agriculture खरपतवार

गेहूं में खरपतवार की समस्या व रोकथाम

गेहूं में खरपतवार
Written by bheru lal gaderi

गेहूं रबी की उत्तर भारत की एक मुख्य फसल है। नई किस्मों, खाद व पानी का समुचित प्रयोग करने से गेहूं की पैदावार प्रति एकड़ तो बड़ी है परंतु इसके साथ-साथ खरपतवारों की समस्या भी बढ़ गई है। धान-गेहूं फसल चक्र वाले इलाकों में गुल्ली-डंडा (कनकी) की एक बहुत बड़ी समस्या बन गया है। इसके अलावा इन इलाकों में लोम्बडा घास, पोआ घास, पितपापडा, जंगली पालक व मालवा की समस्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। प्रांत के दक्षिण पश्चिमी क्षेत्र जहां पर गेहूं की काश्त कपास, बाजरा, ग्वार व ज्वर के बाद की जाती है वहां पर जंगली जई, बथुआ, खडबाथू, गुल्ली डंडा, हिरनखुरी, मेथा, गजरी, प्याजी व कंटीली पालक खरपतवार पाए जाते हैं। अगर गेहूं की फसल में खरपतवार नियंत्रण न किया जाए तो पैदावार में 25 से 75% तक गिरावट आ सकती है।

गेहूं के मुख्य खरपतवार           

घास जाती के खरपतवार गुल्ली डंडा, जंगली जई, पोआ घास या घुई, लोम्बड घास, राइ आदि शादी।

चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार

बथुआ, जंगली पालक, खडबाथू, मेणा,मेथा, हिरणखुरी, कृष्णनील, पितपापड़ा, चटरी, मटरी, मालवा, प्याजी, गजरी व कंडाई आदि।

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खरपतवारों की रोकथाम

खरपतवारों के कारण न केवल फसल का उत्पादन कम होता है बल्कि उत्पादित फसल में बीज की गुणवत्ता भी कम हो जाती है। इसलिए समय पर खरपतवार नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है। गेहूं की फसल में खरपतवार की रोकथाम दो तरीकों से की जाती है।

निराई-गुड़ाई द्वारा

निराई-गुड़ाई करके खरपतवारों को नष्ट करने का तरीका सदियों पुराना है। व आज भी कारगर है। खुरपा,कस्सी, कसोले, व्हील हैंड हो व हाथ से खरपतवारों को आसानी से नष्ट किया जा सकता है। अगर संभव हो तो कोर लगाने के 10 दिन बाद का कसोले या खुरपे से एक बार निराई-गुड़ाई करे।  निराई-गुड़ाई से न केवल खरपतवारों का नियंत्रण होता है बल्कि पौधों की जड़ों को हवा भी मिलती है व खेत में नमी का संरक्षण होता है। जो अधिक पैदावार में सहायक है। लेकिन निराई-गुड़ाई हर जगह संभव नहीं है। समय पर मजबूर ना मिलना, मजदूरी के अधिक लागत, खेत की अवस्था व बारिश के मौसम में निराईगुड़ाई संभव नहीं है। ऐसी अवस्था में खरपतवारों का प्रयोग कर पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

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खरपतवारनाशीयो के प्रयोग द्वारा

खरपतवारनाशी खरपतवारों को उगने से पहले भी नष्ट कर देते हैं। जिससे फसलों में होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है। प्रदेश के धान-गेहूं फसल चक्र वाले क्षेत्रों में पिछले 20 साल पहले कनकी खरपतवार में आइसोप्रोट्यूरान नामक खरपतवार नाशक के प्रति प्रतिरोधीता आ गई थी परंतु अब पिछले 3-4 वर्षों से अन्य खरपतवार नाशक में भी यह प्रतिरोधीता बढ़ती जा रही है। खरपतवारनाशीयो के प्रयोग में सावधानी आवश्यक है वरना यह फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं। क्योंकि उचित मात्रा, समय पर उपचार/छिड़काव, छिड़काव के लिए पानी की मात्रा व विधि अपनाकर खरपतवारों को आसानी से नष्ट किया जा सकता है। खरपतवार नियंत्रण के लिए फ्लैट फें नोजल या फ्लड जेट नोजल का इस्तेमाल करें। विभिन्न खरपतवारनाशियों द्वारा गेहूं में खरपतवार नियंत्रण की विधि नीचे दी गई है-

  • जिन खेतों में केवल चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार हो वहां पर 2,4-डी या अलग्रीप में (मेटसल्फ्युरोन) का प्रयोग करने से ही खरपतवारों का नियंत्रण अच्छी प्रकार से हो जाता है। पिछले कुछ सालों में जंगली पालक की समस्या ज्यादा देखने को मिल रही हैं। अतः जिन खेतों में जंगली पालक की समस्या हो वहां पर केवल अलग्रीप का ही प्रयोग करें क्योंकि जंगली पालक का नियंत्रण 2,4-डी से नहीं होता। अलग्रीप जंगली पालक के साथ-साथ बाथू, सैंजी, मेणा, मेथा, पीतपापड़ा आदि को भी नियंत्रित करती है। हिरनखुरी व मालवा खरपतवार का नियंत्रण केवल एफिनिटी द्वारा व गजरी  का नियंत्रण के 2,4-डी या ऐलीएक्सप्रेस द्वारा ही संभव है।

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  • खरपतवारनाशक-प्रतिरोधी मंडुसी/गुल्ली डंडा के प्रबंधन के लिए पेंडीमेथिलीन 30  ई.सी. को 2 लीटर प्रति एकड़ की दर से 200 लीटर पानी में घोल बनाकर बिजाई के तुरंत बाद छिड़काव करें तथा बिजाई के 35 दिन बाद किसी एक शिफारिशशुदा खरपतवारनाशी (क्लोडिनाफोप 15 डब्ल्यू.पी. 160 ग्राम प्रति एकड़ या पिनोक्साडेन 5 ई.सी. 400 मिली प्रति एकड़ या सल्फोसल्फ्युरोन 75 डब्ल्यू.जी. 13 ग्राम प्रति एकड़ या सल्फोसल्फ्युरोन+मेटसल्फ्युरोन 80 डब्ल्यू.जी. (तैयार मिश्रण) या मिजोसल्फ्युरोन+  आइसोसल्फ्युरोन  3.6 डब्ल्यू.डी.जी. 160 ग्राम प्रति एकड़ (तैयार मिश्रण) का छिड़काव करें। इनमे से जिस खरपतवारनाशक ने गत वर्ष परिणाम अच्छे नहीं दिए हैं उसका प्रयोग ना करें तथा खरपतवारनाशकों का अद्ल-बदल कर प्रयोग करें। पेंडामेथालिन के छिड़काव के समय भूमि की ऊपरी सतह पर भरपूर नमी होनी चाहिए। अगर फसल में केवल जंगली जई की समस्या हो तोक्लॉडिना फोप, फिनेक्साप्रॉप या पिनोक्साडेन का ही इस्तेमाल करें परंतु चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार इकट्ठे हो तो टोटल,सल्फोसल्फ्युरोन, एटलांटिस,अकोर्ड प्लस या वेस्ता का इस्तेमाल करें।
  • गेहूं-धान फसल चक्र में जहां फिनोक्साप्रोप, क्लोडिनाफोप से कनकी की रोकथाम नहीं हो रही वहां पिनोक्साडेन, सल्फोसल्फ्युरोन, एटलांटिस या अकोर्ड प्लस का इस्तेमाल करें। अब अकोर्ड प्लस गेहूं की कुछ किस्मों (पी.बी.डब्ल्यू.550, डब्ल्यू.एच. 542, डब्ल्यू.एच.283, एच.डी. 2894, एच.डी.2851, एच.डी 2733 बरबट) में आरंभिक अवस्था में कुछ नुकसान कर सकते हैं, लेकिन 3-4 सप्ताह बाद ठीक हो जाता है। इन किस्मों में अकोर्ड प्लस के छिड़काव में सावधानी बरतें। एफिनिटी अकेले या पिनोक्साडेन के साथ मिलाकर छिड़कने से भी गेहूं के पौधों पर गोल निशान पड़ जाते हैं लेकिन 3-4 सप्ताह बाद ठीक हो जाते हैं व गेहूं की पैदावार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अगर गेहूं की कटाई के तुरंत बाद ज्वर,मक्का या लोबिया की बिजाई करनी है तो गेहूं की फसल में सल्फोसल्फ्युरोन, टोटल या एटलांटिस का छिड़काव ना करें। गेहू की चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों में अगर हिरनखुरी, मटरी, चटरी व कंडई खरपतवारों की समस्या ज्यादा हो तो 2,4- डी की 500 ग्राम मात्रा प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करें।

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  • खरपतवारनाशियों के प्रयोग हेतु निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए
  • खरपतवारनाशी की सिफारिश की गई मात्रा का छिड़काव 150-200  लीटर पानी में मिलाकर फ्लैट फेन नोजलयुक्त हस्तचालित स्प्रे पंप द्वारा करना चाहिए व स्प्रे एकसार होना चाहिए।
  • खरपतवारनाशी का स्प्रे तरबतर खेत में ही करें। अगर शुष्क हो जाए तो स्प्रे के लिए पानी की ज्यादा मात्रा का प्रयोग करें।
  • अगर 2,4- डी का छिड़काव ऊपर बताए गए समय से अगेता या पछेता हो जाए तो गेहू के होने वाले बाले टेढ़ी-मेडी निकलती है तथा पैदावार में भारी कमी आ जाती है।
  • फिनोक्साप्रोप, क्लोडिनाफोप व सल्फोसल्फ्युरोन के साथ 2,4- डी, या एफिनिटी या अलग्रिप मिलाकर छिड़काव करने से इन दवाइयों का गुल्ली डंडा व जंगली जई पर नियंत्रण कम हो जाता है। इसलिए अगर गुल्ली-डंडा के लिए फिनोक्साप्रोप, क्लोडिनाफोप व सल्फोसल्फ्युरोन का प्रयोग किया गया है तो इसमें 7 से 10 दिन बाद 2,4- डी  का छिड़काव करें।
  • चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों में अगर हिरणखुरी, मटरी, चटरी व कड़ई में खरपतवारों की समस्या ज्यादा हो तो 2,4- डी की 500 ग्राम मात्रा प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करें।
  • अगर गेहूं की कटाई के तुरंत बाद ज्वार, मक्का या लोबिया की बिजाई करनी हो तो गेहूं की फसल में सल्फोसल्फ्युरोन, टोटल या एटलांटिस का छिड़काव ना करें।
  • मंडुसी/ गुल्ली-डंडा/ कनकी के प्रति प्रतिरोधिता से बचने के लिए हर साल खरपतवारनाशको का अद्ल-बदल कर प्रयोग करें।
  • अलग्रीप व 2,4- डी का स्प्रे करने के बाद पंप को थोड़े सोडे या सर्फ से अच्छी तरह साफ कर लें अन्यथा अगर यही पंप चौड़ी पत्ती वाले फसल में स्प्रे के लिए प्रयोग किया जाए तो फसल में भारी नुकसान हो सकता है।
  • अगर हवा जोर से चल रही हो तो 2,4- डी व सल्फोसल्फ्यूरों का छिड़काव ना करें अन्यथा पास वाले खेत में खड़ी सरसों या चने की फसल जल जाएगी।

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लेखक

वीरेंद्र सिंह हुड्डा, मीनाक्षी सांगवान

सस्य विज्ञान विभाग,

चौ.च.सि. हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय,

हिसार 125004

स्त्रोत

फसल क्रांति कृषि पत्रिका

website- www.fasalkranti.com

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bheru lal gaderi

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