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किसानों को मिले गुणवत्ता युक्त सस्ता बीज

बीज
Written by bheru lal gaderi

बीज कृषि का उत्तम ही नहीं सर्वोत्तम आदान हैं और पृथ्वी की गोद से उत्पन्न पार्थिव पदार्थ हैं जो धरा को अपना बिछोना बनाकर सो जाता हैं और पुनः उग कर चर-अचर की उत्पत्ति का आधार बनता हैं। देश में अधिकतम उत्पादन हो और देश की बढ़ती हुई जनसंख्या भर का भरण पोषण हो सके इसलिए भारत एवं राज्य सरकारें कृषक परक नीतियां बनाती हैं। वार्षिक बजट में कृषि और बीज के लिए विशेष धन आवंटित करती हैं।

बीज

बीज के मीनीकट देकर नवीनतम अधिक उत्पादन देने वाली किस्मों को लोकप्रिय बनाती हैं। इसी क्रम में बीजों पर अनुदान देकर उन्हें सस्ती दर पर उपलब्ध कराकर धरनीधरों की पहुंच तक लाना और बीज परिवर्तन दर (एसआरआर) बढ़कर देश/राज्य में उत्पादन स्तम्भ बनाना राज्य सरकारों और केंद्र सरकार का लक्ष्य हैं।

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निजी बीज उद्योग भारी

राष्ट्रीय और राज्य सरकारों के प्रयास सराहनीय हैं। सरकारों की सोच सकारत्मक हैं परन्तु निजी बीज उद्योग सरकार पर भारी पड़ता हैं। अपने अस्तित्व की रक्षा हेतु रातों रात धनाढ्य बनने के लिए सरकार की सब योजनाए तार तार कर देता हैं। सरकार जिन नवीनतम किस्मों को लोकप्रिय करने हेतु मिनिकिट या सब्सिडी देती हैं।

बीज

निजी बीज उद्योग उसके प्रति दुष्प्रचार कर सरकारी प्रयासों को निष्फल कर देते हैं तथा अपनी तथा कथित रिसर्च किस्मों का बीज विक्रेताओं तथा अन्य माध्यमों द्वारा महिमा मंडित कर साकार रूप दे देते हैं और सरकारी प्रयासों पर भारी पड़ते हैं।

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निजी विकास पर सरकार का नियंत्रण

बीज उधमियों की तथाकथित रिसर्च किस्मों के विकास के लिए सरकार ने कोई मापदंड और नियम नहीं बनाए। ऐसे बीज उत्पादक जिनके पास खुद का फार्म नहीं, जमीन ठेके पर नहीं ली, वैज्ञानिक नहीं, कोई रिसर्च का ढांचा नहीं हैं वे एक साल में कई रिसर्च किस्में निकाल देते हैं।

आश्चर्य तो तब होता हैं जब छोटे-छोटे बीज विक्रेता अपनी रिसर्च किस्में निकाल देते हैं। और ऐसा होता देख “रिसर्च” शब्द को अपने आप पर लज्जा आती हैं। कृषि विभाग को इस बारे में सचेत होना चाहिए तथा रिसर्च किस्मों के विकास की पारदर्शी निति बनानी चाहिए। जिससे हाड़तोड़ कमाई छल कपट करने वाले बीज उद्धमीयों द्वारा न हड़प ली जाए।

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रिसर्च एवं डवलपमेंट प्रमाण पत्र

अनुसन्धान या रिसर्च एक विधा हैं जो हर क्षेत्र में उन्नयन करती हैं, नई दिशाए देती हैं, नई राहे दिखाती हैं। कृषि में भी और विशेष तोर से किस्म में विकास अनुसंधान का विशेष महत्व हैं और हम इसे अनुभव मदद से विशिष्ट उपलब्धियां प्राप्त करते हैं।

बीज

भारत सरकार द्वारा प्रायोजित रिसर्च एन्ड डवलपमेंट प्रमाण पत्र अपने अनुसंधान को पहचान दिलाने के लिए आवश्यक हैं और अंतराष्ट्रीय तथा स्थानीय कम्पनी आर.एण्ड.डी. प्रमाण पत्र प्राप्त कर रही हैं। यह प्रमाण पत्र अपने अनुसंधान को नियमित करने का मान्यता प्राप्त तरीका हैं। परन्तु आजकल बीज कंपनियों की आर.एण्ड.डी. प्रमाण पत्र प्राप्त करने की  होड़ सी लगी रहती हैं।

ऐसी  कंपनियां जो मात्र एक या दो वर्ष पूर्व ही बीज उत्पादन में उत्तरी हैं वे भी आर.एण्ड.डी. प्रमाण पत्र प्राप्त करना चाहती हैं तथा उसे किसानों विक्रेताओं तथा कृषि विभाग में प्रचारित प्रसारित कर केवल बीज बिक्री का अस्त्र बनाती हैं, अनुसंधान का नहीं।

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धनार्जन ही उद्देश्य

नयी किस्मे विकसित करने का ढोंग करना तथा आर.एण्ड.डी. प्रमाण पत्र प्राप्त करना या प्राप्त करने का स्वांग रचने के पीछे निजी उद्योग की स्थानीय कंपनियों का उद्देश्य धन कमाना हैं। बीज उद्योग में एक धारणा हैं की कृषि विश्वविद्यालयों की किस्मों का बीज बनाने और नाम से बेचने से अच्छा लाभ नहीं मिलता।

अतः कंपनियां इन किस्मों के बीज को अन्य नाम रख कर अपनी रिसर्च किस्म कहकर भोलेभाले किसान का शोषण करती हैं। आर.एण्ड.डी. का स्वांग रचना भी इसी उद्देश्य का हिस्सा हैं। देश में कई लाख कंपनियां हैं परन्तु मुश्किल से 100 कंपनियों के पास आर.एण्ड.डी. प्रमाण पत्र हैं। अनुसंधान करने के लिए आर.एण्ड.डी. प्रमाण पत्र जरूरी नहीं परन्तु कोई बीज वास्तव में रिसर्च करें तो सही।

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मूल्य दर निर्धारण

तथाकथित रिसर्च किस्मे स्वयं में एक अपराध हैं उसके ऊपर अतिश्योक्ति पूर्ण इनकी दरें। उदाहरण के लिए सरसों की विभिन्न साधारण किस्मों और तथा कथित रिसर्च बीज की विभिन्न दरें होती हैं। यही हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की किस्म आर.एच.-749 का बीज 40 रु. किलो हैं तो इसी किस्म का बीज विभिन्न नामों से अति लुभावने प्लास्टिक पाउचों में रु. 80 व 125 रु. से लेकर रु. 145 तथा 300-400 प्रति किलो बिक रहा हैं और इस तथाकथित किस्म विकास को रोकने तथा ऊँची विक्रय दरों पर नियंत्रण कर हरियाणा सरकार और अन्य राज्य सरकारों के पास कोई उपाय नहीं हैं।

इतना ही नहीं इस अंधेरगर्दी में तथा प्रतिष्ठित कंपनियां भी पीछे नहीं हैं। ऐसा भी अनुभव किया हैं की इस बहती गंगा में रिसर्च किस्मों के साथ छोटे विक्रेता भी तथाकथित सलेक्शन किस्मों के साथ डुबकी लगा रहें हैं। कई कंपनियां ऐसी हैं जो सरसों की साधारण किस्म को चमचमाते, लुभावने प्लास्टिक पेकिंग में संकर किस्म कह कर बेच रही हैं जो पाप ही नहीं बल्कि अपराध हैं।

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रेगुलेशन ऑफ़ सप्लाई, डिस्ट्रब्यूशन, विक्रय एन्ड फिक्सेशन ऑफ़ सेल प्राइस

विगत में कपास बीज उत्पादन में भी ऐसा ही था और राज्य सरकारों ने निजी कंपनियों की अनियमित दरों के निर्धारण हेतु महाराष्ट्र सरकार ने महाराष्ट्र कॉटन सीड (रेगुलेशन ऑफ़ सप्लाई, डिस्ट्रब्यूशन, विक्रय एन्ड फिक्सेशन ऑफ़ सेल प्राइस) एक्ट 2009 बनाया। इसी तर्ज पर गुजरात में अधिनियम बना तथा अन्य राज्य भी पद्धति पर चल रहे हैं।

विदेशी कंपनियों को भारत छोड़ने के कारण ऐसा हुआ। यह बीज उत्पादकों/विक्रेताओं की आदत में सुधार नहीं आता तो हरियाणा सरकार को भी पग उठाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। बीज व्यवहारी आपस में बैठकर इसकी दरों का नियमन नहीं करेंगे क्योंकि उनके मस्तिष्क में होता हैं की जो होगा सभी के लिए होगा। अतः यह कार्य राज्य स्तर पर हर वर्ष विक्रय सीजन से 2 माह पूर्व होना चाहिए।

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सुझाव

कंपनियों की तथाकथित अनुसंधान का विवरण, कृषि वैज्ञानिकों की जानकारी, अनुसंधान स्थल और उसमे रिसर्च एवं ट्रायल के विवरण कृषि विभाग ले और उसकी प्रत्येक वर्ष समीक्षा करें।

विक्रय मौसम से पहले कृषि विभाग बीज विक्रय की अधिकतम दर निर्धारित करें। यह दर कोस्ट सीड में मंदों के अनुसार गणना की जाए। जिसमे बीज उत्पादकों को विज्ञापन आदि खर्च, उनको सिमित लाभ, ब्याज आदि सबकी गणना होनी चाहिए।

किसानों को भी अपनी रक्षा स्वयं करनी होगी। प्रत्येक गाँव में कृषक मंडल बनाने चाहिए और ज्यादा से ज्यादा किसानों को संकेत करना चाहिए। किसानों की चेतना से ही कृषि विभाग तथा बीज उत्पादक मंडल की कुम्भकर्णी नींद टूटेगी अन्यथा किसान हमेशा “बेचारा” शब्द से ही अलंकृत रहेगा।

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