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क्षारीय और लवणीय मृदाओं में कैसे करें? फसल प्रबंधन

क्षारीय और लवणीय मृदाओं में कैसे करें? फसल प्रबंधन
Written by bheru lal gaderi

हमारे देश में लगभग 13.9 मिलियन हेक्टर भूमि बंजर एवं अनुपजाऊ है जिसमें से क्षारीय और लवणीय मृदाओं का हिस्सा 7.5 मिलियन हेक्टेयर है। जो कि आधे से अधिक हैं तथा देश के विभिन्न राज्यों में फैली हुई है। इसी मृदाओं में शुष्क महीनों में किसी भी प्रकार की वनस्पति नहीं दिखाई देती है तथा ऊपरी सतह पर सफेद लवण की परत फैली हुई प्रतीत होती है। वर्षा के मौसम में जल निकास के अभाव के कारण पानी भर जाता है। तथा सूखने पर मृदा की सतह कठोर हो जाती है, जिससे पानी का मृदा में अवशोषण बहुत ही धीमी गति से होता है। मृदा में विभिन्न गहराइयों पर कठोर परते पाई जाती हैं, जिनके कारण जल एवं पौधों की जड़ें मृदा की निचली स्थान तक प्रवेश नहीं कर सकती हैं।

क्षारीय और लवणीय मृदाओं में कैसे करें? फसल प्रबंधन

मृदा में लवणीय व क्षारीय तत्व प्रचुर मात्रा तथा जलभराव होने से बोई गई फसलें व पौधे नष्ट हो जाते हैं तथा सामान्य रूप से बढ़वार नहीं हो पाती हैं। भूमि की भौतिक व रासायनिक दशा क्षीण होने के कारण उपजाऊ व उर्वरा शक्ति का हास्य हो जाता है, जिससे पौधों की वृद्धि संतोषजनक नहीं होती है।

प्रायः क्षारीय और लवणीय मृदाओं का निर्माण शुष्क, अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों या ऐसी भूमियों में जहां जल निकास उचित नहीं होता है। या भूमि की पारगम्यता बहुत ही कम हो, पाया जाता है। ऐसी मृदाओं के निर्माण के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

  • लवणीय व क्षारीय प्रकृति के पैतृक पदार्थ के कारण।
  • सिंचाई स्त्रोतों का पानी क्षारीय व लवणीय होना।
  • शुष्क जलवायु।
  • भूमि की निचली सतहों में कठोर परत का होना।
  • खेतों की जुताई एक ही गहराई पर करते रहना।
  • मृदा में जल निकास की अपर्याप्त सुविधा।
  • मृदा में जल स्तर का ऊँचा होना।
  • क्षारीय प्रकृति के उर्वरकों का अधिक उपयोग।
  • समुद्री जल के प्रभाव से (तटीय क्षेत्रों में)
  • क्षारीय और लवणीय मृदाओं के सुधार के उपाय व उचित समाधान जिससे फसल उत्पादन किया जा सके।

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भौतिक विधियां               

उद्धिलयन (लीचिंग)

इस क्रिया के अंतर्गत खेत को छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित करके अच्छी प्रकार मेड़बंदी करके 10 से 15 सेमी पानी भर दिया जाता है, जिससे घुलनशील लवण पानी में घुलकर नीचे की सतह में चले जाते हैं। इस क्रिया को गर्मी के मौसम में जहां मृदा की निचली सतह में कठोर परत नहीं हो करना चाहिए।

खुरचना

खेतों में जब लवण छोटे-छोटे टुकड़ों में परत के रूप में एकत्रित हो, उन्हीं हिस्सों में से लवण को खुरचकर दूर नदी नालों में डाल दे।

जल निकास

क्षारीय और लवणीय मृदाओं का बनने का मुख्य कारण समुचित जल निकास की समस्या है, वहां पर नालियां व नाले तैयार कराकर उचित जल निकास का प्रबंधन कर देना चाहिए।

घुलनशील लवणों का ऊपरी सतह से बहाना

जिन क्षेत्रों में मृदा के नीचे अधिक गहराई तक कठोर परत हो, ऐसे खेतों में पानी कुछ दिनों तक भरकर गंदला करके नालियों के माध्यम से खेतों से दूर नदी नालों में निकाल दिया जाए।

अधो भूमि की कठोर सतहों को तोड़ना

जिन भूमियों में बहुत ही कम गहराई पर ही कठोर परते हो, वहां पर परतों को तोड़कर समाप्त करके, लवणीय, मृदाओं का सुधार कर सकते हैं।

रासायनिक विधिया

जिप्सम का प्रयोग

क्षारीय मृदाओं में विनिमय सोडियम की अधिकता होती है। अतः मृदा की जिप्सम मांग की जांच के बाद मांग के अनुसार बारीक़ जिप्सम को मृदा में बुरककर 10 से 15 गहराई तक मिला देवें।

अम्ल व अम्ल उत्पादकों का प्रयोग

क्षारीय भूमि के सुधार हेतु गंधक, गंधक चुना, गंधक का अम्ल आदि रसायनों का प्रयोग भी लाभप्रद है, जिसकी मात्रा मृदा के पीएच पर निर्भर करता है।

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पाइराइट का प्रयोग

पाइराइट का प्रयोग ऊसर मृदा के सुधार हेतु किया जाता है। जिन मृदाओं में कैल्शियम क्लोराइड की अधिक मात्रा अधिक हो, ऐसी मर्दों में सुधर हेतु पाइराइट का प्रयोग मृदा सुधार हेतु काफी लाभप्रद है। साधारणतया10-15 टन पाइराइट प्रति हेक्टेयर स्थितियों के अनुसार प्रयोग में लाया जा सकता है।

अतः क्षारीय और लवणीय मृदाओं को भौतिक व रासायनिक विधियों द्वारा एक बार सुधार किया जा सकता है, परंतु ऐसी मृदाओं की उर्वरा व उपजाऊ शक्ति को बनाए रखने हेतु कुछ आवश्यक कृषि एवं भूमि प्रबंधन क्रियाएं अपनाना नितांत आवश्यक है। इसके अलावा भौतिक व रासायनिक विधिया काफी मेहनत व खर्चीली हैं। अतः निम्न कृषि व भू-प्रबंधन क्रियाओं को अपनावे।

  • खेतों की जुताई विभिन्न गहराई पर करे यानि जुताई के विभिन्न यंत्रों का प्रयोग करें।
  • 2-3 वर्षों में सब सॉयलर अथवा चीजल हल से जुताई करें।
  • फसल चक्र अपनावे, जिसमें गहरी व उथली जड़ों वाली फसलों का समुचित समावेश अवश्य हो।
  • फसल चक्र में हरी खाद हेतु ढेंचा की फसल उगाये।
  • जैविक खाद का प्रयोग समय-समय पर करें।
  • जहां पर प्रेस मड अथवा शिरा (मोलेसिस) उपलब्ध हो, उसका प्रयोग करें।
  • अम्लीय उर्वरकों जैसे अमोनियम सल्फेट, अमोनियम नाइट्रेट सिंगल सुपर फास्फेट आदि का अधिक उपयोग करें।
  • लवणीय व क्षारीय सहनशीलता वाली फसलों को उगाए जैसे- धन, कपास, सरसों, जौ, चुकंदर, जई, बरसीम,  पालक, बेर, खजूर, ढेंचा आदि।
  • फसलों की लवणीय व क्षारीय रोधक किस्मों का चयन करके बोये।जैसे- गेहू की खारचिया 65, के आर एल 1-4, 19 जौ कि बिलाड़ा-2,  आर. डी. 2552 आदि।
  • फसलों की बुवाई मेड बनाकर करें।
  • क्षारीय और लवणीय मृदाओं में अंकुरण की समस्या पौधों की कम बढ़वार के कारण बीज दर सामान्य से थोड़ी ज्यादा रखें।
  • सिंचाई हलकी तथा थोड़े- थोड़े अंतराल से करते रहे।
  • जहां सिंचाई जल क्षारीय अथवा लवणीय हो, वहां ड्रिप या फव्वारा पद्धति से सिंचाई करें।

निष्कर्ष

उपरोक्त मृदा सुधार के उपायों का फसल प्रबंधन क्रियाओं को अपनाकर क्षारीय और लवणीय मृदाओं की उर्वरा व उत्पादन क्षमता को बढ़ाया जा सकता है।

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प्रस्तुति

डॉ. भंवर सिहं कुमावत एवं लोकेश कुमार जैन,

बारानी कृषि अनुसंधान केंद्र महा. प्र. कृषि एवं

प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, अरजीया, भीलवाड़ा (राज.)

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