agriculture

गेहूं की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

गेहूं
Written by bheru lal gaderi

भारत में गेहूं(Wheet) की खेती करीब 27 मिलियन हेक्टेयर में होती हैं, और इस बात पर भी बहुत कुछ निर्भर करती हैं की पानी की उपलब्धता कितनी हैं। पिछले दशक में करीब पंद्रह से 20 लाख मिलियन हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र में गेहू उत्पादन के लिए जुड़ा हैं, जिसमे ज्यादातर क्षेत्र मध्य एवं पूर्वी मैदानी क्षेत्रों में हैं। विगत 40 वर्षों में देश में गेहूं उत्पादन में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की हैं और भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश बन गया हैं।

बढ़ती हुई जनसंख्या को ध्यान में रखकर इस बात का अनुमान लगाया जा रहा हैं की अन्न की मांग प्रतिवर्ष 2% बढ़ेगी और सन 2020 तक हमे लगभग 90 से 95 करोड़ टन गेहूं का उत्पादन करना होगा। अतः लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उत्पादकता को बढ़ाना होगा, क्योंकि क्षेत्रफल के बढ़ने की संभावना नहीं के बराबर हैं। निति-निर्मताओं का अनुमान हैं की कृषि व्यवसायिकता एवं राष्ट्रिय और अंतराष्ट्रीय बाजार में परिवर्तन के कारण फसल चक्रों और संसाधनों के इस्तेमाल में व्यापक बदलाव आएगा। ऐसी परिस्थिति में गेहूं उत्पादन के लक्ष्य को प्राप्त करने में कठिनाई आ सकती हैं।

राजस्थान में गेहूं का उत्पादन एवं उसका लाभांश, खेती की लागत के अनुरूप नहीं हैं। प्रदेश के अनेक जिलों में किये गये सर्वेक्षण के अनुसार, किसान 4-6 सिंचाई देकर 30-32 क्विंटल उपज प्रति हेक्टेयर प्राप्त करते हैं। उचित खेती के तरीकों एवं उपयुक्त किस्मों का प्रयोग कर, यह उपज केवल 2-3 सिंचाई द्वारा प्राप्त की जा सकती हैं।

मध्य भारत में सिंचाई की सिमित उपलब्धता को देखते हुए, खेती के उन सभी उन्नत तरीकों को शीघ्र लागु करना होगा जिससे खेती में उपयोग होने वाले सिंचाई जल को बचाने के साथ-साथ उसकी उपयोगिता को भी अधिकाधिक बढ़ाया जा सकें। अतः गेहूं की उत्पादकता बढ़ाने एवं खेती की लागत को कम करने पर अधिक लाभांश लेने के लिए,

खेती के निम्न तरीकों का प्रचार-प्रसार करना अति आवश्यक हैं।

  • संतुलित खाद के उपयोग से फसल का भरपूर उत्पादन।
  • सिमित जुताई करना।
  • सुहा रोधी एवं कम सिंचाई वाली उचित किस्मों का अधिकाधिक उपयोग।
  • सिंचाई जल की उपयोगिता बढ़ाने वाले खेती के तरीकों को अपनाना।
  • खेती के जहरीले रसायनों का उपयोग कम करना।
  • गेहूं उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र

उत्तर पश्चिमी मैदानी क्षेत्र

भारत के कुल गेहूं उत्पादक क्षेत्र का लगभग 35% (10मी.हे.) उत्तर पश्चिमी मैदानी क्षेत्र में आता हैं। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड एवं जम्मू कश्मीर के मैदानी क्षेत्र इसके प्रमुख उत्पादक प्रदेश हैं। सतलुज-गंगा के मैदानी क्षेत्रों से गेहूं के कुल उत्पादन का लगभग 40-45% हिस्सा आता हैं। जल संसाधन की दृष्टि से यह क्षेत्र काफी धनी हैं। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रति हेक्टेयर औसत उपज 4.5 टन हैं। परन्तु अन्य क्षेत्रों में कुछ ऐसे भी जनपद हैं जहां पर औसत उत्पादन 3.0-3.5 टन हैं। उत्पादकता के इस अंतर को कम करने के लिए सतत प्रयास की आवश्यकता हैं।

गेहूं

मध्य क्षेत्र

कोटा जोन भारत के मध्य क्षेत्र में आता हैं यह क्षेत्र उच्च गुणवत्ता वाले गेहूं उत्पादन क्षेत्र के लिए जाना जाता हैं। इस क्षेत्र में प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्य हैं मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान के कुछ क्षेत्र एवं छत्तीसगढ़। इस क्षेत्र में गेहूं की खेती करीब 5-6 मि.है. क्षेत्र में की जाती हैं। पानी की उपलब्धता इस क्षेत्र की प्रमुख समस्या हैं। अतः जल्दी पकने वाली प्रजाति का विकास वैज्ञानिकों का प्रथम लक्ष्य हैं। शोध प्राथमिकता में उच्च ताप रोधी, कम पानी में अच्छा उत्पादन करने वाली किस्मों का विकास, भूरे तथा काले रतुआ से रोधी किस्मों का निर्माण एवं अधिक प्रोटीन व बेहतर चपाती गुणवत्ता प्रमुख हैं।

उपयुक्त प्रजातियों का चयन

गेहूं की रोग रहित अधिक क्षमता वाली प्रजतियों के उपयोग से पैदावार बिना अतिरक्त व्यय के बढ़ाई जा सकती हैं। भारत की विभिन्न कृषि जलवायु की दशाओं में गेहूं की खेती के लिए प्रजातियां उपलब्ध हैं। गेहू के वैज्ञानिकों के अथक प्रयास से विभिन्न दशाओं के लिए प्रचुर मात्रा में प्रजातिया उपलब्ध हैं। किसानों को प्रत्येक दशा में एक से अधिक प्रजातियों का प्रयोग करना चाहिए।

गेहूं की विभिन्न किस्मों के प्रमुख लक्षण

सी-306

इस उन्नत देशी किस्म के पौधे ऊँचे, दाने सुनहरे, अम्बर सख्त, मध्यम आकर के होते हैं। रोली रोग के प्रति मध्यम प्रतिरोधी किस्म हैं। इसकी औसत पैदावार 45 से 50 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती हैं। असिंचित व कम उर्वरता वाले क्षेत्रों में उपयुक्त।

राज-1555

सामान्य समय पर बोई जाने वाली काठिया गेहूं की यह किस्म पर्याप्त सिंचाई एवं उच्च उर्वरता वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त पाई गयी हैं। यह किस्म राज-911 से उपज, रोली रोधकता एवं दानों के गुणों में अधिक अच्छी साबित हुई हैं। यह द्विजिन बोनी किस्म कम सिंचाई में भी अधिक उपज देती हैं। इसकी औसत उपज 40-50 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तथा 1000 दानों का वजन 40-60 ग्राम होता हैं।

राज-1482

यह द्विजीन बोनी किस्म हैं। पौधे की औसत ऊंचाई 85-110 से.मी. होती हैं। इसके दाने गोल आकार के सख्त व सुनहरी आभा वाले होते हैं। इसके पौधों में कल्ले काफी फूटते हैं। इसका तना गहरा हरा होता हैं। यह ब्लेक रस्ट के लिए प्रतिरोधी किस्म हैं। पकने की अवधि 120-130 दिन तक होती हैं। इसकी औसत पैदावार 40 से 50 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती हैं। सामान्य बुवाई के लिए उपयुक्त।

लोक-1

पौधे की औसत ऊंचाई 85-90 से.मी. होती हैं। इसके दाने गोल आकार के सख्त व सुनहरी आभा वाले होते हैं। जल्दी पकने के कारण इस किस्म को सामान्य व पछेती दोनों परिस्थितियों में उगा सकते हैं। यह ब्लेक रस्ट के लिए प्रतिरोधी किस्म हैं। पकने की अवधि 100-110 दिन तक होती हैं। इसकी औसत पैदावार 40-45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती हैं।

राज-3077

यह एक बोनी किस्म हैं। पौधे की औसत ऊंचाई 76-100 से.मी. होती हैं। इसके दाने शरबती आभायुक्त सख्त व मध्यम आकार के होते हैं। सूखे में भी यह किस्म अच्छी पैदावार दे सकती हैं। पकने की अवधि 115-120 दिन हैं। इसकी औसत पैदावार 55 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती हैं।

एच.आई-8381

काली एवं भूरी रोली प्रतिरोधक, काठिया गेहू की यह किस्म सिंचित परिस्थितियों में उच्च खाद की मात्रा के साथ समय पर बुवाई हेतु उपयुक्त हैं। इसके पौधे की ऊंचाई 80-100 से.मी. तथा 1000 दानों का वजन 45-50 ग्राम होता हैं। 120-135 दिन में पककर 45-50 क्विंटल प्रति हैक्टेयर उपज देती हैं।

एच.डी-2236

द्विजीन बोनी 80-85 से.मी. ऊँची यह किस्म 110-115 दिन में पककर तैयार होती हैं। इसका भूसा अन्य अधिक उपज देने वाली किस्मों के समान सख्त होता हैं। देरी से बुवाई के लिए उपयुक्त यह किस्म के 1000 दानों का वजन 40-45 ग्राम एवं औसत उपज 30-35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती हैं।

जी डब्ल्यू-190

सिंचित परिस्थितियों में उच्च खाद की मात्रा के साथ काला धब्बा रोग प्रतिरोधी यह किस्म समय पर अगेती बुवाई हेतु उपयुक्त हैं। रोली अवधि किस्म की ऊंचाई 90-100 से.मी. पकवा अवधि 115-120 दिन एवं 1000 दानों का वजन 40-43 ग्राम होता हैं। औसतन उपज 45-55 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती हैं।

डब्ल्यू एच-147

पौधे की औसत ऊंचाई 100-110 से.मी. होती हैं। इसके दाने कठोर एवं अम्बर रंग वाले होते हैं। यह रस्ट के लिए प्रतिरोधी किस्म हैं। सिंचित एवं समय पर बोये जाने के लिए उपयुक्त किस्म हैं। पकने की अवधि 143 दिन होती हैं। इसके 1000 दानों का वजन 42 से 54 ग्राम होता हैं। इसकी औसत पैदावार 40-55 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती हैं।

एच आई-1077

रोली रोधी बोनी किस्म की ऊंचाई 85-90 से.मी. व पकाव अवधि 115-120 दिन हैं। इसकी उपज 45-50 क्विंटल प्रति हैक्टयर हैं। तथा 1000 दानों का वजन 45-50 ग्राम होता हैं।

जी.डब्ल्यू-173

पौधे की औसत ऊंचाई 73-75 से.मी. होती हैं। यह काली एवं  हरी रस्ट के लिए प्रतिरोधी किस्म हैं। सिंचित एवं देरी पर भी बोये जाने के लिए उपयुक्त किस्म हैं। पकने की अवधि 87-100 दिन होती हैं। इसके 1000 दानों का औसत वजन 35-38 ग्राम होता हैं। इसकी औसत पैदावार 45 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती हैं।

डी एल 803-3

सिंचित अवस्थाओं में समय पर एवं देरी से बुवाई के लिए उपयुक्त रोली प्रतिरोधक इस किस्म के पौधे की औसत ऊंचाई 100-110 से.मी. होती हैं। पकने की अवधि 115-120 दिन होती हैं। इसके 1000 दानों का औसत वजन 40-41 ग्राम होता हैं। इसकी औसत पैदावार 48 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती हैं।

राज-3777

पौधे की ऊंचाई मध्यम होती हैं। इसके दाने सख्त एवं अम्बर कलर के होते हैं। यह रोली रोधक किस्म हैं। यह किस्म ज्यादा गर्म क्षेत्र में भी उगाई जा सकती हैं। पकने की अवधि 105-110 दिन होती हैं।  इसकी औसत पैदावार 40-45 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती हैं। यह किस्म जनवरी में भी बुवाई के लिए उपयुक्त हैं।

यु.पी.-2338

यह किस्म समूचे प्रदेश में राज-1482 व डब्ल्यू.एच. 147 के स्थान पर प्रयोग में ले सकते हैं। पकने की अवधि 140-150 दिन होती हैं।  इसकी औसत पैदावार 45-50 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती हैं। सामान्य बुवाई के लिए उपयुक्त।

जी.डब्ल्यू.-273

पौधे की औसत ऊंचाई 96 से.मी. होती हैं। यह पत्ती एवं तना रोली के लिए प्रतिरोधी किस्म हैं। सिंचित एवं देरी पर भी बोये जाने के लिए उपयुक्त किस्म हैं। पकने की अवधि 113 दिन होती हैं। इसके 1000 दानों का औसत वजन 47 ग्राम होता हैं। इसकी औसत पैदावार 45 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती हैं।

राज-3765

यह एक बोनी किस्म हैं। पौधे की औसत ऊंचाई 85-95 से.मी. होती हैं। इसके दाने शरबती आभायुक्त सख्त एवं बड़े आकार के होते हैं। यह तीनों प्रकार की रोलिरोधक किस्म हैं। इस किस्म को सामान्य व पछेती दोनों परिस्थितियों में उगा सकते हैं। पकने की अवधि 117-122 दिन होती हैं। इसके 1000 दानों का औसत वजन 47 ग्राम होता हैं। इसकी औसत पैदावार 40-45 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती हैं।

 

जी-डब्ल्यू-366

पौधे की औसत ऊंचाई 91-95 से.मी. होती हैं। यह पत्ती एवं तना रोली के लिए प्रतिरोधी किस्म हैं। पकने की अवधि 116-120 दिन होती हैं। इसके 1000 दानों का औसत वजन 49 ग्राम होता हैं। इसकी औसत पैदावार 51-52 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती हैं। सिंचित एवं समय पर भी बोये जाने के लिए उपयुक्त किस्म हैं।

एच.डब्ल्यू-2004

असिंचित क्षेत्रों हेतु उपयुक्त इस किस्म की पैदावार सुजाता किस्म के बराबर हैं लेकिन रोली प्रतिरोधकता अधिक होती हैं। इसके 1000दानों का औसत वजन 40-45 ग्राम होता हैं। यह अधिक बढ़ने वाली किस्म हैं। इसकी औसत पैदावार 20-25 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती हैं।

एच.आई.-8498

पौधे की औसत ऊंचाई 80-85 से.मी. होती हैं। यह रस्ट के लिए प्रतिरोधी किस्म हैं। पकने की अवधि 116-120 दिन होती हैं। इसके 1000 दानों का औसत वजन 50 ग्राम होता हैं। इसकी औसत पैदावार 44 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती हैं।

जी.डब्ल्यू-366

पौधे की औसत ऊंचाई 91-95 से.मी. होती हैं। यह भूरी एवं काली  रस्ट के लिए प्रतिरोधी किस्म हैं। इसके दानें सख्त व अम्बर कलर के होते हैं।  पकने की अवधि 116-120 दिन होती हैं। इसके 1000 दानों का औसत वजन 49 ग्राम होता हैं। इसकी औसत पैदावार 51-52 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती हैं। सिंचित एवं समय पर बोये जाने के लिए उपयुक्त।

एच.डी.-4672

पौधे की औसत ऊंचाई 75-80से.मी. होती हैं। इसके दानें कठोर व अम्बर रंग के होते हैं। यह लिफ़ व स्टेम रस्ट के लिए प्रतिरोधी किस्म हैं। पकने की अवधि 120-125 दिन होती हैं। इसके 1000 दानों का औसत वजन 45-50 ग्राम होता हैं। इसकी औसत पैदावार 35-40 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती हैं।

पी.डी.डब्ल्यू-215

सिंचित एवं समय से बुवाई के लिए काठियाँ गेहू की एक उपयुक्त किस्म हैं। इसकी बुवाई का समय नवम्बर का प्रथम पखवाड़ा हैं। पौधे की औसत ऊंचाई 97 से.मी. होती हैं। पत्तियां गहरे रंग की होती हैं यह किस्म सूजी, नूडल्स आदि के लिए उपयुक्त हैं। दानों का रंग सुनहरा एवं चमकदार होता हैं।  यह किस्म रोली रोग के लिए प्रतिरोधी किस्म हैं। पकने की अवधि 142 दिन होती हैं। इसके 1000 दानों का औसत वजन 51 ग्राम होता हैं। इसकी औसत पैदावार 45 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती हैं।

राज-4037

यह बोनी किस्म हैं। पौधे की औसत ऊंचाई 74 से.मी. होती हैं। इसके दानें शरबती आभायुक्त सख्त व मध्यम आकार के होते हैं। इस किस्म में फुटन अधिक होती हैं।  यह रोली रोधक  किस्म हैं। सिंचित एवं समय पर बोने के लिए उपयुक्त किस्म हैं। पकने की अवधि 104 दिन होती हैं। इसकी औसत पैदावार 40-41 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती हैं।

राज-4083

यह एक बोनी किस्म हैं। पौधे की औसत ऊंचाई 73 से.मी. होती हैं। इसके दानें अम्बर कलर एवं मध्य सख्त होते हैं। यह तीनों प्रकार की रोली से रोधक किस्म हैं। पकने की अवधि 98 दिन होती हैं। इसके 1000 दानों का औसत वजन 42 ग्राम होता हैं। इसकी औसत पैदावार 42 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती हैं। इस किस्म को सामान्य पछेती दोनों परिस्थितियों में उगा सकते हैं।

एच.आई.-1544

पौधे की औसत ऊंचाई 85-90 से.मी. होती हैं। यह सूखे के लिए सहनशील किस्म हैं। इसके दानें अम्बर कलर एवं मध्य सख्त होते हैं। पकने की अवधि 110-115 दिन होती हैं। इसके 1000 दानों का औसत वजन 40-45 ग्राम होता हैं। इसकी औसत पैदावार 51.40 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती हैं।

एच.आई-1531

यह किस्म कम पानी वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त हैं। पकने की अवधि 135-140 दिन होती हैं। इसके 1000 दानों का औसत वजन 40-42 ग्राम होता हैं। इसकी औसत पैदावार 30-35 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती हैं। यह किस्म रोली रोधक हैं।

राज-4120

पौधे की औसत ऊंचाई 108 से.मी. होती हैं। पत्तियां चौड़ी होती हैं। स्टेम रस्ट एवं करनाल बंट के लिए प्रतिरोधी किस्म हैं। इसके 1000 दानों का औसत वजन 40 ग्राम होता हैं। इसकी औसत पैदावार 47.5 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती हैं। सिंचित एवं समय पर बोये जाने के लिए यह किस्म उपयुक्त हैं।

एच.डी.-2932

यह किस्म सिंचित क्षेत्रों में बुवाई के लिए उपयुक्त हैं। पौधे की औसत ऊंचाई 70-75 से.मी. होती हैं।  इस किस्म में अधिक फुटान, गहरे हरे रंग की मोमरहित पत्तियां तथा तना मजबूत होता हैं। यह किस्म काली एवं भूरी रोली से प्रतिरोधी किस्म हैं। इसके 1000 दानों का औसत वजन  35-40 ग्राम होता हैं। इसकी औसत पैदावार 40-45 क्विंटल प्रति हैक्टेयर होती हैं।

खेत की तैयारी

जुताई का मुख्य उद्देश्य मिट्टी को भुरभुरी बनाना हैं। अगर किसान नवीनतम जुताई तकनीक जैसे जीरो टिलेज इत्यादि का उपयोग न कर रहे हो, तो कल्टीवेटर एवं डिस्क हेरों से लगातार जुताई करके खेत को अच्छी तरह से तैयार कर ले। परन्तु सर्वोत्तम यह होगा की संसाधन प्रबंधन तकनीक का ही इस्तेमाल करें। मैदानी भाग में विविध फसल अनुक्रमों की वजह से खेत की तैयारी एवं अवशेष प्रबंधन में सावधानी बरतें। धान-गेहू उत्तर-पश्चिमी एवं पूर्वी मैदानी क्षेत्रों का एक प्रमुख फसल चक्र हैं। खेत की तैयारी करते समय यह ध्यान रखने की बात हैं की बुवाई करते समय नमी की मात्रा उपयुक्त हो, अन्यथा जमाव पर विपरीत प्रभाव पद सकता हैं। अगर नमी उचित मात्रा में नहीं हैं तो बुवाई से पूर्व एक पलेवा अवश्य लगा लें।

बुवाई का समय

मैदानी क्षेत्रों में गेहूं की बुवाई का उपयुक्त समय हैं जब दिन-रात का औसत तापमान 21-30 डी.सेंटीग्रेड होता हैं। आमतौर पर यह तापमान नवम्बर के दूसरे सप्ताह तक हो जाता हैं। यहां पर विशेष बात यह हैं की किसी भी हालत में गेहूं की बुवाई दिसम्बर माह के उपरांत नहीं करनी चाहिए, अन्यथा उत्पादन पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता हैं।

  1. समय से बुवाई:- 10 से 25 नवम्बर तक
  2. देर से बुवाई:- 25 दिसम्बर तक

बुवाई की विधि

खेत को अच्छी तरह से तैयार करने के उपरांत बुवाई करते समय पंक्ति से पंक्ति की दुरी 20-30 से.मी. एवं गहराई 5-6 से.मी. रखें। जहां तक संभव हो, सीड ड्रिल का ही प्रयोग करके बुवाई करें। जब बुवाई जीरो टिलेज अथवा बेड प्लांटर से की जाए तो अच्छे जमाव के लिए बीज की गहराई पर विशेष ध्यान देना चाहिए। अधिक पौध उत्पादन के लिए आडी-तिरछी विधि से बुवाई की जा सकती हैं। धान गेहू की फसल चक्र के मामले में जीरो टिलेज अथवा रोटरी टिलेज का प्रयोग अधिक प्रभावशाली एवं लाभप्रद पाया गया हैं। पछेती बुवाई की दशा में पंक्तियों की दुरी घटा कर 18-20 से.मी. रखें।

बीज की दर

बीज की दर को निर्धारित करने वाले कारक हैं: बीज का आकार, जमाव का प्रतिशत, बुवाई करने का समय एवं प्रयोग में लाए जाने वाला फसल चक्र। अगर दाना मध्यम आकार का हैं (38-40ग्रा./1000दाना) तो निम्नलिखित मात्रा में बीज की दर का प्रयोग करें।

बुवाई का समय स्थिति  बीज दर (की.ग्रा./है.)

  1. समय से बुवाई 100
  2. पछेती बुवाई 125
  3. जीरो टिलेज 125-150
  4. मेड पर बुवाई 75
  5. रोटरी टिलेज से बुवाई 100

उपचारित बीजों का ही प्रयोग करना चाहिए। बीजोपचार के लिए विटावेक्स य कार्बेन्डाजिम  2.5 ग्रा./किलो बीज के लिए पर्याप्त होता हैं।

खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग

गेहूं की फसल में नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटाश का प्रभाव बहुत अच्छा पाया गया हैं। अगर उर्वरकों का प्रयोग मिट्टी की जाँच के उपरांत किया जाए तो उससे कम लागत में अच्छी उपज ली जा सकती हैं। खेतों में प्रति हैक्टेयर 80-100 क्विंटल गोबर की खाद या कम्पोस्ट का प्रयोग करने से अच्छी उपज मिलती हैं और साथ ही मृदा की उर्वरता में वृद्धि होती हैं। समय से बुवाई की जाने वाली प्रजातियों के लिए प्रति हैक्टेयर 120 की.ग्रा. नत्रजन, 60 की.ग्रा. फास्फोरस एवं 40 की.ग्रा. पोटाश का प्रयोग करना चाहिए।

देर से बुवाई की जाने वाली किस्मों के लिए उर्वरक की मात्रा कम कर दी जाती हैं। ऐसी अवस्था में 100 की.ग्रा. नत्रजन, 30-40 किग्रा. फास्फोरस एवं पोटाश प्रति हैक्टेयर पर्याप्त हैं। बारानी गेहूं में 80 किग्रा. नत्रजन एवं 40 किग्रा. फास्फोरस एवं पोटाश का प्रयोग करना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा, फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय ही खेत में डाल दें। बची हुई आधी नत्रजन की मात्रा को प्रथम सिंचाई के उपरांत खेत में बुरकाव करें। बरानी गेहू में नत्रजन एवं फास्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई के समय ही खेत में डाल दें। किसान खाद को खेत में समान रूप से डालें अगर यह कार्य सीड ड्रिल के द्वारा किया जाए तो अधिक लाभप्रद रहेगा।

गेहूं में पोषक तत्व एवं मात्रा

सूक्ष्म पोषक तत्व मात्रा (मिट्टी में) प्रति हेक्टेयर छिड़काव की मात्रा
जस्ता 25 किग्रा. जिंक सल्फेट 0.5% जिंक सल्फेट+

0.25% चूने का घोल

लोहा 50 किग्रा. फैरस सल्फेट 1.0% फैरस सल्फेट+

0.5% चूने का घोल

मैंगजिन 25 किग्रा. मैगनीज सल्फेट 1.0% मैगनीज सल्फेट+

0.5% चूने का घोल

तांबा 20 किग्रा. कॉपर सल्फेट 0.5% कॉपर सल्फेट+

0.25% चूने का घोल

बोरॉन 10 किग्रा. बोरैक्स 0.3% बोरैक्स का घोल

 

सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी लक्षण, पहचान एवं निदान

हरित क्रांति के उपरांत किसानों द्वारा गहन फसल चक्र का प्रयोग करने के कारण मृदा में कई तत्वों का दोहन भरपूर मात्रा में हो गया। इनमे सूक्ष्म पोषक तत्वों की भरपाई पूरी तरह से न हो पाने से इसके लक्षण फसल की प्रारम्भिक अवस्था में दिखाई नहीं देते हैं, परन्तु जैसे-जैसे पौधा बढ़ता जाता हैं, उसकी मांग बढ़ती हैं और सूक्ष्म तत्वों की कमी के लक्षण स्पष्ट होने लगते हैं। गेहू की फसल में मुख्यतया जिन सूक्ष्म तत्वों की कमी दिखती हैं उनमे प्रमुख हैं जस्ता (जिंक) मेगनीज एवं गंधक (सल्फर) कभी-कभी एक से अधिक सूक्ष्म तत्वों की कमी पौधे में एक साथ हो सकती हैं। ऐसी परिस्थिति में यह लक्षण भ्रमित कर सकते हैं।

सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं:-

जस्ता (जिंक)

जिंक की कमी प्रायः उन क्षेत्रों में देखी जाती हैं जहां पर धान-गेहू फसल चक्र का प्रमुखता से प्रयोग होता हैं। पौधे में जस्ते की मात्रा 15 पी.पी.एम्. से कम होने पर उसकी कमी के लक्षण आने लगते हैं। आरम्भ में नई पत्तियों की शिराओं के मध्य भाग में पर्णहीनता दिखाई देती हैं। जिंक की कमी से पौधे की बढ़त रुक जाती हैं और पत्तियां सुख कर गिर जाती हैं।

गंधक (सल्फर)

गंधक पौधों में प्रोटीन बनाने वाले प्रमुख तत्व अमीनो एसिड का प्रमुख घटक हैं। यह क्लोरोफिल बनाने में भी काम आता हैं। क्लोरोफिल प्रकाश संश्लेषण में प्रमुख योगदान करता हैं। सल्फर की कमी रेतीली भूमि में ज्यादा दृष्टिगोचर होती हैं, अथवा पौधे को छोटी अवस्था में अधिक वर्षा होने पर दिखाई देती हैं। सल्फर की कमी से पत्तियों का हरा रंग समाप्त होने लगता हैं और पत्तियों की शिराओं का मध्य भाग पीला होने लगता हैं तथा पौधे की बढ़वार रुक जाती हैं। इस तत्व की कमी को गंधक युक्त उर्वरकों जैसे सिंगल फास्फेट आदि के प्रयोग से दूर किया जा सकता हैं।

मैगनीज

पौधे में मेगनीज की मात्रा 25 पी.पी.एम्. से कम होने पर सर्वप्रथम बिच वाली पत्तियों की शिराओं के मध्य हल्के-भूरे रंग के धब्बे तथा आरम्भिक पत्तियों में पर्णहरिता दिखाई पड़ती है।

सूक्ष्म तत्वों की पूर्ति के उपाय

  • नियमित रूप से गोबर की खाद अथवा कम्पोस्ट का प्रयोग करें।
  • मिट्टी का परीक्षण कराए ताकि सही मात्रा में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग हो, साथ ही अनावश्यक खर्च न हो।
  • रासायनिक उर्वरक चाहे प्राथमिक तत्व के लिए हो या सूक्ष्म तत्वों के लिए, संतुलित मात्रा में प्रयोग करने चाहिए।
  • यदि मृदा क्षारीय हो तो वैज्ञानिक परामर्श से ही मृदा सुधर कार्यक्रम चलाए।
  • अत्यधिक सिंचाई न दे।

सिंचाई

सिमित मात्रा में पानी उपलब्ध होने पर फसल की क्रांतिक अवस्थाओं पर सिंचाई करनी चाहिए क्योंकि इस अवस्था पर पानी की कमी होने पर उपज में तुलनात्मक रूप से अधिक कमी हो जाती हैं। चार सिंचाई उपलब्ध होने पर शीर्ष जड़ जमने पर, फुटान की उत्तरावस्था, बलिया आते समय एवं दाने की दूधिया अवस्था पर, तीन सिंचाई हेतु पानी उपलब्ध होने पर शीर्ष जड़ जमने के समय, फुटान की उत्तरावस्था एवं दानें की दूधिया अवस्था पर करें।

  • फसल की उपरोक्त अवस्थाएं, मौसम तापक्रम, भूमि की किस्म व उर्वरा शक्ति व अन्य कारणों से कुछ पहले व बाद में भी आ सकती हैं , उसी अनुरूप सिंचाई करें।
  • सिंचित बुवाई दोमट वाले व समस्याग्रस्त पानी वाले क्षेत्रों में हल्की व जल्दी जल्दी कम अंतराल पर सिंचाई करें।
  • भारी मिट्टी में पहली सिंचाई हल्की करें।

निराई गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण

गेहूं की फसल में पाए जाने वाले खरपतवार मुख्यतया दो श्रेणियों में रखे जा सकते हैं। एक चौड़ी पत्ती वाले एवं दूसरे संकरी पत्ती वाले। गेहू में उगने वाले मुख्य खरपतवार हैं गुल्ली डंडा, गेहूँसा/मंडुसी, जंगली जई, बथुआ, खरबुधा, सत्यानाशी, कृष्णनील, कटेली एवं मोठा आदि। क्षेत्रों में रबी फसलों में सबसे भयंकर खरपतवार मंडुसी है। यह मुख्यतयाः धान गेंहू फसल चक्र का खरपतवार है।

सस्य विधि

  1. मेड़ो एवं नालियों को साफ-सुथरा रखे।
  2. फसल चक्र में को परिवर्तित करते रहें एवं साल में कम से कम एक बरसीम अथवा जई की फसल को चारे के तौर पर उगाये।
  3. फसल विविधीकरण का पालन करें।
  4. जीरो टिलेज विधि से गेंहू उत्पादन करें।
  5. गेंहू की जल्दी बढ़ने वाली किस्मों का चयन करें।
  6. बेड प्लांटर अथवा रोटोवेटर से बुवाई करने से खरपतवार कम उगते है।
  7. साफ सुथरे, स्वस्थ एवं खरपतवार रहित उच्च गुणवत्ता वाले बीज का प्रयोग करे।
  8. जहां तक संभव हो सके अगर खेत खाली हो तो बुवाई 15 नवंबर से पहले कर दे।
  9. खाद को बीज के 2-3 से.मी. नीचे डाले और बुवाई के लिए सीड ड्रिल का प्रयोग करें।
  10. पौधों की संख्या बढ़ने के लिए आड़ी-तिरछी विधि से बुवाई करे।

यांत्रिक विधि से

गेहूं की बुवाई के एक माह बाद यदि खेत में खरपतवार दिखाई दे, तो निराई-गुड़ाई करें। बुवाई के 30-35 दिन बाद लाइनों में बोए गेंहू की गुड़ाई खुरपे या कसौल इत्यादि से की जा सकती है। परन्तु यदि बुवाई लाइनों में नहीं की गई है तो और खरपतवारों की संख्या अधिक हो तो ऐसी स्थिति में रासायनिक नियंत्रण लाभदायक रहता है। इससे लागत भी कम आती है।

रासायनिक विधि

  1. चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार को नष्ट करने के लिए बोनी किस्मों में बुवाई के 30-35 दिन व अन्य किस्मों में 40-45 दिनों के बीच में 500 ग्राम 2-4डी एस्टर साल्ट या 750 ग्राम 2-4 डी अमाइन साल्ट सक्रिय तत्व खरपतवारनाशी रसायन प्रति हेक्टेयर की दर से 500-700 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
  2. गेंहू में चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों की रोकथाम के लिए मेटा सल्फ्युरोन मिथाइल (एल्ग्रिप 20% डब्ल्यू पी) 4 ग्राम सक्रीय तत्व प्रति हेक्टेयर का सरफेक्टेंट (500 मी.ली./है.) के साथ बुवाई के 30-35 दिन के अंदर छिड़काव करें।
  3. गेहूं में घास वाले खरपतवार का नियंत्रण करने के लिए सल्फॉस फ्यूरोन नामक खरपतवारनाशी का 25 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से सरफेक्टेंट के साथ प्रथम सिंचाई के साथ छिड़काव करें। सोयाबीन-गेहूं फसल चक्र में सोयाबीन में खरपतवार नियंत्रण के लिए सिफारिश के अनुसार डाली गई एलाक्लोर की मात्रा (2किग्रा प्रति हेक.) का गेहूं की फसल पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं देखा गया है।
  4. गुल्ली डंडा व जंगली जई खरपतवार का प्रकोप जिन खेतों में अधिक रहा हो उनमे गेहू की बुवाई के 30-35 दिन बाद आइसोप्रोट्यूरोन अथवा मेटाकसिरान अथवा मेंजोबेन्जाथोजूरान निंदनाशी, हल्की मिट्टी हेतु पौन किलो तथा भरी मिट्टी हेतु सवा किलो सक्रिय तत्व का पानी में घोल बनाकर एक सार छिड़काव करें। मेटाक्सीरॉन का छिड़काव करने से घास कुल व चौड़ी पत्ती वाले सभी खरपतवार समूल नष्ट हो जाते हैं। ध्यान रखे कहि भी दोहरा छिड़काव न हो पाये। इन खरपतवारों के मामूली प्रकोप वाले खेतों में जब खरपतवार बड़े हो जाये तब बीज बनने से पहले खेत से निकाल कर मवेशिओं को खिलावे।

 

खरपतवारनाशी रसायन के प्रयोग के समय सावधानियां

  1. मिश्रित फसल जैसे गेहूं में सरसों की बुवाई हो तो लीडर या अन्य खरपतवारनाशी का प्रयोग ना करें।
  2. दवाई के प्रयोग की संस्तुत विधि को अपनाकर छिड़काव करें। रेत, यूरिया या मिट्टी में मिलकर प्रयोग करें।
  3. पुरे खेत में एक जैसा छिड़काव करें।
  4. खरपतवारनाशी रसायनों के प्रयोग के समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए।
  5. दवा का प्रयोग दोपहर बाद करना लाभकारी होता है जब पत्ती पर ओस सुख जाए।
  6. केवल प्लेट फैन नोजल का इस्तेमाल करें।

कटाई उपरांत ध्यान देने योग्य बातें

पकने के उपरांत गेहूं की फसल को होने वाले नुकसान से बचने के लिए गेहूं की कटाई फसल के पूर्णतया पकने के 4-5 दिन पूर्व जब दानों की मात्रा 18-22% हो तब करनी चाहिए। मुख्यतया कटाई हसिए से मजदूरों के माध्यम से की जानी चाहिए। अगर कटाई के लिए बेलों या ट्रेक्टर से चलने वाले रीपर या कम्बाइन का प्रयोग किया जाए तो लागत में काफी कमी आ सकती है। सुबह का समय कटाई के लिए ज्यादा उपयुक्त होता है। अगर कटाई हाथ से की जाती है तो फसल के बंडल को 3-4 दिन खेत में छोड़ देना चाहिए। फसल को वर्षा आदि से बचने के लिए प्लास्टिक शीट का इस्तेमाल करना चाहिए।

भंडारण

अनाज को भंडारण से पहले अच्छी तरह से साफ और सूखा ले। इसके लिए गेहूं को तारपोलिन अथवा रंगीन प्लास्टिक की शीट पर तेज धुप में सुखाएं जिससे दानों में नमी की मात्रा 12% से कम हो जाए। भण्डारण के दौरान अनाज को कीड़ों से बचाने के लिए अल्युमिनियम फॉस्फाइड अथवा इडीबी/46 मि.ली. प्रति टन रसायन का प्रयोग करें।

गेहूं के अधिक उत्पादन के लिए कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

  1. क्षारीय एवं लवणीय भूमि में जल-प्रबंधन के कार्यक्रम का अनिवार्य रूप से प्रयोग करें।
  2. देर से बुवाई की अवस्था में संसाधन प्रबंधन तकनीक जैसे जीरो टिलेज का प्रयोग करें।
  3. अपने इलाके के लिए उपयुक्त विभिन्न अवधियों पर बोई जाने वाली किस्मों का चयन करें।
  4. बीज विश्वसनीय संस्था से ही ले और जहां तक हो सके बीज को तीन से चार वर्ष में बदल दें।
  5. मिट्टी परिक्षण के बाद ही उर्वरकों का प्रयोग करें। उर्वरकों का छिड़काव शाम के समय उचित होता है जब खेत में थोड़ी नमी मौजूद हो।
  6. छिटवां विधि से बुवाई करते समय 20% अधिक बीज का प्रयोग करना चाहिए।
  7. बीज उपचार करने के बाद ही बीज को प्रयोग में लेना चाहिए।
  8. फसल को काटने के बाद, उत्पादन का अच्छी तरह से भण्डारण करें।
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