agriculture

गुलदाउदी की व्यवसायिक उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

गुलदाउदी की व्यवसायिक उन्नत खेती
Written by bheru lal gaderi

गुलदाउदी एक शाकीय बहुवर्षीय शोभाकारी पौधा हैं, जिसे एस्टेरेसी कुल के अंतर्गत श्रेणीबद्ध किया गया हैं। यह शरद ऋतू का अत्यंत लोकप्रिय फूल हैं। इसके फूलों की बनावट, आकार, प्रकार और रंगों में इतनी अधिक विभिन्नता हैं शायद ही किसी अन्य फूल में हो। इसमें सुगन्ध नहीं होती, साथ ही फूलने का समय भी बहुत कम होता हैं, फिर भी इसके फूल की बनावट इतनी सुन्दर और आकर्षक होती हैं की हर कोई इसे देखकर मुग्ध हो जाता हैं।

इस फूल की विभिन्न किस्मों में चटकीले रंग तथा इसकी बनावट इसके साज श्रृंगार में चार चाँद लगा देती हैं। गुलदाउदी के फूलों में विभिन्नताओं के कारण ही इसे फूलों की रानी का ख़िताब प्रदान किया गया हैं।

गुलदाउदी की व्यवसायिक उन्नत खेती

इस फूल की उत्पत्ति स्थान चीन को मन जाता हैं विश्व फुष्प बाजार में 10 सर्वश्रेष्ठ फूलों में गुलदाउदी का नाम गुलाब के बाद दूसरे स्थान पर आता हैं।इसकी खेती विश्व के विभिन्न देशों जापान, चीन, अमेरिका, इंग्लैंड, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, भारत व अन्य देशों में व्यवसाय के रूप में की जाती हैं।

Read also – गेंदे की उन्नत एवं व्यवसायिक खेती से अधिक आय

इसके फूलों का उपयोग पूजा-पाठ, शादी व अन्य अवसरों पर किया जाता रहा हैं। इस पुष्प की गुणवत्ताओं को ध्यान में रखकर किसान इसकी खेती काफी बड़े स्तर पर कर रहे हैं।

जलवायु

गुलदाउदी प्रकाश व तापमान से अधिक प्रभावित होता हैं। प्रकाश अवधि वर्गीकरण के अनुसार गुलदाउदी की फसल के कर्तित पुष्प उत्पादन के लिए ग्रीनहाउस में जलवायु नियंत्रण हेतु निम्न घटकों का होना अति आवश्यक हैं। पौधे उगने के लिए दिन का तापमान 20-25 डिग्री सेंटीग्रेट व रात का तापमान 15-18 डिग्री सेंटीग्रेट एवं कार्बनडाइऑक्साइड गैस का स्तर 900-1200 पीपीएम और अपेक्षित आर्द्रता 60-75% रहना चाहिए।

फसल की प्राम्भिक अवस्था में वानस्पतिक बढ़वार हेतु कृतिम प्रकाश 2-3 सप्ताह तक 60 अथवा 100 वॉट के बल्बों से प्राप्त 100-150 माइक्रो मोल प्रकाश प्रति वर्गमीटर क्षेत्र में रात्रि में 6 बजे से 11 बजे तक मिलना चाहिए।

Read also – प्रॉम खाद – एक प्रमुख जैविक खाद स्रोत एवं निर्माण विधि

भूमि

गुलदाउदी खेती वैसे तो सभी प्रकार की मृदाओं में की जा सकती हैं लेकिन अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट मृदा, जिसका पीएच मान 6.2-6.5 के मध्य उपयुक्त रहती हैं।

किस्मों का चुनाव

किस्मों का चुनाव करते समय यह ध्यान देना होता हैं की पुष्प बाजार में किस प्रकार के गुलदाउदी की किस्मों की मांग हैं जैसे स्प्रे टाइप, स्टेंडर्ड टाइप आदि। कर्तित पुष्प हेतु गुलदाउदी के बड़े एवं मध्यम आकार के पुष्प वाली प्रजातियों का चुनाव करना चाहिए।

गुलदाउदी के पुष्प की माला बनाने के लिए अधिकांशतः छोटे आकार वाले पुष्पों की मांग हैं। यदि पुष्प के रंग की बात करें तो सबसे ज्यादा खपत सफेद और पिले रंग के पुष्पों की है। किस्मों की जानकारी सरणी में दी गई हैं।

Read also – जरबेरा की पॉलीहाउस में व्यावसायिक खेती

बड़े फूल वाली या स्टेंडर्ड किस्में

इन किस्मों में एक बड़ा फूल लम्बी डंडी पर लगता हैं। स्नोबॉल, ब्यूटी, चन्द्रमा, महात्मा गाँधी, विलियम टर्नर, स्नोडेन व्हाइट, माउंटेनियर, सोनार बंगला, पूर्णिमा, इवनिंग स्टार, ब्राइट गोल्डन तथा चन्द्रमा इत्यादि।

छोटे फूल वाली या स्प्रे किस्में

इन किस्मों में बहुत छोटे-छोटे फूल एक डंडी पर लगते हैं। अजय, कुंदन, बीरबल साहनी, व्हाइट बुके, जया, पूजा, बसंती, क्रेकर जेक, ब्लू विनर, लेहमेंस, ननको, सोनाली, तारा इत्यादि।

प्रवर्धन

यह एक स्वतः प्रजनित बहुवर्षीय शाकीय पौधा हैं जो पुराने पौधे से नये पौधे को उत्पन्न करता हैं जिन्हे सकर्स के नाम से जाना जाता हैं इसके अलावा गुलदाउदी के पौधों को कटिंग के माध्यम से भी प्रवर्धित करते हैं।

Read also – नर्सरी में मौसमी फूलों के पौधे तैयार करने की उन्नत तकनीक

सकर्स

इस विधि में गुलदाउदी के पौधे को जब उसका फूल मुरझाने लगता हैं, जमीन से लगभग 15-20सेमी. ऊपर से काट देते हैं इसके बाद जनवरी, फरवरी में पौधे की जड़ के पास से बहुत सी सकर्स निकलना प्रारम्भ हो जाती हैं, जिससे सावधानीपूर्वक निकालकर लगा देना चाहिए। तैयार सकर्स को फरवरी के तीसरे सप्ताह से लेकर मध्य मार्च तक तैयार क्यारियों में 20-25 सेमी. के अंतराल पर रोपित कर देना चाहिए।

कटिंग

कटिंग तैयार करने का सबसे सर्वोत्तम समय जुलाई-अगस्त हैं अथवा वातावरण में जब नमी हो उस समय शीर्ष भाग से कटिंग लेना चाहिए। उस समय इसका सम्पूर्ण रंग हरा होता हैं। एक आदर्श कटिंग 5-8 सेमी. लम्बी तथा व्यास 3.2 मीमी. होना चाहिये। कटिंग तैयार करते समय ध्यान रहे की नोड के 1 सेमी. निचे धार वाले चाकू से भली-भाती काट लेना चाहिए, कटिंग को फफूंदीनाशक (थाइरम) 0.2% घोल में डुबोकर उपचारित कर लेना चाहिए तत्पश्चात इंडोल ब्यूटारिक एसिड के 2000 पी.पी.एम. के घोल में कटिंग के निचले हिस्सों को 10 सेकन्ड तक उपचारित करने के पश्चात छायायुक्त स्थल में परयाणिकूलन हेतु कुछ देर तक छोड़ जाता हैं।

Read also – कृषि प्रसंस्करण : एक रोजगार का विकल्प

अब यह कटिंग रूटिंग मिडिया जिसमे दो भाग मिट्टी+1 भाग मोटा बालू+1भाग पत्ती की खाद को उथले बर्तन में भरकर उसमे लकड़ी से 5 सेमी. की दुरी पर छिद्र बनाकर लगा देनी चाहिए। उपरोक्त मिश्रण में कटिंग को लगाने से पूर्व 1-2% फारमैलीन से मिश्रण को उपचारित कर लेना चाहिए। ऐसा करने से कटिंग में लगने वाली बीमारी की संभावना समाप्त हो जाती हैं। जड़ों का विकास 2 सप्ताह के बाद शुरू हो जाता हैं जो की वातावरण की आपेक्षित आर्द्रता, तप एवं किस्म पर निर्भर करता हैं। जड़ युक्त कटिंग 3-4 सप्ताह में रोपित करने योग्य हो जाती हैं।

पौध की रोपाई

गुलदाउदी के पौधे की रोपाई अगस्त में कर सकते हैं पौधे की रोपाई पंक्ति से पंक्ति 20 से 30 सेमी. एवं पौधे से पौधे की 20 सेमी. करना उचित रहता हैं। प्रत्येक बेड में 2 या 3 पंक्तिया रखी जाती हैं। रोपाई के उपरांत बौछार द्वारा हल्की सिंचाई करें। पौध की रोपाई करने के 20-25 दिनों तक जारे के द्वारा हल्का पानी सुबह, दोपहर, शाम तीनो समय देना चाहिए।

सिंचाई

गुलदाउदी उथली जड़ों वाली फसल हैं इसमें जड़ के पास जल का जमाव होने से जड़े सड़ने का डर रहता हैं एवं अधिक मात्रा में पानी देने से पौधे भी मर जाते हैं। अतः जल निकास का उचित प्रबंधन होना चाहिए। पौधों को पानी की आवश्यकता का पता इसकी कोमल पत्तियों व शाखाओं की ताजगी खोने से लगाया जा सकता हैं।

Read also – गुलाब की उन्नत खेती तथा पौध संरक्षण उपाय

पोषक तत्व

पोषण के लिए 20:20:20 के अनुपात में एन.पि.के. यानि नत्रजन, फॉस्फोरस, व पोटाश का घोल पानी के साथ दे और कली आने पर 150:150:150 पी.पी.एम. के अनुपात में नत्रजन, फॉस्फोरस व पोटाश की मात्रा का छिड़काव करें।

निराई-गुड़ाई

निराई एवं गुड़ाई दो प्रमुख एवं आवश्यक प्रक्रियाएं हैं जिन्हे फसल काल में गुलदाउदी की विभिन्न प्रजातियों को उगाने के लिए करना पड़ता हैं। पौधों की छोटी अवस्था में ही समय-समय पर निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए। ऐसा करने से खरपतवार नियंत्रण के साथ मिट्टी भी भुरभुरी बनी रहती हैं। जिससे जड़ों की अच्छी वृद्धि एवं विकास होता हैं।

अन्य देखरेख

पौधों और फूल के सही विकास के लिए पौधे को शुरू से लेकर फूलने तक सही ढंग से देख रेख करने की आवश्यकता होती हैं इसके लिए समय से खाद, पानी एवं निराई गुड़ाई के अलावा पिंचिंग, डिसबडिंग, डिससूटिंग एवं सहारा देने की आवश्यकता होती हैं।

Read also – जलवायु परिवर्तन का कृषि एवं पर्यावरण पर प्रभाव

पिंचिंग या शीर्षनोचन

शीर्षनोचन पौधों के फैलाव व बढ़ाने के लिए जिया जाता हैं। इस प्रिक्रिया में गुलदाउदी में जब पौधा 8-10 सेमी. का हो जाता हैं, तो ऊपर की 3-5 सेमी. शाखा को तोड़ देते हैं। पिचिंग स्प्रे टाइप गुलदाउदी से अधिक संख्या में फूल प्राप्त करने के लिए की जाती हैं।

डिसबडिंग एवं निष्कालिकायन

यह क्रिया स्टेण्डर्ड टाइप गुलदाउदी में बड़े फूल प्राप्त करने के लिए की जाती हैं इसमें हर शाखा पर से अतिरिक्त कलियों को काट देना चाहिए तथा केवल एक या दो कलियाँ छोड़नी चाहिए। आमतौर पर हर शाखा से एक कली निकल दी जाती हैं। सिंगल कोरियन और स्प्रे वर्ग की किस्मों में डिसबडिंग करने की आवश्यकता नहीं होती हैं।

डिससूटिंग

यह क्रिया पौधों में शाकीय शाखा रखने के लिए की जाती हैं। शीर्षनोचन के बाद जब बगल में शाखाए निकलती हैं, तो उसमे से आवश्यकतानुसार स्वस्थ शाखाओं वाला पौधा तैयार करने के लिए एक शाखा बिच में तथा दो उसके अगल बगल में रखते हैं तथा अनावश्यक शाखाए हटा देते हैं। यह क्रिया स्प्रे टाइप किस्मों में नहीं करते हैं।

Read also – फसल चक्र का आधुनिक खेती में उपयोग एवं महत्व

स्केटिंग (सहारा)

गुलदाउदी के पौधों की सीधी और अच्छी वृद्धि के लिए शेयर की आवश्यकता पड़ती हैं, जिसे बॉस की खपच्ची लगाकर किया जाता हैं यह विधि गमलों में पौधे उगाने के लिए तो ठीक हैं लेकिन व्यापारिक स्तर की खेती में लागत को देखते हुए दूसरी सस्ती विधि का उपयोग करते हैं। क्यारियों के दोनों छोर पर लगभग 75 सेमी. ऊँचा बॉस गाड़ देते हैं।

Read also – अरहर की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

अब महीन तार को एक छोर से बांध देते हैं, जिससे की पौधे पंक्तिबद्ध रूप से उगे तथा उनकी शाखाये भूमितल में न गिरे। ये सम्पूर्ण प्रक्रिया अक्टुम्बर तक होनी चाहिये। गुलदाउदी की लम्बी प्रजाति को उगाते समय पहला तार 0 3सेमी. की ऊंचाई पर तथा तार 50 सेमी. की ऊंचाई पर लम्बाई में बांधना आवश्यक हैं। इससे पौधे सुचारु रूप से बढ़ते हैं तथा पार्श्व शाखाओं को भलीभांति बढ़ने का मौका मिलता हैं।

वृद्धि नियामक रसायन प्रयोग

वृद्धि नियामकों का प्रयोग गुलदाउदी के पौधे पर फूलों की संख्या तथा आकार बढ़ाने के लिए किया जाता हैं। जिब्रेलिक एसिड का 50 पी.पी.एम. घोल को दो बार क्रमशः 30 एवं 60 दिन बाद प्रयोग करके पौधों की वृद्धि को बढ़या जा सकता हैं।

ऐसा करने से फूलों की संख्या भी बढ़ जाती हैं। इसी प्रकार बी-नाइन का 0.25% का छिड़काव यदि पिंचिंग के बाद तीन सप्ताह के अंतराल पर दो बार किया जाये तो पौधे की ऊंचाई कम हो जाती हैं। बी-नाइन पौधे को बोना करने के साथ-साथ पत्तियों के रंग को भी अच्छा बनता हैं।

Read also – क्वालिटी प्रोटीन मक्का की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

फूलों को काटने की अवस्था एवं रख-रखाव

  • बड़े फूल वाली (स्टेण्डर्ड) किस्मों के फूल तभी काटने चाहिए जब वे पूरी तरह से खिल जाए और उनकी बहरी पंखुडिया पूरी तरह से सीधी हो जाए।
  • छोटे फूल वाली (स्प्रे) किस्मों को उस समय कटा जाना चाहिए, जब टहनी पर खिले सबसे पहले फूल पूरी तरह से खुल जाए।

कर्तित पुष्प की डण्डियों की कटाई

पुष्प डंडियों को काटने की उचित अवस्था, उसकी किस्मों, संभावित पुष्प बाजार से दुरी तथा ट्रांसपोर्टेशन की सुविधा पर निर्भर करती हैं। स्टेण्डर्ड गुलदाउदी की किस्मों के फूल तभी काटने चाहिए जब पुष्प पर्ण रूप से खिल जाये और ब्राहा पंखुडिया पूरी तरह से सीधी हो जाए।

Read also – जैव उर्वरक एवं जैव नियंत्रण द्धारा आधुनिक खेती

स्प्रे गुलदाउदी की किस्मों को उस समय काटना चाहिए जब टहनी पर ऊपरी एक पुष्प पर्ण रूप से खिल जाए एवं अन्य पुष्प कलियों में रंग दिखाई देने लगे। पुष्प टहनी को जमीन से लगभग 10-112 सेमी. की ऊंचाई पर काटना चाहिए। पुष्प डंडियों को काटने का कार्य सुबह या सांयकाल के समय करना चाहिए। पुष्प डंडियों को काटने के तुरंत बाद इनका निचला ५-६ सेमी. हिस्सा साफ पानी में डूबा देना चाहिए तथा किसी ठण्डे कमरे या छायादार स्थान पर 3-4 घण्टे के लिए रख देना चाहिए।

श्रेणीकरण/ग्रेडिंग

पुष्प डंडियों का श्रेणीकरण पुष्प डंडियों की लम्बाई, पुष्प की संख्या, प्रति डंडी पुष्प का व्यास एवं उनके रंग के आधार पर किया जाता हैं। पुष्प डंडियों को पुष्प डंडी की लम्बाई 50 सेमी., 60 सेमी., 70 सेमी., 80 सेमी. 90 सेमी. व एक मीटर के आधार पर वर्गीकृत किया जाता हैं। वर्गीकरण से पहले पुष्प डंडियों पर यह देख लिया जाता हैं की कोई कीट जैसे एफिड, केटरपिलर इत्यादि का संक्रमण तो नहीं हैं।

Read also – मक्का (स्वीट कॉर्न एवं बेबी कॉर्न) की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

संक्रमण की अवस्था में प्रभावित पुष्प डंडियों को छाँटकर अलग कर देते हैं। उपरोक्त वर्णित लम्बाई के अनुसार गुलदाउदी की 10 पुष्प डंडिया प्रति बण्डल में रखकर रबड़ बेंड निचे व ऊपर लगा देते हैं। पुष्प डंडियों की प्रति बंडल संख्या बाजार पर निर्धारित करती हैं। पुष्प के बंडल को पत्तियों एवं पुष्प की सुरक्षा के लिए पतले पॉलीथिन बेग में रख देते हैं।

इस प्रकार का रेडीमेड पॉलीथिन बेग बाजार में उपलब्ध हैं। एक बेग में एक ही बण्डल रखा जाता हैं। इस प्रकार तैयार पुष्प बंडलों की लम्बाई के अनुसार कठोर कागज से बने गत्तों में पुष्प उत्पादक के खेत/फार्म से पुष्प बाजार में ट्रांसपोर्टेशन जैसे बस इत्यादि द्वारा भेजा जाता हैं।

गुलदाउदी के प्रमुख कीट एवं उनका प्रबंधन

गुलदाउदी उत्पादन में कुछ ऐसे कारक हैं जो की इनकी गुणवत्ता के साथ-साथ उत्पादन को प्रभावित करते हैं। जिसमे प्रमुख कारण कीटों का प्रकोप हैं। कीटों के इस नुकसान से बचने के लिए किसान बिना विचार किए व सोचे समझे रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग अंधाधुंध करते हैं जिससे कीटों की संख्या तो कम होती हैं लेकिन कई समस्याये भी पैदा होती हैं, जैसे की पौधों का जल जाना या मुरझाना, पर्यावरण प्रदूषण, कीटों में कीट विषों के प्रति सहनशीलता  व मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव इत्यादि।

Read also – बागवानी से साकार कर रहे किसान अपने सपने

जिसके द्वारा अधिक उत्पादन के साथ-साथ गुणवत्तायुक्त फूल प्राप्त कर सकते हैं। गुलदाउदी में लगने वाले प्रमुख कीट निम्नवत हैं जिनके द्वारा होने वाली क्षति एवं उनकी रोकथाम व प्रबंधन के उपायों से गुलदाउदी को नुकसान होने से बचाया जा सकता हैं

माहूँ

यह कीट अन्य माहूँ की अपेक्षा आकार में थोड़ा बड़ा व काले भूरे रंग का होता हैं। इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ दोनों ही अवस्था का मुखांग चुभोने व चूसने वाला होता हैं जिससे पौधों की कोमल पत्तियों पर काले रंग के मल त्याग देते हैं जिसके कारण पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया बाधित होती हैं जिससे पत्तियां पिली हो जाती हैं और पौधे कमजोर हो जाते हैं।

Read also – नर्सरी में प्रो ट्रे तकनीक से तैयार करें सब्जियों की पौध

अधिक प्रकोप होने पर पुष्प कलियों का आकार छोटा हो जाता हैं एवं पूर्ण रूप से खिल नहीं पाते हैं। माहूँ विष्णु रोग का वाहक हैं। इसके प्रकोप से काफी हानी उठानी पड़ती हैं। इस कीट का प्रकोप सितंबर से फरवरी तक पाया जाता हैं, अक्टुम्बर-नवम्बर में इसका प्रकोप अधिक होता हैं।

प्रबंधन

प्रभावित पौधों को उखाड़कर नष्ट कर दें।

कीटनाशीयों का छिड़काव करते समय यह ध्यान देने की बात हैं की कीटनाशी ज्यादा जहरीला न हो क्योंकि ज्यादा जहरीला होने पर कीटनाशी पौधे के साथ-साथ मधुमक्खियों को भी नुकसान पहुँचाते हैं।

निम्नलिखित कीटनाशियों का आवश्यकता पड़ने पर छिड़काव करें, जैसे:- इमिडक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. की 1 मि.ली. प्रति ली. की मात्रा या मोनोक्रोटोफॉस 36% एस.एल. की 300-400 मि.ली. मात्रा या सेपरमेथ्रिन 10 ई.सी. की 500 मि.ली. मात्रा को प्रति हैक. की दर से आवश्यकतानुसार पानी में मिलाकर प्रयोग करें या एसीटामिप्रिड 20 एस.पी. की 200-400 ग्राम मात्रा को प्रति एकड़ की दर से प्रयोग करें।

Read also – तिल की उन्नत खेती एवं उत्पादन की उन्नत तकनीक

सफेद मक्खी

यह कीट आकार में बहुत ही छोटा व सफेद रंग का होता हैं जो पत्तियों के निचले सतह पर पाए जाते हैं। इस किट की प्रौढ़ व शिशु अवस्था दोनों का मुखांग चुभोने व चूसने वाला होता हैं जिसके द्वारा शिशु एवं प्रौढ़ दोनों ही पौधों की पत्तियों का रस चूसते हैं जिससे पत्तियों पर पिले पिले धब्बे बन जाते हैं जिससे पौधे कमजोर होकर सुख जाते हैं।

प्रबंधन

माहू के प्रबंधन की तरह से।

पत्ती सुरंगक किट

यह किट गुलदाउदी का प्रमुख व हानिकारक किट हैं। व्यस्क मक्खी चमकीले गहरे हरे रंग की होती हैं तथा यह आकार में लगभग 2-3 मिली. मीटर लम्बी होती हैं। पूर्णविकसित मेगट पिले रंग का गलभग 3 मिमी. लम्बा और 0.75 मिमी. चौड़ा होता हैं। यह गुलदाउदी पत्तियों में सुरंग बनाकर पत्तियों के हरे भाग को कहती हैं जिससे गुलदाउदी की पत्तियों के ऊपरी सतह पर सफेद धारियां दिखाई देती हैं इसके प्रकोप के कारण पौधों में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया बाधित होती हैं जिससे गुलदाउदी की पत्तियां और पौधे कमजोर होकर सुख जाते हैं।

Read also – कपास की फसल में पोषक तत्वों का प्रबंधन कैसे करें

प्रबंधन

माहू के प्रबंधन की तरह से।

तम्बाकू की सुंडी

यह किट रात्रिचर स्वभाव का होता हैं तथा दिन के समय जमीन में छिपे रहते हैं और रात्रि के समय जमीन से बाहर आ जाते हैं तथा गुलदाउदी की कोमल पत्तियों एवं टहनियों को काटकर कहते हैं, जिससे काफी हानि होती हैं। इस किट की सुंडी अवस्था नुकसान पहुँचाती हैं। इस किट के सुंडी का मुखांग काटने व चबाने वाला होता हैं सुंडी मुख्य रूप से 2.5-3 सेमी. लम्बी हरे रंग की काली धारी  रंग की होती हैं तथा व्यस्क का रंग भूरा होता हैं।

प्रबंधन

  1. नीम उत्पादित किट विष (5%एन.इस.के.ई.) का प्रयोग करें।
  2. प्रकाश प्रपंच की व्यवस्था करें।
  3. फेरोमोन ट्रेप को 5-6 की संख्या में प्रति हे. की दर से व्यवस्था करें।
  4. बी.टी. की एक किग्रा. मात्रा प्रति हैक. की दर से 500 लीटर पानी में मिलकर 20-25 दिन के अंतराल पर 3-4 बार छिड़काव करें।
  5. आवश्यकता पड़ने पर प्रमुख किट नाशियों का 3-4 बार छिड़काव 20-25 दिन के अंतराल पर 500 लिटर पानी में घोलकर/हैक. की दर से प्रयोग करें।

Read also – ग्वार की उन्नत खेती एवं उन्नत किस्में व उत्पादन तकनीक

  • इमिडाक्लोप्रिड 17 एस.एल. की 500 मिली. मात्रा।
  • सायपरमेथ्रिन 10 ई.सी. की 500 मिली. मात्रा।
  • डाइक्लोरवास की 500 मिली. मात्रा।
  • मेलाथियोन 50 ई.सी. की 950 मिली. मात्रा।

लाल मकड़ी

यह गुलदाउदी का एक नुकसान दायक अष्टपादि हैं जो लाल रंग का होता हैं और पत्तियों के निचली सतह पर पाए जाते हैं। जिसका मुखांग चुभोने व चूसने वाला होता हैं इस अष्टपादी का प्रकोप प्रारम्भिक अवस्था में होती हैं जो की पौधों की कोमल पत्तियों से रस चुस्ती हैं जिससे पत्तियों का हरा रंग भूरे रंग में परिवर्तित हो जाता हैं। जिसके फलस्वरूप पौधों की बढ़वार रुक जाती हैं तथा फूल कम बनते हैं। जिससे काफी हानि उठानी पड़ती हैं।

प्रबंधन

प्रभावित शाखाओं को तोड़कर नष्ट कर दे या जला दें।

प्रमुख अष्टपादि नाशकों जैसे हिजफोल या डाइकोफोल की 1.0-2.0 मि.ली. मात्रा का प्रति ली. पानी में घोलकर दिन के अंतराल पर 3-4 बार छिड़काव करें।

Read also – ज्वार की उन्नत खेती एवं अधिक उत्पादन तकनीक

गुलदाउदी के प्रमुख रोग एवं उनका प्रबंधन

पाउडरी मिल्ड्यू

फफूंद द्वारा जनित इस रोग में सफेद रंग के पाउडर की परत पत्तियों के ऊपरी भाग पर फेल जाती हैं तथा अत्यधिक संक्रमण की अवस्था में यह पत्तियों के पृष्ठ भाग व तने पर भी फेल जाती हैं। इसका प्रकोप अत्यधिक आर्द्रता वाले वातावरण में ज्यादा होता हैं। इस रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियां धीरे-धीरे मुरझा जाती हैं तथा पौधा सूखने लगता हैं। इसकी रोकथाम के लिए डायनोकेप का 0.03% सांद्रता का घोल बनाकर समय-समय पर छिड़काव करना चाहिए। इस छिड़काव से इस रोग पर काफी हद तक नियंत्रण पाया गया हैं।

सेप्टोरिया ऑफ़ स्पॉट

वर्षात में गुलदाउदी की यह एक मुख्य बीमारी हैं। इसके संक्रमण से पुराणी पत्तियों पर पहले भूरे रंग का एवं बाद में काले रंग की घोल आकृति का धब्बा बन जाता हैं। तनों के निचले हिस्से की पत्तियां पहले प्रभावित होती हैं।

Read also – बाजरा उत्पादन की वैज्ञानिक खेती एवं उन्नत पद्धति

बीमारी का प्रकोप अत्यधिक होने पर पत्तियां जड़ जाती हैं तथा पौधा मर जाता हैं।  इस रोग पर नियंत्रण के लिए सर्वप्रथम रोग युक्त पौधों को नष्ट कर देते हैं मेंकोजेब या केप्टान या कार्बेन्डाजिम का 0.3% सांद्रता का घोल बनाकर छिड़काव (10 दिनों के अंतराल पर) करते हैं तथा क्यारियों में पानी के जमाव को रोकते हैं।

जड़ एवं तना सड़न

जड़ एवं तना सड़न जैसी बीमारी गर्म व आद्र वातावरण में ज्यादा फैलती है। यह बीमारी वानस्पतिक विधि से पौध सामग्री, को तैयार करते समय नर्सरी में पानी जमाव होने के कारण होता है। इस कवक के संक्रमण से पौधों की जड़े, तने व पत्तियाँ एकाएक गल जाती है। इसकी रोकथाम के लिए सर्वप्रथम रूटिंग मिडिया को ठीक ढंग से 1% फार्मेल्डिहाइड के घोल से उपचारित करंते हैं तथा यदि कोई कटिंग रोग से ग्रस्त है तो उसे निकालकर जमीं में खड्डा खोदकर दबा देते है। इसके आलावा अन्य कवकनाशी जैसे केप्टॉन या बिनोमिल के 2.0 सांद्रता वाले घोल से पौधों की ड्रेचिंग करते है।

Read also – खरीफ फसलों की उन्नत किस्म के बीज

बैक्टीरिया ब्लाइट

यह बैक्टीरिया द्धारा जनित रोग है। इससे संक्रमित पौधों का ऊपरी भाग मुर्जा कर गिर जाता है तथा नर्सरी में गुलदाउदी की पौध तैयार करते समय कटिंग्स का निचला हिस्सा भूरे-काले रंग का होकर गाल जाता है। इस बीमारी की रोकथाम के लिए कटिंग्स को लगाने के पूर्व मिट्टी का शोधन करना चाहिए तथा कटिंग्स को जीव प्रतिरोधी  जैसे स्ट्रेप्टोमाइसिन या स्ट्रेपोसाइक्लीन के घोल में 4 घंटे तक डुबाकर रखना चहिये। इससे इस रोग पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जाता है।

विषाणु रोग

गुलदाउदी के पौधे कई  प्रकार के विषाणुओं से भी ग्रसित हो सकते है। विष्णु से प्रभावित पौधों की पत्तियों पर विभिन्न प्रकार की आकृतियां एवं धब्बे दिखाई देते है। विष्णु रोग का फैलाव एफिड, थ्रिप्स, संक्रमित मातृ पौध से प्रवर्धन, संक्रमित औजार इत्यादि से होता है। इसकी रोकथाम के लिए एफडीस, थ्रिप्स पर नियंत्रण विषाणु मुक्त पौधों का प्रवर्धन तथा आस-पास उगने वाली घासों की सफाई एवं स्वच्छ कृषि यंत्रो का प्रयोग अनिवार्य है।

Read also – खरीफ फसलों में सामयिक एवं प्रभावी खरपतवार प्रबंधन

Facebook Comments

About the author

bheru lal gaderi

Hello! My name is Bheru Lal Gaderi, a full time internet marketer and blogger from Chittorgarh, Rajasthan, India. Shouttermouth is my Blog here I write about Tips and Tricks,Making Money Online – SEO – Blogging and much more. Do check it out! Thanks.