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गोट फार्मिंग – फैशन डिजाइनर श्वेता तोमर बनी रोल मॉडल

गोट फार्मिंग
Written by bheru lal gaderi

गोट फार्मिंग – फैशन डिजाइनर श्वेता तोमर बनी रोल मॉडल – अक्सर हम गांव से शहरों की ओर पलायन की खबरें पढ़ते रहते हैं पर धीरे-धीरे अब हवा की दिशा बदल रही है। साइंस, मैनेजमेंट, फैशन मीडिया जैसे क्षेत्रों में काम कर रहे युवा भी गांवों का रुख कर रहे हैं। इसे युवक ही नहीं युवतियों की तादात में अच्छी खांसी है, जो गावों में बेहतर जिंदगी का सपना लिए लौट रही है। कारण कुछ भी हो स्वास्थ्य की फिक्र या शांति की चाह पर यह बदलाव एक अच्छी खबर है।

गोट फार्मिंग

Image Credit – indiamantra

उत्तराखंड के देहरादून जिले के भागपुर गांव की श्वेता तोमर भी इन्हीं में से एक है। साइंस में स्नातक कोर्स चंडीगढ़ से फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने के बाद पता श्वेता पहले दिल्ली, नोएडा और फिर जयपुर में कुछ समय तक नौकरी की पर उनका मन नहीं लगा। गांव की शांति जैसे उन्हें अपनी ओर खींचती रही थी पर इतनी पढ़ाई के बाद बेरोजगार रहना भी उन्हें मंजूर नहीं था। तब उन्होंने गोट फार्मिंग ( Got farming) शुरू की ससुराल वालों ने भी इस काम में उनकी पूरी मदद की।

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ऑनलाइन बकरियां खरीद

आज उनकी अपनी वेबसाइट है जहां ऑनलाइन बकरियां खरीदी जा सकती है। मांग अच्छी रहने पर औसतन हर रोज 20 से 30 बकरियों की बिक्री हो जाती है। अब उन्होंने बछिया पालन की दिशा में भी काम शुरु किया हे कई किसान उनसे गोट फार्मिंग के गुर सीख रहे हैं चुला-चौका करने वाली महिलाएं भी इस काम के लिए आगे आ रही है। श्वेता इनकी रोल मॉडल बन चुकी है।

हालांकि उच्च शिक्षा प्राप्त श्वेता के लिए यह सब कुछ आसान भी नहीं था। शादी के बाद बेंगलुरु शिफ्ट होना पड़ा तो श्वेता को नौकरी छोड़नी पड़ी। वहां उन्होंने गोट फार्मिंग के बारे में जानकारी जुटाई। महीनों के प्रशिक्षण के बाद परिवार के सहयोग पर वह उत्तराखंड लौटी। वे अपने पिता का कृषि फार्मिंग का सपना पूरा करना चाहती थी।  दरअसल भागपपुर गांव में उनके पिता अपने पुश्तैनी जमीन पर इसी तरह का फार्म बनाना चाहते थे पर असामयिक मृत्यु से उनका सपना अधूरा रह गया।

श्वेता बताती हैं कि उनके पति आईटी क्षेत्र में काम करते हैं और उन्होंने हमेशा मदद की है। लेकिन चुनौतियां तो हर काम में आएगी, प्रोजेक्ट बनाया तो 10000000 रूपए का खर्चा रहा था। कोई भी बैंक इतना पैसा देने को तैयार नहीं था। आखिरकार 30 लाख रूपय लोन मिला और करीब 15 लाख रूपय अपने पास से लगाकर श्वेता ने बकरी पालन की शुरुआत की।

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अत्याधुनिक गोट फार्मिंग

श्वेता का प्रेम एग्रो फार्म अब तक अत्याधुनिक बकरी फार्म बन चुका है। वह बकरियों के साथ मुर्गियां  भी पाल रही है और अलग से गौशाला भी शुरू करने की योजना है। ऊपर बकरियों और नीचे मुर्गियों के प्लेटफार्म वैज्ञानिक तरीके से तैयार किए गए हैं।

गोट फार्मिंग

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श्वेता के गोट फार्मिंग में सिरोही, बरबरी, जमुनापारी और तोतापारी जैसी ब्रीड के बकरी-बकरे हैं जिनकी कीमत 5000 से लेकर एक लाख रूपय तक हैं। कर्मचारियों के साथ श्वेता भी काम काज में जुटी रहती हैं। बकरियों का दूध निकालना हो या बीमार होने पर दवा का प्रबंध, उन्हें यह सब अच्छा लगता है।

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कृषि और पशुपालन

श्वेता बताती हैं कि सदियों से कृषि और पशुपालन आपस में जुड़ा रहा है। अगर किसान खेती के साथ पैसे और जमीन के हिसाब से 1,2,10 या फिर फार्म तैयार कर भेड़, बकरी, गाय, भैंस पाले तो अच्छी आमदनी की जा सकती है। उन्होंने अपने अनुभव बांटते हुए कहा कि यह फार्म तैयार करते समय जलवायु के हिसाब से ब्रीड का चुनाव और आसपास हरी घास होना सुनिश्चित कर लेने से काम काफी आसान हो जाता है।

बकरियों का दूध निकाल कर बेचा जा सकता है और गोबर खेतों में खाद के तौर पर इस्तेमाल कर लिया जाता है। वह राजस्थान के सिरोही ब्रीड को काफी अच्छी मानती है वह कहती है कि गांव में भैंस गाय प्रायः घर की महिलाएं ही तो पालती हैं। ऐसे में यह स्वरोजगार महिलाओं के लिए काफी आसान और लाभकारी हो सकता है बस इसके लिए एक कदम बढ़ाना होगा।

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युवाओं का स्टार्टअप आईडिया लाएगा बदलाव

महंगाई के अलावा बिजली पानी की समस्या खाद बीज और उन्नत तकनीक का अभाव जहां गांवों में निराशा के बादल को दिखाता है तो वही अपने पेशेवर क्षेत्रों को छोड़कर गृह राज्य लौटने वाले युवाओं का फैसला नए उम्मीद लेकर आता है। जैसे युवाओं ने अपने नए नए स्टार्टअप आईडिया के साथ सामाजिक पहलू को भी आत्मसात किया है। अब ये लोग न सिर्फ स्थानीय लोगों को रोजगार दे रहे हैं बल्कि महामारी की तरह बढ़ रही पलायन की समस्या को दूर करने में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं।

स्टार्ट अप की शुरुआत के लिए दो बातों का होना जरूरी पहला नवाचार यानी नया विचार और दूसरा जोखिम उठाने का हौसला। यह दोनों ही खूबियां युवाओं में होती है। जानकारों का कहना है कि सोशल स्टार्टअप एक मिशन है, उस सामाजिक ताने-बाने को विकास के रास्ते पर लाने का जो सरकारी प्रयासों से औपचारिकता मात्र समझे जाते हैं। अच्छी बात यह है कि बदलाव लाने की जिम्मेदारी युवाओं ने अपने कंधो पर उठा ली और सुखद परिणाम देखने भी लगे है। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों की भूमिका बढ़ सकती हैं।

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Aurthor :- 

प्रतिमा मिश्रा
स्वतंत्र पत्रकार

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