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गाजर घास खरपतवार का एकीकृत प्रबंधन

गाजर घास खरपतवार का एकीकृत प्रबंधन
Written by bheru lal gaderi

भारत में सर्वप्रथम यह गाजर घास (कांग्रेस घास) पुणे महाराष्ट्र में 1955 में दिखाई दी थी। ऐसा माना जाता है कि हमारे देश में इसका प्रवेश 1955 में अमेरिका से आयात किए गए गेहूं के साथ हुआ है। परंतु अल्पकाल में ही यह गाजर घास का आज पूरे देश में एक भीषण प्रकोप की तरह लगभग 35 मिलियन हेक्टेयर भूमि पर फैल चुकी है। गाजर घास पूरे वर्षभर उगता एवं फूलता फलता रहता है। इस खरपतवार द्वारा खाद्यान्न फसलों में लगभग 40% तक उत्पादन की कमी आंकी गई है। विश्व में गाजर घास भारत के अलावा अन्य देशों जैसे अमेरिका, मेक्सिको, वेस्टइंडीज, नेपाल, चीन, वियतनाम तथा ऑस्ट्रेलिया के विभिन्न भागों में फैली हुई है। इस आलेख में गाजर घास का नियंत्रण के उपायों का वर्णन किया गया है।

गाजर घास खरपतवार का एकीकृत प्रबंधन

Imag Credit -flowersofindia.net

गाजर घास का वैज्ञानिक नाम पार्थेनियम हिस्टोफोरस है। गाजरघास को अन्य नामों से जाना जाता है- कांग्रेस घास, सफेद टोपी, छंतक चांदनी, घणी-बूटी आदि। यह एस्टीरेस कुल का पौधा है। इसका मूल स्थान मैक्सिको, मध्य उत्तरी अमेरिका माना जाता है। यह खरपतवार पूरे भारतवर्ष में फैल चुकी है। वैसे तो गाजर घास का मुख्यतयाः शहरों में, खुले स्थानों, औद्योगिक क्षेत्रों, सड़कों के किनारे, रेलवे लाइन पर उग जाती है। हर प्रकार के वातावरण में उगने की अभूतपूर्व क्षमता रखता है।

इसके बीजों में सुषुप्ता अवस्था नहीं पाई जाती है। अतः नमी होने पर कभी भी अंकुरित हो जाता है। गाजरघास फसलों में नुकसान पहुंचाने के अलावा मनुष्य और जानवरों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती है। इसकी उपस्थिति के कारण स्थानीय वनस्पतिया नहीं उग पति, जिससे जैव विविधता पर प्रभाव पड़ता है और पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। इस खरपतवार की उपस्थिति के कारण मनुष्य में त्वचा रोग, बुखार और दमा हो जाता है। इसलिए इसका सामूहिक रुप से नियंत्रण करने की आवश्यकता है।

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गाजर घास की पहचान व जीवन चक्र

गाजरघास का 1 वर्षीय पौधा है, जिसकी लंबाई लगभग 1.0 से 1.5 मीटर तक हो सकती है। जिसका तना रोयेंदार एवं अत्यधिक शाखा युक्त होता है। इसकी पत्तियां गाजर की पत्तियों की तरह नजर आती है। इस कारण से गाजरघास कहते हैं, जिन पर सूक्ष्म रोये लगे होते हैं। पौधे पर 6 से 55 पत्तियां पाई जाती है। जमने के 1 महीने के बाद फूलने लगते हैं। फुल पर क्रीमी सफेद रंग के फूल खिलते हैं। प्रत्येक पौधा लगभग 10000 से 25000 अत्यंत सूक्ष्म बीज पैदा कर सकता है। बीजों में सुषुप्तावस्था नहीं होने के कारण बीज पककर जमीन पर गिरने के बाद नमी पाकर पुनः अंकुरित हो जाते हैं।

बीज के  जमाव के लिए 22 से 30 डिग्री तापक्रम इसकी बढ़वार के लिए उपयुक्त है। बीज 20 साल तक सुरक्षित रह सकता है। गाजरघास का बीज 20से 30 डिग्री तापक्रम पर अच्छी प्रकार से फलता-फूलता है। गाजर घास का पौधा लगभग तीन चार महीने में अपना जीवन चक्र पूरा कर लेता है। क्योंकि यह पौधा प्रकाश एवं तापक्रम के प्रति उदासीन होता है।

गाजर घास का पौधा हर तरह के वातावरण में उगने की अभूतपूर्व क्षमता रखता है। इसके बीज लगातार प्रकाश अथवा अंधकार दोनों ही परिस्थितियों में अंकुरित होते हैं। यह हर प्रकार की भूमि चाहे वह अम्लीय है या क्षारीय उग सकता है। इसलिए गाजर घास के पौधे समुद्र तट के किनारे एवं मध्यम से कम वर्षा वाले क्षेत्रों की शुष्क फसलों में भी देखने को मिलते हैं। बहुतायत रूप में गाजरघास के पौधे खाली स्थानों, अनुपयोगी भूमि, औद्योगिक क्षेत्रों, सड़कों के किनारे, रेलवे लाइनों आदि भूमि पर पाए जाते हैं। इसके अलावा इसका प्रकोप खाद्यान्न, दलहनी, तिलहनी, फसलों, सब्जियों एवं उत्पादन फसलों में भी देखने को मिलता है।

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गाजर घास का वितरण

इसका फैलाव सिंचित से अधिक सिंचित भूमि में देखा गया है। गाजर घास का प्रसार, फैलाव एवं वितरण मुख्यतः इसके अति सूक्ष्म बीजों द्वारा हुआ है। शोध से ज्ञात होता है कि 1 वर्ग मीटर भूमि में गाजर का लगभग 1,54,000 बीज उत्पन्न कर सकता है। एक स्वस्थ गाजर घास के अकेले पौधे से ही जीवन चक्र में लगभग 10 से 25 हजार बीच उत्पन्न हो सकते हैं। इसके बीज अत्यंत सूक्ष्म हल्के पंखदार होते हैं। सड़क और रेल मार्गों पर होने वाले यातायात के कारण भी यह संपूर्ण भारत में आसानी से फेल गई है। मनुष्य, पशुओं, यंत्रों, वाहनों, हवा एवं नदी, नालों और सिंचाई के पानी के माध्यम से भी गाजरघास के सूक्ष्म बीज एक स्थान से दूसरे स्थान पर आसानी से पहुंच जाते हैं।

गाजर घास से होने वाली हानियां

गाजर घास के संक्रमण से वातावरण प्रदूषित वह इसकी कॉलोनी से घास व चारे के उत्पादन को कम करता है। इसके पोलन विभिन्न फसलों में पौधे के बीज बनने पर प्रभाव डालता है। इस गाजरघास के लगातार संपर्क में आने से मनुष्यों में डरमेटाइटिस, एक्जिमा, एलर्जी, बुखार, दमा आदि जैसी बीमारियां हो जाती है। पशुओं के लिए यह गाजर घास अत्यधिक विषाक्त होता है। इसके खाने से पशुओं में अनेक प्रकार के रोग पैदा हो जाते हैं एवं दुधारू पशुओं के दूध में कड़वाहट के साथ दूध उत्पादन में कमी आने लगती है। इस खरपतवार द्वारा खाद्यान्न फसलों में लगभग 40% तक कम आंकी गई है। पौधे के रासायनिक विश्लेषण से पता चलता है कि इसमें सेस्क्यूटरपीन लेक्टोन नामक विषाक्त पदार्थ पाया जाता है जो फसलों के अंकुरण एवं वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

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नियंत्रण के उपाय

कृषि क्रियाएं

कृषि क्रियाएं विधि द्वारा खरपतवार नियंत्रण की विधि है। जिसमें परंपरागत अपनाई जाने वाली कृषि क्रियाओं में परिवर्तन कर खरपतवार पर नियंत्रण पाया जा सकता है। गाजरघास के जमने के तुरंत बाद हल से जुताई कर देनी चाहिए। फसलों में हेर-फेर कर बोने, खेत गहरी जुताई, मिश्रित फसल बोने पर नियंत्रण पाया जा सकता है। जहां पर गाजर घास का प्रकोप अधिक हो वहां पर फसलों में लाइन से लाइन की दूरी व पौधे से पौधे की दूरी कम रखनी चाहिए। बीज की मात्रा अधिक रखने से इस खरपतवार को फूलने- फलने का मौका कम मिलेगा। फसल में खरपतवार जमने के तुरंत बाद गुड़ाई कर देनी चाहिए।

यांत्रिक विधि

खरपतवार नियंत्रण कि यह आर्थिक एव उपयोग की विधि है। इस विधि द्वारा खरपतवार को पूरी तरह से नष्ट किया जा सकता है और जब भूमि में नमी हो तब आसानी से उखाड़ा जा सकता है। गाजरघास पूरे वर्ष उगता है पूर्ण रूप से नष्ट करने के लिए खरपतवार को फूलने से पहले हाथ से उखाड़ कर इकट्ठा करके जला देने या इसका कंपोस्ट बनाकर काफी हद तक नियंत्रण किया जा सकता है। क्योंकि खरपतवार में बीज जाने पर इसके बीज भूमि पर गिरने के बाद उचित नमी पाकर उग जाते हैं। इसलिए फूल आने से पहले इस खरपतवार को हाथ से उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए।

बीज के फैलाव को रोकने के लिए यंत्रों को अच्छी प्रकार से साफ कर लेना चाहिए। इसे उखाड़ते समय हाथ में दस्ताने तथा सुरक्षात्मक कपड़ों का प्रयोग करना चाहिए। क्योंकि गाजर घास एक व्यक्ति की समस्या ना होकर जनसाधारण की समस्या है अतः पार्को, कॉलोनी में रहने वालों को समूह बनाकर इसे उखाड़ कर नष्ट करना चाहिए।

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रासायनिक विधि

जैविक व अन्य खरपतवार नष्ट न हो तो शाकनाशियों प्रयोग करना उचित होगा। शाकनाशियों के प्रयोग से खरपतवार का नियंत्रण आसानी से किया जा सकता है। इस शाकनाशी रसायनों में एट्राजिन, एलाक्लोर, डाइयुरान, मेट्रिव्युजिन, 2,4-डी, ग्लाइफोसेट आदि प्रमुख हैं। वनस्पतियों को नष्ट करने के  साथ सभी प्रकार की वनस्पतियों को नष्ट करने के लिए ग्लाइफोसेट (1 से 1.5%) वनस्पतियों को बचाते हुए केवल गाजर घास को नष्ट करने के लिए (0.3-0.5%) नाम के रसायनों का प्रयोग करना चाहिए।

जैविक विधि

गाजर घास का नियंत्रण उनके प्राकृतिक शत्रुओं मुख्यता कीटों, रोगों के जीवाणु एवं वनस्पतियों द्वारा किया जा सकता है। गाजरघास का रोगकारक फंगस- एल्टरनेरिया एल्ट्रेनेटा, कुवुलेरिया लुनता, राइजोक्टोनिया सोलानाई, जीवाणु-रेलस्टोनिया सोलेनेसीरियम,जन्थोमोनास कप्टेरिस तथा वायरस-टोमेटो, लीफ कर्ल वायरस, टोमेटो स्टिक वायरस द्वारा नष्ट किया जा सकता है। किट मेक्सिकन बीटल द्वारा इस खरपतवार को नष्ट किया जा सकता है। जाइगोग्रामा बाइकोलोराटा नामक बीटल को गाजरघास को खाने वाले गुबरैले को गाजर घास से ग्रसित स्थानों पर छोड़ देना चाहिए।

इसके लार्वा और वयस्क दोनों अवस्थाओं पत्तियों को चाटकर गाजरघास को सुखाकर मार देते हैं। इस कीट के लगातार आक्रमण के कारण धीरे-धीरे गाजरघास कम हो जाती है। जिससे वहां अन्य वनस्पतियों को उगने का मौका मिल जाता है। एक वयस्क एक गाजर घास के पौधे को ६से 8 सप्ताह में चट कर जाता है। इस प्रकार एक हेक्टर क्षेत्र के लिए 7 से 11 लाख कीटों की आवश्यकता होगी। एक स्थान पर जहां गाजर घास अच्छी मात्रा में हो। कम से कम 500 से 1000 तक वयस्क बीटल छोड़ने चाहिए। एक स्थान गाजर घास खत्म हो जाने पर पास वाले क्षेत्रों की गाजरघास पर आकर्षित होकर स्वतः ही चले जाएंगे।

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अवांछित पौधे 

गाजर घास के प्रभाव को कम करने के लिए प्रतिस्पर्धी वनस्पतियों जैसे चकोड़ा, हिप्टिस, जंगली चौलाई आदि से गाजर घास को आसानी से विस्थापित किया जा सकता है। प्रतिस्पर्धी वनस्पति गाजर घास की गति को बढ़ने से रोकता है। अक्टूबर-नवंबर माह में चकोड़ा के बीज इकट्ठा कर उनका अप्रैल-मई महीने में गाजरघास से ग्रसित स्थानों पर छिड़काव कर देना चाहिए। वर्षा होने पर शीघ्र ही वहां चकोड़ा गाजर घास को विस्थापित कर देता है।

वैधानिक नियंत्रण

कृषि विकास के लिए बहुत से पौधे उनके भाग तथा अनाज एक देश से दूसरे देशों को भेजें तथा मंगाए जाते हैं। इन पदार्थों के साथ बहुत से हानिकारक जीव व्याधिया खरपतवार एक देश से दूसरे देश में प्रवेश कर जाते हैं। इसे रोकने के वैधानिक प्रावधान बनाने चाहिए व खरपतवारों के प्रवेश एवं उनके फैलाव को रोकने हेतु नगर राज्य स्तर पर कानून बनाकर बचत दंड का प्रावधान रख इस पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। सभी राज्यों को गाजरघास को अधिनियम के अंतर्गत रखकर इसके उल्लंघन की प्रक्रिया युद्ध स्तर पर करनी चाहिए।

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प्रस्तुति

आर.एस. यादव, सह प्राध्यापक (शस्य विज्ञान),

चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर (उ.प्र.),

ऋषिपाल, पर्यवेक्षक, जैविक नियंत्रण प्रयोगशाला (कीट विज्ञान विभाग),

सी.एस. प्रसाद प्राध्यापक (कीट विज्ञान विभाग),

सरदार वल्लभ भाई पटेल, कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, मेरठ (उ. प्र.)

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