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गुन्दा (लसोड़ा) की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

गुन्दा
Written by bheru lal gaderi

वैज्ञानिक नाम कोर्डिया डाइकोटोमा एवं कोर्डिया मिक्सा है।  कुल- बोरागिनेसी, उत्पत्ति स्थान भारत इण्डियन चेरी या लसोड़ा, गुन्दा, लहसुआ, बहुवार आदि कहते हैं।

गुन्दा

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लसोड़ा एक मध्यम आकार का फल वृक्ष है। यह शुष्क एवं अर्द्धशुष्क क्षेत्रों में पाया जाता है। इसका उपयोग वायु रोधक पट्टियों के रूप में व घरों में बगीचों में लगाया हुआ देखा जा सकता है। यह कम पानी में आसानी से पनपने वाला पौधा है।

गुन्दा की खेती राजस्थान में अजमेर, जोधपुर, पाली, सिरोही, जालौर जिले में बहुतायत से होती है। अगर गुन्दा/लसोड़ा को खेत के चारों ओर वायुरोधक पट्टियों के रूप में लगाया जाए तो यह गर्मी में लू से सर्दी में पाले से फसलों की रक्षा तो करता ही है साथ में किसानों को इसके अतिरिक्त आय प्राप्त होती है।

इसके कच्चे फलों से सब्जी व अचार बनाया जाता है। इसके फलों के अलावा पत्ते पशुओं के चारे के रूप में व इसकी लकड़ी का उपयोग कृषि उपकरणों के हत्थे बनाने में काम आते हैं।

इसके फलों में औषधीय गुण विध्यमान है।  यह कृमिनाशक, मूत्रवर्धक तथा कफनाशक होता है। पूर्णरूप से पक्का हुआ फल मीठा होता है तथा ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े चाव से खाया जाता है, परंतु इसके गुदे में लसलसा पदार्थ अधिक होने के कारण फल के रूप में प्रचलित नहीं है।

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गुन्दा की किस्में:-

प्रकृति में दो तरह के गुंदे होते हैं।

  1. जंगलीय छोटे फल वाला गुन्दा
  2. बड़े फल वाला गुन्दा

जंगली या छोटे फल वाला गुन्दा:-

इसके पत्ते तथा फल छोटे होते हैं। एक फल का वजन 3 से 5 ग्राम होता है। इसमें लगभग 50% गुठली एवं 50% गुदा होता है। इसकी बाजार में कीमत नहीं मिलती है, क्योंकि इसके फल में गूदा कम होता है, पर इसके बीजों का अंकुरण अच्छा होता है। लगभग 40% तक अंकुरण हो जाता है। इसलिए इसका उपयोग बड़े फल वाले गुन्दा पौधों के लिए रूट स्टॉक के रूप में काम में लाया जाता है।

बड़े फल वाला गुन्दा:-

इसके पत्ते तथा फल जंगली गुन्दा से लगभग दो गुने बड़े होते है। एक फल का वजन 6-10 ग्राम तथा खाने योग्य भाग 80 से 90% तक होता है। इसके बीजों का अंकुरण जंगली गुंदे की अपेक्षा कम होता है।

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भूमि एवं जलवायु:-

गूंदा की खेती के लिए उचित जल निकास वाली बलुई दोमट भूमि अच्छी रहती हैं। वैसे इसकी खेती के लिए सभी तरह की भूमि अच्छी रहती हैं। इसमें सूखापन सहन करने की क्षमता अधिक होती है।

यह क्षारीय भूमि को भी सहन कर सकता है। इसकी खेती के लिए उष्ण एवं उपोष्ण जलवायु अच्छी रहती है, परंतु पाला इसके लिए हानिकारक होता है। यह शुष्क और अर्धशुष्क जलवायु का फल है, इसलिए राजस्थान में इसकी व्यवसायिक रूप से खेती करने की पूर्ण संभावनाये है।

पौध लगाने की विधि:-

गुन्दा की पौध लगाने का उचित समय जुलाई-सितंबर है। क्योंकि उस समय तक उसी वर्ष में मई-जून में बोये गए बीजों से पौध रोपाई योग्य हो जाती है। इसको खेत में लगाने के लिए गड्डे का आधार 60X60X60 से.मी. करते है तथा पौध व कतारों के बीच की दूरी 6 मीटर रखकर वर्गाकार विधि से क्षेत्र का रेखांकन किया जाता है।

गड्डे खोदने का कार्य मई-जून में करना चाहिए। खोदे गए गड्ढों की ऊपरी मिट्टी में 15 किलो गोबर की खाद कंपोस्ट मिलाकर पुनः भर दे। अगर दीमक की आशंका हो तो मिट्टी एवं खाद के मिश्रण में 100 ग्राम क्यूनालफोस दवा मिला दे।

गड्डों की वापिस भरे के पश्चात सभी गड्डों के केंद्र बिंदुओं पर लकड़ी की खूंटी गाड़ दे ताकि पौधा लगाते समय केंद्र बिंदु का ध्यान रहे। जुलाई-अगस्त में एक या दो वर्षा होने के बाद पौध की खेत में रोपाई कर दे एवं आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहे।

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पौध तैयार करना:-

गुंदे का प्रवर्धन बीज व कलिकायन विधि द्वारा किया जाता है।

बीज द्वारा:-

इस विधि से पौध तैयार करने के लिए बड़े फल वाले गुदों जिस की उपज अच्छी हो, से पके हुए फल इकट्ठे कर ले। पके हुए फलों से गुठली निकाल ले। चूँकि गुठली के चारों तरफ बहुत सारा लसलसा पदार्थ होता है इसलिए इसको बालू, मिट्टी व रेत से रगड़कर गुठली को साफ कर लें तथा एक-दो दिन धूप में सुखा लें।

इसके बाद इन्हे पहले से तैयार खाद एवं मिट्टी के मिश्रण से भरी हुई पॉलिथीन की थैलियों में लगा दे। बीज को 1 सेंटी मीटर की गहराई पर बोये व तुरंत सिंचाई कर दें।

कलीकायन विधि द्वारा:-

इस विधि से पौध तैयार करने के लिए जंगली पौधों से बीज अलग करें तथा उन्हें जून के महीने में पोलिथिन थैलियों में बो दें जब यह पौधे 2 महीने के हो जाए तब उन पर बड़े फल वाले गुन्दा के पेड़ जिसकी उत्पादन क्षमता अच्छी हो, से कलिका लेकर टी विधि से उस पर चढ़ा ले। यह कार्य अगस्त-सितंबर माह में किया जाना चाहिए।

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खाद एवं उर्वरक:-

पौधों में खाद एवं उर्वरक निम्न तालिका के अनुसार देवें।

खाद एवं उर्वरकप्रथम वर्षद्वितीय वर्षतृतीय वर्षचतुर्थ वर्षपांचवा वर्ष
गोबर की खाद1015202530
यूरिया00.10000.15000.20000.25000.300
सुपर फास्फेट00.20000.30000.40000.50000.600
म्यूरेट ऑफ पोटाश……..………00.10000.20000.300

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कटाई छटाई:-

गुन्दा में फल व फूल पिछले वर्ष की शाखाओं पर ही लगते हैं। इसलिए इसमें प्रति वर्ष नियमित कटाई की जरूरत नहीं पड़ती हैं। पर शुरू के 2 वर्षों में मजबूत शाखाओं की संतुलित वृद्धि के लिए छंटाई करना भी आवश्यक हैं। छंटाई करते समय एक दूसरे के ऊपर से गुजरने वाली तथा नीचे की ओर झुकी हुई शाखाओं को सिकेटियर से काट लें। इसी तरह से सुखी हुई टहनियों तथा रोगग्रस्त शाखाओं को समय समय पर काटते समय रहे।

सिंचाई:-

पौधों की रोपाई के प्रथम 2 वर्षों में नियमित रूप से सर्दियों में 15 दिन व गर्मियों में 7 से 10 दिन के अंतर पर सिंचाई करें। जब पौधे 3 से 4 वर्ष के हो जाएं तब उनमे फलन साधारणतया शुरू हो जाता है। इस समय सिंचाई की व्यवस्था अति आवश्यक है। बड़े पौधों में नवंबर-जनवरी तक सिंचाई बंद कर देने से पत्ते पीले पड़ कर गिरने लगते हैं। लेकिन सभी पत्ते एक साथ नहीं गिरते इसलिए जनवरी के अंतिम सप्ताह में पेड़ों से सभी पत्ते हाथ से तोड़ देना चाहिए।

यह क्रिया करने से फूल एवं फल जल्दी व एक साथ आते है। पत्ते तोड़ने के बाद फरवरी के दूसरे सप्ताह में देशी खाद या कंपोस्ट (10-15 किग्रा./पेड़) डालकर अच्छी तरह खोदकर मिट्टी में मिला कर सिंचाई शुरू कर दें। जैसे तापमान बढ़ने लगे नई बढ़वार व फूल एक साथ शुरू हो जाते हैं, इस दौरान हल्की सिंचाई 7-12 दिन के अंतराल पर नियमित रुप से करें।

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फूल व फल बनना:-

गुन्दा में फरवरी-मार्च में हल्के पीले रंग के छोटे फूल आना शुरू हो जाते हैं। इसमें 40-50 दिन तक फूलों का बनना चलता रहता है। मई-जून में पूर्ण विकसित फल (20-25 मि.मी. व्यास) के फल गुच्छों में आते हैं।

रोग व कीट:-

गुन्दा में रोग व कीट से ज्यादा नुकसान नहीं होता है पर पौधों की शाखाओं से गोंड जैसा तरल पदार्थ निकलना बहुत आम है। कई बार या तरल पदार्थ नीचे बढ़ता हुआ दिखाई देता है। यह गोंद प्रायः शाखाओं में सुखकर पोषक तत्वों व पानी के बहाव को रोक देता है। जिस से ऊपर की शाखाएं सूखने लगती है।

नियंत्रण:-

सुखी हुई डालियों को काटकर शाखाओं पर जमे हुए गोंद को चाकू की सहायता से खुरच कर कॉपर आक्सीक्लोराइड या बोर्डो पेस्ट का लेप करने से कुछ हद तक नुकसान को कम किया जा सकता है।

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कीट:-

फरवरी-मार्च में जब पौधों की नई बढ़वार शुरू होती हैं तब मोइला तथा अन्य रस चूसने वाले कीटों का आक्रमण देखा गया है।

नियंत्रण:-

मोनोक्रोटोफॉस 1.0 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर दो से तीन छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर करें।

फूलों व फलों का गिरना:-

फरवरी के दूसरे व तीसरे सप्ताह में जब फूल व फलन शुरू होता है तो कई बार तापमान अचानक बढ़ जाता है या फिर गर्म हवा के चलने से फूल व फल अधिक मात्रा में गिरने लगते हैं।

नियंत्रण:-

इस को नियंत्रित करने के लिए बगीचे में नमी बनाए रखें हो सके तो कभी-कभी पानी से पौधों पर छिड़काव भी करें। इसके अतिरिक्त प्लानोफिक्स (एन.ए.ए.) 5.0 मिली दवा का 15 लीटर पानी में मिलाकर फूलो फलो पर छिड़काव करने से नुकसान को रोका जा सकता है।

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फलों की तुड़ाई एवं उपज:-

राजस्थान में गुन्दा में फरवरी-मार्च में फूल आते हैं तथा मई-जून में इसके फल तैयार हो जाते हैं। इसके फलों को ज्यादातर अचार बनाने के काम में लिया जाता है। अर्थात हरे फल ही तोड़ लिए जाते हैं। फलों को हमेशा गुच्छों में ही तोड़ना चाहिए। ताकि तुड़ाई के बाद काफी समय तक फल ताजा बने रहें।

उपज:-

एक पेड़ से औसतन 20 से 50 किग्रा फल प्राप्त किए जा सकते हैं।

तुड़ाई के बाद प्रबंधन:-

फलों की तुड़ाई सुबह के समय सर्वोत्तम रहती हैं। फल तोड़ने के बाद ठंडे पानी 3-5 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान में 5 मिनट तक डुबोकर निकालने से फलों से गर्मी निकल जाती है। जिससे फल तुड़ाई के बाद अधिक समय तक ताजे बने रहते हैं।

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प्रस्तुति:-

श्री जालम सिंह राठौड़

डॉ. एस. एस. राठौड़

नवल किशोर गुप्ता

डॉ. बाबू लाल यादव

चौंमू, जिला- जयपुर

स्रोत:-

कृषि भारती

वर्ष 8, अंक 09, जयपुर, 16 जून 2018

Mob.- 09983353511

Email- krishibharti@gmail.com

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