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गेहूं की पछेती खेती के लिए बहुत उपयोगी जानकारी

गेहूं की पछेती खेती
Written by bheru lal gaderi

गेहूं की भरपूर उपज प्राप्त करने के लिए समय से बुवाई करना अत्यंत आवश्यक है। लेकिन उत्तर-पश्चिमी भारत के कुछ ऐसे भी क्षेत्र हैं जहां पर गेहूं की पछेती खेती करना एक वास्तविकता है। उदाहरण स्वरूप हरियाणा राज्य में लगभग 1100000 हेक्टेयर क्षेत्र ऐसा है जिस में गेहूं देर से बोया जाता है। राजस्थान की इंदिरा गांधी एवं चंबल नदी क्षेत्र में भी लगभग 25% क्षेत्र में गेहूं देरी से बोया जाता है।

गेहूं की पछेती खेती

इसी प्रकार पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भाग में गेहूं की काश्त प्रायः पछेती दशा में ही की जाती है। विशेषकर धान (बासमती) अथवा गन्ना, आलू या कपास की फसलों के बाद गेहूं की पछेती खेती अक्सर देर से संभव हो पाती है। कभी कभी बाढ़ के कारण खेतों का पानी देर से सुख पाता है। जिसके कारण कृषक गेहूं की बुआई समय से नहीं कर पाते है। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे उपयुक्त प्रजातियों को अपनाएं तथा  कुछेक बातों को ध्यान में रखे तो गेहूं की पछेती खेती से भी प्रति हेक्टेयर संतोषजनक उपज प्राप्त की जा सकती है।

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गेहूं की पछेती खेती के लिए उपयुक्त प्रजाति का चुनाव

कृषि वैज्ञानिकों द्वारा हाल-फिलहाल में कई ऐसी प्रजातियों का विकास किया गया है जो की बीमारियों के प्रति अवरोधी होने के साथ-साथ अधिक पैदावार देने में सक्षम हैं। इन प्रजातियों में राज-3765, जी डब्ल्यू-173, जी डब्ल्यू-273, लोक-1, राज-3077 के नाम मुख्य रूप से लिए जा सकते हैं। आप इन प्रजातियों की दिसंबर के अंत तक बुवाई करके 40 से 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार प्राप्त की जा सकती है। यदि गेहूं की बुवाई जनवरी माह के मध्य तक करना आवश्यक हो जाता है तब राज-3077, राज-3765 तथा लोक-1 प्रजातियों को ही प्रयोग में लाना चाहिए। मध्य जनवरी में बोई गई गेहूं की फसल से भी लगभग 35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पैदावार ली जा सकती है।

बीज की मात्रा बीज शोधन एवं बुवाई की विधि

मध्यम आकार के दाने वाली प्रजातियों का 125 किलोग्राम बीज एक हेक्टर क्षेत्र की बुआई करने के लिए प्रयोग में लाना चाहिए। यदि मोटे दाने वाली प्रजाति को प्रयोग में लाया जा रहा है तब इसकी मात्रा बढ़ाकर 150 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से कर देनी चाहिए। गेहूं की पछेती खेती में अक्सर कंडुआ रोग का अपेक्षाकृत अधिक प्रकोप देखने में आता है।

कंडवा नामक रोग पर नियंत्रण करने के लिए विटावेक्स दवा की 2 ग्राम मात्रा को 1 किलोग्राम बीज उपचारित करने के लिए उपयोग में लाना चाहिए। बीज की मात्रा बढ़ाने के साथ साथ यह भी आवश्यक है कि कुंडों के मध्य का फासला भी कम किया जाए सीड ड्रिल अथवा हल के फाल को इस तरह नियंत्रित किया जाए ताकि एक कुंड से दूसरे कुंड की दूरी घटकर 18 सेंटीमीटर आ जाए। ऐसा करने से प्रति इकाई पौधों की संख्या अधिक होने के कारण में वृद्धि कर पाना संभव हो जाता है।

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रसायनिक खाद उचित की मात्रा एवं प्रयोग विधि गेहूं की पछेती खेती में

बुवाई के समय एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 125 किलोग्राम डीएपी, 100 किलोग्राम यूरिया, 50 किलोग्राम म्यूरेट आफ पोटाश एवं 30 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रयोग में लाए। बुवाई करने के 25 दिन बाद प्रथम सिंचाई करें और नमी रहते 125 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टर के हिसाब से खड़ी फसल में बिखेरकर प्रयोग करें ध्यान रहे की पछेती फसलों में इससे ज्यादा यूरिया प्रयोग में ना लाएं। तत्पश्चात आवश्यकतानुसार सिंचाई देते रहना चाहिए। बालियां आने के बाद जमीन में नमी की कमी दानों में सिकुड़न का कारण बन सकती है। अतः इस बात का ध्यान रखें कि इसमें आवश्यक नमी बनी रहे तेज हवा चलते समय सिंचाई ना करें अन्यथा फसल गिरने का भय रहता है।

गेहूं की पछेती खेती में निराई गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण 

गेहूं की फसल में फ्लेरिस माइनर अथवा गुल्ली डंडा अथवा मंडुसी नामक खरपतवार के साथ-साथ जंगली जई, हिरनखुरी, बथुआ, कृष्ण नील, गाजर घास अधिक खरपतवारों का प्रकोप अक्सर देखने में आता है।  प्रथम सिंचाई के 10-12 दिन के अंदर कम से कम एक बार निराई गुड़ाई कर खरपतवार अवश्य निकाल दें एवं बाद में भी खरपतवार निकालते रहे।

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चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार

  1. चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार को नष्ट करने के लिए बोनी किस्मों में बुवाई के 30 से 35 दिन व अन्य किस्मों में 40 से 50 दिन के बीच 500 ग्राम २-4 डी एस्टर या 750 ग्राम 2-4 डी दी अमाइन सक्रिय तत्व निंदनाशी रसायन प्रति हेक्टर की दर से 500 से 700 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
  2. गेहूं चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों की रोकथाम के लिए मेटासल्फ्युरान मिथाइल ( एल्ग्रिप 20% डब्ल्यू पी) 4 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर का सरफेक्टेंट  (500 मिलीलीटर प्रति हेक्टर) के साथ बुवाई के 30 से 35 दिन के अंदर छिड़काव करें।
  3. गेहूं की घास वाले खरपतवार का नियंत्रण करने के लिए सल्फोसल्फ्युरोन खरपतवारनाशी का 25 ग्राम प्रति हेक्टर की दर से सरफेक्टेन्ट के साथ प्रथम सिंचाई के बाद छिड़काव करें सोयाबीन की फसल चक्र में सोयाबीन में खरपतवार नियंत्रण के लिए सिफारिश के अनुसार डाली गई एलाक्लोर की मात्रा 92 किलो प्रति हेक्टेयर) का गेहूं की फसल पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं देखा गया है।

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गुल्ली डंडा जंगली जई खरपतवार का प्रकोप जिन खेतों में गत वर्षो में अधिक रहा हो उनमें गेहूं की बुवाई के 30-35 दिन बाद आइसोप्रोट्यूरॉन अथवा मेटाक्सिरान अथवा मेंजोबेन्जाथयोजुरोन निंदनाशी, हल्की मिट्टी हेतु पोन किलो तथा भरी मिट्टी हेतु सवा किलो सक्रिय तत्व का पानी में घोल बनाकर एक सार छिड़काव करें। मेटाक्सिरान का छिड़काव करने से घास कुल की चौड़ी पत्ती वाले सभी खरपतवार समूल नष्ट हो जाते हैं। ध्यान रखें कहीं भी दोहरा छिड़काव न होने पाए। इन खरपतवारों के मामूली प्रकोप वाले खेतों में जब खरपतवार बड़े हो जाए तब इनको बीज बनने से पहले खेत से निकाल कर मवेशियों को खिला दे।

अतः आवश्यकतानुसार खरपतवार नियंत्रण हेतु उचित कार्यवाही करें यदि आवश्यक हो तो दीमक की रोकथाम हेतु उचित उपाय करें

प्रस्तुति :-

डॉ अरुण शर्मा एवं डॉ के एम गौतम,

सहप्राध्यापक,

 अनुसंधान केंद्र कोटा (राज.)

 

 

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