सकती है। गरमी के दिनों में 1 या 2 गहरी जुताई मिटटी पलटने वाले हल से करें एवं मानसून की प्रथम वर्षा के साथ या एक या दो जुताई कर पाटा लगाकर  खेत को बुवाई के लिए तैयार करे।

बीज उपचार

जड़ गलन रोग की रोकथाम हेतु बीज की बुवाई से पूर्व 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम व 1 ग्राम थाइरम फफूंदनाशी 6-8 ग्राम ट्राइकोडर्मा मित्र फफूंद प्रति किलो की दर से उपचारित करें। अंगमारी रोग की रोकथाम हेतु बीज को 250 पीपीएम एग्रीमाइसिन या 100 पीपीएम स्ट्रेप्टोसाइक्लीन के घोल में 3 से 5 घंटे भिगोकर उपचारित करे। अंत में राइजोबियम कल्चर तथा पी.इस.बी. कल्चर से भी उपचारित करें।

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बीज दर एवं बुवाई

उन्नत किस्म का निरोग बीज बोए वर्षा होने के साथ ही या यदि देरी से वर्षा हो तो 30 जुलाई तक बुवाई कर देना अच्छा रहता है। देरी से मानसून शुरू होने पर अगस्त मध्य तक बोन हेतु ग्वार सबसे अच्छी फसल है। ग्वार की अकेली फसल के लिए 15-20 किलो बीज प्रति हेक्टेयर बोए  मिश्रित फसल हेतु 8-10 किलो बीज पर्याप्त होता है। देरी से बुवाई करने पर बीज दर 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रखे। कतार से कतार की दुरी 30 से.मी. एवं पौधे से पौधे की दुरी 10 से.मी. रखें।

खाद एवं उर्वरक

अधिक उपज के लिए 200 से 250 किलोग्राम अच्छी पाकी हुई गोबर की खाद तथा 10 किलोग्राम नत्रजन व 40 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हेक्टेयर देवें। इस बात का विशेष ध्यान रखें की जहाँ फॉस्फोरस की मात्रा डी.ए.पी. उर्वरक से दी जा रही है वहां 150 किलो जिप्सम प्रति हेक्टेयर बुवाई के समय उर कर देवें। फॉस्फेट उर्वरक देने से ग्वार में छाछया रोग का प्रकोप कम होता है। जिंक की कमी वाले खेतो में 20 किलो जिंक सल्फेट बुवाई के समय उरकर देवे।

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सिंचाई एवं निराई गुड़ाई

बुवाई के तीन सप्ताह बाद यदि अच्छी वर्षा न हो तो और सम्भव हो सके तो सिंचाई करे। इसके बाद भी यदि वर्षा न हो तो 20 दिन बाद फिर सिंचाई करें। बुवाई के पूर्व प्रति हेक्टेयर 0.75 किलोग्राम फ्लूक्लोरेलिन 100 लीटर पानी में मिलाकर जमीन पर छिड़काव करें। 30 दिन की फसल अवस्था पर निराई-गुड़ाई करे। पहली निराई-गुड़ाई पौधों के अछि तरह से जम जाने के बाद करनी चाहिए।

पौध संरक्षण

ग्वार के प्रमुख कीट

जेसिड (हरा तेला)

यह कीट हरे रंग का होता है जो पौधे की पत्तियों, तना, शाखाओं का रस चूस कर पौधे को कमजोर कर देता है।

नियंत्रण

इस कीट के नियंत्रण के लिए बुवाई के 30 दिन बाद डाइमिथोएट 30 ई.सी. या इमिडाक्लोरपिड 0.005 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें।

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मोयला एवं सफेद मक्खी

इन कीटों के नियंत्रण हेतु मैलाथियान 5% चूर्ण 25 किलो राख में मिलाकर भुरकाव या मैलाथियान 50 ई.सी. या डायमेथोएट 30 ई.सी. एक लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

कातरा:-

इस किट की लट वाली अवस्था ही फसलों को नुकसान पहुँचाती हैं। इसके पतंगों का नियंत्रण प्रकाश पाश लगाकर या खेतों में रात के समय जगह- जगह कचरा जलाकर करें। कातरे की लट की रोकथाम के लिए छोटी अवस्था में मिथाइल पेराथियोन २% चूर्ण २५ किग्रा. प्रति हैक. की दर से भुरकाव करें। बड़ी अवस्था में जहाँ पानी की सुविधा हैं वहाँ मिथाइल पैराथियान 50 ई.सी. 750 मिलीलीटर या क्लोरोपायरिफोस 20  ई.सी. एक लीटर प्रति हैक. की दर से छिड़काव करें।

व्याधि(रोग) नियंत्रण:-

ग्वार के प्रमुख रोग

पितशिरा मोजेक(विषाणु रोग):-

इस रोग से पौधे की पत्ती की शिराओं का मध्य भाग पीला हो जाता हैं यह रोग इसे चूसने वाले कीटों से फैलता हैं, रोग का प्रकोप दीखते ही एक लीटर मोनोक्रोटोफॉस 36 डब्ल्यू.एस.सी. का प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

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बैक्टीरियल ब्लाइट रोग:-

इसकी रोकथाम हेतु 100 लीटर पानी में 5 ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लीन या 50 ग्राम प्लांटोंमाइसीन का प्रति हैक. की दर से छिड़काव करें।

जड़ गलन रोग:-

इस रोग के नियंत्रण हेतु बीज को सुखाकर 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम या 1 ग्राम थाइरम फफूंदनाशी या 6 से 8 ग्राम ट्राइकोडर्मा मित्र फफूंद प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बुवाई करें।

पीलिया रोग:-

फसलों में पत्तियों पर पीलापन दिखाई देते ही ०.1% गंधक का तेजाब या ०.5% फेरस सल्फेट (सुहागा) का छिड़काव करें।

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तना झुलसा रोग:-

इस रोग का प्रकोप पौधे तने पर जले हुए की तरह लक्षण दिखाई देते हैं इस रोग का प्रकोप दिखाई देते ही तंबायुक्त फफूंदनाशी मेंकोजेब 2 किलोग्राम प्रति हैक. की दर से छिड़काव करें।

छछया रोग:-

इस रोग में पतियों की ऊपरी सतह पर शुरू में सफेद गोलाकार पाउडर जैसे धब्बे हो जाते हैं तथा बाद में पाउडर सारे तने तथा पत्तियों पर फेल जाता हैं। इसकी रोकथाम के लिए प्रति हेक्टेयर 2.5 किलो घुलनशील गंधक अथवा कैराथेन एक लीटर (०.1%) के घोल का छिड़काव करें एवं दूसरा छिड़काव 10 दिन के अंतराल पर दोहरावे। अथवा 25 किलो गंधक चूर्ण का प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

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कटाई एवं गहाई:-

बुवाई की परिस्थिति के अनुसार ग्वार की फसल अक्टूबर के अंत से नवम्बर तक पकती हैं। पूरी पकने पर फसल की कटाई करनी चाहिए तथा सूखने के लिए खेत में छोड़ देना चाहिए या खलिहान में लेकर सूखा लेना चाहिए। फसल की औसत उपज 10 से 14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती हैं। जो फसल भगौलिक स्थिति एवं कृषण क्रियाओं पर निर्भर करता हैं।

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