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किसान वैज्ञानिक ईश्वर सिंह कुंडू को राष्ट्रपति भवन से मिला निमंत्रण

Written by bheru lal gaderi

कृषि में नए प्रयोग के लिए देश-विदेश में नई पहचान बना चुके ईश्वर सिंह कुंडू को एक बार फिर से राष्ट्रपति भवन में निमंत्रण मिला है। वे 5 दिनों तक राष्ट्रपति भवन में रहेंगे। जहां राष्ट्रीय नवप्रवर्तन संस्थान अहमदाबाद द्वारा नई खोजों को लेकर प्रदर्शनी का आयोजन किया जा रहा है। यह प्रदर्शनी 19 से 23 मार्च को आयोजित होगी। जिसके लिए कुंडू को निमंत्रण मिला है।

ईश्वर सिंह कुंडू

इससे पूर्व भी उन्हें राष्ट्रपति भवन से निमंत्रण मिल चुका है। वहां ईश्वर सिंह कुंडू की बनाई गई दवा भी पौधों में प्रयोग लाई जा चुकी हैं। ईश्वर सिंह कुंडू ने बताया कि राष्ट्रीय नवप्रवर्तन संस्थान के अधिकारी ने उन्हें 18 मार्च शाम तक अपनी खोज वह उत्पादों के साथ दिल्ली पहुंचने को कहा है। राष्ट्रपति भवन के बागवानी एवं मुगल गार्डन में बरसों से ईश्वर के बनाए उत्पादों का प्रयोग हो रहा है। पिछले साल इस कार्यक्रम के समापन समारोह में तत्कालीन राष्ट्रपति ने ईश्वर को विशेष तौर पर निमंत्रित किया था।

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कृषि को जड़ी बूटियों से जहर मुक्त करने का प्रयास

ईश्वर सिंह कुंडू ने साधारण शिक्षित होते हुए भी कृषि को जहर मुक्त करने के प्रयास 1995 में आरंभ किए थे। जड़ी बूटियों से जहरीले रसायनों का तोड़ निकालकर साबित किया था कि बिना खतरनाक रसायनों के भी खेती संभव है।

इसके लिए इनको दर्जनों पुरस्कार मिले एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता में 44 लाख का पुरस्कार जीता, वर्तमान प्रधानमंत्री ने 2013 में गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए ईश्वर को सम्मानित किया था। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद कृषि विभाग हरियाणा, पांडिचेरी, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश दिल्ली से सम्मान हासिल किए एवं लिम्का बुक रिकॉर्ड कायम किए।

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दवा बनाने में आयुर्वेद के सिद्धांतों का किया प्रयोग

ईश्वर सिंह कुंडू ने बताया कि उन्होंने आयुर्वेद के सिद्धांतों को कृषि के लिए प्रयोग किया। इसके लिए नीम, ऑक और अरहर, बरहेड़ा, आंवला, शिकाकाई, निंबोली, नीम पत्ते, रीठा, तीन प्रकार की हल्दी का प्रयोग करके शोध किया। जिससे दवा बनी उससे कीटनाशक तैयार हुए इंसेक्टिसाइड, फर्टिलाइजर के कारण जमीन जहरीली हो गई। इस जहर से मुक्ति के लिए और जमीन की सेहत के लिए यह उत्पाद तैयार किया। उनके सिद्धांत से मिट्टी वह पौधे में वह ताकत आ जाती है, जिससे कि वह बीमारियों से लड़ सके। उनके प्रयोग से खर्च कम हुए और जमीन की उत्पादकता बढ़ती गई और उत्पादन बढ़ा।

साभार:-

अमर उजाला ब्यूरो

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