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कुल्थी की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

कुल्थी
Written by bheru lal gaderi

कुल्थी (Kulthi) एक दलहनी फसल हैं जो कि बारानी व कम उपजाऊ मिट्टी में बुवाई के लिए उपयुक्त हैं। इसमें प्रोटीन की मात्रा 22 से 23% होती हैं। इसके दानों को साबुत उबालकर खाने के काम में लिया जाता है। कुल्थी का प्रयोग कई बीमारियों जैसे पथरी, मूत्र रोग, सर्दी जुकाम के उपचार हेतु भी किया जाता है।

कुल्थी

Image Credit – bfnsrilanka.org

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कुल्थी की उन्नत किस्में एवं उनकी विशेषताएं:-

के. एस.-2 (1991):-

यह एक भूरे रंग के दाने वाली किस्म है। इस के पौधों की ऊंचाई 40 से 50 सेंटीमीटर होती हैं। यह किस्म 85 से 90 दिन में पककर तैयार होती हैं। इस किस्म से 7 से 10 क्विंटल दाना तथा 15 से 20 क्विंटल सूखा चारा प्रति हेक्टर प्राप्त होता है।

ए.के.-21 (1999):-

यह एक राख के रंग के दानों वाली किस्म हैं। यह देश में राजस्थान के कृषि अनुसंधान केंद्र भीलवाड़ा में विकसित की गई हैं। इसके पौधों की ऊंचाई 50 से 60 सेंटीमीटर होती हैं।  यह किस्म 85 से 90 दिन में पककर तैयार हो जाती है।

प्रताप कुल्थी-1 (ए.के.-42):-

यह एक भूरे रंग के दानों वाली किस्में है। इसके पौधों की ऊंचाई 40-60 सेंटीमीटर होती हैं। यह एक जल्दी पकने वाली किस्म है जो 80 से 90 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है तथा अन्य क्षेत्रों के लिए उपयुक्त हैं।

इस किस्म से 7 से 11 क्विंटल दाना तथा 18 से 22 क्विंटल सूखा चारा प्राप्त होता है। इस किस्म में प्रोटीन की मात्रा 25 से 28% होती हैं जो कि प्रचलित किस्मों से अधिक हैं।

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भूमि एवं खेत की तैयारी:-

कुल्थी सभी प्रकार की मृदाओं (ऊसर भूमि को छोड़कर) में सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है। कुल्थी अधिकतर कम उर्वरा शक्ति वाली भूमियों में उगाई जाती है जहां पर अन्य फसलें भली भांति नहीं होती है।

वर्षा होने पर भूमि को एक दो बार आवश्यकतानुसार जोतकर तैयार करना चाहिए। अंतिम जुताई के समय यह ध्यान रखना चाहिए कि खेत समतल हो व जल निकास अच्छा हो।

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बीजोपचार:-

बुवाई के पहले प्रति किलोग्राम बीज को 3 ग्राम थायरम या कार्बेन्डाजिम से उपचारित करें।

कारक (वर्षा सिंचित, असिंचित किस्म, उपयोगिता)

नाइट्रोजन किग्रा/हेक्टेयर फास्फोरस

किग्रा/हेक्टेयर

पोटाश

किग्रा/हेक्टेयर

अन्य
सामान्य 10 30

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बीज एवं बुवाई:-

दाने के लिए 15-20 किलो बीज प्रति हेक्टर काम में लेना चाहिए। इसकी बुआई 30 से.मी. दूर कतारों में करें। बाद में छंटाई कर पौधे से पौधे की दूरी 10 से 15 सेंटीमीटर रखें। कुल्थी की बुवाई मानसून की वर्षा के बाद जब खेत बुवाई लायक हो जाए तब करनी चाहिए।

खरपतवार प्रबंधन:-

कुल्थी फसल में घास कुल के खरपतवारों के नियंत्रण के लिए क्युजालोफोप इथाइल 50 ग्राम प्रति हेक्टर की दर से आवश्यकतानुसार पानी में घोल बनाकर फसल बुवाई के 15 से 20 दिन बाद  (खरपतवारों की दो चार पत्ती वाली अवस्था पर) छिड़काव करें एवं 30 दिन की अवस्था में एक बार निराई गुड़ाई करनी चाहिए।

उपरोक्त फसल में घास कुल तथा द्विबीजपत्री खरपतवारों के नियंत्रण के लिए इमाजिथापायर 100 ग्राम प्रति हेक्टर की दर से आवश्यकता अनुसार घोल बनाकर खरपतवारों की दो से चार पत्ती वाली अवस्था पर छिड़काव करें तथा 30 दिन की अवस्था पर एक बार निराई गुड़ाई करनी चाहिए।

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फसल संरक्षण:-

मूल विगलन के प्रकोप का जहां अंदेशा हो वहां बीजों को फफुंदनशी से उपचारित करके बोये। कभी-कभी पत्तियों पर छोटे-छोटे गहरे भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं जिससे पौधे मुरझा जाते हैं। इस रोग की रोकथाम हेतु प्रति हेक्टर 2 किलोग्राम ताम्र युक्त कवक नाशक का छिड़काव करें।

कटाई एवं पैदावार:-

जब फलियां पककर सुख जाये तब फसल की कटाई करें। इसमें फलियों से बीज गिरने की शिकायत रहती हैं अतः समय पर कटाई करना आवश्यक है। इसकी औसत उपज  8 से 10 क्विंटल प्रति हेक्टर होती हैं।

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