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गेंदे की उन्नत एवं व्यवसायिक खेती से अधिक आय

गेंदे
Written by bheru lal gaderi

गेंदा हमारे देश की पुष्पीय फसलों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण फसल हैं, जिसकी खेती देश के विभिन्न भागों, विशेष रूप से मैदानी भागों में व्यावसायिक रूप से की जाती हैं। इस फसल के लोकप्रिय होने का कारण यह हैं की इसका पौधा विभिन्न प्रकार की जलवायु अवस्थाओं और मिट्टियों में आसानी से उगाया जा सकता हैं। इसके खूबसूरत फूलों का पुष्पन कल लम्बा होता हैं और उनकी निधानी आयु भी अधिक होती हैं। मौसमी फूलों में गेंदे का महत्वपूर्ण स्थान हैं। इसके फूल विभिन्न रंगों व आकारों में आते हैं तथा सालभर तक मिलते रहते हैं। इसकी खेती अधिकतर खुले पुष्पों के लिए की जाती हैं, जिनका माला, गजरा, वेणी, गुलदस्ता व अन्य सजावटी कार्यों के लिए प्रयोग किया जाता हैं। गेंदा एक ऐसा पौधा हैं जो आसानी से उगाया जा सकता हैं और इस पर कीट एवं बिमारियों का प्रकोप बहुत कम होता हैं। आर्थिक दृष्टि से इसकी खेती करना लाभदायक हैं।इसके अलावा इसे अन्य फसलों (जैसे:- टमाटर, मूली आदि) के खेत में मेड़ों पर मिश्रित फसल के रूप में ऊगा सकते हैं क्योंकि इससे खेत में लगी फसलों पर लाभदायक प्रभाव पड़ता हैं। गेंदे को पौधा लवणता तथा अन्य प्रतिकूल अवस्थाओं का कुछ प्रतिरोधी हैं।

गेंदे

जलवायु

गेंदे को सालभर, तीनों ही ऋतुओं में आसानी से उगाया जा सकता हैं। इसकी अच्छी पैदावार के लिए शरद ऋतू उपयुक्त पाई गई हैं। इसका पौधा पाले से प्रभावित होता हैं। अतः इससे पौधों का बचाव करें।

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भूमि

7.0 से 7.5 पीएच मान युक्त बलुई दुमट मिट्टी जिसमे वायु संचरण और जलनिकास अच्छी तरह से होता हैं, गेंदे के लिए बहुत उपयुक्त हैं। अधिक क्षारीय एवं अम्लीय भूमि इसके पौधों की वृद्धि व उत्पादन में बाधक हैं।

गेंदे की उन्नत किस्में

बड़े फूलों वाली (अफ्रीकन गेंदा)

क्राउन ऑफ़ गोल्ड (पीला), जॉइन्ट सनसेट (नारंगी), सपन येला (पीला), सपन गोल्ड, येलो फलकी, येला स्टोन, गोल्डन एज, ऑरेंज हवाई।

छोटे फूलों वाली

रेड ब्रॉकेट, बटर स्कोच, गोल्डी, रस्टी रेड, लेमन जेम, स्कारलेट ग्लो, लेमन ड्रॉप, रेड चेरी, बोनन्जा फ्लेम, येलो बॉय, गोल्डन बॉय, हनी कॉम्ब, स्कारलेट सोफिया, क्वीन सोफिया।

संकर किस्मे

ब्यूटी गोल्ड, ब्यूटी ऑरेंज, ब्यूटी येलो, ऑरेंज जुबिली, गोल्डन जुबिली, डायमंड जुबिली, येलो क्लाइमेक्स, फस्ट लेडी, प्रेम रोज लेडी, रायल येलो, रायल ऑरेंज।

भारतीय किस्में

पूसा नारंगी गेंदा व पूसा बसन्ती गेंदा पूसा अर्पिता।

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प्रसारण

आम तोर पर गेंदे को बीज द्वारा ही उगाया जाता हैं। बीजों को पौधशाला में ऊँची उठी हुई क्यारियों में समान रूप से बिखेर कर बुवाई करें। 3से 4 सप्ताह बाद पौध रोपाई के लिए तैयार की जाती हैं। एक हेक्टेयर की बुवाई के लिए लगभग 800 ग्रा. से 1 किग्रा. बीज की आवश्यकता होती हैं किन्तु अधिक पुराना बीज नहीं बोना चाहिए, इनकी अंकुरण क्षमता घट जाती हैं।

भूमि की तैयारी

खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से कर, खेत को कुछ समय खुला छोड़ दे ताकि तेज धुप में मौजूद हानिकारक जीवाणु नष्ट हो जावे ,बाद में देशी हल से जुताई करें एवं खेत को समतल कर लेवे। आखिरी जुताई के समय 20-25 टन अच्छी पकी हुई गोबर की खाद मिला दे तथा सिंचाई के लिए सुविधानुसार क्यारियां बना ले। क्यारिया बनाने से पूर्व भूमि में 120-200 किलो यूरिया, 400 किलो सिंगल सुपर फॉस्फेट व 100 किलो म्यूरेट ऑफ़ पोटाश को भूमि में मिला देवे। रोपाई के35-40 दिन बाद खड़ी फसल में 125 किलो यूरिया देकर सिंचाई कर देवे।

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बुवाई का समय

शीतकालीन फसल लेने के लिए बीज की बुवाई सितम्बर-अक्टूबर में की जाती हैं। ग्रीष्मकालीन फसल के लिए जनवरी-फरवरी में बीज बोना चाहिये तथा वर्षाकालीन फसल लेने के लिए बीज मई-जून माह में बो देना चाहिये। एक ऋतू में अधिक समय तक फूल लेने के लिए बीज की बुवाई 15 दिन के अन्दर पर की जानी चाहिए।

रोपाई

बीज बुवाई के एक माह बाद पौधों को खेतों में रूप देना चाहिए। गेंदे की रोपाई क्यारियों में करें। अफ्रीकन गेंदे की रोपाई कतार से कतार 45 से  60 सेंटीमीटर व पौध से पौध 30 से 45 सेंटीमीटर की दुरी पर करें।

फ्रेंच गेंदे की रोपाई पौधे से पौधे व कतार से कतार की दुरी 30 सेंटीमीटर रखते हुए करें। गेंदे की रोपाई जुलाई में कलम द्वारा भी की जा सकती हैं। कलम वाले पौधे में 15 दिन जल्दी फूल लिए जा सकते हैं। संकर गेंदे की रोपाई 60×90 सेमी. की दुरी पर करें। इसमें नत्रजन की मात्रा 400किग्रा./हैक. के हिसाब से दी जानी चाहिए।

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पौधे को सघन बनाना

जैसे ही पौधे खेत में जम जाए तो उनका ऊपरी सिरा नोचकर या कांटकर अलग कर देना चाहिए। इससे प्रचुर मात्रा में शाखाए आएगी और पार्शिवक प्ररोह भी अधिक निकलेंगे। पार्शिवक प्ररोह की भी ऐसी छंटाई कर देने से शाखाए अधिक सघन हो जाती हैं। 2000 पी.पी.एम. की दर से साइकोसेल (सी.सी.सी.) का छिड़काव करने से पौधे सर्वाधिक बौने रहते हैं।

सिंचाई

गर्मियों में प्रति सप्ताह एवं सर्दियों में 12-15 दिन के अंतराल से सिचाई करें।

देखभाल

गेंदे की फसल में खरपतवारों को न उगने देवे। इस हेतु समय-समय पर निराई-गुड़ाई करें। गुड़ाई करते समय पोधो के पास मिट्टी चढ़ावे। पौधे, हवा से जमीन पर न गिरे, इसके लिए लकड़ी का सहारा लगावे। जिब्रेलिक एसिड 100से 400 पी.पी.एम्. फूलों तथा पौधों की वृद्धि के लिए उपयोगी पाया गया हैं। इसका उपचार फूल आने से पहले किया जाना चाहिये।

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प्रमुख कीट

मोयला, हरातेला, सफेद मक्खी

ये कीट पोधो की पत्तियों एवं कोमल शाखाओं से रस चूसकर कमजोर कर देते हैं। इससे उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं।

नियंत्रण

इसके नियंत्रण हेतु मिथाइल डिमेटॉन 25 ई.सी. अथवा डाइमेथोएट 30 ई.सी. एक मिलीलीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। आवश्यकतानुसार 10से15 दिन के अंतराल पर छिड़काव दोहराये।

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प्रमुख व्याधि

चूर्णिल आसिता

इस रोग के प्रकोप से पत्तियों एवं कलियों पर सफेद चुंर्णी धब्बे दिखाई देते हैं।

नियंत्रण

नियंत्रण हेतु केराथेन एल.सी. केलक्सिन 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी के घोल का छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर करें।

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फूलों की तुड़ाई एवं उपज

पौध रोपाई के 60से 75 दिन बाद फूल तोड़ने लायक हो जाते हैं और औसतन दो-ढाई महीने तक फूल खिलते रहते हैं। अतः पूर्ण विकसित फूलों की नियमित तुड़ाई करते रहना चाहिए। पूर्ण विकसित फूलों की सुबह या शाम के समय तुड़ाई करें। गेंदे के फूलों की औसतन उपज 80से 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मिलती हैं। अफ्रीकन गेंदे में सही रख-रखाव करने पर 180से 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज मिलती हैं।

तुड़ाई उपरांत प्रौद्योगिकी

  • पूर्ण विकसित फूलों की सुबह या शाम के समय तुड़ाई करें।
  • तुड़ाई के बाद फूलों को 200ग्रा. क्षमता वाली पॉलीथिन की थैलियों में पैक करें।
  • 1-2डी.से. तापमान व 80-90% आर्द्रता पर भंडारित करें।

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