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कृषि रसायन का मृदा स्वास्थ्य पर प्रभाव

कृषि रसायन का मृदा स्वास्थ्य पर प्रभाव
Written by bheru lal gaderi

भारत में परंपरागत तरीके से करीब 2000 वर्षों से खेती की जा रही है। जिसका किसी भी प्रकार का कोई दुष्परिणाम नहीं पड़ा। 1960-70 के बीच सूखे की स्थिति निर्मित होने के फलस्वरुप हरित क्रांति का उद्भव औद्योगिक खेती के रूप में बाहरी आदान विशेष रूप से रासायनिक उर्वरक, पौध संरक्षण औषधि एवं अधिक उत्पादन देने वाले बीजों पर निर्भर होकर प्रारंभ हुआ। उस समय रसायन अपनाना हमारी मजबूरी एवं आवश्यकता थी निश्चित रूप से हरित क्रांति ने तात्कालिक आवश्यकता की पूर्ति की। परंतु यह उस कीमत पर हुई है जिसे अब आगे अपनाएं रखने के लिए न भारत और न विश्व के अन्य देशों के लिए संभव है।

कृषि रसायन का मृदा स्वास्थ्य पर प्रभाव

उद्योगिक खेती का मूल प्राकृतिक गैस एवं तेल है। जिसके स्त्रोत सीमित है और इसकी उपलब्धता 30 से 40 वर्षों से अधिक बनना संभव नहीं। 1970-71 से 1993-94 तक को देखे तो आदान के उपयोग में कई गुना वृद्धि हुई। उदाहरण स्वरूप सिंचाई 68.80%, रासायनिक उर्वरक 614.90 %, पौध संरक्षण ओषधिया 241.60%, बिजली 745% एवं कृषि ऋण 1128% तक बढे। जिसके विरुद्ध खाद्यान्न 89.4 प्रतिशत एवं समस्त कृषि उत्पादन में 91.8% प्रतिशत उत्पादन वृद्धि हुई है।

जहां इस वृद्धि को प्राप्त करने में अत्यधिक धन राशि का उपयोग करना पड़ा वही भूमि की उत्पादन क्षमता में निरंतर गिरावट पर्यावरण को दूषित होने के साथ-साथ खाद्यान्नों में रासायनिक अवशेषों के फलस्वरुप मानव स्वास्थ्य पर दुष्परिणाम पड़ा। अतः अब वह समय आ गया है जबकि इस प्रणाली के बदले खेती की ऐसी प्रणाली को अपनाया जाए जो बिना उत्पादन की कमी एवं पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव छोड़े लंबे समय तक आवश्यकता की पूर्ति कर सके, और यह प्रणाली है जैविक खेती पद्धति।

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औद्योगिक एवं आधुनिक खेती के परिणाम स्पष्ट रूप से सामने आए हैं उनका उल्लेख यहां पर किया जाना आवश्यक है।

उत्पादन वृद्धि प्राप्त होने के फलस्वरुप खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त हुई।

  • देश खाद्द्यान निर्यात करने की स्थिति में पहुंचा।
  • दुष्परिणाम यह हुआ की मिटटी की उपजाऊ शक्ति घट रही हैं।
  • आदान की आवश्यकता बढ़ती जा रही है जिसके फलस्वरूप आत्महत्याओं की प्रवृत्ति बढ़ी हैं।
  • भूमि की भौतिक रासायनिक एवं जैविक संरचना रसायनों के उपयोग से प्रभावित हो रही है।
  • डेविड पाइकेवल एवं क्लाइड एडवर्ड्स के अनुसार फसलों पर छिड़कने वाला जीवनाशियों के रसायन का मात्र 1% ही असली लक्ष्य तक पहुंच पाता हैं।
  • हानिकारक तत्वों की मात्रा जमीन एवं पौधों में बढ़ रही है।
  • हानिकारक तत्वों के फलस्वरुप आज मां के दूध में भी डी.डी.टी. मेलाथियान के अवशेष पाए जा रहे हैं।
  • बड़े शहरों की 70% सब्जियों में हानिकारक तत्वों की मात्रा निर्धारित मात्रा से अधिक पाई गई है।
  • इस प्रकार रासायनिक खेती से भोजन पानी एवं पर्यावरण प्रदूषित हो रहे हैं।
  • गत वर्ष एक अख़बार के अंक में चपाती में जहर, आपकी थाली में पेस्टीसाइड, रोटी में कैंसर फैलाने वाले रसायन, रोटी में डी.डी.टी. के संबंध में उल्लेख कर ध्यान आकर्षित किया गया था।
  • स्पष्ट हैं की कैंसर ब्रेन एवं नर्वस सिस्टम, प्रजनन क्षमता, ह्रदय रोग, डायबिटीज एवं अन्य बीमारियों के जनक मुख्यतः खेती में उपयोग किए जा रहे रसायन हैं।

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इस प्रकार हम देखते हैं कि पेस्टिसाइड उत्पादन विश्व की भीषणतम त्रासदी का जनक है। जिसमें सेवंसी बंसेल तथा भोपाल गैस त्रासदी यह दोनों ही पेस्टीसाइड बनाने वाली फैक्ट्रियों से संबंधित है। विश्व में केरल में सबसे ज्यादा इंडोसल्फान का उपयोग किया जा रहा है। इसके फलस्वरुप काजू का उत्पादन तो बढ़ा है परंतु इसके बदले तरह-तरह की बीमारियां ग्रामीण एवं नागरिकों में पाई गई।यहां तक कि 70% पीड़ितों में कैंसर पाया गया है। खेतों में उपयोग किए जा रहे रसायनों के अवशेष का दुष्परिणाम बच्चों पर अत्यधिक दृष्टिगत हो रहे हैं। इसी के फलस्वरुप जर्मनी में 70% से भी अधिक जैविक फ़ूड ही विक्रय हो रहा है। इस प्रकार आधुनिक खेती ने जहां हमे खाद्द्यान में आत्मनिर्भरता दी हैं वही कृषि भूमि, पीने योग्य पानी, खाद्द्यान एवं पर्यावरण को दूषित किया है।

आठ के दशक में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के लिए उर्वरकों एवं पौध संरक्षण औषधियों का उपयोग बढ़ाना हमारी आवश्यकता एवं मज़बूरी थी।वर्तमान कृषि उत्पादन हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए पर्याप्त है फिर हम क्यों उनसे होने वाले नुकसान को नहीं समझ पा रहे हैं। क्या यह तथ्य जानते हुए भी धीमा जहर लेना चाहेंगे। इस धीमे जहर में बचने का उपाय हैं। जैविक उत्पाद का ही सेवन करना।

मध्य प्रदेश सहित भारत में कृषक भारी मात्रा में जैविक खाद का उत्पादन करने लगा है। परंतु उपभोक्ताओं में जागृति ना होने के कारण इसकी मांग निर्मित नहीं हो पा रही है। विश्व के विकसित देशों में दूसरी और जैविक उत्पादन की मांग लगातार बढ़ती जा रही है।

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ताजे आकलन के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय फेडरेशन फॉर एग्रीकल्चर मूवमेंट द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों से स्पष्ट है कि विश्व में लगभग 31 मिलियन हेक्टर क्षेत्र जैविक पद्धति के अंतर्गत प्रमाणित है।

सबसे ज्यादा क्षेत्र ऑस्ट्रेलिया (11.8 की.हे) में हैं। जैविक उत्पाद की मांग लगातार बढ़ रही है। भारत में जहां हम पहले से ही कम उर्वरक एवं पौध संरक्षण दवाइयों का उपयोग कर रहे हैं परंतु देश में उपभोक्ताओं को रासायनिक खेती से प्राप्त उत्पादनों के दुष्परिणाम से अवगत ना होने के कारण इसकी मांग ज्यादा आ रही है। क्या हम अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग नहीं होंगे। क्या जब विदेशों से जब विदेशों से इसकी लहर आएगी तभी हम इसे अपनाएंगे। ऐसा ना हो कि तब तक बहुत देर हो जाए और हम अपने स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण को भी दूषित कर दें। इन सभी बातों को ध्यान में लेते हुए विशेष तौर पर शहरवासियों को यह प्रण करना होगा कि वह जैविक उत्पाद का ही सेवन करेंगे तभी हम निश्चित रूप से हर समस्या से मुक्ति पा सकेंगे।

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प्रस्तुति

डॉ. प्रवीण कुमार जगा,

सहायक प्राध्यापक/मृदा वैज्ञानिक,

ज.ने. कृ.वि.वि. कृषि महाविद्यालय,

गंज बासौदा, जिला विदिशा (म. प्र.)

स्रोत:-

विश्व कृषि संचार

वर्ष -20, अंक-12, मई-2018

विश्व एग्रो मार्केटिंग एन्ड कम्युनिकेशन, कोटा (राज.)

ईमेल – vks_2020@yahoo.com

मोब. नो.- 9425081638

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