agriculture पशुपालन

किसानों की आय दुगनी करने में पशुपालन की भूमिका एवं रणनीति

किसानों की आय
Written by Rajesh Kumar Singh

पशुपालन और खेती एक दूसरे से जुड़ा हुआ पेशा है। आय बढ़ाने के लिए पशुपालन को बेहतर तकनीक के साथ अपनाने की जरूरत है। पशुपालन के सह-उत्पाद जैसे गोबर से बनी कंपोस्ट खाद, खेती की उपज बढ़ाने और उसकी लागत को कम करने में मददगार होते हैं।

किसानों की आय

किसान पशुपालन के जरिये अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते हैं। इसके साथ ही भूमिहीन मजदूर या छोटी जोत के किसान पशुपालन को अपनाकर पूरे साल काम पा सकते हैं। किसानों के साथ-साथ यह उद्यमियों और युवाओं को स्वरोजगार के अवसर प्रदान करता है।

भारत की अर्थव्यवस्था में पशुपालन का खास योगदान रहा है। विश्व में भारत दूध उत्पादन के मामले में पहले नंबर पर है. देश की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था में पशुधन का स्थान प्रमुख रहा है।

किसान देश की जीवन रेखा हैं और किसी भी देश का विकास उसके कृषि क्षेत्र के विकास के बिना अधूरा है । देश की खाद्य सुरक्षा को सतत आधार पर सुनिश्चिवत करने का श्रेय हमारे किसानों को ही जाता है । आज वस्तुस्तिथि यह है कि भारत न केवल बहुत से कृषि उत्पा दों में आत्मक निर्भर व आत्म संपन्न है वरन बहुत से उत्पाकदों का निर्यातक भी है।

इन सत्यो के साथ यह भी सच है कि किसान अपने उत्पापदों का लाभकारी मूल्य नहीं पाते हैं। अत: सरकार का मानना है कि कृषि क्षेत्र में इस तरह का चहुमुखी विकास किया जाये की अन्न एवं कृषि उत्पादों के भंडारों के साथ साथ किसान की जेब भी भरे व उनकी आय भी बढे।

इसी आशय के साथ दिनांक 28 फरवरी 2016 को बरेली में आयोजित किसानो की एक रैली में माननीय प्रधानमंत्री जी ने कहा था – “मै वर्ष 2022 तक,जब भारत अपनी आज़ादी की 75वीं सालगिरह मनाये, किसानो की आय को दोगुना करना चाहता हूँ। मैंने इसे एक चुनौती के रूप में लिया है, पर यह केवलएक चुनौती नहीं है। एक अच्छी रणनीति, सुनियोजित कार्यक्रम, पर्याप्त संसाधनों एवं कार्यान्वन में सुशासन के माध्यम से इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है”।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह एक महत्वाकांक्षी उद्देश्य है और इसके लिए सरकार द्वारा बहु-आयामी रणनीति की आवश्यकता है।

अत: इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमारे माननीय यसस्वी प्रधानमंत्री श्री मोदी जी ने ‘सात सूत्रीय’रणनीति का आह्वान किया है, जिसमे शामिल हैं:-

  1. प्रति बूंद अधिक फसल के सिद्धांत पर प्रयाप्त संसाधनों के साथ सिंचाई पर विशेष बल।
  2. प्रत्येूक खेत की मिटटी गुणवत्ता के अनुसार गुणवान बीज एवं पोषक तत्वों का प्रावधान।
  3. कटाई के बाद फसल नुक्सान को रोकने के लिए गोदामों और कोल्डचेन में बड़ा निवेश।
  4. खाद्य प्रसंस्कलरण के माध्य म से मूल्यर संवर्धन को प्रोत्साहन ।
  5. राष्ट्रीय कृषि बाज़ार का क्रियान्वन एवं सभी 585 केन्द्रों पर विकृतियों को दूर करते हुए ई – प्लेटफार्म की शुरुआत।
  6. जोखिम को कम करने के लिए कम कीमत पर फसल बीमा योजना की शुरुआत।
  7. डेयरी-पशुपालन, मुर्गी-पालन, मधुमक्खीो–पालन, मेढ़ पर पेड़, बागवानी व मछली पालन जैसी सहायक गतिविधियों को बढ़ावा देना।

पिछले 20 वर्षों से भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश बना हुआ है। भारत में दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में व्यापक संभावनाएँ हैं, क्योंकि यह बड़े स्तर पर भारत की अर्थव्यवस्था में भागीदारी करता है।

यह एक ऐसा क्षेत्र है, जो बहुत से अशिक्षित लोगों को रोज़गार प्रदान करता है। इसने ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी के उन्मूलन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है, क्योंकि सूखे के दौरान प्रभावित परिवारों की आय का मुख्य स्रोत दुग्ध उत्पादन ही रहता है।

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ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन का महत्त्व:-

  • यह ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका का प्रमुख आधार है। विशेषकर भूमिहीन और सीमांत किसान पशुपालन के माध्यम से अपनी परिवारिक आय बढ़ा सकते हैं।
  • पशुपालन और कृषि संबंधी प्रक्रियाएँ आपस में जुड़ी हुई हैं। पशुओं के लिये भोजन कृषि से प्राप्त होता है तो पशु भी कृषि को विभिन्न प्रकार की आगतें, जैसे-खाद्य, ढुलाई आदि प्रदान करते हैं।
  • पशुपालन से ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी तथा छिपी हुई बेराज़गारी की समस्या का निवारण किया जा सकता है।
  • पशुपालन में अधिकतर महिलाएँ संलग्न होती हैं। अतः यह श्रम क्षेत्र में महिला भागीदारी को बढ़ावा देकर महिला सशक्तीकरण में योगदान देता है।

पशु उत्पाद ग्रामीण निर्धनों के लिये प्रोटीन एवं पोषक तत्त्वों के प्रमुख स्रोत हैं।

भारत में दुग्ध उत्पादन:-

  • विगत 3 वर्षों में दुग्ध उत्पादन 7 मिलियन टन से बढ़कर 165.4 मिलियन टन हो गया है। वर्ष 2014 से 2017 के बीच दुग्ध उत्पादन में वृद्धि 20% से भी अधिक रही है।
  • इसी तरह प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता 2013-14 के 307 ग्राम से बढ़कर वर्ष 2016-17 में 355 ग्राम हो गई है जो कि 6% की वृद्धि को दर्शाती है।
  • इसी प्रकार 2011-14 की अवधि की तुलना में 2014-17 में डेयरी किसानों की आय में 77% की वृद्धि हुई।
  • इस उपलब्धि को हासिल करने में राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान (NDRI) जैसे अनुसंधान सस्थानों का योगदान रहा है, जो डेयरी क्षेत्र की तकनीकी और मानव संसाधन आवश्यकताओं को पूरा करते आए हैं।

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पशु उत्पादकता संवर्द्धन हेतु सरकारी प्रयास:-

  • पशुपालन योजनाओं का लाभ सीधे किसानों के घर तक पहुँचे, इसके लिये सरकार द्वारा एक नई योजना‘नेशनल मिशन आन बोवाइन प्रोडक्टीविटी’ अर्थात गौपशु उत्पादकता राष्ट्रीय मिशन शुरू किया गया है।
  • इस योजना में ब्रीडिंग इनपुट के द्वारा मवेशियों और भैंसों की संख्या बढ़ाने हेतु आनुवंशिक अपग्रेडेशन के लिये सरकार द्वारा 825 करोड़ रूपए खर्च किये जा रहे हैं।
  • दुग्ध उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि करके डेयरी कारोबार को लाभकारी बनाने के लिये यह योजना अपने उद्देश्य में काफी सफल रही है।
  • सरकार द्वारा प्रजनकों (ब्रीडरों) के साथ दुग्ध उत्पादकों को जोड़ने के लिये पहला ई-पशुहाट पोर्टल बनाया गया है।
  • इस पोर्टल को गौपशु उत्पादकता राष्ट्रीय मिशन के अंतर्गत प्रारंभ किया गया है और इसका उद्देश्य बोवाइन जर्मप्लाज्म की उपलब्धता के बारे में जानकारी प्रदान करना है।
  • सरकार ने देशी नस्लों के संरक्षण और विकास के लिये राष्ट्रीय गोकुल मिशन का शुभारंभ किया है।
  • स्वदेशी नस्लों के विकास एवं एक उच्च आनुवंशिक प्रजनन की आपूर्ति के आश्रित स्रोत के केंद्र के रूप में कार्य करने के लिये देश के 13 राज्यों में 20 गोकुल ग्राम स्वीकृत किये गए हैं।
  • स्वदेशी नस्लों के संरक्षण के लिये देश में दो राष्ट्रीय कामधेनु प्रजनन केंद्र भी स्थापित किये गए हैं, पहला, दक्षिणी क्षेत्र में चिन्तलदेवी, नेल्लोर में और दूसरा, उत्तरी क्षेत्र इटारसी, होशंगाबाद में।

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बजट 2018-19 में पशुपालन ——

सरकार ने पिछले बजट में नाबार्ड के साथ ‘दुग्ध प्रसंस्करण और बुनियादी विकास निधि’ (Dairy Processing & Infrastructure Development Fund-DIDF) योजना को 10,881 करोड़ रूपये के कोष के साथ स्थापित किया था।
इस वर्ष सरकार ने 2450 करोड़ रूपए के प्रावधान के साथ पशुपालन क्षेत्र की बुनियादी आवश्यकताओं को फाइनेंस करने के लिये एक पशुपालन बुनियादी संरचना विकास निधि (AHIDF) की स्थापना की है।

साथ ही, डेयरी किसानों की कार्यशील पूंजी की आवश्यकता को पूरा करने के लिये मत्स्यपालक और पशुपालक किसानों के लिये किसान क्रेडिट कार्ड की सुविधा भी सरकार द्वारा बढ़ा दी गई है।

किसानो की आय को दोगुना करना – रणनीति

वर्तमान में चालू योजनाओ को आय संवर्धन के साथ जोड़ने पर भी विशेष बल दिया जा रहा है जैसे कि – उत्पादकता बढ़ोतरी से उत्पादन में वृद्धि के लिए राष्ट्रीय खाद्यसुरक्षा मिशन एव् बागवानी के समेकित विकास के लिए गठित मिशन के क्रियान्वन पर बल दिया गया है। कृषि लागत में कटौती के लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड व् नीम लेपित यूरिया के इस्तेमाल और हर बूंद से ज्यादा फसल संबंधी योजनाओं को लक्षित किया गया है।

लाभकारी आय स्त्रोत के सृजन के लिए ई-नाम, शुष्क और ठन्डे भंडारण संसाधन, डीईडीफ (डेरी प्रसंस्कन और अवसंरचना विकास कोष), ब्याज की रियाती दरो पर भण्डारण की सुविधाए और कटाई पश्चात् ऋण की सुविधा तथा वार्षिक आधार न्यूनतम सपोर्ट प्राइस बढाने आदि पर जोर दिया गया है तथा जोखिम प्रबंधन एवं स्थाई पद्धतियां अपनाने हेतु प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, परम्परागत कृषि विकास योजना तथा उतरपूर्वी राज्यों के लिये जैविक खेती पर मिशन आदि के माध्यम से सतत कृषि को बढ़ावा दिया जा रहा है ।

कृषि के अतिरिक्ता किसान के अन्यय आय के साधनों जैसे पशुपालन, मुर्गीपालन, मधुमक्खीरपालन, मछलीपालन एवं डेयरी के विकास की विभिन्नन योजनाओं पर भी सरकार निरंतर कार्य कर रही है। सरकार का मानना है कि किसान की आय में वृद्धि के लिए इन अतिरिक्ता आय स्रोतों के विकास किए जाने की अत्यंत आवश्यृकता है। इस हेतु सरकार ने राष्ट्रीय पशुधन मिशन, गोकुल मिशन, नीली क्रांति, मधुमक्खी पालन, मुर्गी पालन आदि बहुत सी योजनाएं प्रारंभ की हैं जिनके कारण गत वर्षों में डेयरी, पोल्ट्री , मधुमक्खी, मत्स्य पालन क्षेत्र में काफी वृद्धि दर्ज हुई है।

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राष्ट्री य पशुधन मिशन (एनएलएम)

जिसको वर्ष 2014-15 में शुरू किया गया था और इसमें सभी राज्यों और संघ शासित क्षेत्रों को कवर किया गया है, में पशुधन उत्पाददन पद्धति, हितधारकों की क्षमता निर्माण, पशुधन उत्पारदन और परियोजना में सहायता और सुधार से जुड़े सभी पहलू कवर किए गए हैं। इस मिशन का उद्देश्यो पशुधन क्षेत्र का सतत विकास करना और गुणवत्ता प्रद आहार व चारे की उपलब्ध‍ता में सुधार करना है।

पूर्वोत्तकर क्षेत्र में सूअर विकास उप-मिशन के तहत पूर्वोत्त र राज्यस के क्षेत्रों में सूअर पालन के समग्र विकास के लिए सहायता की लगातार मांग की जा रही थी। इस उद्देश्यर से पूर्वोत्त्र क्षेत्र के 8 राज्योंत में भारत सरकार स्टेथट पिगरी फार्म व जर्मप्लाोज्मर के आयात के लिए सहायता प्रदान कर रही है ताकि आजीविका कार्यकलापों के साथ साथ फूड बास्केरट में प्रोटीन की मात्रा को भी बढ़ाया जा सके। समेकित मात्यियक की विकास व प्रबंधन की व्योवस्थाक वाली नई पहल ‘नीली क्रांति’ जिसमें अंतर्देशीय मात्यिबंधनकी, जल कृषि, समुद्री मछली, मैरीकल्चसर व राष्ट्रीय मात्यिबंधनकी विकास बोर्ड (एनएफडीबी) द्वारा किए जाने वाले कार्यकलाप शामिल किये गये हैं।

अब तक एकत्रित सूचना एवं परिचर्चाओ के मध्य्नज़र तथा विकास के सात स्त्रोतों जैसे कि-

  1. फसल उत्पादकता में सुधार
  2. पशुधन उत्पादकता में सुधार
  3. संसाधन उपयोग दक्षता (लागत, बचत और स्थिरता)
  4. फसल सघनता में वृद्धि
  5. अधिक मूल्य वाली फसलो के माध्यम से विविधता
  6. किसानो द्वारा प्राप्त वास्तविक मूल्यों में सुधार
  7. कृषि से गैर कृषि कार्यो में बदलाव को ध्यान में रखते हुए डी.ऍफ़.आई. समिति ने अपनी अंतरिम सिफरिशे सरकार से साँझा की है जिन्हें वर्तमान में चालू योजनाओ के माध्यम से अमल में भी लाया जा रहा है।

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सारांश में डी.ऍफ़.ई. समिति की मुख्य सिफारिशे एवं अनुशंसाओं की एक झलक निम्नानुसार है:–

  1. खेती, पशुधन, गैर-कृषि व्यवसाय, मजदूरी और वेतन की विकास दर के अनुसार जो क्रमश: 8%, 14.7%, 0.5% व् 1.6 % है, के आधार पर पशुधन के क्षेत्र पर अधिक बल देना।
  2. कृषि एवं कृषि विकास में निवेश के बीच सकारात्मक सम्बन्ध स्थापित करना ताकि कृषि के लिए सार्वजनिक निवेश, विशेषकर कोर्पोरेट सेक्टर के निवेश में बढ़ोतरी हो।
  3. बाज़ार हस्तक्षेप तथा फसल उत्पादन के बाद की प्रक्रियाओं को प्राथमिकता देना।
  4. किसानो की बची हुई (ज़रूरत से अधिक उपज) की 100% कीमत को उत्पादन पश्चात हस्तक्षेप से केप्चर करना।
  5. किसानो की उपज को रोकने (विद-होल्ड करने) की क्षमता को बढ़ाना।
  6. सूखे एवं गीले भंडारण की बुनियादी अवसरचना को मज़बूत करना।
  7. नई बाज़ार पहलों जैसे इलेक्ट्रॉनिक व्यापार, एकल व्यापारी लाइसेंस, बाज़ार शुल्क के लिए एक मात्र बिंदु, बाज़ार शुल्क पर चेक, अनुबंध खेती को बढ़ावा, कृषि मूल्य प्रणाली मंच/प्लेटफार्म का गठन, प्रत्येक किसान को वैल्यू श्रंखला में एकीकृत करना तथा 25 % विस्तार एवं आत्मा कर्मिओं को विपणन के काम में लगाना आदि शामिल है।
  8. उत्पादन में सतत प्रथाओं जैसे कि जल संरक्षण, एकीकृत खेती प्रणाली, वाटर शेड प्रबंधन, जैविक खेती आदि को लागु करना।
  9. खेत से जुडी गतिविधियों एवं सहायक कृषि क्षेत्रो जैसे मधुमकखी पालन, मशरूम की खेती, खाद बनाना, लाख की खेती, कृषि वानिकी आदि को बढ़ावा देना।
  10. कृषि विस्तार कार्यक्रमों में नई शक्ति डालना जैसे आत्मा व् विस्तार कर्मियों की रिक्तियों को भरने के लिए केंद्र सहयता को 60 से 75 % तक बढ़ाने पर विचार करना, विस्तार कार्यो के लिए मानव शक्ति व् आई. सी.टी. के समावेश पर बल देना।
  11. अन्य संरचनात्मक सुधारो पर ध्यान देना।

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आजकल सरकारी तौर पर पशुपालन को बहुत ज्यादा बढ़ावा दिया जा रहा है. सरकार चाहती है कि पशुपालन के जरीए किसानों की माली हालत मजबूत हो। इसीलिए सरकार ने इस मामले में तमाम शानदार योजनाएं शुरू की हैं। सरकार इसके लिए कई योजनाएं चलाती हैं।

किसानों को विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत मुफ्त प्रशिक्षण, पशु खरीद के लिए ऋण (लोन) एवं सुरक्षा के लिए बीमा जैसी वित्तीय सहायता देती हैं। इसके साथ ही नस्ल में सुधार के जरिये उत्पादन में वृद्धि के लिए योजनाएं हैं।

पशुपालन के अंतर्गत किसान गाय, भैंस, भेड़, बकरी, खरगोश, कुक्कुट जैसे कई प्रकार के मवेशियों का व्यवसाय कर सकते हैं.

निम्नलिखित केंद्र सरकार की योजनाये ,राज्य सरकारो के माध्यम से विभिन्न अंसदान के अनुपात मे ,राज्य सरकारे अलग अलग नाम से चलाती है , मोदी सरकार की कृषि एवं पशुपालन से जुड़ी कुछ योजनाएं जो की बहुत ही सराहनीय है ,को मैने संक्षिप्त मे पेश करने का प्रयास किया हैं।

पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन विभाग द्वारा पशुपालन के लिए केन्द्र प्रायोजित योजनाओं के बारे में जानकारी निम्नवत है:-

कृषि एवं पशुपालन से जुड़ी ऋण योजनाएं:-

  1. वानिकी विकास कार्यक्रमों के लिए वित्तपोषण योजना।
  2. एग्री क्लिनिक्स एवं एग्री बिजनैस केन्द्र (एसीएबीसी) की स्थापना के लिए कृषि स्नातकों को वित्तपोषण योजना।
  3. बंजर भूमि विकास योजना हेतु वित्तपोषण योजना (ट्री पट्टा योजना सहित) ।
  4. निवेश प्रमोशन योजना के अंतर्गत गैर-वानिकी बंजर भूमि
  5. कृषि उद्देश्य के लिए भूमि की खरीद हेतु किसानों को वित्तपोषण हेतु योजना।
  6. भूमि खरीदने तथा अन्य कृषि कार्य-कलापों के लिए कृषि स्नातकों को वित्तीय सहायता प्रदान करने की योजना।
  7. मशरुम की खेती हेतु वित्तपोषण योजना।
  8. मशरुम स्पान उत्पादन हेतु वित्तपोषण योजना।
  9. बायोगैस यूनिटों की स्थापना के लिए वित्तपोषण योजना।
  10. डीलरों को कृषि निविष्टियों के लिए पशु चारा, मुर्गीदाना, डेयरी फीड इत्यादि।
  11. मुर्गीपालन के लिए वित्तपोषण योजना।
  12. डेयरी विकास कार्यक्रमों के लिए वित्तपोषण योजना।
  13. दूध उत्पादन कार्यकलापों के लिए वित्तपोषण अर्थात दूध उत्पादन के लिए दुधारू पशुओं (गाय/भैंसों) की खरीद व रखरखाव।
  14. अच्छी नस्ल के दुधारू पशुओं हेतु वित्तपोषण योजना।
  15. पशुपालन से सम्बन्ध अन्य नवीन कार्यकलापों के लिए वित्तपोषण।
  16. डेयरी विकास कार्ड योजना (चुने हुए राज्यों में लागू)।
  17. नई भैंस खरीदना / मौजूदा भैंस को बदलना।
  18. मत्स्य विकास वित्तपोषण हेतु योजना।
  19. मेरीन मछली पालन वित्तपोषण योजना।
  20. भेड़-बकरी पालन हेतु वित्तपोषण योजना।
  21. सूअर विकास हेतु वित्तपोषण योजना।
  22. गाड़ी एवं भार ढोने वाले पशुओं की खरीद हेतु वित्तपोषण योजना।
  23. मधुमक्खी पालन वित्तपोषण योजना।
  24. रेशम उत्पादन के वित्तपोषण के लिए योजना।
  25. किचन गार्डनिंग वित्तपोषण योजना।
  26. पीएनबी कृषि कार्ड योजना।
  27. पादप गृहों के वित्त पोषण के लिए योजना।
  28. पीएनबी कल्याणी कार्ड योजना।
  29. पीएनबी जनरल क्रेडिट कार्ड (जीसीसी)।
  30. सौर उर्जा प्रकाश प्रणाली के वित्तपोषण के लिए योजना (एसईएलसी)।
  31. पीएनबी कृषक साथी योजना (केएसएस)।
  32. कृषि अग्रिमों के लिए मार्जिन संबंधी मानदण्ड।

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बायोगैस यूनिटों की स्थापना के लिए वित्तपोषण योजना:-

पात्रता:-

ऋण लेने वाले उधारकर्ताओं के पास पर्याप्त संख्या में पशु होने चाहिए तथा उनके अनुसार ही स्थापित किए जाने वाले प्रस्तावित प्लांट का आकार होना चाहिए।

ऋण की सीमा:-

बायो-गैस प्लांट के माडल तथा क्षमताओं के आधार पर आवश्यकता के अनुसार।

ऋण की चुकौती:-

5-7 वर्ष

डीलरों को कृषि निविष्टियों के लिए पशु चारा, मुर्गीदाना, डेयरी फीड इत्यादि। कमीशन एजेण्टों/आढ़तियों/ डीलरों को कृषि निविष्टियों के वितरण के लिए योजना के विवरण भाग-I तथा भाग-II में दिये गये हैं ।

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भाग-I:-

बीजों, उर्वरकों, कीटनाशक दवाओं इत्यादि के वितरण के लिए प्रदत्त स्टॉक की एवज में एजेंटों/डीलरों को उनके कृषि निविष्टियों (स्टॉक) की खरीद तथा खेती के लिए किसानों को सप्लाई बीजों के बही ऋण (बुक वैल्यू) के विरुध्द एजेंट/डीलरों को ऋण दिया जा सकता है। उन्हें केवल कृषि निविष्टियों की खरीद के लिए जो इन निविष्टियों (इनपुट्स) के एक्सक्लुसिव डीलर नहीं हैं तथा उन कमीशन एजेंण्टों/आढ़तियों को जो किसानों को इनपुट्स की खरीद के लिए ऋण प्रदान करते हैं, परंतु इनपुट्स के डीलर नहीं हैं तथा व्यष्टि किसानों/स्वयं सहायता समूहों/संयुक्त देयता समूहों से उत्पादन खरीदने के लिए कमीशन एजेंटों/आढ़तियों को वित्तपोषित करना।

पात्रता:-

व्यक्तियों/फर्मों/प्राईवेट या पब्लिक लिमिटेड/कारपोरेट निकाय या किसी भी कोऑपरेटिव सोसायटी नियम के अंतर्गत पंजीकृत कोऑपरेटिव सोसायटी जो आढ़तियों/कमीशन एजेण्ट/डीलर के रूप में कार्य करने वाले, क्षेत्र में अच्छी साख रखने वाले, अच्छी वित्तीय स्थिति वाले कृषि इनपुट्स के वितरण में लगे पर्याप्त अनुभव रखने वाले तथा संतोषजनक टर्न-ओवर वाले हैं, ऋण के पात्र हैं।

सुविधा की किस्म:-

(i) नकद ऋण (दृष्टिबंधक)
(ii) नकद ऋण (गिरवी)
(iii )नकद ऋण (बही-ऋण)

ऋण सीमा:-

आवश्यकता आधारित।

ऋण की अवधि:-

चालू फसलों (खरीफ/रबी) के उत्पाद की मार्केटिंग के साथ ऋण अवधि को संबध्द किया जाएगा। खाते को वर्ष में कम-से-कम एक बार क्रेडिट बैलेंस में लाना चाहिए । खाते को वार्षिक आधार पर समीक्षा की जायेगी ।

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भाग-II:-

पशु चारा, मुर्गी दाना, डेयरी फीड, मछली दाना इत्यादि के वितरण में लगे डीलरों को उनके प्रदत्त स्टॉक के विरुध्द अधिकतक 40 लाख रुपये।

पात्रता:-

व्यक्तियों/फर्मों/प्राईवेट या पब्लिक लिमिटेड/कारपोरेट निकाय या किसी भी कोऑपरेटिव सोसायटी नियम के अंतर्गत पंजीकृत कोऑपरेटिव सोसायटी जो आढ़तियों/कमीशन एजेण्ट/डीलर के रूप में कार्य करने वाले, क्षेत्र में अच्छी रेपुटेशन रखने वाले, अच्छी वित्तीय स्थिति तथाकृषि इनपुट्स के वितरण में लगे पर्याप्त अनुभव रखने वाले तथा संतोषजनक टर्न-ओवर वाले इसके लिए पात्र हैं।

ऋण सीमा:-

आवश्यकता आधारित।

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मुर्गीपालन के लिए वित्तपोषण योजना:-

मुर्गीपालन के लिए वित्तपोषण योजना के अंतर्गत छज्जों के निर्माण के लिए उपकरणों की खरीद तथा एक दिन के चूज़ों की खरीद, मुर्गीदाना, औषधियों इत्यादि की खरीद के लिए ऋण दिया जाता है। उधारकर्ताओं को निम्नानुसार वित्तीय सहायता प्रदान की जायेगी।

उद्देश्य:-

सहायक कार्यकलापों के लिए :स्थाई सम्पत्तियों के अधिग्रहण के लिए मध्यावधि मीयादी ऋण के रूप में निवेश ऋण प्रदान किया जायेगा जबकि उत्पादन ऋण, अल्पावधि मीयादी ऋण के रूप में कार्यकारी पूंजी अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए दिया जायेगा।

मुख्य कार्यकलापों के लिए:-

निवेश ऋण ऊपर उल्लिखित अनुसार प्रदान किया जायेगा जबकि उत्पादन ऋण या तो नकद ऋण सीमा के रूप में या निवेश ऋण के घटक के रूप में।

पात्रता:-

सहायक कार्यकलापों के लिए:-

ऋणी एक छोटा किसान, भूमि रहित कृषि मजदूर या अन्य व्यक्ति होना चाहिए जो अल्परोजगार प्राप्त हो और मुर्गीपालन के माध्यम से अतिरिक्त आय सृजित करना चाहता हो और जिसके पास शैड निर्माण के लिए पर्याप्त भूमि हो ।

मुख्य कार्यकलापों के लिए:-

ऋणी को मुर्गीपालन यूनिट चलाने का अच्छा अनुभव हो और व्यावसायिक आधार पर मुर्गीपालन में व्यस्त हो या मुर्गीपालन को मुख्य व्यवसाय के रूप में अपनाना चाहता हो, उसके पास पर्याप्त भूमि/शैड हो जहां वह मुर्गीपालन का कार्य करना चाहता है।

यूनिट का आकार:-

सहायक कार्यकलापों के लिए मुर्गी पालन यूनिट के लिए 500 पक्षियों की न्यूनतम साईज होनी चाहिए ।

ऋण सीमा:-

आवश्यकता आधारित होगी।

ऋण की चुकौती:-

उत्पादन ऋण, यदि अल्पावधि ऋण के रूप में लेयर्स और ब्रायलर्स के मामले में दिया जाता है तो 6/3 महीनों की प्रारम्भिक अवधि सहित 18/12 महीनों में वसूल किया जाना है ।
निवेश ऋण पर्याप्त प्रारम्भिक अवधि (12 महीनों तक लेयर्स के लिए और 3 माह तक ब्रायलर्स के लिए) मासिक/तिमाही/छमाही किश्तों में, छोटे किसानों के मामले में उनकी चुकौती क्षमता पर निर्भर करते हुए, 6-7 वर्षों की अवधि में वसूल किया जाता है ।

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डेयरी विकास कार्यक्रमों के लिए वित्तपोषण योजना:-

डेयरी प्रोजेक्ट के अन्तर्गत निम्नलिखित कार्यों हेतु वित्तपोषण किया जाता है।

  1. दुग्ध उत्पादन के लिए अच्छी नस्ल के दुधारू पशुओं जैसे कि गाय/भैंस या संकर नस्ल की गायों की खरीद के लिए व्यक्तियों को वित्तपोषित करना।
  2. एक माह तक के बछड़ों के पालन-पोषण के लिए व्यक्तियों को ऋण।
  3. दूध उत्पादन की प्रथम अवस्था तक के लिए बछियों की खरीद व पालन-पोषण के लिए ऋण।
  4. अन्य पशु पालन के नए कार्य, पशु प्रजनन जैसे दुग्ध उत्पादन की सुविधाएं, दुग्ध गृहों का निर्माण इत्यादि हेतु वित्तपोषण । दुग्ध उत्पादकों के गाय/भैंसों के लिए चारे की व्यवस्था ।

दूध उत्पादन कार्यकलापों के लिए वित्तपोषण अर्थात दूध उत्पादन के लिए दुधारू पशुओं (गाय/भैंसों) की खरीद व रखरखाव:-

उद्देश्य:-

बैंक निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए ऋण प्रदान करता है।

  • अच्छी नसलों के दुधारू पशुओं गाय/भैंसों की खरीद।
  • पशुओं को रखने के लिए छज्जों(शेड्स) का निर्माण।
  • डेयरी मशीनरी की खरीद अथवा डेयरी कारोबार के अन्य उपकरणों हेतु वित्तपोषण।
  • पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था।
  • पशुओं को बाजार, हाट व मेलों से खरीदने व लाने/ले जाने हेतु परिवहन की लागत।
  • दुधारू पशुओं के चारे की व्यवस्था स्वरूप एक माह तक चारे की खरीद हेतु वित्तपोषण।

पात्रता:-

  1. वे व्यक्ति जो आंशिक/सहायक कार्य के रूप में डेयरी चलाते हैं।
  2. वे व्यक्ति जो व्यावसायिक/मुख्य रूप में डेयरी चलाते हैं।

ऋण सीमा:-

आवश्यकता-

आधारित ऋण प्रदान किया जाता है । दो दुधारू पशुओं की यूनिट, दुग्ध उत्पादन के लिए व्यवहार्य है।

ऋण की चुकौती:-

दुधारू पशुओं की खरीद के लिए देय ऋण को निम्न से चुकाया जाएगा।

क्र.सं.

निवेश का प्रकार प्रकार चुकौती अवधि

(प्रारम्भिक अवधि सहित)

ऋण किश्त अवधि

प्रारम्भिक अवधि

1.

संकर नस्ल की गायें

5 वर्ष

मासिक/तिमाही

चुकौती लेक्टेशन अवधि के साथ समबध्द होगी

2.

भैंसें

4 – 5 वर्ष

…..वही…..
…..वही…..

3.

2 ग्रेडेड मुर्रा भैसें

4 – 5 वर्ष

…..वही…..
…..वही…..

4.

संकर नस्ल के बछड़ा प्रजनन

5 – 6 वर्ष

…..वही…..

30 माह

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अच्छी नस्ल के दुधारू पशुओं हेतु वित्तपोषण योजना:-

उद्देश्य:-

जन्म से चार माह तक के स्वस्थ मादा बछड़ों के पालन हेतु ।

पात्रता:-

पशुओं को रखने वाले/प्रगतिशील किसान जो दुग्ध उत्पादन के लिए गाय अथवा पहली बछड़ी के प्रजनन के बाद बिक्री का काम करते हो तथा उनके पास चारा उगाने का पर्याप्त स्थान हो ।

ऋण सीमा:-

ऋण की राशि उधार्रकत्ता के पास रखे जाने वाले दुधारू पशुओं का पालन करने की संख्या पर निर्भर करेगी ।

ऋण की चुकौती:-

पहली बार ब्याहने के बाद यदि मादा बछड़े को दूध उत्पादन की अवस्था तक रखा जाता है तो ऋण तथा ब्याज को अधिकतम 4 वर्षों में वसूल किया जायेगा । प्रथम किश्त प्रथम बार प्रजनन के बाद प्रारम्भ होगी । यदि मादा बछड़े को जन्मते ही बेच दिया जाता है तो मूल तथा ब्याज को बिक्री के बाद एकमुश्त वसूल किया जायेगा। तदनुसार पहले मामले में अधिकतम चुकौती अवधि 5 – 6 वर्ष होगी जबकि बाद के मामले में 2 वर्ष 6 महीने होगी ।

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पशुपालन से सम्बध्द अन्य नवीन कार्यकलापों के लिए वित्तपोषण:-

उद्देश्य:-

कृत्रिम गर्भाधान द्वारा मवेशियों का प्रजनन, समय के साथ दूध की मात्रा कम हो जाने से गायों को पुन: प्रजनन हेतु खरीदना/बेचना, दूध उत्पादन सुविधाओं के लिए वित्तपोषण, गाँव के दूध को को ऑपरेटिव सोसायटी द्वारा दूध गृहों का निर्माण, चरागाह खरीद के विकास इत्यादि के लिए वित्तपोषण ।

ऋण सीमा:-

आवश्यकता आधारित ।

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डेयरी विकास कार्ड योजना (चुने हुए राज्यों में लागू):-

उद्देश्य:-

अच्छी नसल के दुधारू पशुओं की खरीद के लिए, पशुओं के रहने के लिए छज्जों के निर्माण, कार्यशील पूंजी मदों की खरीद जैसे कि डेयरी फीड, पशु चिकित्सा औषधियाँ, चारा, डेयरी उपकरण या अन्य उपकरणों की खरीद।

पात्रता:-

भूमि रहित कृषि श्रमिक या किसान / कोई भी व्यक्ति जिसे दुधारू पशुओं को रखने का अनुभव हो ।

मार्जिन:-

शून्य

कार्ड का टाईप:-

पीएनबी डेयरी विकास कार्ड ।

कार्ड की वैधता:-

5 वर्ष

ऋण सीमा:-

100,000/- रुपये

ऋण सीमा का निर्धारण

(i) उत्पादन ऋण:- कुल सीमा का 25%
(ii) निवेश ऋण:- ऋण सीमा का न्यूनतम 75%
ऋण का वितरण:- किसान की ज़रूरत के अनुसार ऋण का वितरण विभिन्न चरणों में किया जाएगा । ऋण सुविधा कार्ड जारी करने वाली शाखा से प्राप्त की जाएगी।

ऋण का पुनर्भुगतान:-

निवेश ऋण 5 वर्षों में चुकाया जायेगा । निवेश ऋण को वार्षिक आधार पर संमिश्र नकद ऋण सीमा को कम करते हुए 5 वर्षों में चुकाया जायेगा । खाते में किश्तें मासिक/तिमाही आधार पर चुकाई जायेंगी ।

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नई भैंस खरीदना / मौजूदा भैंस को बदलना——–

उद्देश्य:-

आवेदकों को नई भैंसों की खरीद मौजूदा भैंसों को बदलकर नई भैंस खरीदने की अनुमति है बशर्ते खाते का संचालन पिछले एक वर्ष में संतोषजनक हो । यह सुविधा तीसरे वर्ष तक दी जाएगी ।

कार्यक्षेत्र:-

प्रारम्भिक रूप में यह योजना पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, गुजरात तथा महाराष्ट्र में लागू है।

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मत्स्य विकास वित्तपोषण हेतु योजना:-

स्वदेशी मछली विकास तथा खारा पानी मछली तथा झींगा मछली विकास वित्तपोषण हेतु योजना

उद्देश्य :

ताल/कुण्डों के निर्माण/नवीकरण के लिए, जलद्वार (स्लूस) निर्माण, झींगा मछली की खरीद, फ्राई एवं फिंगर लिंग्स/फिश सीड/झींगा मछली के बीज, ऑयल केक, फर्टीलाइजर्स, आर्गेनिक उर्वरक तथा अन्य भोज्य सामग्री की खरीद प्रथम हार्वेस्ट तक, जालों, बक्सों तथा बास्केट, रस्सियों, बेलचे, हुक तथा अन्य सहायक चीज़ों इत्यादि के लिए वित्तीय सहायता देना।

पात्रता :

किसानों, व्यक्तियों, सहकारी सोसायटियों, कंपनियों, व्यक्तियों के समूह जिनके पास इस योजना के अंतर्गत पर्याप्त अनुभव भी है और आवश्यक आधारभूत सुविधाएं भी।
ऋण सीमा:- आवश्यकता आधारित।
ऋण चुकौती:- निम्नानुसार निर्धारित अवधि में ऋण की चुकौती की जाएगी :
तालाब मछली कल्चर:- प्रारम्भिक अवधि सहित 5 – 8 वर्ष । चुकौती वार्षिक अंतराल पर ।
खारा पानी फिश/झींगा कल्चर:- प्रारम्भिक अवधि सहित 5-10 वर्ष। भुगतान छमाही अंतराल पर।

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मेरीन मछली पालन वित्तपोषण योजना:-

उद्देश्य:-

मशीनीकृत/गैर मशीनीकृत नावों/गहरे समुद्र में मछली पकड़ने हेतु जलपोत (डीप-सी फिशिंग), ट्रावलर्स, जालों की खरीद – ट्रैवल नैट/पर्स-सियन/ग्रिल नेट, अन्य डैक उपकरणों की खरीद जैसे कि ट्रैवल विंच, वायर रोप, गैलोस, नैट हैण्डलर, नेवीगैशनल लाइट्स, लाईफ जैकेट, पाईप बोट, एकर्स,डायरेक्शन फाइडर्स, फिश फाईर्नड इत्यादि की खरीद, मेरिन इंजन इत्यादि की खरीद हेतु ।

पात्रता:-

व्यक्तियों/साझेदार फर्मों, कोऑपरेटिव सोसायटीज, लिमिटेड कंपनियों, जो तकनीकी रूप से सक्षम हैं तथा इस प्रकार के कार्यों का पर्याप्त अनुभव है ।

ऋण सीमा:-

इसकी राशि प्रोजैक्ट रिपोर्ट में प्रस्तुत अपेक्षानुसार होगी ।

ऋण की चुकौती :-

मध्यम अवधि के ऋण:-

गैर-मशीनीकृत नाव/जलपोत:- 6-7 वर्ष
मशीनीकृत नाव :- 8 – 12 वर्ष
नकदी ऋण सीमा:- कार्यशील पूंजी के लिए नकद ऋण सीमा प्रत्येक वर्ष नवीकृत की जाएगी ।

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भेड़-बकरी पालन हेतु वित्तपोषण योजना:-

उद्देश्य:-

अच्छी नस्ल की भेड़/बकरी के प्रजनन के लिए खरीद, पालन-पोषण, ऊन, मांस तथा दूध उत्पादन के लिए, भेड़/बकरी के लिए छज्जों का निर्माण, यदि आवश्यक माना जाये तो उपकरणों/उपस्करों की खरीद हेतु तथा उनके लिए चारे हेतु ।

पात्रता:-

छोटे एवं सीमांत किसान तथा कृषि मजदूर जो भेड़/बकरी पालन को सहायक कार्य के रूप में करने के इच्छुक हैं अथवा अन्य प्रशिक्षित व्यक्ति जो व्यावसायिक स्तर पर इस कार्य को करने के लिए इच्छुक हों, पात्र है।

ऋण सीमा:-

आवश्यकता आधारित ।

ऋण चुकौती:-

मीयादी ऋण

कार्य प्रारम्भिक अवधि सहित न्यूनतम तथा अधिकतम चुकौती अवधि भुगतान का तरीका
(किश्तें)
भेड़ पालन 5 – 6 वर्ष
तिमाही/छमाही/वार्षिक

बकरी पालन 5 – 6 वर्ष तिमाही/छमाही/वार्षिक

कार्यशील पूँजी:-

अग्रिम की तारीख से 1.5वर्ष की अवधि में कार्यशील पूंजी की अदायगी की जायेगी । यदि नकद ऋण सीमा दी जाती है तो सुविधाओं का नवीकरण प्रत्येक वर्ष होगा ।

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सूअर विकास हेतु वित्तपोषण योजना—–

उद्देश्य:-

अच्छी नसल के सूअरों के प्रजनन के लिए अथवा सूअरों के पालन पोषण के लिए ।

पात्रता:-

किसान / कृषीय मजदूर तथा वे व्यक्ति जो सूअर पालन को सहायक कार्यकलाप के रूप में करने के इच्छुक हैं तथा वे जो इस प्रकार के कार्यों को मुख्य व्यवसाय के रूप में करना चाहते हैं ।

ऋण सीमा:-

आवश्यकता आधारित ।

ऋण की चुकौती:-

उत्पादन ऋण:-

कार्यशील पूंजी ऋण अग्रिम की तारीख से 18 महीनों की अधिकतम अवधि में चुकाया जाये ।
निवेश ऋण:-

मध्यम मीयादी ऋण छमाही किश्तों में 5 – 6 वर्षों की अवधि में, प्रारम्भिक तैयारी अवधि को शामिल करते हुए चुकाया जाये

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गाड़ी एवं भार ढोने वाले पशुओं की खरीद हेतु वित्तपोषण योजना:-

उद्देश्य:-

भार ढोने वाले पशुओं, कृषि परिवहन, पशु गाड़ी की खरीद के लिए ऋण दिया जाता है ।
पात्रता:- 2 एकड़ भूमि रखने वाले किसान या 2 एकड़ भूमि पर खेती करने का परम्परागत अधिकार रखने वाले किसान ।
”भूमिहीन खेतीहर मज़दूर” की श्रेणी से सम्बध्द व्यक्तियों को भी रोज़गार प्रदान करने के लिए गाड़ी एवं भार ढ़ोने वाले पशुओं की खरीद के लिए वित्तपोषित किया जाता है ।

ऋण सीमा :-

आवश्यकता आधारित।

ऋण की चुकौती :-

चुकौती अवधि मासिक/तिमाही/छमाही अंतरालों पर निम्नानुसार है।
सृजित सम्पत्ति सृजित सम्पत्ति
केवल बैल
4 वर्ष

भैंसा तथा झोटा बग्गी
4 – 5 वर्ष

केवल ऊँट 5 वर्ष

बैल गाड़ी तथा छकड़ा
5 – 7 वर्ष

पशु द्वारा खींची जाने वाली गाड़ी
5 – 7 वर्ष

ऊँट एवं छकड़ा गाड़ी

5 – 7 वर्ष

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मधुमक्खी पालन वित्तपोषण योजना:-

उद्देश्य :-

निम्नलिखित कार्यों के लिए वित्तीय सहायता दी जाती है ।

निश्चित लागत:-

जैसे कि शहद के छत्तों के निर्माण के लिए, कोलोनीज की खरीद, मधुमक्खी रखने के लिए बक्सों तथा उपकरणों की खरीद, शहद निकालने के लिए स्मोकर्स तथा बीवेल, बी नाइफ, हाईव टूल, क्वीन गेट, फीडर, सोलरवैक्स, एक्सट्रक्टर, शहद रखने के लिए प्लास्टिक ड्रम्स, रबड़ दस्ताने इत्यादि।
आवर्ती मूल्यों के रूप में : जैसे कि फाउन्डेशन शीट, शुगर, औषधियां, दस्ताने इत्यादि।

पात्रता:-

छोटे तथा सीमान्त किसान/मजदूर(कृषि), मधुमक्खी पालन में प्रशिक्षित व्यक्ति/समूह/कम्पनी, जिन्हें मधुमक्खी पालन का पर्याप्त अनुभव है तथा जो व्यावसायिक आधार पर मधुमक्खी पालन के इच्छुक हैं ।
ऋण की सीमा तथा प्रकृति : आवश्यकता-आधारित मीयादी ऋण । प्रारम्भिक आवर्ती लागतों के लिए प्रावधान केवल मीयादी ऋण के भाग के रूप में रहेगा ।

चुकौती:- प्रारम्भिक अवधि सहित अधिकतम 5 वर्षों में ।

अभी केंद्र सरकार द्वारा कृषि कल्याण अभियान योजना चलाई जा रही है जो की 15 अगस्त 2018 तक चलेगी ,ईसमे देश के प्रत्येक पंचायत येवम प्रखण्ड अस्तर पर पशुपालको येवम किसानो के बीच संबन्धित विभाग के द्वारा समबाद स्थापित कियाजारहा है । वर्तमान में सरकार के सभी चालु कार्यक्रमों एवं प्रयासों का एक मात्र लक्ष्य है किसान भाइयों की आमदनी को 2022 तक दोगुना करना और इसके लिए समिति की रिपोर्ट के अनुसार जो भी कदम उठाना है, सरकार उसके लिए कृतसंकल्प है। इसी रास्ते पर आगे बढ़ते हुए हमें पूरा पूरा विश्वास है कि आजाद भारत में खुशहाल किसान के लक्ष्य को पाया जा सकता है।

NB—सरकार की और भी ढेर सारी पशुपालन से संबन्धित योजनाए है जैसे की e pashuhat, pashubazar, INAPH, SINGLE WINDOW SYSTEM,KISHAN PORTAL, PM KAUSAL VIKASH,GOKUL MISSION etc.जिसका जिक्र ईस लेख मे नहीं हो पाया

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About the author

Rajesh Kumar Singh

I am a Veterinary Doctor presently working as vet officer in Jharkhand gov.
, graduated in 2000, from Veterinary College-BHUBANESWAR. Since October-2000 to 20O6 I have worked for Poultry Industry of India. During my job period, I have worked for, VENKYS Group, SAGUNA Group Coimbatore & JAPFA Group.
I work as a freelance consultant for integrated poultry, dairy, sheep n goat farms ... I prepare project reports also for bank loan purpose.
JAMSHEDPUR, JHARKHAND, INDIA
Email - rajeshsinghvet@gmail.com
Mob- 9431309542