agriculture

खाद्य सुरक्षा मिशन में सहकारिता की सहभागिता

खाद्य सुरक्षा मिशन
Written by bheru lal gaderi

खाद्य सुरक्षा मिशन में सहकारिता की सहभागिता – कृषकों के लिए तकदीर बदलने वाला वर्ष 1965 को कहे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इस जनवरी में केंद्र सरकार द्वारा कृषि मूल्य आयोग का गठन किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य कृषि जिंसों की उत्पादन लागत का विश्लेषण करना व उसके आधार पर कृषि उत्पादों के खरीद मूल्य की सिफारिश केंद्र सरकार को करना हैं। कृषि मूल्य आयोग से प्राप्त सिफारिशों पर विचार कर, केंद्र सरकार किसानों से सफल खरीद के लिए ऐसे न्यूनतम समर्थन मूल्य का निर्धारण करती हैं जिससे खेती किसान के लिए जीविकोपार्जन बनी रहे।

खाद्य सुरक्षा मिशन

Image Credit – indiatoday.intoday.in

वर्तमान में लगभग 25 कृषि जिंसों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी)भारत सरकार द्वारा निर्धारित किये जाते हैं। इनकी घोषणा वर्ष में दो बार खरीफ और रबी की फसलों की बुवाई से पूर्व की जाती हैं। सुनिश्चित खरीद मूल्य के आधार पर किसान अपनी फसल उत्पादन योजना (क्रॉपिंग स्किम) का निर्धारण करता हैं। वर्ष 1985 में कृषि आयोग का नाम बदलकर कृषि लागत व् मूल्य आयोग (एग्रीकल्चर कोस्ट एवं प्रैस कमीशन ) कर दिया गया।

वर्ष 1966 कृषि उत्पादन की दृष्टि से मील का पत्थर साबित हुआ। यह वह वर्ष था जब सरकार देशवासियों के भरण पोषण के लिए, मुख्यतः आयत पर निर्भर थी। इस वर्ष देश ने सर्वकालीन एक करोड़ अड़तीस लाख तरह हजार टन खाद्यान का आयात किया। सरकार ने साहसिक निर्णय लेते हुए, डॉ ई. नारमन बोरलाग द्वारा विकसित कम ऊंचाई की अधिक उपज देने वाले गेहूं की लरमा राजो एवं सोनेरा 64 किस्मों का आयात किया। इसके सुखद परिणाम मिले।

“सोने पे सुहागा’ का काम किया। भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद के वैज्ञानिकों ने। इनके द्वारा डॉ एम. एस. स्वामीनाथन के निर्देशन में अधिक उपज देने वाली गेहूं की ऐसी किस्मों का विकास किया गया जो भारतीय जलवायु के लिए उपयुक्त थी। इनमें तत्समय की प्रचलित किस्में कल्याण सोना, राज-3077 उल्लेखनीय है।

परिणामस्वरूप देश देखते ही देखते चार वर्ष की अल्पावधि में आयातक से आत्मनिर्भर हो गया। खाद्यान्न उत्पादन में अर्जित इस उपलब्धि को हरित क्रांति (ग्रीन रेवोल्यूशन) के नाम से परिभाषित किया गया। इसमें गेहूं व चावल की फसलों का विशेष योगदान रहा।

Read also – गन्ने की उन्नत खेती एवं पौध संरक्षण

सफल हरित क्रांति में न्यूनतम समर्थन मूल्य की सार्थकता

कृषि उत्पाद के लाभकारी मूल्य सुनिश्चित होने से, कृषक उपलब्ध संसाधनों व उन्नत तकनीक का उपयोग कर, उत्पादन बढ़ने का भरसक प्रयास करता है। यह 1966 की हरित क्रांति व 1968 में सोयाबीन फसलोत्पादन के सफल प्रयोग से यह स्वयमेव स्पष्ट है।

उपरोक्त वर्णित सफलताओं में साकार की न्यूनतम समर्थन मूल्य निति की सार्थक भूमिका थी। केन्द्र साकार द्वारा प्रतिवर्ष न केवल समर्थन मूल्यों की घोषणा की गई अपितु समर्थन मूल्य पर सरकारी प्रतिष्ठानों द्वारा खरीद भी सुनिश्चित की गई।

केन्द्र सरकार के उपक्रम भारतीय खाद्य निगम (फूड कॉपोरेशन ऑफ इन्डिया को नोडल एजेन्सी नियुक्त किया गया) द्वारा नाफेड, राजफेड आदि राष्ट्रिय व राज्य स्तरीय संस्थाओं के माध्यम से सरकारी स्तर पर गेहूं व चावल की व्यापक स्तर पर वर्ष दर वर्ष खरीद सुनिश्चित की गई।

परिणामतः कुल उत्पादन का लगभग एक तिहाई मात्रा सरकारी स्तर पर प्रतिवर्ष खरीद की जाती है। शेष एक तिहाई मात्रा की खरीद खुले बाजार में व्यापारियों द्वारा की जाती है। इससे भाव में स्थिरता कायम रहती है। बाजार भाव समर्थन मूल्य से निचे नहीं जाते है। इससे मल्यों में विचलन काफी कम होता है।

Read also – कृषि बाजार से जुड़ी मुख्य समस्याएं एवं सुझाव

दक्षिणी अफ्रीका देशों में हरित क्रांति की विफलता

डॉ नारमन बोरलाग भारत की हरित क्रांति की सफलता से अत्यधिक प्रभावित थे। इसकी पुनरावृति हेतु दक्षिणी अफ्रीकी देशों  में भी हरित क्रांति की शुरुआत की गई। प्रारंभिक अवस्था में उत्पादन वृद्धि में उत्साहवर्धक परिणाम प्राप्त हुए परन्तु अर्जित सफलता वहां सतत रूप से सफल नहीं रह सकी।

कारणों का विश्लेषण करने पर निष्कर्ष निकला की भारत की तरह वहां उत्पादन व समर्थन मूल्य पर खरीद की समन्वित योजना क्रियान्वित नहीं की गई।

कृषकों को लाभकारी मूल्य नहीं मिलने से उनकी फसलोत्पादन हेतु लागत आदान यथा प्रमाणित व उन्नत बीज, खाद व उर्वरक तथा उन्नत मशीनरी के उपयोग से रूचि कम होती गई। इसका उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ा। यह हरित क्रांति की विफलता का कारक बना। विपरीत इसके भारत में उत्पादन व् पूर्व निर्धारित मूल्यों पर विपणन की समन्वित योजना की क्रियान्विति सुनिश्चित की गई जो हरित क्रांति की सफलता का कारक सिद्ध हुई।

Read also – कहावतों से समझे खेती किसानी की कहानी

हरित क्रांति की विफलता का दक्षिणी अफ्रीकी देशों पर प्रभाव

विश्व में खाद्यान की स्थिति व भविष्य की संभावनाओं तथा क्षेत्रों की जलवायुवीय स्थिति का अध्ययन कर कांगो, मोजंबिक आदि देशों ने दलहन की उपलब्धता बढ़ने हेतु उत्पादन तकनीक व लाभकारी मूल्यों पर फसल की खरीद व्यवस्था को समन्वित रूप से क्रियान्वित किया।

इसके उत्साहवर्धक परिणाम मिले। जिन अफ्रीकी देशों में सकारात्मक सोच के साथ उत्पादन व विपणन में वांछित सुधारों को सतत व समन्वित रूप से अपनाया। वे अल्पसमय में ही आत्मनिर्भर हुए अपितु विश्व व्यापार में एक सशक्त निर्यातक के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करने में सफल हुए।

वर्तमान में भारत मोजंबिक सहित कई देशों से दलहन का आयात करता है। अफ्रीकी देशों में दलहन उत्पादन की इस आशातीत सफलता को भूरी क्रांति (ब्राउन रिवोल्यूशन) के नाम से परिभाषित किया गया।

Read also – हरिमन शर्मा किसान वैज्ञानिक उनकी कहानी उनकी जुबानी

दलहन आयात की स्थिति

भारत द्वारा इन देशों के साथ दीर्घावधि के व्यापार समझोते इस आशय के साथ किये गए की भारत सबंधित देशों से, एक निश्चित मात्रा की पूर्व निर्धारित दरों पर खरीद करेगा। दरों का निर्धारण उस देश में वर्तमान प्रचलित बाजार दर अथवा भारत में केन्द्र सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य में से जो भी अधिक होगा के आधार पर किया जायेगा।

समय के साथ-साथ दलहन निर्यातक देशों की संख्या में वृद्धि हो रही है। वर्ष दर वर्ष आयातित दलहन की मात्रा में वृद्धि देखी गयी जो वर्ष 2016 में बढ़कर 58.1 लाख टन के रिकार्ड स्तर पर पहुँच गई है।

भारत में भूरी क्रांति (ब्राउन रेवोल्यूशन ) की विफलता

80 के दशक में सेम पित्रोदा की सलाह पर देश में अनाज, दाल, व तिलहन उत्पादन के विशेष प्रयास किये गए। तत्पश्चात खाद्यान्न उत्पादन दुगुना (डबलिंग फूड प्रोडक्शन) कार्यक्रम के अंतर्गत दलहन उत्पादन को विशेष महत्व दिया गया।

वर्तमान में क्रियान्वित खाद्य सुरक्षा मिशन के अंतर्गत 20 लाख टन अतिरिक्त दलहन उत्पादन का लक्ष्य है। सतत रूप से क्रियान्वित किये जा रहे अनेक कार्यक्रम के उपरांत भी दलहन उत्पादन लगभग 175 लाख टन पर स्थित है। विपरीत इसके गेहूं और चावल के उत्पादन में आशातीत वृद्धि हुई है।

Read also – उत्तक संवर्धन पादप जैव प्रौद्योगिकी का कृषि विकास में योगदान

विफलता के कारण (खाद्य सुरक्षा मिशन)

वर्णित स्थिति का विश्लेषण करने से स्पष्ट है की भारत द्वारा दलहन उत्पादन के क्रियान्वन में वही गलती दोहराई गई जो दक्षिणी अफ्रीकी देशों हरित क्रांति की विफलता के समय देखी गयी थी। अर्थात देश में उत्पादन के प्रयास तो किये गए किन्तु लाभकारी मूल्यों की व्यवस्था सुनिश्चित नहीं की गई।

सुढृढ़ विपणन व्यवस्था के आभाव में कृषक दलहन उत्पादन की और प्रेरित नहीं हुए। आज भी अधिकांश क्षेत्रों में दलहन उत्पादन के लिए परम्परागत खेती के तरीके अपनाये जाते है। दलहन की खेती प्रायः असिंचित क्षेत्रों में की जाती है। उत्पादकता लगभग 800 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के स्तर पर स्थिर है जबकि आयात बढ़ते-बढ़ते 58.1 लाख टन के रिकार्ड स्तर पर पहुँच गया है।

वर्तमान स्थिति (खाद्य सुरक्षा मिशन)

देश में दलहन का सर्वाधिक उत्पादन वर्ष 2013 में 192 टन था। विगत दो वर्षों में कम मानसून के कारण उत्पन्न सूखे की स्थिति के बनाते उत्पादन 172 लाख टन रह गया। बाजार भाव रिकार्ड स्तर पर पहुँच गए। 160-180 रूपये किलो दाल के भाव होने के कारण दाल आमजन की थाली से दूर हो गई।

Read also –जैव तकनीक का पशुधन सुधार में उपयोग

देश के प्रचार तंत्र यथा टेलीविजन, समाचार पत्र और पत्रिकाएं अथवा लोकसभा या राज्यसभा सभी में दलों की मंहगाई पर चर्चा प्रमुखता से होती थी। आमजन भी चाय की दुकान से लेकर कार्यालय  तक दाल के बढ़ते हुए भाव से चिन्तित था।

कल्याणकारी जनतांत्रिक सरकार हरकत में आई। उचित मूल्य पर दाल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए त्वरित गति से निर्णय लिए गए। इनमें से कुछ प्रकार है।

  • 20 लाख टन के सुरक्षित भंडार की स्थापना।
  • विदेशों से पूर्व निर्धारित भाव से दीर्घावधि के लिए निर्धारित मात्रा में आयात के अनुंबध।
  • दालों के समर्थन मूल्यों में वृद्धि व यथेष्ट बोनस की घोषणा कर दलहन उत्पादकों के लिए लाभकारी मूल्यों की सुनिश्चितता।

लिए गए निर्णयों के अनुरूप विगत कुछ माह में 75 हजार टन का संरक्षित भंडार बनाया गया। मोजंबिक, कांगो, ब्राजील आदि देशों से दीर्घावधि के व्यापार समझोते किए गए।

विभिन्न प्रकार की दलहनी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी के साथ-साथ बोनस की घोषणा भी की गई जिसके फलस्वरूप खरीफ के समर्थन मूल्यों में आशातीत वृद्धि देखि गई।

Read also – आंवला का परिरक्षण एवं विभिन्न उत्पाद

विभिन्न दलहनी फसलों के समर्थन मूल्य और विक्रय मूल्य का विवरण निम्नानुसार है।(खाद्य सुरक्षा मिशन)

फसल

समर्थन मूल्य

वर्तमान विक्रय मूल्य

अरहर50504700 (महाराष्ट्र और कर्नाटक)
मुंग52253700
उड़द50003700

 

समर्थन मूल्य का बुवाई व उत्पादन पर सकारात्मक प्रभाव (खाद्य सुरक्षा मिशन)

सरकार द्वारा लिए गए सकारात्मक निर्णयों का बाजार भाव पर तो कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं हुआ अपितु किसानों ने सरकार के निरयण को शोरोधार्य कर भविष्य में मिलने वाले अच्छे भाव की सम्भावना से रिकार्ड क्षेत्र में बुवाई की। प्रकृति ने भी साथ दिया। समान वितरण के साथ पर्याप्त मात्रा में इंद्रदेव ने जल बरसाया।

किसानों ने भी लाभ की आस में उन्नत कृषि क्रियाओं को अपनाया। लागत आदान का समुचित उपयोग किया गया। चने व अन्य दलहनी फसलों के बुवाई क्षेत्र में दर्ज की गई वृद्धि से रबी की फसल में भी रिकार्ड उत्पादन की संभावना है।  इस वर्ष देश में 2 से 2.25 करोड़ टन का रिकार्ड उत्पादन संभावित है।

Read also – सूक्ष्म सिंचाई योजना एवं अनुदान राजस्थान में

उदास उपभोक्ता और निराश किसान

खरीफ में रिकार्ड उत्पादन के उपरांत भी किसानों को उनकी उपज के समर्थन मूल्य नहीं मिलने से किसान निराश है तो बाजार में दलों की ऊँची कीमतों से आज भी उपभोक्ता के चेहरे पर उदासी स्पष्ट दिखाई देती है।

जनहित में सरकार द्वारा चलाई गई कल्याणकारी योजनाओं उत्तरदायी हुक्मरानों के सोच के कारण किस तरह निष्प्रभावी हो जाती है इसका जीता जगता उदाहरण है, दलहन के न्यूनतम समर्थन पर खरीद व्यवस्था की उपेक्षा।

सरकार द्वारा स्पष्ट घोषणा की गई थी और दोहराया गया की काश्तकारों द्वारा बाजार में लाइ गई दलहनी फसलों की खरीद की उचित व्यवस्था की जाएगी। उनको कम मूल्यों के कारण निराश नहीं होना पड़ेगा। घोषणा अभी तक जमीनी सच्चाई नहीं बनी। गिने चुने खरीद केन्द्र खोलकर अपने कर्तव्य को अंजाम दे दिया।

कृषि उपज मंडी समिति में मुंग के भावों तो देवली में मूंगफली के भावों में आई अचानक कमी (7 हजार रूपये प्रति क्विंटल से 3 हजार रूपये प्रति क्विंटल) से किसान आंदोलित हो उठे। फिर भी हाथ कुछ नहीं लगा। वर्तमान में महाराष्ट्र और कर्नाटक से लेकर राजस्थान एवं उत्तरप्रदेश देश के विभिन्न क्षेत्रों में खरीफ दलहन फसलें न्यूनतम समर्थन से कम मूल्य पर बेचने को मजबूर है।

सरकार खुश है की नीतिगत निर्णयों के कारण दलहन के भाव कम हो गए। हाँ सरकार भूल गई की 20 लाख टन सुरक्षित भंडार स्थापित करने का क्या हुआ ? क्या हुआ उस वादे का की प्रत्येक दाने को समर्थन मूल्य पर ख़रीदा जायेगा और किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाया जायेगा।

देश में खरीफ के कुल उत्पादन का 10% भी सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर नहीं ख़रीदा गया। कर्ज से दबा, किस्मत का मारा किसान कम भावों पर अपनी फसल बेचने को मजबूर है। यह स्थिति केवल राजस्थान में ही हो ऐसा भी नहीं है महाराष्ट्र और कर्नाटक से लेकर उत्तरभारत तक सभी राज्यों में अधिकांश दलहनी फसलें न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम भाव पर बेचने को किसान मजबूर है।

Read also – कृषि प्रसंस्करण व विपणन योजना राजस्थान में

संभावनाएं (खाद्य सुरक्षा मिशन)

स्थिति से निराश हो किसान का सरकार की नीतियों से विश्वास उठ जायेगा। वह फिर परम्परागत खेती के तोर तरीके अपनाएगा। दलहन के क्षेत्रफल व उत्पादकता में कमी होगी। जैसा डी.डी. किसान के हाल ही में 8 दिसंबर के समाचार में बताया गया की रबी की मुंग के बुवाई के क्षेत्र में विगत वर्ष की अपेक्षा 40 हजार हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है।

स्थिति की सरकार समीक्षा करेगी और रास्ता अख्तियार करेगी दालों के आयात का। ऐसा करना शायद जरुरी भी होगा। विभिन्न देशों से किये गये दीर्घावधि के आयात संबधी अनुबंधों की क्रियान्विति के लिए ऐसा करना सरकार की प्रतिबद्धता जो है।

विकल्प (खाद्य सुरक्षा मिशन)

प्राथमिक सहकारी समितियों (पैक्स) द्वारा समर्थन मूल्य पर कृषि उत्पादों की अपेक्षित खरीद व सार्वजानिक वितरण प्रणाली द्वारा स्थानीय स्तर पर विक्रय करना समस्या के निराकरण के लिए वैकल्पिक उपाय के रूप में संभव है।

सहकारी समितियों का उद्देश्य व दायित्व है की कृषकों को फसलोत्पादन हेतु ऋण व आदान यथा समय व वाजिब मूल्यों पर उपलब्ध कराएं। दूसरा मुख्य उद्देश्य है की कृषकों के उत्पादन की समुचित मूल्य पर खरीद सुनिश्चित हो।

उद्देश्य प्राप्ति के लिए पैक्स किसानों को खरीफ व रबी की फसलों की बुवाई से पूर्व दो बार फसली ऋण उपलब्ध कराती है। इसे दो भागों में विभक्त किया जाता है।

Read also – राजस्थान में प्रमुख सरकारी कृषि योजना एवं अनुदान

भाग – अ -(ए कम्पोनेंट)

यह कुल स्वीकृत ऋण का 60% होता है, जो लागत आदान यथा बीज, उर्वरक एवं पौध संरक्षण रसायनों के रूप में उपलब्ध कराया जाता है।

भाग – ब – (बी कम्पोनेन्ट)

यह कुल स्वीकृत ऋण का 40% होता है। इससे किसान काजदूरि व अन्य आकस्मिक खर्चों की पूर्ति करने में सक्षम होता है। ऋण का यह भाग नगद राशि के रूप में कृषकों को उपलब्ध कराया जाता है।

सहकारी व्यवस्था में कृषि जिंसों की समर्थन मूल्यों पर खरीद और बिक्री ग्राम पंचायत स्तर पर प्राथमिक सहकारी समितियों (पैक्स) के माध्यम से सुगमता से संचालित हो सकती है। कारन उनके पास व्यवस्थागत सुविधाएं उपलब्ध है। इसको सुढृढ़ करने के लिए कृषि जिंसों की समर्थन मूल्य पर खरीद के साथ-साथ 15 से 20% हेंडलिंग चार्ज (रख-रखाव) के भुगतान का प्रावधान किया जाना अपेक्षित है।

Read also – मत्स्य पालन योजना एवं अनुदान राजस्थान में

यह वर्तमान में सरकारी उपक्रम एफसीआई द्वारा धारित 60-65% हेंडलिंग चार्ज की अपेक्षा बहुत कम है। (इकॉनिमिक सर्वे 2013-14, पृष्ट 155)

पेक्स पर की गई अधिक खरीद (यदि हो तो) लैम्पस (वृहद बहुउद्देशीय सहकारी समिति) के माध्यम से ऐसे पेक्स को उपलब्ध करायी जा सकती हैं जहां मांग के अनुरूप ख़रीददारी संभव नहीं हुई हो। इस प्रकिया में किसान उसकी फसल की समुचित मूल्यों पर बिक्री व समय पर भुगतान के प्रति आश्वस्त होंगे। पेक्स व लेम्पस की आर्थिक स्थिति सुदृढ़  होगी। अनाज की छीजत अपेक्षाकृत बहुत कम होगी। अनाज की अत्याधिक छीजत के लिए एफसीआई प्रत्येक वर्ष चर्चाओं में बना रहता हैं।

खरीद और बिक्री की अनियमितताओं में कमी आयेगी। इसका कारण यह हैं की स्थानीय स्तर पर प्रत्येक व्यक्ति एक-दूसरे के यहां उत्पादित फसल के बारे में जानकारी रखता हैं। वह जानता हैं प्रत्येक परिवार के अनाज के खपत के बारे में। स्थानीय स्तर पर किसान उसके यहां हुए पैदावार से अधिक विक्रय नहीं कर कर पायेंगे और मांग से अधिक खरीद नहीं कर सकेंगे। सहकारी समितियों के माध्यम से क्रियान्वित खरीद व बिक्री की इस योजना से सरकार, उत्पादक व उपभोक्ता तीनों को ही लाभ होगा। सहकार की भावना जाग्रत होगी, किसान समृद्ध होंगे एवं विकसित होगा हमारा भारत देश।

Read also – कृषि वानिकी सब-मिशन योजना राजस्थान में

Author:-

राजवीर सिंह
निदेशक, राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति

Facebook Comments

About the author

bheru lal gaderi

Hello! My name is Bheru Lal Gaderi, a full time internet marketer and blogger from Chittorgarh, Rajasthan, India. Shouttermouth is my Blog here I write about Tips and Tricks,Making Money Online – SEO – Blogging and much more. Do check it out! Thanks.