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गुग्गल की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

गुग्गल की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक
Written by bheru lal gaderi

गूग्गल एक बहुशाखीय झाड़ीनुमा छोटा वृक्ष है। जिसके पत्ते चिकने तथा तीन पत्रक वाले होते हैं। इसके फल मांसल, लम्बे, छोटे बेर के समान, लंबे व लाल रंग के होते हैं। इसकी शाखाएं हल्की सफेद या भूरापन लिए रहती है। यह बहुत ही धीमी गति से बढ़ने वाला पौधा है। गुग्गल के पौधे की आयु 500 वर्ष होती है। इसके तने व शाखाओं से गोंद जैसा चिपचिपा पदार्थ निकलता है जो कि गूग्गल के नाम से जाना जाता है। यह एक उष्णकटिबंधीय पौधा है तथा इसके लिए शुष्क मरुस्थलीय जलवायु उपयुक्त है। अधिक गर्मी और गर्म हवाएं इससे रिसने वाले गोंद जैसे पदार्थ की मात्रा को बढ़ाने में सहायक होती है।

गुग्गल की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

गूग्गल का उपयोग

इसका उपयोग परंपरागत औषधि के रूप में किया जाता है। औषधियों में बड़े पैमाने पर कृमिनाशक, उदर रोग, कफ-निस्सारक, सहित-प्रशंसन, अतिसार, मूत्रल, तथा यह रक्त में सफेद कणिकाओं को बढ़ाती हैं। इसका उपयोग सौंदर्य-प्रसाधन, अगरब्त्त तथा सभी तरह के बाम के निर्माण में इस्तेमाल किया जाता है। गूग्गल का प्रयोग वात-रक्त, आमवात, भगंदर, कुष्ठ, प्रमेह, मूत्र-कच्छ, उपदंश, नेत्ररोग, शिरारोग, ह्रदय रोग, पांडु रोग, अम्लपित्त, पांडुरोग आदि में प्रभावी रूप से किया जाता है। गुग्गल लोशन के रूप में अल्सर, कमजोर दांत, मसूड़ों में पायरिया के उपचार तथा गले के अल्सर के उपचार में प्रयुक्त होता है। गूग्गल के धुए को यक्ष्मा के कीटाणुओं को नष्ट करने वाला बताया गया है। यह नदी तंत्र पर लाभकारी प्रभाव से शरीर में वात-संतुलन की स्थिति बनाए रखता है तथा त्रिदोष-हर, कृमिघ्न व वेदना स्थापक होने के कारण कैंसर के नियंत्रण में भी लाभप्रद है।

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जलवायु एवं भूमि

गूग्गल एक उष्णकटिबंधीय पौधा है मरुस्थलीय जलवायु तथा रेतीली भूमि इसकी खेती के लिए उपयुक्त है। गुग्गल क पौधा 40 से 50 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान सहन कर सकता है।

पौध तैयार करना

इसकी पौध कलम तथा बीज दोनों द्वारा तैयार कि जा सकती हैं। पौधे पर जब बीज अच्छी तरह से पककर लाल हो जाए तो उन्हें उतार लेना चाहिए और बीज का छिलका उतार कर अगस्त के महीने में नर्सरी तैयारी करते हैं इन बीजों का अंकुरण 15 दिनों में हो जाता है एवं 6 महीने में पौधे रोपाई योग्य हो जाते हैं।

कलम से पौधे तैयार करने हेतु 10-15 सेमी. लंबाई तथा 3 सेमी मोटाई की कलम जुलाई के महीने में बरसात होते ही आई.बी.ए. के 250 पि.पि.एम. के घोल में 24 घंटे तक डुबोकर 25 सेमी. की दुरी पर नर्सरी में लगभग 5 सेमी. की गहराई पर नर्सरी तैयार करते हैं। जब कल्ले फूटने लगे और पत्तियां निकलने लगे तो पौध खेत में रोपाई योग्य हो जाती हैं।

खेत की तैयारी एवं रोपाई

खेत में दो बार कल्टीवेटर से जुताई करके 22 मीटर की दूरी पर 45x45x45 सेमी. आकार के गड्ढे बनाते हैं। गड्डों में मिट्टी में सही मात्रा में खाद मिलकर भरते हैं और पौध लगाकर सिंचाई करते हैं। सामान्यतयाः पौध फरवरी के प्रथम सप्ताह में लगाते हैं।

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उर्वरक प्रबंधन

जब पौधों से नई पत्तियां निकलना प्रारंभ हो जावे तब 25 किग्रा नत्रजन, 25 किग्रा फास्फोरस पेंटाआक्साइड तथा 25 किग्रा पोटेशियम ऑक्साइड का मिश्रण प्रति हेक्टेयर के हिसाब से पौधे से 8-10 सेमी दूरी पर पौधों के चारों तरफ मिला देना चाहिए। दीमक से बचाव हेतु क्लोरोपायरीफॉस का घोल बनाकर काम में लाना चाहिए। उर्वरक मिश्रण जुलाई एवं अक्टूबर में प्रतिवर्ष देते रहना चाहिए।

सिंचाई एवं निराई

पौध लगाने के 30 दिन बाद पहली निराई करना चाहिए। इसके उपरांत आवश्यकतानुसार सिंचाई एवं निराई करते रहना चाहिए।

कटाई एवं छंटाई

दो साल के पश्चात् पौधे के मुख्य तने से छोटी-छोटी टहनियों को काट देना चाहिए जिससे पौधे की ठीक तरह से बढ़वार हो सके तथा तने की मोटाई बढ़ सके।

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गोंद निकालना

सामान्यतया 5 वर्ष की आयु के गुग्गल के पौधे गोंद निकालने योग्य हो जाते हैं। पौधे पर भूमि की सतह से 15 सेमी. की ऊंचाई पर वि आकार का 1 से 1.5 सेमी. गहरा चीरा, मई, जून और अक्टुम्बर में लगते हैं।

गुग्गल की पैदावार

एक पौधे से लगभग 100 से 125 ग्राम गोंद एक बार में प्राप्त होता है। एक पौधे में 3 से 4 चीरे लगाते हैं। दसवें वर्ष तक लगभग कुल 2 की.ग्रा. गोंद प्रत्येक पौधे से प्राप्त हो जाता है। 10 साल में लगभग 50000 रूपये/हेक्टेयर खर्च आता है। और प्रति हेक्टेयर 5000 किग्रा. गोंद प्राप्त होता है। गोंद का भाव 150-200 रूपये/किग्रा. रहते हैं। अर्थात औसतन प्रतिवर्ष  70,000-10,0000 रूपये प्रति हेक्टेयर लाभ प्राप्त होता है।

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