agriculture

गन्ने की उन्नत खेती एवं पौध संरक्षण

गन्ने की उन्नत खेती
Written by bheru lal gaderi

गन्ना(Sugarcane) की फसल प्राचीन काल से भारत में उगाई जाती है। यह गुड़ व चीनी का प्रमुख स्रोत है। विश्व में गन्ना व चीनी (26.64 मी. टन) उत्पादन में भारत दूसरे स्थान पर है। देश में गन्ने की खेती 5 मिलियन हेक्टयर क्षेत्र में की जाती है। जिसकी औसत उत्पादकता 71.67 टन प्रति हेक्टेयर है।  देश में गन्ने की खेती उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक तथा महाराष्ट्र में प्रमुखता से की जाती है।

गन्ने की उन्नत खेती

गन्ने की उन्नत किस्में एवं उनका विवरण

सी.ओ. – 419

देर से पकने वाली व अधिक उपज देने वाली यह किस्म चिकनी मिट्टी के लिए अधिक उपयुक्त है। इसकी औसत उपज 120 टन प्रति हेक्टेयर है।

सी.ओ.एस. – 677

सूखे एवं पीला के प्रति सहनशील, भारी मिट्टी वाले क्षेत्रों हेतु उपयुक्त, सामान्य से माध्यम समय में पकने वाली इस किस्म का जमाव अच्छा होता है। ठोस गन्ने वाली व न गिरने वाली गुड़ के लिए उपयुक्त  इस किस्म की पेड़ी की फसल भी अच्छी होती है। लाल सड़न एवं कण्डवा रोग रोधी इस किस्म में कीड़ों का प्रकोप भी कम होता है। उपज 80-100 टन प्रति हेक्टेयर होती है।

Read also – कृषि बाजार से जुड़ी मुख्य समस्याएं एवं सुझाव

सी. ओ.- 1007

भारी मिट्टी वाले क्षेत्रों के लिए भी उपयुक्त माध्यम समय में पकने वाली यह किस्म आड़ी नहीं गिरती और पेड़ी के लिए उपयुक्त होती है। सभी परिस्थितियों में उगाये जाने वाली इस किस्म में कीड़ों का प्रकोप भी कम होता है एवं इसकी उपज 80-100 टन प्रति हेक्टेयर तक होती है।

सी. ओ. 66-17

गन्ने की अगेती कम पैदावार देने वाली इस किस्म के गन्ने लगभग 2.5 मीटर लम्बे व 2.5 सेन्टीमीटर मोठे, हरे रंग के ठोस व सीधे अपेक्षाकृत कम छोड़ी पत्तियों वाले होते है। नवंबर में पकने वाली यह किस्म आड़ी नहीं गिरती है। इसमें शर्करा की अधिक मात्रा होती है, इसलिए यह किस्म मिल के लिए सर्वोत्तम है।

सूखा एवं पाला सहन कर सकने वाली इस किस्म की पेड़ी बहुत अच्छी होती है तथा गुड़ बहुत अच्छा बनता है। यह ऐसे क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है जहाँ लाल सड़न रोग का प्रकोप नहीं पाया जाता है। इसमें पायरिला का प्रकोप भी कम पाया जाता है। इसकी उपज 70-75 टन प्रति हेक्टेयर एवं इसकी पेड़ी की फसल की उपज 65 टन प्रति हेक्टेयर होती है।

Read also – कहावतों से समझे खेती किसानी की कहानी

सी. ओ. – 1148

माध्यम समय में पकने वाली यह किस्म भारी मिट्टी वाले क्षेत्रों के लिए उपयोगी है। इसके गन्ने लगभग ढाई मीटर लम्बे व सवा दो सेन्टीमीटर मोटे ठोस व सीधे रहने वाले होते है। इसमें शर्करा की मात्रा 17% तथा उत्पादन क्षमता 80-100 टन प्रति हेक्टेयर है। यह सूखा सहने की क्षमता रखती है तथा लाल सड़न रोग से कम प्रभावित होती है।

सी ओ पंत 84211

यह एक अगेती किस्म हैं जिसमे अच्छा अंकुरण होता हैं एवं कल्लों की संख्या भी अच्छी होती हैं। पेड़ी के लिए उपयुक्त इस किस्म का गणना पीला हरा होता हैं एवं हल्के जामुनी रंग की झलक होती हैं। गन्ने की औसत लम्बाई दो से ढाई मीटर तथा एक गन्ने का वजन 800 ग्राम होता हैं। इसके गन्ने गिरते तथा उनके फूल भी नहीं आते। इसकी औसत उपज 70-85 टन प्रति हेक्टेयर तथा 10 माह की फसल में ग्लूकोज की मात्रा 18 से 18.5% होती हैं। इसमें लाल सड़न व कण्डवा रोग का प्रकोप भी कम होता हैं।

सी ओ जे 64

यह किस्म गन्ने की अगेती किस्म हैं तथा 300 दिन में पककर तैयार हो जाती हैं। इसका रंग हल्का पीला हैं। यह किस्म पड़ी के लिए भी अत्यंत उपयुक्त हैं। इसके गन्ने की ओसत लम्बाई 2 मीटर से 2.5 मीटर तक तथा एक गन्ने का औसत भार 750 ग्राम से 850 ग्राम प्रति हॉट हैं। इस किस्म के गन्ने आड़े नहीं पड़ते हैं तथा इसमें फूल भी नहीं आते हैं। इसकी औसत उपज 70-75 टन प्रति हेक्टेयर होती हैं। आईएसएम शर्करा की मात्रा 17.5 से 18.00% तक होती हैं। यह किस्म लाल सड़न रोग व कण्डवा रोग से प्रतिरोधी होती हैं।

Read also – हरिमन शर्मा किसान वैज्ञानिक उनकी कहानी उनकी जुबानी

सी ओ जे-97015

मध्य देरी से पकने वाली अधिक शर्करा युक्त एवं अधिक उपज देने वाली किस्म हैं।

सी. ओ 00421

गन्ने की यह किस्म अगेती हैं (280-300 दिन में पकने वाली) इसकी औसत उपज 85-90 टन/हेक्टेयर हैं, इसका गन्ना थोड़ा पतला व हल्के हरे रंग का होता हैं। पत्तियाँ कम चौड़ी होती हैं। इसमें शर्करा 17-18% होता हैं। यह किस्म लाल सड़न रोग व कण्डवा रोग से प्रतिरोधी होती हैं। यह किस्म गुड़ बनाने के लिए काफी उत्तम हैं। इसकी पेड़ी भी उचित रहती हैं। पेड़ी की फसल में इसकी औसत पैदावार 65-75 टन प्रति हेक्टेयर हैं।

प्रताप गन्ना – 1 (सी ओ पी के 05191)

यह किस्म 81 टन प्रति हेक्टेयर गन्ना उपज एवं 9.5 टन व्यावसायिक चीनी उत्पादन देती हैं तथा इसमें 17.2% सुक्रोज पाया जाता हैं। यह किस्म आदि गिरने, सूखा सहने तथा तना गलन, स्मट व उखटा रोग के प्रति सहनशील हैं।

इसके अतिरिक्त सी 238, सी ओ पंत 84136 एवं सी ओ एल के 8001 किस्मों की भी सिफारिश हैं।

Read also – उत्तक संवर्धन पादप जैव प्रौद्योगिकी का कृषि विकास में योगदान

भूमि की तैयारी

गन्ने के लिए दोमट या मध्यम चिकनी मिट्टी, जो क्षारीय न हो तथा जिसमे जल निकास का समुचित प्रबबंध हो अच्छी रहती हैं। बुवाई के लिए खेत को अच्छी तरह तैयार करना चाहिए। प्रथम जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा इसके बाद 2-3 जुताई देशी हल या कलटीवेटर से करे। अच्छी तरह जुताई करने के बाद खेत को समतल करने हेतु पाटा अवश्य लगा देना चाहिए। विल्ट लगने वाले रोग ग्रस्त खेतों में गन्ना न बोए। मृदा का पीएच 6.5-8.0 के मध्य होना चाहिए।

बीज एवं बीज की मात्रा

प्रति हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई के लिए 2-2 आँख वाले (66-67 हजार) या 3-3 आखों वाले लगभग 40-45 हजार टुकड़ों की आवश्यकता होती हैं। इतने टुकड़े गन्ने की मोटाई के अनुसार 6-8 टन गन्ने से प्राप्त किये जा सकते हैं। उपयुक्त किस्मों के रोग व किट से मुक्त बीज का प्रयोग करें। टुकड़े काटते समय कोई गन्ना अंदर से लाल दिखाई दे तो बीज के लिए उसका प्रयोग नहीं करें। गन्ने की आँख पूर्ण स्वस्थ होनी चाहिए। जहां तक संभव हो गन्ना नर्सरी से ही ले। बीज हेतु गन्ने का तो तिहाई हिस्सा या ऊपर के आधे हिस्से को काम में लेवे। इस भाग में सुक्रोज की मात्रा कम रहने से तथा कलिया अविकसित स्वस्थ होने के कारण गन्ने में जमाव बहुत जल्दी व अच्छा होता हैं।

बीजोपचार

बुवाई से पूर्व बीज के टुकड़ों को 100 लीटर पानी कार्बेन्डाजिम 50 ग्राम (0.05% घोल), 300 मिली लीटर मेलाथियान के घोल में 15-30 मिनट तक डुबोकर बोए। 1:2:5 के अनुपात में गाय का गोबर:मूत्र:पानी के घोल में 15 मिनट डुबोकर लगाने से कलियों का अंकुरण अच्छा होता हैं।

Read also –जैव तकनीक का पशुधन सुधार में उपयोग

बुवाई

बसंत कालीन बुवाई

मध्य फरवरी से मध्य मार्च बुवाई करें। इसके बाद बुवाई करनी हो तो बीज किमत्र कुछ बड़ा देनी चाहिए। 15 मार्च बाद बुवाई करने हेतु सी ओ 419 के बजाए सी ओ 1007 किस्म काम में लेनी चाहिए। शरदकालीन गन्ने की अपेक्षा बसन्तकालीन गन्ने में उपज अधिक प्राप्त होती है।

शरदकालीन बुवाई

गन्ने की बुवाई अक्टुम्बर से भी की जा सकती हैं। इस समय बुवाई के दो लाभ हैं। गन्ने व शक़्कर की उपज बढ़ती हैं तथा साथ ही गेहू सरसों या चुकुन्दर की मिश्रित फसल भी ली जा सकती हैं। इसके लिए गन्ने की बुवाई 15 से 20 अक्टुम्बर तक अवश्य कर देनी चाहिए। यह फसल 13 से 14 माह में तैयार हो जाती हैं।

ग्रीष्मकालीन बुवाई

देर से बुवाई (गेहू के बाद मध्य अप्रेल मई) इस स्थिति में गन्ना लेने पर 250 किलो नत्रजन प्रति हक्टेयर डालें व गन्ने की किस्म सी ओ एल के 8001 बोए व कतार से कतार की दुरी 60 सेमी. रखे।

Read also – फसलों में जैव उत्पाद से रोग नियंत्रण एवं प्रयोग विधि

बुवाई की विधि

बुवाई विधि

गन्ने की बुवाई सपाट व फेरो विधि से करनी चाहिए। इसके लिए पलेवा देकर खेत तैयार करने के बाद 75-90 सेमी. के फासले पर गहरे कुंड निकाले। भारी व अच्छी उपजाऊ भूमियों में पंक्ति से पंक्ति की दुरी 90 सेमी. एवं हल्की एवं कम उपजाऊ मृदा में यह दुरी 75 सेमी. रखे।

  • इन कुंडों में दीमक आदि कीड़ों की रोकथाम हेतु कीटनाशक डालकर ऊपर से गन्ने के टुकड़ों को ड्योढ़ा मिलकर रख दे और फिर पाटा फेर दे ताकि टुकड़े अच्छी प्रकार मिटटी में ढक जाए। बुवाई के तीसरे सप्ताह में एक सिंचाई देकर सावधानी से अंधी गुड़ाई करें, ऐसा करने से मिट्टी की पपड़ी उखड जएगी और अंकुरण अच्छा होगा।
  •  चिकनी मिट्टी वाले क्षेत्रों में जमीन भुरभुरी तैयार नहीं हो पाती हैं। इसलिए इन क्षेत्रों में सुखी मिट्टी में बुवाई करनी चाहिए। इसके लिए सुखी मिट्टी में 75-90 सेमी. की दुरी पर गहरे कुंड निकालकर उनमे उर्वरक तथा भूमि उपचार हेतु औषधि डाल दे। इसके बाद गन्ने के टुकड़ों को ड्योढ़ा (तिरछा) रख दे और पाटा फेरकर तुरंत सिंचाई कर दे। ध्यान रहे की पहली सिंचाई हल्की और समान होनी चाहिए। जब खेत बाह पर आ जाए तो अच्छी तरह अंधी गुड़ाई करें। इसके 15-20 दिन बाद दोबारा सिंचाई कर बाह आने पर गुड़ाई करें। इससे अंकुरण अच्छा होगा।
  • खली स्थानों पर रोपाई हेतु गन्ने की तीन-चार अतिरिक्त पंक्तिया बोए। जहां अंकुरण कम हुआ हो, वहां बुवाई के 25-30 दिन बाद एक आँख वाले टुकड़े को निकालकर रोपाई करें।

Read also – उद्यानिकी यंत्रीकरण में नवाचार

जैविक खाद एवं उर्वरक

भूमि की तैयारी के साथ प्रति हेक्टेयर 25-30 टन कम्पोस्ट अथवा गोबर की खाद बिखेर देना चाहिए। मृदा परिक्षण की सिफारिश अनुसार उर्वरक देवें। इसके आभाव में 200 किलो नत्रजन, 60 किलो फॉस्फोरस व 30-40 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर देवें।

नत्रजनीय उर्वरक को चार हिस्सों में बांटकर बुवाई के समय, शीर्ष बढ़वार के समय एवं शेष चौथाई वर्षा शुरू होने पर  देवें। फॉस्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय कुंडो में उर कर देवे।  सल्फर क कमी से पत्तियां पिली पड़ती हो तो तीन वर्ष में एक बार बुवाई के तीन सप्ताह पूर्व प्रति हेक्टेयर 40 किलो गंधक चूर्ण दें। पर यदि जिप्सम का प्रयोग करें तो गंधक से छह गुनी मात्रा जिप्सम की देवे।

खाद एवं उर्वरक देने सम्बन्धित मुख्य समीकरण

  • गुड़ बनाने के लिए 200:45:30 किलो एन.पी.के. प्रति हेक्टेयर की दर से तीन बराबर भागों में बांटकर 30,60 व 90 दिन पर देवें।
  • गन्ने की मुख्य फसल 100% एन.पी.के. 25% नाइट्रोजन गोबर की खाद से जैविक खाद (एजोटोबेक्टर तथा फॉस्फोरस घुलनशील जीवाणु) तथा रेटून फसल में 100% एन.पी.के. सेल्युलोटिक खाद की भूमि में समायोजन करने से गन्ने की उपज में वृद्धि पायी गई।
  • गन्ना की मुख्य फसल में नत्रजन फॉस्फोरस व पोटेशियम की संस्तुति मात्रा के साथ 40 सल्फर, 25 किलो जिंक सल्फेट देने से गन्ने की फसल में उत्पादकता बधाई जा सकती है।
  • गन्ने की पड़ी फसल हेतु 60 किलो पोटाश तथा 25 किलो जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से गन्ना काटने के 30 दिन पहले पानी के साथ देने पर अधिक पेड़ी उपज प्राप्त होती है।
  • खड़ी फसल में सूक्ष्म तत्व जिंक आयरन की कमी दूर करने हेतु 0.5% जिंक सल्फेट, फोरस सल्फेट 1 या 0.5% फेरस ईडी डीए को 1% यूरिया के साथ 15 दिन के अंतराल पर तब तक छिड़काव करें जब तक कमी के लक्षण दूर न हो जावे।

Read also – अचारी मिर्च की खेती एवं उत्पादन तकनीक

सिंचाई

10-15 दिन के अन्तर पर वर्षा न हो तो सिंचाई करना चाहिए। वर्षा समाप्त होने के बाद फसल की कटाई तक 25-30 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए। इस प्रकार 12-15 सिंचाई गन्ने के लिए पर्याप्त रहती है। गन्ने की फसल को जुड़वाँ पंक्तियों में बुवाई की विधि के साथ 12 सिंचाइया देने अधिकतम पानी उपयोग दक्षता, गन्ना उपज तथा व्यवसायिक चीनी प्राप्त होती है।

  • बुवाई के बाद फवारा पद्धति से गन्ने में सिंचाई करने से 30-35% पानी की बचत, अंकुरण क्षमता 90% अधिक तथा उपज में 20-30% वृद्धि होती है। यह पद्धति गन्ना अवशेष को सड़ाने में भी उपयुक्त है।
  • ड्रिप सिंचाई पद्धति द्वारा खेत में पानी देने से भूमि में नमी की समुचित मात्रा एक समान रहती है। जिससे फसल द्वारा पोषक तत्व का अवशोषण अधिक होता है तथा 45-40% तक पानी की बचत तथा  20-30% उपज में वृद्धि होती है।

Read also – कृषि रसायनों के उपयोग से पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव

निराई-गुड़ाई

बुवाई के बाद पहली और दूसरी सिंचाई के बाद गुड़ाई करना बहुत जरुरी है, जिससे गन्ने का अंकुरण भलीभांति हो सके। खेत में खरपतवार न रहे इसका ध्यान रखना चाहिए। खरपतवारों को खरपतवारनाशी रसायनों का चिढ़कर करके भी नष्ट किया जा सकता है। इसके लिए 1.25 किलो एट्राजिन प्रति हेक्टेयर की दर से एक हजार लीटर पानी में घोलकर कर बुवाई के 3-4 दिन बाद, जब खेत में अच्छ नमी हो छिड़काव करना चाहिए। जहां मिश्रित खेती की गई हो वहां खरपतवारनाशक रसायनों का प्रयोग नहीं करें।

  • सभी प्रकार के खरपतवारों का प्रभावी नियंत्रण हेतु एट्राजिन 2 किलो प्रति हेक्टेयर अंकुरण से पूर्व तथा डाईकेम्बा 350 ग्राम का प्लांटिंग के 75 दिन बाद उचित घोल बनाकर छिड़काव करें।
  • गन्ने के अंकुरण के बाद गन्ने की कटाई से प्राप्त पत्तियों को खेत में बिछा कर भी खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है। इसे खेत में नमी भी अधिक समय तक बानी रहती है अंकुरण छेदक का प्रकोप भी कम हो जाता है।
  • गन्ने की फसल में खरपतवारों के सफल नियंत्रण के लिए हेक्साजाइनोन (46.8%) + डाइयुरोन (13.2%) मिश्रण (60% पानी में घुलनशील पाउडर) को गाने के अंकुरण से पहले 1.20 किलोग्राम सक्रीय तत्व प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए। तथा इसके बाद फसल के 90 दिन की अवस्था पर निराई-गुड़ाई करनी चाहिए।

Read also – महुआ महत्व एवं उन्नत शस्य क्रियाऐं

फसल संरक्षण

दीमक नियंत्रण

दीमक का प्रकोप दोमट भूमि में शुष्क अवस्थाओं में अधिक होता हैं। ये नई बोई गई पोरियों के कटे हुए सिरों एवं आखों को खाती हैं। तीव्र प्रकोप में 40-60% अंकुरण नष्ट हो जाते हैं। रोकथाम हेतु पोरियों को नालियों में डालने से पूर्व क्यूनालफॉस 1.5% 25 किलोग्राम परइ हेक्टेयर की दर से भूमि उपचार करें अथवा 4-5 लीटर क्लोरोपायरिफॉस 20 ई.सी. का छिड़काव नालियों में रखे बीज के टुकड़ों पर मिट्टी ढकने से पूर्व करें इससे जड़ छेदन किट से भी बचाव होता हैं। कड़ी फसल में दीमक नियंत्रण हेतु 4 लीटर क्लोरोपायरिफॉस 20  ई.सी. प्रति  हेक्टेयर सिंचाई के पानी के साथ देवें।

जड़ छेदन, तना छेदक एवं शीर्ष छेदक

इसकी रोकथाम के लिए एक लीटर क्यूनालफॉस 25 ई.सी. या मोनोक्रोटोफॉस 36 एस.एल. पीटीआई हेक्टेयर छिड़के। जल्दी बुवाई करने से जड़ छेदक का प्रकोप कम होता हैं। कटाई के बाद खेत में डंठल व कचरे को इकट्ठा करके जला दे। खेत में प्रकाश पाश की सहायता से वयस्क कीड़ों को नष्ट कर इनकी संख्या को कम करना लाभदायक रहता हैं।

पायरिला एवं सफेद मक्खी

पायरिला का प्रकोप मार्च-अप्रेल से अक्टुम्बर नवम्बर तक होता हैं। रोकथाम हेतु मिथाइल पेराथियोन 2% चूर्ण 25 किलो प्रतिहेक्टेयर की दर से भुरके अथवा कार्बेरिल 50% घुलनशील चूर्ण 2.5 किलो या क्यूनालफॉस 25 ई.सी. डाइमिथोएट 30 ई.सी. या मिथाइल डिमेटॉन 25 ई.सी. एक लीटर,या मेलाथियान 50 ई.सी. 1.87 लीटर (गन्ने की बड़ी फसल के लिए) या मेलाथियान 50 ई.सी. सवा लीटर (छोटी फसल के लिए) प्रति हेक्टेयर में से किसी एक रसायन का छिड़काव करें।

Read also – करंज का महत्व एवं उन्नत शस्य क्रियाएं

टिपणी

घोल बनाने के लिए पानी की मात्रा छिड़काव करने वाले उपकरण की किस्म एवं फसल की अवस्था पर निर्भर करेगी।

लाल सड़न रोग

रोग नियंत्रण हेतु रोग रहित बीज बोए। जिस खेत में रोग लगा हो उसमे से स्वस्थ गन्ना काटकर शेष गन्ने में आग लगा दे एवं उस खेत में फिर एक वर्ष ततक गन्ना न बोए। रोग रोधक किस्मे जैसे सी ओ 419, सी ओ 1007 या सी ओ 449 ही बोए। रोग ग्रसित खेत से स्वस्थ गन्ने के खेत में पानी न आने दे।

कण्डवा रोग

रोग नियंत्रण हेतु स्वस्थ गन्ने के टुकड़े ही बोए। रोग ग्रस्त पौधे को उखड कर जला दे। रोग रोधक किस्मे जैसे सी ओ 1007, सी ओ 449, सी ओ 449 ही बोए। पेड़ी फसल न ले। गर्म वायु एवं गर्म की उपचार विधि काम में ले।

50 ग्राम कार्बेन्डाजिम 100 लीटर पानी में घोलकर गन्ने के टुकड़ों को इस घोल में पूरा डुबोकर निकाले और फिर इनकी बुवाई करे।

Read also – अलसी की फसल में एकीकृत कीटनाशी प्रबंधन

गन्ने के पत्ते का सफेद पड़ना

पत्तों के थोड़ा सा सफेद दिखाई देते ही 1.5 लीटर गंधक के तेजाब जा 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। आवश्यकता पड़ने पर 15-15 दिन के अंतराल पर छिड़काव दोहराए अथवा पत्तों के थोड़ा सफेद दिखाई देते ही 0.5% हरा कसीस तथा 0.25% चुने के घोला का मिश्रण बनाकर फसल पर छिड़के अथवा रोग दिखाई देते ही हरा कसीस 100 ग्राम टार्टरिक अम्ल या साइट्रिक अम्ल 25 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी में घोलकर आवश्यकतानुसार हर बिस्वे दिन छिड़काव करें।

यह छिड़काव वर्षा होने पर बंद कर दे। इससे पत्तियों का रंग फिर हरा हो जाता हैं क्योंकि यह रोग पौधे में लोह तत्व की कमी के कारण होता हैं अथवा जहां पर गन्ने का सफेद पड़ना हर वर्ष उग्र रूप में दिखाई पड़ता हो वहां 40 किलो गंधक या 5 किलो फेरस सल्फेट या जिप्सम कुंडों में दे। यदि गंधक का प्रयोग किया जाता हैं तो उसे बुवाई के 21 दिन पूर्व भूमि में मिलाए।

 

मिट्टी चढ़ाना तथा फसल बांधना

हल्की मिट्टी वाले क्षेत्र में फसल को गिरने से बचाने तथा देर से फूटने वे कल्लो को निकलने से रोकने के लिए वर्षा प्रारम्भ होते ही पौधे की जड़ों पर अच्छी तरह मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए। अगस्त- सितम्बर में फसल की बंधे कर देनी चाहिए, ताकि फसल गिरने न पाए, क्योंकि फसल गिरने से उपज तथा गन्ने में शक़्कर की मात्रा दोनों कम हो जाती हैं।

Read also – आंवला का परिरक्षण एवं विभिन्न उत्पाद

गन्नों की बंधाई अर्ध सुखी पत्तियों की रस्सी बनाकर करनी चाहिए। बंधाई सीधी न करें। आमने-सामने की कतारों के तीन चार गन्ने के झुंड को पत्तों से तिपाई के रूप में बांधना चाहिए। इससे खड़ी फसल में पाइरिला की रोकथाम के लिए दवाई का छिड़काव आसानी से किया जा सकेगा।

पेड़ी फसल लेना

गन्ने की पेड़ी एक वर्ष के लिए लेना उपयुक्त पाया गया हैं। पेड़ी वाले खेतों में गन्ने की कटाई जमीन की सतह तक करनी चाहिए और फरवरी के शुरू में पत्तों व खरपतवार को आग लगाकर नष्ट कर देना चाहिए। इसके पश्चात् सिंचाई देकर खेत में बाह आने पर गन्ने की लाइन क समांतर जुताई करनी चाहिए। नत्रजन खाद नई फसल की सिफारिश अनुसार देनी चाहिए।

खेत की खाली जगह में गन्ने के नए बीज के टुकड़े लगा देवे। गन्ने की पेड़ी की अधिक उपज लेने के लिए फरवरी के प्रथम सप्ताह में मुख्य फसल की कटाई करे तथा प्ररोहों को नहीं हटाए। दो पेड़ी से अधिक न लेवे। पेड़ी में खाद, पानी तथा अन्य क्रियाएं मुख्य फसल की भांति ही करें।  काटने के बाद बची हुई पत्तियां जला दे एवं पड़ी के लिए आवश्यक शस्य क्रियाएं अपनाए। इसकी 60-80 टन प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त की जा सकती हैं।

Read also – वैज्ञानिक विधि से फल उद्यान कैसे तैयार करें

गन्ना की रटून(पेड़ी) फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए मेट्रिब्यूजिन 1.0 किग्रा. सक्रीय तत्व का प्रति हेक्टेयर की दर से अंकुरण पूर्व छिड़काव + एक निराई-गुड़ाई अंकुरण के 45 दिन बाद करने से अधिक उपज प्राप्त होती है।

गन्ने की मुख्य एवं रटून(पेड़ी) फसल को 75% एन.पी.के. रासायनिक उर्वरक से + 25% नत्रजन, गोबर की खाद तथा बीज का टीकाकरण, एजेक्टोबेक्टर, पी.एस.बी. एवं ट्राइकोडर्मा से करने से वृद्धि पाई गई है।

गन्ने के साथ अंतरा शस्य फसल

अक्टूबर में की गई बुवाई में गेहूं एवं सरसों की फसल सफलता से ली जा सकती है। गन्ना 90-100 सेंटीमीटर के फासले पर बोना चाहिए और गन्ने की दो पंक्तियों के बिच में गेहूं की चार पंक्तिया या सरसों की ३ पंक्तियाँ नवंबर के दूसरे सप्ताह में, जब गन्ने का अंकुरण हो जाये बोए।

फरवरी-मार्च में बोये गन्ने में गर्मी की सब्जिया जैसे – भिंडी, प्याज, लोकि आदि भी लगाई जा सकती है।

Read also – कृषि वानिकी सब-मिशन योजना राजस्थान में

कटाई

गन्ना पूर्णतया पक जाये तब कटाई करें। इस समय पत्तियों का रंग पीला पद जाता है। पड़ी रखने के लिए गन्ना जमीन की सतह से काटना चाहिए। गन्ने की पड़ी फसल से 60 से 80 टन तथा मुख्य फसल से 100 से 120 टन प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है।

Author:-

भवानीशंकर मीणा, डॉ प्रमोद कुमार एवं डॉ राजेश कुमार बागड़ी

कृषि अनुसन्धान केंद्र, उम्मेदगंज, कोटा (कृषि विश्व विद्यालय, कोटा) (राज.)

 

 

Facebook Comments

About the author

bheru lal gaderi

Hello! My name is Bheru Lal Gaderi, a full time internet marketer and blogger from Chittorgarh, Rajasthan, India. Shouttermouth is my Blog here I write about Tips and Tricks,Making Money Online – SEO – Blogging and much more. Do check it out! Thanks.