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कृषि रसायनों के उपयोग से पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव

कृषि रसायनों के उपयोग
Written by bheru lal gaderi

देश की निरंतर बढ़ती हुई आबादी के लिए खाद्यान्न की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कृषि उत्पादन एवं पौध संरक्षण तकनीकी की अहम भूमिका हैं। अनुमानतः देश के कुल उत्पादन का 50% हिस्सा कीड़ों-मकोड़ो, पौध रोग उत्पादकों खरतवार, चूहों, चिड़ियों एवं निमेटोड के कारण कृषि उत्पादन की विभिन्न अवस्थाओं एवं भंडारण के दौरान नष्ट हो जाता हैं। अच्छे कृषि उत्पादन एवं कीड़े तथा बिमारियों से बचाव हेतु कृषि रसायनों का प्रयोग विगत वर्षों की तुलना में तेजी से बढ़ा हैं विगत छः दशकों में कृषि रसायनों का देश में उपयोग तालिका में दर्शित हैं।

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भारत में कृषि रसायनों की खपत

वर्ष कीटनाशी खपत (टन में)

रासायनिक उर्वरकों की खपत

(टन में)

1955-56 2353 130.8
1961-62 10,300 338.3
1971-72 29,535 2656.8
1981-82 60,878 12728.0
1991-92 72,133 12728.0
2001-2002 47,022 17359.7

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तालिका से स्पष्ट हैं छठे दशक में हरित क्रांति के आगाज के साथ ही कीटनाशकों का दो गुना तथा रासायनिक खादों का पांच गुना से अधिक प्रयोग बढ़ गया हैं। अन्न, चारे एवं रेशे की लागत बढ़ती जरूरतों के कारण कृषि उत्पादन में बढ़ोतरी हेतु कृषि रसायनों यथा कीटनाशी, पौध वृद्धि नियंत्रक, जन्तुनाशी, शाकनाशी, कवकाशी, संरक्षी रसायन, रासायनिक उर्वरक, सूक्षम तत्व उर्वरक आदि का प्रयोग अनिवार्य होता जा रहा हैं परन्तु उपरोक्त के असंतुलित एवं अव्यहारिक प्रयोग के गंभीर दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं।

कीटनाशियों का पर्यावरण पर प्रभाव

कृषि उत्पादन बढ़ाने में कृषि रसायनों का बहुत बढ़ा योगदान हैं परन्तु इन रसायनों के मनुष्य एवं अन्य जीवों पर अनचाहे दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं। अनुमान के अनुसार सम्पूर्ण विश्व में कीटनाशियों की विषाक्तता से लगभग एक करोड़ व्यक्ति प्रति वर्ष दीर्घकालीन बिमारियों के शिकार हो जाते हैं अथवा मर जाते हैं।

वास्तव में एक कीटनाशी केवल लक्षित कीट अथवा बीमारी के प्रति घटक होना चाहिए न की अलक्षित प्रजातियों एवं मानव के लिए, परन्तु दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हैं इसलिए कीटनाशियों के प्रयोग पर लोगों के अलग-अलग मत हैं।

कृषि रसायनों के प्रयोग के बारे में उपयोगकर्ताओं के मन में भ्रान्ति हैं की “यदि थोड़े प्रयोग का परिणाम अच्छा हैं तो अधिक प्रयोग का परिणाम और अच्छा होगा” जिसके कारण मानव एवं अन्य जातियों के जीवन में गंभीर दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं।

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तालिका में कीटनाशियों के अतिरिक्त विषाक्त अवशेष मृदा जीवों में दीर्घकालिक विषाक्तता उत्पन्न कर देते हैं जिससे मृदा उर्वरकता एवं फसलों की सूखा सहिष्णुता घट जाती हैं। कीटनाशियों के विषाक्त अवशेषों का प्रभाव तालिका में वर्णित हैं।

विभिन्न पर्यावरणीय घटकों पर कीटनाशियों का प्रभाव

घटक

प्रभाव

पौधे अवशेष, वनस्पतिक विषाक्तता, वनस्पतिक परिवर्तन।
जानवर, उड़ने वाले कीड़े

इत्यदि

अवशेष, दैहिक प्रभाव, वन्य जीव, प्रजातियों का विलुप्त होना, लाभदायक, जीव प्रजातियों एवं परजीवी का विलुप्त होना, कीट जनसंख्या परिवर्तन, अनुवांशिक परिवर्तन।
मनुष्य जैव रसायन परिवर्तन, इन्द्रियों एवं उत्तकों में अवशेष मृत्यु, कुरूपता।
मृदा अवशेष

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भूमिगत जल में कीटनाशी अवशेष

भूमिगत जल शहरी एवं ग्रामीण मानव जीवन हतु पेयजल का मुख्य स्त्रोत हैं। यह लगभग 80% ग्रामीण एवं 50% नगरवासियों के पानी की आवश्यकता की पूर्ति करता हैं। यह सतही जल की तुलना में प्रदूषण से कम प्रभावित हैं। वर्षा जल की प्राकृतिक अशुद्धियाँ भूमिगत जल में नहीं मिल पाती क्योंकि ये मृदा संस्तरों में छनकर इकट्ठी हो जाती हैं। भूमिगत जल सिंचाई एवं उद्द्योग जगत द्वारा बहुतायत में उपयोग किया जाता हैं।

विभिन्न भूमि एवं जल आधारित मानव क्रियाये इस अमूल्य संसाधन को प्रदूषित कर रही हैं एवं इसका अतिरिक्त दोहन कुछ स्थानों पर भूमिगत जल स्त्रोतों को प्रदूषित कर रहां हैं। कृषि रसायनों (उर्वरक एवं कीटनाशी) तथा कारखानों के कचरे से सतही एवं भूमिगत जल प्रदूषण पर्यावरण स्वास्थ्य के प्रमुख संकट हैं।

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अधिकांश भारतीय नदियां एवं अन्य सतही जल धाराएं बहुत प्रदूषित हैं। मल-मूत्र एवं नगरपालिका के गंदे पानी द्वारा नदियों में 75% प्रदूषण होता हैं शेष 25% प्रदूषण कृषि रसायनों एवं कारखानों के गंदे पानी द्वारा नदियों में फैलता हैं।

कीटनाशियों का मनुष्यों पर प्रभाव

मानव वसा- भारत एवं अन्य देशों के अध्ययन बताते हैं की कीटनाशियों का मनुष्य के प्रतिरोधी तंत्र पर प्रभाव पड़ता हैं। मानव शरीर की वसा में विश्व का सबसे अधिक कीटनाशी अवशेष दिल्लीवासियों में ज्ञात किया गया। विभिन्न शहरों के आम आदमियों की वसा में डी.डी.टी. एवं एच.सी. अवशेष स्तर तालिका में दर्शाया गया हैं। उल्लेखनीय हैं की कृषि में डी.डी.टी. के उपयोग को प्रतिबंधित किया जा चूका हैं।

कीटनाशियों का मनुष्यों पर प्रभाव

कीटनाशी

आरगेनो-क्लोरीन

प्रदूषित भोज्य पदार्थ प्रभाव
एल्ड्रिन

डी.डी.टी.

मछलिया, दूध, वसा

मछलिया, दूध, वसा, मांस

मानव ऊतकों में संचयन

मानव ऊतकों में संचयन, कम विषाक्तता आंत्र एंजाइम में प्रवेश

लिण्डेन फल, सब्जियां, अनाज, दूध, वसा, अस्थिमज्जा में विषक्तता मानव ऊतकों में संचयन
आरगेनो फॉस्फेट

पैराथियान

मेलाथियम

फल

फल, सब्जियां

तीव्र विषाक्तता, तंत्रिका विषाक्तता

तीव्र विषाक्तता, तंत्रिका विषाक्तता

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मानव रक्त में कीटनाशी अवशेष

इंसानी रक्त में डी.डी.टी., एच.सी.एच. एवं अन्य क्लोरीन युक्त कीटनाशी जैसे हेप्टाक्लोर इपोऑक्साइड, एल्ड्रिन, ऑक्सीक्लोरडेन, हेक्साक्लोरोबेंजीन (एच.सी.बी.) एवं डाइएल्ड्रीन आदि विश्लेषित किये जा चुके हैं।

मानव दुग्ध में कीटनाश अवशेष

नवजात शिशु काफी समय तक माँ के दूध पर निर्भर रहते हैं। दूध में उपस्थित कीटनाशी इनके लिए गंभीर खतरा साबित हो सकते हैं।

भोज्य वस्तुओं एवं नित्य आहार में कीटनाशी अवशेष

खाद्य पदार्थों में कीटनाशी अवशेषों की मात्रा क्षेत्र दर व वर्ष दर वर्ष ही नहीं वरन एक ही भज्य वर्ग के समस्त भोज्य वस्तुओं में है। भारत के विभिन्न राज्यों में एकत्रित भिज्य वस्तुओं में कीटनाशी के अवशेष विश्लेषण में पाया गया की 12 राज्यों के 2205 गोदुग्ध नमूनों में से 82% नमूनों में डी.डी.टी. अवशेष उपस्थित था जिसमें 37% नमूनों में डी.डी.टी. का उच्चतम स्तर 2.2 मिलीग्राम प्रति किलग्राम रिकॉर्ड किया गया।

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बाजार में बिकने वाले 20 व्यवसायिक शिशु नुस्खों के 186 नमूनों में डी. डी. टी. एवं एच. सी. एच. अवशेष क्रमश: 70 एवं 94% नमूनों में दर्ज किये गए तथा इनका उच्चतम स्तर (वसा आधारित) 4.3 एवं 5.7 मि ग्रा. प्रति किलोग्राम दर्ज किया गया। रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रति व्यक्ति नित्य आहार में डी.डी.टी. एवं एच.सी.एच. की औसत मात्रा 115 एवं 48 किग्रा. पायी गई जो अधिकांश विकसित देशों के नित्य आहार में उपस्थित उक्त कीटनाशियों से अधिक थी।

वनस्पति तेल, सब्जी, कुक्कुट, मांस, मछली, शहद नमूनों में कीटनाशी अवशेष

 (पी.पी.एम. में)

कीटनाशी

वनस्पति तेल सब्जियां

कुक्कुट मांस

मछली

शहद
आंत्र उत्तक वसा उत्तक आंत्र उत्तक

वसा उत्तक

एच.सी.एच.

0.16 10.86* 0.84 2.73 0.06 1.10

डी.डी.टी.0.09

1.09 0.10 0.03 0.14

इंडोसल्फान

0.07 18.63* 0.17 0.22

एल्ड्रिन

0.08 0.26 0.02 0.10

साइपरमेथ्रिन

0.25* 2.49*

6.64

डी.डी.व्ही.पी. 1.17*

1.38

मोनोक्रोटोफॉस 2.45*

0.80

मेलाथियान

2.5

0.16

क्लोरोपेरिफॉस 0.89

0.82

क्विनालफॉस

0.42

डाइमिथोएट 2.90

0.64

फैलीट्रोथियान 0.17

3.90

कार्बारिल

9.00

कार्बोफ्यूरॉन

0.44*

0.68

ऑक्सिडेमोटोन

9.00

कार्बेन्डाजिम 1.95 0.90 16.59

फेनवलेरेट

0.93*

डेल्टामैथ्रिन 0.07* 1.02

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वर्ष 2004 में किये गए एक अध्ययन के अनुसार 666 विभिन्न सब्जी नमूनों में से 56.5% नमूने विभिन्न कीटनाशी समूहों तथा आरगेनो-क्लोरीन, आरगेनो फॉस्फेट व सिंथेटिक पाइरिडथ्रीड से दूषित पाए गए। इन प्रदूषकों में मुख्यतः इंडोसल्फान, साइपरमेथ्रिन, साईहेलोथ्रिन, फेनवलेरेट, क्लोरोपाइरीफॉस, डी.डी.व्ही.पी., फोरेट व लिण्डेन सम्मलित थे जबकि इन नमूनों में से केवल 5.3% नमूने ही कीटनाशियों के उच्चतम अवशेष स्तर से अधिक प्रदुसित पाए गए। सब्जियों की अपेक्षा फलों में कम प्रदूषण पाया गया। कुल फल 317 (आम, संतरा, सेव, अंगूर) नमूनों में से 118 नमूने प्रदूषित पाए गए परन्तु महाराष्ट्र के एक नमूने को छोड़कर सभी में प्रदुषण उच्चतम स्तर से कम था।

कृषि रसायनों के हानिकारक प्रभाव को न्यून के उपाय

कृषि रसायनों (उर्वकों एवं पौध संरक्षण रसायन) के हानिकार प्रभावों की न्यूनता हेतु निम्न उपाय किये जा सकते है।

  1. कीटनाशी एक्ट एवं उर्वरक नियंत्रण आदेश का कड़ाई से पालन लागु करना।
  2. फैक्ट्री एक्ट, भोज्य वास्तु मिलावट रोकथाम एक्ट, जल प्रदुषण एवं वायु प्रदुषण रोकथाम एक्ट, पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम एवं दूषित प्रबंधन नियमों का क्रियान्वयन।

Author :-

डॉ. ए.के. सिंह एवं डॉ. आशीष त्रिपाठी,

ज.ने.कृ.वि.वि., कृषि विज्ञानं केन्द्र, सागर (म. प्र.)

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