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किनोवा की उन्नत खेती- कॉलेस्ट्रॉल व शुगर को रखेगा काबू में

किनोवा की उन्नत खेती
Written by bheru lal gaderi

सौ हेक्टेयर क्षेत्र में की गई बुवाई

चित्तौड़गढ़– कॉलेस्ट्रॉल, मधुमेह, गाल ब्लेडर सहित कई बीमारियों के उपयोग में आने वाले किनवा की खेती अब जिले में भी शुरू हो गई है। जिले में करीब सौ हेक्टेयर क्षेत्र में किनोवा की बुवाई की गई है और अब फसल पकने के कगार पर हैं। कृषि विभाग के सहायक निदेशक डॉक्टर शंकरलाल जाट का कहना है कि प्रदेश में सबसे पहले चित्तौड़गढ़ जिले में किनवा की बुवाई का प्रयोग वर्ष 2016 में शुरू किया गया था।

किनोवा की उन्नत खेती

Image credit- wikiagri.fr

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निम्बाहेड़ा व भदेसर में लहलहा रही है फसल 

किनोवा की बुवाई भदेसर व निम्बाहेड़ा क्षेत्र में लगभग 100 हेक्टेयर क्षेत्र में की गई है। इसका उपयोग वसा व कॉलेस्ट्रॉल व वजन कम करने में फायदेमंद है और यह गाल रोग में उपयोग में लिया जाता है। पौधा मुख्य रूप से हरा रहता है लेकिन परिपक्वता के समय पौधा गुलाबी हो जाता है। किनोवा मुख्यतः रबी की फसल हैं। यह चिनोपोडियम कुल की फसल हैं। इसका वानस्पतिक नाम चिनोपोडियम किनोवा हैं।

भूमि की तैयारी

किनोवा के लिए हल्की रेतीली दोमट भूमि उपयुक्त रहती है। भूमि का पी.एच. मान 5.0 से 9.0 तक अच्छा रहता है। खेत की दो से तीन बार जुताई  करके छोटे आकार की समतल क्यारिया बनाकर खेत तैयार किया जाता है।

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बीज की मात्रा

किनोवा की फसल के लिए 5 से 8 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहता है। बुवाई से पहले बीजों को एप्रोन 35 एस.डी. नामक दवा 5 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचारित कर 50 /25/ 12.5 सेमी की दूरी पर कतारों में बुवाई की जाती है।

खाद एवं उर्वरक

बुवाई से पहले खेत में 10 टन प्रति हेक्टेयर सड़े हुए गोबर की खाद दी जाती है। इसमें रासायनिक उर्वरकों की जरूरत नहीं पड़ती है।

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सिंचाई

किनोवा की फसल में कुल दो से तीन सिंचाई की आवश्यकता होती है। प्रथम सिंचाई बुवाई के तुरंत बाद धीमी गति से दूसरी व तीसरी सिंचाई क्रमशः 30 व 70 दिन बाद की जाती है।

निराई-गुड़ाई

पहली निराई- गुड़ाई के 30 दिन बाद वह दूसरी बुवाई के 50 दिन बाद श्रेष्ठ है।

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कीट एवं रोग

इस फसल में कीट और बीमारियों का प्रकोप नहीं रहता है। मुख्यता इसमें स्टेट बोरर, एफिड्स, लिप हूपर आदि का प्रकोप रहता है।

फसल पकना

फसल पकने में 90 से 100 दिन लगते हैं। कटाई के दिन मौसम शुष्क होना चाहिए और पौधों को साफ खलिहान पर 7 से 8 दिन सुखाने के बाद ही गहाई की जाती है। किनोवा कम पानी चाहने वाली फसल है। दो, से तीन सिंचाई में पक जाती है। खास बात यह भी है कि इस फसल को रोजड़े एवं अन्य पशु नहीं खाते। ज्यादा खाद और उर्वरक की जरूरत नहीं पड़ती। कीट व बीमारियों का प्रकोप कम होने से कीटनाशकों का खर्चा बचता है। बाजार में किनोवा 8000 से ₹10000 प्रति क्विंटल बिकती है, अतः लगभग डेढ़ से दो लाख प्रति हेक्टेयर आय प्राप्त होती है। इससे किसान की आर्थिक स्तर में सुधार होता है।

उपज

इससे 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन प्राप्त हो सकता है।

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किनोवा उत्पादकों की हैं मांग

इस उत्पाद को बेचने के लिए राजस्थान में भी कोई मंडी नहीं हैं। उत्पादक किसानों की मांग है कि जिले में इसकी खरीद केंद्र खोला जाए ताकि किसान की आय प्राप्त कर सकें। खुलने पर किनोवा की खेती का क्षेत्र बढ़ने की संभावना है।

सफल रही है खेती

चित्तौड़गढ़ जिले में किनोवा की खेती सफल रही है इसके आशाजनक परिणाम सामने आए हैं।

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स्त्रोत

डॉक्टर शंकरलाल जाट सहायक निदेशक कृषि विस्तार, चित्तौड़गढ़

सभार

राजस्थान पत्रिका न्यूज़

rajasthanpatrika.com

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