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गौ आधारित प्राकृतिक खेती से लाभ एवं महत्व

गौ आधारित प्राकृतिक खेती
Written by bheru lal gaderi

किसान भाइयों/बहनों आज के युग में जो हम खेती करते हैं वो रासायनिक खेती हैं, आपको पता हैं रासायनिक खेती अभी कितनी महंगी हैं और महंगी होती जाएगी तथा पैदावार घटती जाएगी इसमें पूरी फसल समाप्त होने के खतरे ज्यादा हैं, रासायनिक खेती में रोग स्वयं लगते हैं, अपनी खेती खतरे में हैं इसे बचाए प्राकृतिक खेती अपनाए।

गौ आधारित प्राकृतिक खेती

बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ भोजन की आपूर्ति के लिए हरित क्रांति के समय से 1960 से 1990 तक कृषि उत्पादन को बढ़ाने के लिए जिस तेजी से और जिस तरह से रासायनिक खादों और कीटनाशकों के इस्तेमाल किया गया, उसमे हमारे खेतों जीवन दोनों को संकट में डाल दिया, तब पर्यावरण की अनदेखी की गयी थी, जिसकी कीमत आज हम चूका रहे है, 1990 के बाद प्राकृतिक खाद की और खेती को लौटाने का अभियान शुरू हुआ, जो अब भी जारी हैं, द्वितीय हरित क्रांति में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा हैं और किसानों को इसके लिए तैयार किया जा रहा हैं।

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किसान भाइयों/बहनों आपको पता होगा कि प्राचीन काल में मानव स्वास्थ्य के अनुकूल तथा प्रकृतिक वातावरण के अनुरूप खेती की जाती थी, भारत वर्ष में प्राचीन काल में कृषि के साथ-साथ गौ पालन किया जाता था, जिसके प्रमाण हमारे ग्रंथों में प्रभु कृष्ण और बलराम हैं, जिसे हम गोपाल व हलधर के नाम से संबोधित करते हैं, अर्थात कृषि एवं गोपालन संयुक्त रूप से लाभदायक था जो की प्राणी मात्र वो वातावरण के लिए अत्यंत उपयोगी था परन्तु बदलते प्रवेश में गौ पालन धीरे-धीरे कम हो गया हैं तथा कृषि व कीटनाशकों का प्रयोग हो रहा हैं, जिसके फलस्वरूप प्राकृतिक व अप्राकृतिक पदार्थों का संतुलन बिगड़ता जा रहा हैं और वातावरण प्रदूषित होकर मानव जाती के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा हैं, प्राकृतिक खेती सस्ती तो हैं ही, जीवन और जमीन को बचाने के लिए बेहद जरूरी हैं।

प्राकृतिक खेती का अर्थ

गौ आधारित प्राकृतिक खेती

चाहे कोई भी अन्य फसल हो या बागवानी की फसल हो, उसकी लागत का मूल्य जीरो होगा, मुख्य फसल का लागत मूल्य आंतरवर्तीय फसलों के या मिश्र फसलों के उत्पादन से निकाल लेना और मुख्य फसल बोनस रूप में लेना यह आध्यात्मिक कृषि की प्राकृतिक खेती हैं, फसलों को बढ़ने के लिए और उपज लेने के लिए जिन-जिन संसाधनों की आवश्यकता होती हैं, वे सभी घर में ही उपलब्ध करना, किसी भी हालत में मंडी से या बाजार से खरीदकर नहीं लाना, यही प्राकृतिक खेती हैं।

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फसलों को बढ़ने के लिए जो संसाधन चाहिए वह उनके जड़ों के पास भूमि में और पत्तों के पास वातावरण में ही पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं, ऊपर से कुछ भी देने की जरूरत नहीं, क्योंकि हमारी भूमि अन्नपूर्णा हैं, हमारी फसले भूमि में कितने तत्व लेती हैं, केवल 1.5से 2.0% लेती हैं, बाकि 98से 98.5% हवा, सूरज की रौशनी और पानी से लेती हैं।

पुरानी कृषि विधि और किट प्रबंधन

प्राकृतिक खेती में प्राकृतिक खाद और प्राकृतिक कीटनाशकों का इस्तेमाल होता हैं। भारतीय किसानों के लिए प्राकृतिक खेती कोई नया विषय नहीं हैं, यह जरूर है की रासायनिक खाद और कीटनाशकों के प्रयोग को लेकर चले अभियान ने हमारे किसानों को कुछ समय के लिए अपने ऊपर निर्भर बना लिया। अब, जबकि एक बार हम सस्ती और कम नुकसानदेह वाली खेती की और बढ़ रहे हैं, तब एक बार हम पुरानी कृषि विधि और किट प्रबंधन की और लौटना चाहते हैं। इस अंतराल में प्राकृतिक खेती को लेकर कई नये प्रयोग हुए हैं, जो खेती के लाभ के दायरे को बढ़ाते हैं। रासायनिक और महंगी खाद की जगह हम इन खादों का इस्तेमाल कर सस्ती, टिकाऊ और स्वस्थ्य खेती का लाभ ले सकते हैं। रासायनिक कीटनाशक की जगह आप प्राकृतिक कीटनाशक इस्तेमाल करें।

खेती महंगी हो गई हैं

खेती महंगी हो गई हैं, कृषि उपकरण, बीज, खाद, पानी और मजदूर सब महंगे हो गए हैं। किसान हो या सरकार, सबको जोर कृषि उत्पादन की दर को बढ़ाने पर हैं। ज्यादा उत्पादन होने पर कृषि उपज की कीमत बाजार में गिरती हैं। अधिक उत्पादन के लिए हाइब्रिड बीज और रासायनिक खाद व कीटनाशक के इस्तेमाल से फलों और सब्जियों में सड़न जल्दी आ रही हैं। किसान उन्हें ज्यादा समय तक रख नहीं सकते। इन सबका नुकसान किसानों को उठाना होता हैं। हर साल यह स्थिति बनती हैं की बाजार में सब्जियों की कीमत में भारी गिरावट और सड़न की दर में वृद्धि के कारण किसान उन्हें खेती में ही नष्ट कर देते हैं। सच यह भी हैं की जमीन सिमित हैं। ऐसे में सस्ती और टिकाऊ खेती ही अंतिम विकल्प हैं।

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गौ को कृषि में साझेदारी बनाये

यदि किसान प्राकृतिक खेती अपनाते हैं तो महंगे खाद, कीटनाशक आदि से मुक्त होकर बेहतर समृद्धि की और बढ़ सकते हैं, क्योंकि कृषि में खर्च 50% कम हो जाता हैं, इसके लिए किसान को अपनी भूमि के संवर्धन के उपाय व आधुनिक प्राकृतिक कृषि सूत्रों का उपयोग करना होगा, आज यूरिया, फॉस्फेट आदि के लम्बे समय तक उपयोग से भूमि अम्लीयता आने एवं भूमि में कार्बनिक तत्वों, सूक्ष्म रासायनिक व सूक्ष्म जीवाणुओं के समाप्त होने से लाखों एकड़ भूमि बंजर हो चुकी हैं, जो अब प्राकृतिक खेती अपना रहे हैं।

गौ आधारित प्राकृतिक खेती

शास्त्रों में कहा गया हैं की गोबर में लक्ष्मी का वास हैं, आज का विज्ञानं इसे सिद्ध कर चूका हैं, क्योंकि गौ को गोबर की सहायता से भूमि की अम्लीयता ख़त्म हो जाती हैं, भूमि के कणिक तत्वों की पूर्ति होती हैं, जो की जमीन के अंडे केंचुए आदि लाभदायक जीवों का पोषण करते हैं व असंख्य संख्या में कृषि के सर्वोपरि सूक्ष्म जीवाणुओं को बढ़ाते हैं।

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गौ के गोबर व गौ मूत्र में भूमि के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्व मौजूद हैं, वर्तमान में अज्ञानतावश इनका सही ढंग से उपयोग नहीं हो रहा है। गोबर व गौ मूत्र से किसान अत्यंत लाभ कमा सकते हैं व यूरिया से मुक्ति पा सकते हैं, अतः गौ/बेल को कृषि में अपना लाभदायक साझेदार समझे, बिना दूध देने वाली गौ भी गोबर और गौ मूत्र के आधार पर एक लाभदायक हिस्सेदार हैं, अपने खेत पर प्रति बीघा कम से कम एक गौ वंश जरूर पाले।

प्राकृतिक खेती के उद्देश्य

खेती की लागत कम करके अधिक लाभ लेना, जमीन/मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाना, रासायनिक खाद/कीटनाशकों के प्रयोग में कमी लाना, कम पानी/सिंचाई अधिक उत्पादन लेना, किसानों की बाजार निर्भरता में कमी लाना।

गौ आधारित प्राकृतिक खेती से होने वाले लाभ

प्राकृतिक खेती के कई लाभ हैं, इससे खेत और किसान दोनों आत्मनिर्भर होते हैं, तो कुछ ही सालों में आपके खेत की उत्पादन क्षमता का स्वाभाविक विकास इतना हो जाता हैं की बहुत अधिक पानी और खाद की जरूरत नहीं रह जाती।

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कम लागत पर अधिक कृषि उत्पादन

किसानों की रासायनिक खाद पर निर्भरता घाट जाती हैं, किसान खुद खाद तैयार कर सकते हैं, इसलिए उन्हें सरकार और खाद आपूर्तिकर्ताओं की और मुँह उठाये नहीं रहना पड़ता हैं, चूँकि प्राकृतिक खेती सस्ती हैं, इसलिए किसान को कम लागत पर अधिक कृषि उत्पादन का भरपूर अवसर मिलता हैं। प्राकृतिक खेती से भूमि की उपजाऊ क्षमता बढ़ती हैं, रासायनिक खाद पर निर्भरता कम हो जाती हैं, कम लागत में बेहतर उपज। प्राकृतिक खेती पर्यावरण की मित्र हैं, यह पर्यावरण और जीव विविधता के लिए अनुकूल हैं।

भूमि के जल स्तर में वृद्धि

प्राकृतिक खेती से भूमि के जल स्तर में वृद्धि होती हैं, यह जल और मिट्टी के माध्यम से होने वाले प्रदूषण में कमी लती हैं, इसमें खाद बनाने के लिए कचरे का उपयोग होता हैं। इससे कचरा प्रबंधन में भी हमे मदद मिलती हैं।प्राकृतिक खेती सिंचाई संकट में भी निकलने का बड़ा रास्ता देती हैं, कम अंतराल पर सिंचाई नहीं करनी पड़ती हैं।

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मृदा की जलधारण की क्षमता बढ़ती

दूसरी बात की प्राकृतिक खाद से खेतों में जलधारण की क्षमता बढ़ती हैं। तीसरी बात की प्राकृतिक खेती से खेत के पानी का भाप बनकर उड़ने की प्रक्रिया कम होती हैं। इससे खेतों में लम्बे समय तक नमि बनी रहती हैं और सिंचाई मंद में किसान के खर्च को कम करती हैं। प्राकृतिक खेती से उत्पादित फसलों में सड़ने और गलने की दर रासायनिक खाद के मुकाबले मंद होती हैं। यानी फल हो या सब्जी जल्दी सड़ते और गलती नहीं हैं। इससे किसानों को अपनी फसल बचाने के लिए ज्यादा समय मिलता हैं। प्राकृतिक खेती का दीर्घकालीन सकारात्मक प्रभाव भी हैं।

खेती की गुणवत्ता में सुधार

खेती की गुणवत्ता को बनाये रखने में ये कारगर हैं। प्राकृतिक खादे व प्राकृतिक किट तथा खरपतवार नियंत्रक रासायनिक उर्वरकों आदि की तुलना में कम खर्च (लगभग 75-85%) में तैयार कर सकते हैं। प्राकृतिक कृषि उत्पादों की उपलब्धता ग्राम स्तर पर ही हो सकती हैं, स्थानीय संसाधनों के विवेकपूर्ण प्रयोग से उत्पादित पदार्थों की गुणवत्ता, पौष्टिकता एवं प्रति उन्नत उत्पादन क्षमता में निरंतर वृद्धि होती हैं। पोषणीयता प्राकृतिक खादों के संतुलित प्रयोग से मृदा की भौतिक, रासायनिक व प्राकृतिक संरचना में गुणोत्तर वृद्धि होती हैं। प्राकृतिक उत्पाद अधिक स्वास्थ्यवर्धक होते हैं।

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संतुलित विकास

प्राकृतिक तकनीक व स्थानीय कृषि तकनीक से समन्वित कृषि का विकास होता हैं। प्राकृतिक खेती और विभिनत्ता व विविधता के कारण संतुलित विकास में सहायक होती हैं। कम लागत, स्थानित निर्माण व उपयोगिता के विभिन्न गुण प्राकृतिक खादों को किसान के लिए मित्रवत बनाते हैं।प्राकृतिक खाद से मृदा मे जल धारण क्षमता, पि.एच. मान, जीवाश्म का अनुपात आदि में वृद्धि होती हैं। प्राकृतिक खेती में कम लागत व गुणोत्तर उत्पादन से सकल आय में बढ़ोतरी होती हैं, प्राकृतिक कृषि उत्पादों की बिक्री व निर्यात में 30-40% अधिक मूल्य भी मिलता हैं।

खरपतवार व कीड़ों के प्रकोप में कमी

प्राकृतिक खादों के नित्य प्रयोग से रासायनिक विधि की खेती-बाड़ी की तुलना में खरपतवार व कीड़ों के प्रकोप में कमी आती हैं। फलतः रासायनिक खरपतवार व कीटनाशी पर खर्च तथा उनके विभिन्न हानिकारक आयाम जैसे मित्र कीटों में कमी, प्रदूषण, खाद्य श्रंखला में विष प्रकोप आदि से बचा जा सकता हैं। प्राकृतिक खादों के प्रयोग से उत्पादित कृषि उत्पादनों में भंडारण क्षमता तुलनात्मक रूप से लगभग 30-40% अधिक होती हैं।

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प्राकृतिक खेती के मुख्य अवयव

बीजामृत (बीज शोधन)

100 की.ग्रा. बीज के लिए सामग्री 5कि.ग्रा. गौ का गोबर, 5 लिटर गौ का गौ मूत्र, 20 लीटर पानी, 50 ग्राम चुना, 50 ग्राम मेड की मिट्टी।

बनाने की विधि

इस सभी सामग्री को चौबीस घंटे एक साथ पानी में डालकर रखे, दिन में दो बार लकड़ी से घोले, बाद में बीज पर बनाए हुए बीजामृत का छिड़काव करें, बीज को मिलाकर छाया में सुखाए और बाद में बीज बोए। बीज शोधन से बीज जल्दी और ज्यादा मात्रा में उग आते हैं, जड़े गति से बढ़ती हैं और भूमि से पेड़ों पर जो बिमारियों का प्रदुर्भाव होता हैं वह नहीं हो पाता हैं।

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अवधि प्रयोग

बुवाई के 24 घंटे पहले बीजशोधन करना चाहिए।

जीवामृत

घन जीवामृत (एक एकड़ खेत के लिए)

सामग्री

100 की.ग्रा. गौ का गोबर, 1 की.ग्रा. गुड़/फलों के गूदे की चटनी, 2 की.ग्रा. बेसन (चना, उड़द, अरहर, मुंग), 50ग्राम मेड या जंगल की मिट्टी, 1 लीटर गौ मूत्र।

बनाने की विधि

सर्वप्रथम 100 किलोग्राम गौ के गोबर को किसी पक्के फर्श व पॉलीथिन पर फैलाए फिर इसके बाद1 किलोग्राम गुड़ या फलों के गुदों की चटनी व 1 किलोग्राम बेसन को डाले इसके बाद 50 ग्राम मेड या जंगल की मिट्टी डालकर तथा 1 लीटर गौ मूत्र सभी सामग्री को फावड़ा से मिलाए फिर 48 घंटे छायादार स्थान पर एकत्र कर या थापिया बनाकर जुट के बोरे से ढक दें। 48 घंटे बाद उसको छाया में सुखाकर चूर्ण बनाकर भंडारण करें।

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अवधि प्रयोग

इस घन जीवामृत का प्रयोग छः माह तक कर सकते हैं।

सावधानियां

साथ दिन का छाया में रखा हुआ गोबर का प्रयोग करें, गौ मूत्र किसी धातु के बर्तन में न ले या रखे।

छिड़काव

एक बार खेत जुताई के बाद घन जीवामृत का छिड़काव कर खेत तैयार करें।

जीवामृत (एक एकड़ हेतु)

सामग्री

10 किलो देशी गाय का गोबर, 5-10 किलोग्राम गौ मूत्र, 2 किलोग्राम गुड़ या फलों के गुदों की चटनी, 2 किलोग्राम बेसन(चना, उड़द, मुंग), 200 लीटर पानी, 50 ग्राम मिट्टी।

बनाने की विधि

सर्वप्रथम कोई प्लास्टिक की टंकी या सीमेंट की टंकी ले फिर उस पर 200 ली. पानी डालें। पानी में 10 किलो गाय का गोबर व 5-10 लीटर गौ मूत्र एवं 2 किलोग्राम गुड़ या फलों के गुदो की चटनी मिलाए। इसके बाद 2 किलोग्राम बेसन, 50 ग्राम मेड की मिट्टी या जंगल की मिट्टी डालें और सभी को डंडे से मिलाए। इसके बाद प्लास्टिक की टंकी या सीमेंट की टंकी को जालीदार कपड़े से बंद कर दे। 48 घंटे में चार बार डंडे से चलाए और 48 घंटे बाद तैयार हो जाएगा।

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अवधि प्रयोग

इस जीवामृत का प्रयोग केवल सात दिनों तक कर सकते हैं।

सावधानियां

प्लास्टिक व सीमेंट की टंकी को छाए में रखे जहां पर धुप न लगे, गौ मूत्र को धातु के बर्तन में रखें, छाए में रखा हुआ गोबर का ही प्रयोग करें।

छिड़काव

जब जीवामृत को पानी सिंचाई करते हैं तो पानी के साथ छिड़काव नहीं करते तो स्प्रे मशीन द्वारा छिड़काव करें। पहला छिड़काव बोआई के 15 से 21 दिन बाद 5 लीटर छना जीवामृत 100 लीटर पानी में घोलकर, दूसरा छिड़काव बोआई के 30 से 45 दिन बाद 5 लीटर छना जीवामृत 100 ली. पानी में घोलकर, तीसरा छिड़काव बोआई के 45-60 दिन बाद 10 ली. छना जीवामृत 150 ली. पानी में घोलकर। 60से 90 दिन की फसलों में, चौथा छिड़काव बोआई के 60 से 75 दिन बाद 20 ली. छना जीवामृत 200 ली. पानी में घोलकर 90 से 180 दिन की फसलों में, पांचवा छिड़काव बोआई के 75-90 दिन बाद 20 ली. छना जीवामृत 200 लीटर पानी में घोलकर।

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छठा छिड़काव बोआई के 90 से 105 दिन बाद 25 ली. छना जीवामृत 200 ली. पानी में घोलकर। सत्व छिड़काव बोआई के 105 से 120 दिन बाद 25 ली. छना जीवामृत 200 ली. पानी में घोलकर। आठवां छिड़काव बोआई के 120 से 135 दिन बाद 25 ली. छना जीवामृत 200 ली. पानी में घोलकर। नौवां छिड़काव बोआई के 135 से 150 दिन बाद 25 ली. छना जीवामृत 200 ली. पानी में घोलकर। दसवां छिड़काव बोआई के 150 से 200 दिन बाद 30 ली. छना जीवामृत 200 ली. पानी में घोलकर।

कीटनाशी दवाएं

नीमास्त्र(रस चूसने वाले किट एवं छोटी सुंडी इल्लियों के नियंत्रण हेतु)

सामग्री

5 की.ग्रा. नीम की टहनिया, 5 किलोग्राम नीम फल/नीम खली, 5 लीटर गौ मूत्र, 1 की.ग्रा. गौ का गोबर।

बनाने की विधि

सर्वप्रथम प्लास्टिक के बर्तन पर 5 किलोग्राम नीम की पत्तियों की चटनी और 5 किलोग्राम नीम के फल पीस व कूट कर डालें एवं 5 लीटर गौ मूत्र व 1 किलोग्राम गौ का गोबर डालें इन सभी सामग्री को डंडे से मिलाकर जालीदार कपड़ें से ढक दें। यह 48 घंटे में तैयार हो जाएगा। 48 घंटे में चार बार डंडे से मिलाए।

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अवधि प्रयोग

नीमास्त्र का प्रयोग छः माह तक कर सकते हैं।

सावधानियाँ

इसे छाया में रखे धुप से बचाए।

गौ मूत्र प्लास्टिक के बर्तन में ले या रखें।

छिड़काव

100 ली. पानी में तैयार नीमास्त्र को छान कर मिलाए और स्प्रे मशीन से छिड़काव करें।

ब्रम्हास्त्र (अन्य किट बड़ी सुंडी इल्लियां)

सामग्री

10 लीटर गौ मूत्र, 3 किलोग्राम नीम की पत्ती की चटनी, 2 किलोग्राम करंज की पत्तों की चटनी, 2  किलोग्राम सीताफल पत्ते की चटनी, 2 किलोग्राम बेल के पत्ते, 2 किलोग्राम अरंडी के पत्ते की चटनी, 2 किलोग्राम धतूरा के पत्ते की चटनी।

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बनाने की विधि

इन सभी सामग्री में से कोई भी पांच सामग्री के मिश्रण को गौ मूत्र में मिट्टी के बर्तन पर डालकर आग में उबाले जैसे चार उबले आ जाए तो आग से उतारकर 48 घंटे छाया में ठंडा होने दें। इसके बाद कपड़े से छानकर भंडारण करें।

अवधि प्रयोग

ब्रह्मास्त्र का प्रयोग छः माह तक कर सकते हैं।

सावधानियां

भण्डारण मिट्टी के बर्तन में करें।

गौ मूत्र धातु के बर्तन में न रखें।

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छिड़काव

एक एकड़ हेतु 100 लीटर पानी में 3 से 4 लीटर ब्रह्मास्त्र मिला कर छिड़काव करें।

अग्नि अस्त्र (तना किट फलों में होने वाली सुंडी एवं इल्लियों के लिए)

सामग्री

20 लीटर गौ मूत्र, 5 किलोग्राम नीम के लिए पत्ते की चटनी, आधा किलोग्राम तम्बाकू का पाउडर, आधा किलोग्राम हरी मिर्च, 500 ग्राम देशी लहसुन की चटनी।

बनाने की विधि

उपयुक्त ऊपर लिखी हुई सामग्री को एक मिट्टी बर्तन में डालें और आग से चार बार उबाल आने दे। फिर 48 घंटे छाया में रखें। 48 घंटे में चार बार डंडे से चलाए।

अवधि प्रयोग

अग्नि अस्त्र का प्रयोग केवल तीन माह तक प्रयोग कर सकते हैं।

सावधानियां

मिट्टी के बर्तन पर ही सामग्री को उबाल आने दें।

छिड़काव

5 ली. अग्नि अस्त्र को छानकर 200 लीटर पानी में मिलाकर स्प्रे मशीन या नीम के लेवचा से छिड़काव करें।

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फंगीसाइड फफूंदनाशक दवा

100 लीटर पानी में 3 लीटर खट्टी छाछ (मट्ठा) का खूब अच्छी तरह मिलाकर फसल में छिड़काव करें।

दशपर्णी अर्क (सभी तरह के रस चूसक किट और सभी इल्लियों के नियंत्रण के लिए)

सामग्री

200 ली. पानी, 2 की.ग्रा. करंज के पत्ते, 2 की.ग्रा. सीताफल के पत्ते, 2 की.ग्रा. धतूरा के पत्ते, 2 की.ग्रा. तुलसी के पत्ते, 2 की.ग्रा. पपीता के पत्ते, 2 की.ग्रा. गेंदा के पत्ते, 2 की.ग्रा. गौ का गोबर, 500 ग्राम तीखी हरी मिर्च, 200 ग्राम अदरक या सोंठ, 5 की.ग्रा. नीम के पत्ते, 2 की.ग्रा.  बेल के पत्ते, 2 की.ग्रा. कनेर की पत्ती, 10 लीटर गौ मूत्र, 500 ग्राम तम्बाकू पीस के या काटकर, 500 ग्राम हल्दी पीसी।

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बनाने की विधि

सर्वप्रथम एक प्लास्टिक के ड्रम में 200 ली. पानी डालें फिर नीम करंज, सीताफल, धतूरा, बेल, तुलसी, आम, पपीता, कंजरे, गेंदा की पत्ती की चटनी डालें और डंडे से चलाएं फिर दूसरे दिन तम्बाकू, मिर्च, लहसुन, सोंठ, हल्दी डालें फिर डंडे से चलाकर जालीदार कपड़े से बंद कर दें और 40 दिन छाया में रखा रहने दे, परन्तु सुबह शाम चलाए।

अवधि प्रयोग

इसको छः माह तक प्रयोग कर सकते हैं।

सावधानियां

इस दशपर्णी अर्क को छाया में रखें, इसको सुबह शाम चलाना न भूलें।

छिड़काव

200 ली. पानी में 5 से 8 ली. दशपर्णी अर्क मिलाकर छिड़काव करें।

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