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क्वालिटी प्रोटीन मक्का की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

क्वालिटी प्रोटीन मक्का
Written by bheru lal gaderi

मक्का एक महत्वपूर्ण मोटे अनाज की फसल हैं। भारत में उत्पादित आधे से अधिक मक्का का प्रयोग रोटी, भुट्टा, सत्तू, दलिया, हरी गुल्लियों आदि के रूप में किया जाता हैं। मक्का के दाने, पशुओं, मुर्गीपालन, सूअर आहार अथवा मछली के भोजन के लिए महत्वपूर्ण हैं। मक्का के भ्रूणपोष में लगभग 9-12% प्रोटीन होती हैं। हालाँकि इसमें दो अनिवार्य एनिमो एसिड लाइसिन तथा ट्रीफ्टोफेन की कमी पाई जाती हैं। इससे पारम्परिक मक्का किस्मों में निम्न प्रोटीन उपयोगिता तथा निम्न जैविक गुणों में बढ़ोतरी होती होती हैं। अतः मक्का किस्मों में जैविक गुणों के सुधार की आवश्यकता महसूस की गई हैं। और अनुसंधान से क्वालिटी प्रोटीन मक्का किस्मों का विकास किया गया।

क्वालिटी प्रोटीन मक्का

खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के लिए क्वालिटी प्रोटीन मक्का

पिछली शताब्दी के साठ के दशक के बिच के वर्षों में इस दिशा में किए गए प्रयासों से मक्का भ्रूणपोष अवयव में लाइसिन तथा ट्रिप्टोफेन मात्रा को बढ़ाकर ओपेक-2 म्युटेंट जिन में जैव रासायनिक प्रभाव खोजा गया। तदुपरांत, विश्वभर में मक्का प्रजनको ने इस साधारण वंशानुगत जिन ओपेक-2 को व्यवसायिक मक्का किस्मों में सम्मिलित करने का प्रयास किया। भारत में, भारत में अखिल भारतीय समन्वित मक्का, अनुसन्धान परियोजना के तत्वावधान में प्रजनकों ने उच्च लाइसिन एवं ट्रीप्टोफोन मात्रा के साथ रत्ना, प्रोटीन तथा शक्ति मक्का कम्पोजिट किस्मे विकसित की। वर्ष 1971 में उनकी संस्तुति सामान्य खेती के लिए की गई। बहरहाल, पैदावार में 10-15% कमी, कान्तिहीन कोमल ओपेक दिखने वाले दानों तथा बिमारियों एवं नाशिजीवों के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता के कारण ये किस्में किसानों में भी लोकप्रिय नहीं बन पायी।

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क्वालिटी प्रोटीन मक्का

इसके उपरांत, कुछ निश्चित प्रभारी जीनों की पहचान की गयी जिसमे ओपेक-2 के प्रतिकूल के प्रभाव को कम किया जा सके। मक्का एवं गेहू के अंतराष्ट्रीय सुधार केंद्र ने अपने सतत प्रजनन प्रयासों से उच्च पैदावार वाला कठोर भ्रूणपोष उन्नत ओपेक-2 मक्का जननद्रव्य का विकास किया तथा इसे समस्त विश्व को उपलब्ध कराया। ऐसे जनद्रव्यों का प्रयोग कर मक्का अनुसंधान निदेशालय, नई दिल्ली ने कठोर भ्रूणपोष वाली उन्नत ओपेक मक्का किस्म में अपने प्रयास जारी रखे तथा शक्ति-१ की सिफारिश की जिसे भारतीय किसानों द्वारा सामान्य खेती के वर्ष 1998 में जारी तथा अधिसूचित किया गया।

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अखिल भारतीय समन्वित मक्का अनुसंधान परियोजना के वैज्ञानिकों ने अभी हाल ही में मेक्सिकों से प्राप्त बहुत से मक्का जनद्रव्यों के परीक्षण किये हैं। अनुकूलन एवं दोहराये गये चयन के द्वारा बहुत उच्च पैदावार क्षमता तथा बेहतर प्रोटीन क्वालिटी के साथ कठोर भ्रूणपोष वाली उन्नत ओपेक-2 मक्का अतः प्रजात वंशाक्रम एवं उनके संकरों की पहचान की गई। ये क्वालिटी प्रोटीन मक्का संकर किस्में सामान्य मक्का संकर की तुलना में उच्च पैदावार क्षमता तथा बेहतर प्रोटीन क्वालिटी के साथ व्यवसायिक खेती के लिए उपयुक्त पाई गई। सामान्य मक्का के स्थान पर क्वालिटी प्रोटीन मक्का संकर प्रयोग करने से जहां किसानों को अधिक आय प्राप्त होगी वहीं उपभोक्ताओं को अधिक पोषण भी मिलेगा। यह देश को विशेषकर गरीब एवं आदिवासी किसानों को जिनका मुख्य भोजन मक्का ही हैं, खाद्द्य उद्योग आदि को क्वालिटी प्रोटीन मक्का द्वारा क्वालिटी भोजन तथा चारा उपलब्ध कराया जा सकेगा।

क्वालिटी प्रोटीन मक्का क्या हैं?

  • क्वालिटी प्रोटीन मक्का पोषण रूप में बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि:-
  • इसमें लाइसिन और ट्रीप्टोफेन (आवश्यक अमीनो अम्ल) होते हैं।
  • दाने में एमिनो अम्ल का संगठन संतुलित मात्रा में होता हैं।
  • दाने देखने एवं स्वाद में सामान्य मक्के की तरह ही होते हैं।
  • इसमें अच्छी वानस्पतिक वृद्धि एवं विकास होता हैं।
  • मुख्य कीटों एवं रोगो के प्रति सहनशील (टोलरेंस) होता हैं।

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क्वालिटी प्रोटीन मक्का का उपयोग क्यों जरूरी हैं?

  • खाद्य सुरक्षा की निश्चितता मक्का उत्पादन में वृद्धि
  • पोषण सुरक्षा प्रदान करने हेतु
  • प्रोटीन आवश्यकता की पूर्ति करना
  • सामान्य जनसंख्या
  • समाज के विशेष वर्गों के लिए (५वर्ष से कम उम्र के बच्चे, किशोर लड़कियों, गर्भवती एवं दूध पिलाने वाली महिलाएं एवं वृद्ध लोगों के लिए।
  • तनावग्रस्त रोगियों के लिए।
  • प्रोटीन की कमी से होने वाले कुपोषण का उन्मूलन करना।
  • एलर्जी वाले व्यक्ति को क्वालिटी प्रोटीन प्रदान करना।
  • पौष्टिक खाद्य एवं चारा प्रदान करना। मुर्गियों के लिए, पशुओं के लिए, सूअरों के लिए एवं मछलियों के लिए
  • गरीबी निवारण कार्यकर्म में सहायता करना।
  • मक्का आधारित ग्रामीण उद्धमशीलता (एंटरप्रेन्योरशिप) का विकास करना

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क्वालिटी प्रोटीन मक्का का उपयोग कैसे करते हैं?

  • क्वालिटी प्रोटीन मक्का को विभिन्न प्रकार के उत्पादों में बदलकर पीसकर
  • क्षारीय क्रिया द्वारा (एल्कली प्रोसेसिंग द्वारा)
  • उबालकर पकाकर फर्मन्टेंशन इत्यादि द्वारा।
  • शिशु आहार के रूप में
  • हेल्थ फ़ूड/बिवरेज (पेय) के रूप में
  • न्यूट्रास्यूटिकल्स (पौष्टिक भोजन) के रूप में।
  • विशेष आहार के रूप में।
  • आपातकालीन आहार के रूप में।

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पैदावार एवं आर्थिक लाभ

मक्का अनुसंधान निदेशालय द्वारा पुरे भारत में विभिन्न क्षेत्र पर शक्तिमान-1 एवं शक्तिमान-2 जैसी क्वालिटी प्रोटीन मक्का संकरों की खाद्यान पैदावार क्षमता के परीक्षण करने पर सभी स्थानों पर इसकी निरंतर श्रेष्ठता पाई गई।

क्वालिटी प्रोटीन मक्का के उपयोग

भारत में मक्का ने गरीब व्यक्ति के अन्न की ख्याति प्राप्त कर ली हैं। इसमें उच्च कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन, कुछ विटामिन और खजिन होते हैं, जो मनुष्यों के लिए बहुत पौष्टिक होते हैं इसलिए इसे ‘पोषक खाद्य’ की भी संख्या दी गई हैं। प्रचलित मक्का में एल्कोहॉल विलयशील प्रोटीन (न्यूट्रीसियल) अंश की उपस्थिति की समस्या का क्वालिटी प्रोटीन मक्का के विकास के द्वारा समाधान किया गया। इसमें एमिनो एसिड का बेहतर संतुलित संगठन हैं। लाइसिन और ट्रीप्टोफेन की कम मात्रा होने से क्वालिटी प्रोटीन मक्का का, सभी धान्यों के बिच का विशिष्ट स्थान हैं। क्वालिटी प्रोटीन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए और मनुष्यों में पौष्टिक तत्व को बढ़ाने के लिए साधारण मक्का के स्थान पर क्वालिटी प्रोटीन मक्का का प्रयोग सबसे अधिक प्रभावशाली और आकर्षक उपाय हैं।

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इसलिए लोगो के बिच, विशेष रूप से समाज के कुपोषित समुदायों के लिए क्वालिटी प्रोटीन मक्का को प्रचलित करनर की अत्यधिक आवश्यकता हैं। यदि क्वालिटी प्रोटीन मक्का का विभिन्न प्रकार के उत्पादों के रूप में इस्तेमाल किया जाता हैं, जैसे की छोटे बच्चों के भोजन, स्वास्थ्य भोजन, मिश्रणों, सुविधाजनक भोजन विशेष रूप से खाद्यों और आपातकालीन राशन, इससे कुपोषित जनसंख्या की स्वास्थ्य स्थिति पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा। क्वालिटी मक्का विकसित उत्पाद अन्य लोकप्रिय और ऊंची कीमत वाले ओद्योगिक भोजन का स्थान ले सकते हैं। ये उत्पाद गावों में भी तैयार किए जा सकते हैं और इस प्रकार यह ग्रामीण आय बड़ा स्त्रोत हो सकता हैं।

उत्पादन प्रौद्योगिकी

क्वालिटी प्रोटीन मक्का को बिना किसी कठिनाई के खरीफ, रबी और जायद मौसमों में तथा गैर-पारम्परिक क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता हैं। रबी के दौरान अधिकतम खाद्यान उपज प्राप्त करने के लिए बीज बोने का समय 15 अक्टुम्बर से 15 नवम्बर हैं। गर्मी के मौसम में सिंचाई को सुनिश्चित करते हुए फरवरी-अप्रेल के दौरान उपयुक्त बीज बोने चाहिए क्वालिटी प्रोटीन मक्का सैंकड़ों की शस्य वैज्ञानिक आवश्यकताए पादप संरक्षण और खरपतवार नियंत्रण उपाय वही है जो समान्य संकर फसलों के है। कटाई और छिलका उतारने का काम वैसे ही किया जाता है, सामान्य मक्का फसल में किया जाता है।

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खेती का क्षेत्र

क्वालिटी प्रोटीन मक्का को सामान्य मक्का की तरह ही देश के लगभग सभी भागो में, मैदानी क्षेत्रों से पर्वतीय क्षेत्रों तक (2700 मी. की ऊंचाई तक) सफलतापूर्वक उगाया जाता है। यह रेती से भरी मृदा तक, सभी प्रकार की मृदाओं में उगाया जा सकता है। जल धारण करने की बेहतर क्षमता के कारण गहरी भारी मृदाएं बेहतर समझी  जाती है। लवणीय और अम्लीय मृदाओं से बचना चाहिए। क्योंकि इसमें फसल के अंकुरण के तुरंत बाद प्रतिकूल असर होने लगता है। नए क्षेत्रों में मक्का उगने से पूर्व पीएच और विद्युतीय चालकता की जाँच की जानी चाहिए। निचले व खराब जल निकासी वाले क्षेत्रो से बचना चाहिए। जहां भी आवश्यक हो, बुवाई से पहले खेत की ढलान के साथ-साथ उथली और गहरी नालियां बनाकर सतही निकासी की व्यवस्था उपलब्ध करानी चाहिए।

किस्मों का चयन

मक्का अनुसन्धान निदेशालय ने अपने केन्द्रों की मदद से एक मिश्रित किस्म, शक्ति और अन्य उच्च उपजशील संकर-किस्में शक्तिमान-1, शक्तिमान-2, शक्तिमान-3, शक्तिमान-4, एच. क्यू. पी. एम.-1,5 तथा 7 एवं विवेक क्यू. पी. एम. 9 विकसित किए गए हैं।

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बुवाई का समय

प्राकृतिक वर्षा का सर्वोत्तम उपयोग करने के लिए बुवाई के समय को उपयुक्त रूप से समायोजित करना चाहिए। सिंचित क्षेत्रों में, वर्षा आने से 10-15 दिन पहले बुवाई पूरी कर लेनी चाहिए। इससे उन खेतों से 15 प्रतिशत अधिक उपज प्राप्त होती है। जहाँ वर्षा आने पर या उसके बाद बुवाई की जाती है। रबी मौसम के दौरान अक्टुम्बर मध्य से लेकर नवम्बर का प्रथम सप्ताह बुवाई करने के लिए उपयुक्त है।

क्यारी तैयार करना

एक साफ समतल गहरी जुती हुई लेकिन मजबूत क्यारी सबसे अच्छी होती है। फसलों को रुके हुए जल के कारण होने वाली क्षति से बचने और जड़ को पर्याप्त नमी उपलब्ध करने के लिए फसल को मेड पर बोना चाहिए। दूसरा सबसे अच्छा विकल्प समतल सतह पर बोना और जैसे ही मौसम अनुकूल हो तो फसल पर मिटटी चढ़ानी चाहिए। यह पद्धति रबी मौसम में उपयोगी है।

उर्वरक प्रबंधन

उच्च पैदावार प्राप्त करने के साथ ही मृदा की उर्वरकता बनाए रखना भी आवश्यक है। खेत में बुवाई से पूर्व पर्याप्त मात्रा में गोबर की खाद डालनी चाहिए। केवल रासायनिक उर्वकों के उपयोग की जगह जैविक खाद और रासायनिक उर्वकों को मिलाकर इस्तेमाल किया जाय तो बेहतर उपज प्राप्त होगी और मृदा की उर्वरता में भी सुधार होगा।

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उर्वरकों की मात्रा

विभिन्न खेतों के लिए उर्वरकों की सही मात्रा मृदा की उर्वरता स्थिती, शस्यन के पिछली स्थिती और   किस्म की अवधि पर निर्भर करती है। किस्म के पकने की अवधि के आधार पर प्रति हेक्टेयर 60-120 किग्रा. नत्रजन, 40-60 किग्रा. फॉस्फोरस और 40 किग्रा. पोटाश के संतुलित प्रयोग की सिफारिश की जाती है।

उर्वरक का उपयोग

खरीफ मौसम के दौरान बुवाई से पहले नत्रजन की कुल मात्रा का एक चौथाई और फॉस्फोरस, पोटाश, ज़िंक (यदि आवश्यक हो) की पूरी मात्रा 5-7 से.मी. गहराई तक डालनी चाहिए। बची हुई नत्रजन को  दो भाग में खड़ी फसल (टॉप ड्रेसिंग) के रूप में देनी चाहिए। जब फसल घुटनों तक आ जाये तो कुल नत्रजन के आधे भाग यानि 60 किग्रा. को देना चाहिए बाकि बचे भाग 30 किग्रा को झण्डा पत्ता दिखाई देने के बाद पर नरमंजरी के आने से पहले दे देना चाहिए।

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पौधों की संख्या

खरीफ के दौरान खाद्यान्न की उच्च उपज प्राप्त करने के लिए कटाई के समय प्रति हेक्टेयर 65-70 हजार पौधे होने चाहिए। तथा रबी फसल के समय पौधों की संख्या 90 हजार पौधे प्रति हेक्टेयर बढ़ाई जा सकती है। अंकुरण के समय 10% अधिक पौधे होने चाहिए। पंक्ति और पौधे से पौधे की दुरी 75से.मी.x18 से.मी. होनी चाहिए।

बीज दर

एक हेक्टेयर में बुवाई करने के लिए लगभग 20 किग्रा. बीजों की आवश्यकता होती है। अच्छी पैदावार और बढ़वार के लिए बीजों को 5 से.मी. की गहराई पर बुवाई होनी चाहिए।

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सिंचाई

क्वालिटी प्रोटीन मक्का को ऐसे फसल चक्र के दौरान वर्षा प्रधान क्षेत्रों में उगाया जा सकता है, जहाँ वर्षा का वितरण पर्याप्त हो, जिससे मिटटी में नमी सुनिश्चित की जा सके।  अधिक उपज के लिए फसल बढ़वार के महत्वपूर्ण समय में एक या दो सिंचाई यदि संभव हो तो अवश्य करनी चाहिए।  मक्का अपने पुरे जीवनचक्र के दौरान आर्द्रता प्रतिबल के प्रति ग्रहणशील होता है। पुष्पन और दाना भरने का समय अधिक महत्वपूर्ण होता है यदि इस समय वर्षा न हो तो फसल की सिंचाई करनी चाहिए। रबी के मौसम फसल को 5-8 सिंचाई की जरुरत होती है।

खरपतवार नियंत्रण

चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार के नियंत्रण के लिए एट्राजेन 1.5 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की सर से प्रयोग करना चाहिए। इसके अतिरिक्त खारववार नियंत्रण के लिए २ बार निराई-गुड़ाई अवश्य करि चाहिए।

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फसल सुरक्षा

हानिकारक कीट

पूरे देश में खरीफ मौसम के दौरान मक्के का डंठल छेदक (कैलो पारटेल्स) मुख्य कीट है जबकि रबी मौसम के दौरान कुछ क्षेत्रो में सेसेमिया इन्फेरेंस दिखाई देता है। १० से १५ दिन पुरानी फसल पर ०.१% डाइमेथोएट(३५ ई.सी.) की दर से या ०.०५% लिंडेन (20 ई.सी.) का पहला पर्णीय छिड़काव करना चाहिए और उसके बाद यदि आवश्यक हो तो 15 दिन बाद पौधों के घेरों में १५किग्रा. की दर से लिंडेन दानों का दूसरा छिड़काव करना चाहिए।

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प्रमुख रोग

इस फसल में मुख्य रूप से जहां अधिक जल भराव होता है वहां टरसिक्यूम पर्णब्लाइट रोग की शिकायत दिखाई देती है। इसी प्रकार फसल बढ़वार की पुष्पन स्थति के बाद की आद्रता प्रतिबल स्थतियों में कम से अधिक डंठल विगलन होता है।  इन रोगों से बचने के लिए रोग प्रतिरोधी किस्मे उगाई जाए।  टरसिक्यूम और मेडिस पर्णब्लाइट को नियंत्रित करने के लिए 10-15 दिन के अंतराल पर 2.5 किग्रा./1000 लीटर की दर से जाइनेब के २-३ छिड़काव करना चाहिए।

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कटाई

अनाज की पैदावार के लिए उगाई गई मक्का की फसल कटाई तब करनी चाहिए जबकि वः 25-30% नमी प्राप्त करते हुए पक जाए। क्वालिटी प्रोटीन मक्का का चारा पशुओं के लिए बहुत ही पौष्टिक पाया गया है। कटाई के तुरंत बाद कडबी का पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

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