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गुलाब की उन्नत खेती तथा पौध संरक्षण उपाय

गुलाब की उन्नत खेती
Written by bheru lal gaderi

गुलाब विश्व का सर्वाधुक लोकप्रिय पुष्प हैं इसलिए इसे फूलों का राजा भी कहते हैं। यह इंग्लैंड व ईरान का राष्ट्रीय पुष्प हैं। यह जोरेसी परिवार से संबंध रखता हैं। यह झाड़ीनुमा बहुवर्षीय पौधा हैं जो सुन्दर पुष्पों के लिए उगाया जाता हैं। इसके फूल को हिप कहते हैं जो विटामिन सी का अच्छा स्त्रोत हैं। इसके फूल से जैम, जेली व मार्मलेड बनाए जाते हैं। गुलाब के फूलों से मुख्य रूप से इत्र निकला जाता हैं। इसके 3-4 टन गुलाब के फूलों से लगभग 1 लीटर गुलाब का तेल प्राप्त किया जा सकता हैं। इत्र के अलावा गुलाबजल, गुलकंद, पंखुरी, गुल रोगन शर्बत आदि उत्पाद गुलाब के फूलों से बनाए जाते हैं।

गुलाब की उन्नत खेती

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हमारे देश में सुगन्धित गुलाब का उपयोग मुख्यतः माला, कट फ्लावर गुलदस्ता, मंदिर व अन्य धार्मिक और शुभ अवसरों पर किया जाता रहा हैं वहीं पर वर्तमान में सौन्दर्य प्रसाधनों की मांग बढ़ने के साथ गुलाब तेल का वार्षिक उत्पादन लगभग 18-20 टन हैं, जबकि इसकी मांग कई गुना अधिक हैं।

वर्तमान में गुलाब की खेती बुल्गेरिया, फ्रांस, मोरक्को, टर्की तथा भारत में प्रमुख रूप से की जाती हैं। भारत में गुलाब का उत्पादन मुख्य रूप से हिमांचल प्रदेश, चंडीगढ़, दिल्ली, लखनऊ, पुणे नासिक, बंगलौर, कयेमबटूर, पश्चिम बंगाल के कुछ क्षेत्रों मुख्यतः कलकत्ता में किया जाता हैं। राजस्थान में इसका उत्पादन मुख्य रूप से पुष्कर, हल्दीघाटी, श्रीगंगानगर व उदयपुर में किया जाता हैं।

राजस्थान में लाल, पिले व केसरियाँ, बैंगनी व सफेद रंग के फूल दिखाई देते हैं। विदेशों में काले गुलाब को नमूने के तोर पर लगाया गया हैं। वनस्पति शास्त्र में इसे रोजाइन्डिका के नाम से जाना जाता हैं। मूल रूप से इसकी 28 प्रजातियां विश्व में पाई जाती हैं। गुलाब की खेती देश व विदेश में निर्यात करने के लिए दोनों ही रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। इन दिनों गुलाब के फूलों का सीजन हैं। फरवरी- मार्च में इनकी बहार आ जाती हैं। गुलाब को कट फ्लावर, गुलाबजल, गुलाबतेल, गुलकंद आदि के लिए उगाया जाता हैं।

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गुलाब की खेती काफी अधिक लाभदायक एवं सुगमता से की सकने वाली खेती हैं। गुलाब लगाने के साथ- साथ इसकी देखभाल करना बहुत ही महत्वपूर्ण हैं।

जलवायु

गुलाब के लिए बिच की जलवायु न जाड़े में अधिक ठंडक, न गर्मियों में अधिक गर्म चाहिए अर्थात दिन का तापमान 25-30 सेल्सियस तथा रात का 12-14 डिग्री सेल्सियस अति उत्तम मन जाता हैं।

खुले क्षेत्र में गुलाब उगाना

भूमि

गुलाब हेतु मिटटी दोमट तथा अधिक कार्बनिक पदार्थ वाली होनी चाहिए जिनका पी.एच. मान 5.3 से 6.5 तक हो।

प्रजातियां

संकर

क्रिमसन ग्लोरी, मिस्टर लिंकन, लव, जान एफ केनडी, जवाहर, मृणालिनी, प्रेसिडेन्ट, राधा कृष्णन, अपोलो, पूसा सोनिया, गंगा, टाटा सेटनरी, आर्किड, सुपर स्टार अमेरिकन हेरिटेज आदि।

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पालिएन्था

अंजनी, रश्मि, नर्तकी, प्रीति स्वामी।

फ़्लोरीबन्डा

बंजारन, देहली, प्रिंसेज, डिम्पल, चन्द्रमा, सदाबहार, सोनोरा, नीलाम्बरी, करिश्मा, सूर्य किरण आदि।

गेंडीफ्लोरा

क्वीन एलिजावेथ, मॉन्टे जुमा आदि।

मिनियेचर

ब्यूटी सीक्रेट, रेड फ्लश, पुश्कला, बेबी गोल्ड स्टार, सिल्वर टिप्स आदि।

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विदेशी बाजार में प्रचलित गुलाब की किस्में

मुख्त रूप से तीन रंग के गुलाब की किस्मों की बाजार में अधिक मांग रहती हैं।

  •  लाल रंग वाली
  • गुलाबी रंग वाली
  • नारंगी रंग वाली

लाल रंग की फूल वाली किस्में

फ्सर्ट रेड, ग्रान्डगाला, केरामिया, एसकेडा, रेफिला, बैरोनेस, बेन्डी, पेसन आदि।

गुलाबी रंग की किस्में

किस, मेलाडी, सोनिया, विवाल्डी, पीस,एस्ट्रा आदि।

नारंगी रंग की किस्में

लेम्बाङ नोवलेस, रेवल, ओसियाना, केपरी, कोनफेटी आदि।

इन किस्मों के अलावा ग्राहकों को पीला अथवा सफेद रंग के गुलाब भी पसंद आते हैं, परन्तु विदेशी बाजार में लाल, नारंगी एवं गुलाब रंग का ही अधिक प्रचलन हैं।

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पौध तैयार करना

जंगली गुलाब के ऊपर ‘टी’ बडिंग द्वारा इसकी पौध तैयार होती हैं। जंगली गुलाब की कलम जून-जुलाई में क्यारियों में लगभग 15 सेमी. की दुरी पर लगा दी जाती हैं और इनमे पत्तियां फुट जाती हैं। नवम्बर-दिसम्बर में चाकू की सहायता से फुटाव आई टहनियों पर से कांटे साफ कर दिए जाते हैं। जनवरी में अच्छी किस्म के गुलाब से टहनी लेकर ‘टी’ आकार कालिका निकालकर जंगली गुलाब के ऊपर लगाकर पॉलीथिन से कसकर बांध देते हैं। तापमान के साथ इनमे फुटाव आ जाता हैं और जुलाई-अगस्त में रोपाई के लिए पौध तैयार हो जाती हैं।

ले आउट और तैयारी

सुंदरता की दृष्टि से औपचारिक ले आउट करके क्यारियों जिनका आकार 5×2 मीटर रखा जा सकता हैं। दो क्यारियों के बिच में आधा मीटर स्थान छोड़ना चाहिए ताकि अन्य कृषि क्रियाओं में बाधा न आने पाये। क्यारियों को अप्रेल-मई के महीने में एक मीटर की गहराई तक खोदे और 15-20 दिन तक खुला छोड़ दे। क्यारियों में 30 सेमी. तक सुखी पत्तियों को डालकर खोदी गई मिट्टी से क्यारियों को भर दे साथ ही गोबर की अच्छी तरह तैयार खाद एक महीने पहले खेत (क्यारी) में डाल दे।

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इसके बाद क्यारियों को पानी से भर दे। दीमक से बचाव के लिए पैराथियान २% धूल या कार्बोफ्यारोन ३जी. का प्रयोग करें। लगभग 10-15 दिन बाद ओट आने पर इन्ही क्यारियों कतार बनाते हुए पौधों से पौधे व लाइन से लाइन की दुरी 30x 60 सेमी. रखी जाती हैं, इसको और भी कम किया जा सकता हैं अर्थात पौधे व लाइन की दुरी 30 सेमी. तथा दो लाइन के पश्चात् तीसरी लाइन की दुरी 60 सेमी. रखा जाता हैं। ऐसा करने से फूल की डंडी लम्बा तथा फूल काटने में आसान रहता हैं।

पौध रोपाई

पौधशाला से सावधानीपूर्वक पौध खोदकर उत्तर भारत के मैदानी भागों में सितम्बर-अक्टूबर में पौध की रोपाई करना चाहिए। खोदे गये पिन्डी से लिपटी घास-फुस हटा दे और ध्यान दे की कलिकायन वाला भाग रोपाई के समय भूमि की सतह से 15 सेमी. ऊँचा रहें। पौधे-पौधे व लाइन से लाइन की दुरी 30×60 सेमी. रखी जाती हैं। पौध लगाने के तुरंत बाद सिंचाई कर दें।

सिंचाई

गुलाब के लिए सिंचाई का उत्तम प्रबंध होना चाहिए और आवश्यकतानुसार गर्मी में 5-7 बार और सर्दी में 10-12 दिन बाद सिंचाई करनी चाहिए।

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कटाई-छटाई (प्रूनिंग)

गुलाब की उन्नत खेती गुलाब की उन्नत खेती

काट-छांट के लिए मैदानी भागों में अक्टुंबर महीनें का दूसरा सप्ताह उपयुक्त होती है, बशर्ते काट-छांट के समय वर्षा न हो। पौधों में 3-5 मुख्य टहनियों को 30-45 से.मी. लम्बी रखकर काट दिया जाता है। जहां पर काटा जाय वहां पर आँख बाहर की तरफ हो, इस बात का ख्याल रखना चाहिए। इसमें 45 अंश(डिग्री) पर आंख के 5 मी.मी. ऊपर से काटा जाता है। काट-छांट तेज चाकू या सिकेटियर से करनी चाहिए। कटे हुए भाग पर कवकनाशी दवाओं जैसे – कॉपर आक्सीक्लोराइड, कार्बेन्डाजिम, बोर्डो मिश्रण या चौबटिया पेस्ट का लेप लगाना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक

गुलाब के विकास के लिए जाड़े दिनों में 3-4 घंटे की धुप और रात्रि में ओंस बहुत आवश्यक है।  उत्तम कोटि का फूल लेने के लिए (प्रूनिंग के बाद) प्रती पौधा 10 किलोग्राम गोबर की सड़ी हुई खाद मिटटी में मिलाकर सिंचाई करनी चाहिए। गोबर की खाद देने के एक सप्ताह के बाद जब पोंधों में नई कोपलें फूटने लगे तब 200 ग्राम नीम की खली, 100 ग्राम हड्डी का चुरा तथा रासायनिक खाद का मिश्रण 50 ग्राम प्रति पौधा जिसमे यूरिया, सुपर फास्फेट, पोटेशियम सल्फेट 1:2:1 अनुपात में हो देना चाहिए।

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फूलों की कटाई

गुलाब की उन्नत खेती

सफेद, लाल, गुलाबी रंग के फूल अधखुली पंखुड़ियों में जब ऊपरी पंखुड़ी नीचे की तरफ मुड़ना शुरू हो तब काटना चाहिए। फूलों को काटते समय एक या दो पत्तियां टहनी पर छोड़ देनी चाहिए जिससे पौधों को वहां से फिर बढ़वार मिलती।

फूलों की कटाई के बाद देखरेख

फूल काटते समय पानी की बाल्टी साथ रखें जिससे फूलों को काटने के तुरंत बाद पानी में रखा जा सके। बाल्टी में कम से कम 10 से.मी. पानी अवश्य होना चाहिए। जिससे फूलों की डंडी अच्छी तरह से भीग जाये। पानी के अंदर प्रिजरवेटिव्ज भी मिलाते है।

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फूलों को कम से कम 3 घंटे पानी में रखने के बाद ही उनकी ग्रेडिंग के लिए निकलना चाहिए यदि ग्रेडिंग देर से करनी हो तो फूलों को कोल्ड स्टोरेज में रखना चाहिए। जिसका तापक्रम 1-3 से. होना चाहिए।

पौध सरंक्षण

गुलाब में सर्वाधिक नुकसान बिमारियों व इसमें लगने वाले कीटों से होता है अतः इनका उचित प्रबंधन गुलाब की सफल खेती के लिए आवश्यक है।

गुलाब में होने वाले प्रमुख रोग

कला धब्बा (डिप्लोकेरोन रोजी )

लक्षण

इस रोग से ग्रसित पौधे की पत्तियों के दोनों सतह पर घोल काळा धब्बे दिखाई देते हैं यह धब्बे धीरे-धीरे बड़े हो जाते हैं और पत्तियां पिली पड़कर गिर जाती है।

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नियंत्रण

इस रोग से ग्रसित पौधों पर डाईथेन जेड-78 अथवा डाईथेन एम-45, 2 ग्राम प्रति लीटर की दर से पानी के साथ कटाई-छंटाई के बाद 15 दिन के अंतराल में 3-4 छिड़काव करें।

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चूर्णी फफूंद (स्पेरोथिका पेनोशा)

लक्षण

इस रोग के मुख्य लक्षण पतियों के किनारे मुद जाते हैं और पत्तियों, तनों, कलिकाओं पर सफेद व् भूरे धब्बे बन जाते है। इस बीमारी का सफेद आटे के समान पाउडर तेजी से पत्तियों पर फैलता है। यह सफेद पाउडर पुरे पौधे को ढ़क देता है।

 नियंत्रण

  • केराथेन 2-3 मी.ली./10ली. पानी का छिड़काव करावें।
  • कार्बेंडाजिम अथवा बेनलेट 1 ग्रा./ली. पानी के साथ समय-समय पर छिड़के।
  • फफूंदनाशी की अनुपलब्धता पर बोर्डो मिश्रण(5:5:50) उपयोग में ले।

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गुलाब का कीट

लक्षण

इस रोग के लक्षण गर्मी में नांरगी रंग के डब्बे पत्तियों पर दिखाई देते है। जो अक्टुंबर महीने में भूरे रंग के धब्बों में प्रवर्तित हो जाते है। ये धब्बे पत्तियों में वृत्त पर भी पाए जाते है।

नियंत्रण

बीमारी आने पर डाईथेन जेड-78 2 ग्राम प्रति लीटर की दर से पानी के साथ 3-4 छिड़काव करें।

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शीर्षारम्भी क्षय (डिप्लोडिया रोसेरम)

लक्षण

रोग से ग्रसित पादप की शुरुआत टहनी से होती हैं। कलिका लगने की जगह से तना काला हो जाता हैं और धीरे-धीरे निचे की और पूरा पौधा ही सुख जाता हैं।

नियंत्रण

  • ग्रसित टहनियों को काटकर चौपटिया पेस्ट/बोर्डोमिश्रण लगावे।
  • कटाई हमेशा तिरछी तेज धार दार साफ स्केट्रियर से करें।

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किट

गुलाब की रायेदार सुंडी (यूप्रोकटिस फ्रेटरना)

सुंडी की लार्वी पत्तियों, कोमल टहनियों, कलिकाओं को काटकर खा जाती हैं। यह लार्वी गुलाब के अलावा दूसरे पोंधों को भी खा जाती हैं क्योंकि इस सुंडी की लार्वी सर्वाहारी स्वभाव की होती हैं।

नियंत्रण

  • इस सुंडी के अण्डे लार्वी को एकत्रित करके नष्ट कर दे।
  • इस किट के लिए 0.05% मिथाइल पैराथियान, 0.05% क्लोरोफाइरीफोस का छिड़काव करें।

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गुलाब का स्केल(एनडोला ओरोंटी)

इस किट का निम्फ, प्रौढ़ दोनों तने, टहनियों, कलियों, पतियों व फूलोवृत का रस चूस लेते हैं जिससे पौधा कमजोर हो जाता हैं ज्यादा प्रकोप होने पर पौधा मर जाता हैं।

नियंत्रण

  • ग्रसित शाखाओं को काटकर नष्ट कर देवे।
  • 0.1 फास्फामिडोंन/ डाइमेथोएट 0.06% अथवा 0.04% मोनोक्रोटोफॉस का छिड़काव करें।

सफेद मक्खी (एलुरोकेंथस रोजी)

लक्षण

इस मक्खी का निम्फ, प्रौढ़ पत्ती के निचले किनारे पर ज्यादा संख्या में पाये जाते हैं, जो पत्तियों और तनों से रस चूस लेते हैं। इनके ज्यादा समय तक पौधे पर उपस्थित रहने पर पत्तियां पिली पड़कर निचे गिर जाती हैं। जिससे पौधे की बढ़वार रुक जाती हैं। सफेद मक्खी शहद के जैसा रस पौधों पर स्त्रावित करती हैं। जिससे दूसरे किट जैसे चींटियां और कज्जली फफूंद पुरे पौधे पर आ जाती हैं।

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नियंत्रण

  • पिले रंग का चिपकने वाला ट्रेप बगीचे के अंदर रखे ताकि सफेद मक्खी आकर्षित हो जाये और ट्रेप में चिपक जाये तब उसे नष्ट कर देवें।
  • मिथाइल डाईमेटान 0.05% डाइमेथोएट 0.06% मोनोक्रोटोफॉस 0.04 अथवा नीम तेल 2.0%नीम बीज का निस्सार5.0% छिड़काव करें।

गुलाब चेपा (मेक्रोसियम रोजिफोर्मिस)

लक्षण

इस किट का निम्फ और प्रौढ़ ऊपरी टहनी, नई पत्तियों, कलिकाओं और फूलवृत हजारों की संख्या में पाया जाता हैं जो पौधों का रस चूस लेता हैं व खा जाता हैं। जिससे पत्तियां ऊपर की और मूड जाती हैं। तने का रंग हल्का हो जाता हैं। पौधा बीमार सा दिखने लगता हैं। चेपा शहद के समान रस स्त्रावित करता हैं। जिससे कज्जली फफूंद पैदा हो जाती हैं।

नियंत्रण

  • ग्रसित पौधों की टहनियों को काटकर नष्ट कर देवें।
  • 0.06% रोगोर को छिड़काव करें।

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सूत्रकृमि (मेलाईडोगाइन इनकाग्निटा, में हाल्फा प्रेटीलेकुलम पेनेट्रास)

लक्षण

सूत्रकृमि पौधें की जड़ के अंदर और बाहर खाने के दौरान पाचय जूस छोड़ता हैं। जिससे पौध के ऊतक और उपाचय क्रिया दोनों ही प्रभावित होती हैं। पौधे का ओज कम हो जाता हैं जिससे पौधा कमजोर हो जाता हैं। पौधे में पानी और पोषक तत्वों की कमी हो जाती हैं।

नियंत्रण

  • सूत्रकृमि से ग्रसित जमीन में कम्पोस्ट, गोबर की खाद, जैसे नीम की खली, अरंडी की खली आदि मिलाये।
  • डी.डी., ई.डी.बी. और बी.सी.बी. को डालने से सूत्रकृमि को रोका जा सकता हैं। जमीन में 20-25 सेमी. गहरी 30 सेमी. दुरी पर धूमन करें।

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निर्यात हेतु गुलाब

निर्यात के लिए उत्तम गुणवत्ता के फूलों की आवश्यकता होती हैं, अतः गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए पौधों को ग्रीन हॉउस/पोली हॉउस में उगाया जाता हैं।

ग्रीन हॉउस/पोली हॉउस में गुलाब उगने से लाभ

  • निश्चित इकाई भूमि से अधिकतम फूल प्राप्त किए जा सकते हैं।
  • किसी भी फसल/फूल को उचित वातावरण में लगा कर उसकी जैविक क्षमता का अधिकतम उपयोग किया जा सकता हैं।
  • वर्ष भर पुष्प उत्पादन का कार्य किया जा सकता हैं अथवा बजार की मांग मांग में अनुसार फसल/पौधे को कम/ज्यादा किया जा सकता हैं।
  • उत्तम गुणवत्ता के फूल बिना किसी समय बडिंग आदि कर नए पौधे तैयार कर पुष्प उत्पादन के लिए प्रयोग कर सकते हैं।
  • पौधे/फूलों को आसानी से किट/रोग अथवा मौसम से बचाया जा सकता हैं।

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निर्यात की जाने वाली किस्मों के गुण

  • जो किस्मे अधिक संख्या में फूल पैदा करती हैं।
  • जिसकी क्लिक धीरे-धीरे खुलती हो तथा अधिक समय तक आकार बनाए रखती हो।
  • फूल पौधे से कटने के पश्चात लम्बे समय तक ताजा बना रहें।
  • फूल की डंडी फूल से मुड़ने वाली नहीं होनी चाहिए।
  • काँटों की संख्या कम हो।
  • फूल का रंग देखने में अच्छा तथा काफी समय तक एक समान बना रहने वाला हो।
  • यदि फूल में हल्की खुशबु हो तो और भी अच्छा रहता हैं।
  • जो कीटों तथा रोगों के प्रतिरोधी हो।
  • परिवहन के समय होने वाली प्रभाव को सहन करने में सक्षम हो।

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