कालमेघ की वैज्ञानिक खेती एवं औषधीय महत्व

By | 2017-04-27

 

कालमेघ आयुर्वेदिक एवं होम्योपैथिक चिकित्सा में प्रयोग किया जाने वाला पादप हैं। इस पौधे के सभी भागो का प्रयोग ओषधि के रूप में किया जाता हैं। यह वनों में जंगली पौधे के रूप में पाया जाता हैं। कुछ वर्षों से इसके औषधीय उपयोगिता को देखते हुए इस पर कई प्रकार के शोध कार्य किये जा रहे हैं तथा इसकी कृषि तकनीक विकसित की गई हैं और इसकी खेती को प्रचलन में लाया गया हैं। कालमेघ की खेती उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, केरल, असम, जम्मू, तमिलनाडु एवं उड़ीसा में की जा रही हैं।

कालमेघ का औषधीय उपयोग

कालमेघ

इसके सम्पूर्ण पौधे को यकृत विकार, हेपेटाइटिस, पेचिस, कब्ज, लिवर, तीव्र ज्वर, आदि बिमारियों को ठीक करने के लिए औषधीय एवं होम्योपैथिक चिकित्सा में दवाई के रूप में प्रयोग में लाया जा रहा हैं।

जलवायु

इसके लिए गर्म एवं नाम जलवायु तथा पर्याप्त प्रकाश की आवश्यकता होती हैं मानसून आने के बाद इसकी वृद्धि अच्छी होती हैं। सितम्बर के मध्य जब तापमान न ज्यादा गर्म व न ज्यादा ठंडा हो, फूल बनना शुरू हो जाते हैं। दिसंबर के मध्य में फलियाँ बनने लगती हैं।

मृदा

इसके अच्छे विकास के लिए अच्छी उर्वरा शक्ति वाली मिट्टी एवं जिसकी जल धारण क्षमता अच्छी हो वह उपयुक्त होती हैं। भूमि में जल निकास की व्यवस्था अच्छी होनी चाहियें। बलुई दोमट से दोमट मिट्टी में कालमेघ की खेती अच्छे उत्पादन के साथ की जा सकती हैं।

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प्रवर्धन

कालमेघ का फैलाव विशेष परिस्थितियों में पौधों की गाठों एवं लेयरिंग द्वारा कर सकते हैं। बीज से बुवाई के लिए मई के तीसरे सप्ताह में एक हेक्टेयर कालमेघ लगाने के लिए 300-400 ग्राम बीज 10 मीटर लम्बी तथा 2 मीटर चौड़ी तीन क्यारियों में बोते हैं। इसके बीज का अंकुरण 70-80% तक होता हैं। नर्सरी बनाने के लिए किसी छाया दार स्थान का चुनाव करना चाहियें। अच्छे जमाव के लिए मल्चिंग का प्रयोग भी करते हैं।  सुखी घास, पुआल तथा पेपर आदि का प्रयोग अच्छा रहता हैं। खेत में सीधी बुवाई करने पर 2-2.5  किलो बीज की आवश्यकता होती हैं।

भूमि की तैयारी

पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 1-2 जुताई देशी हल या हैरो से करनी चाहिए एवं पाटा लगाना चाहियें जिससे खेत समतल हो जाता हैं।

पौधा रोपण

खेत में क्यारियां बनाकर जून के दूसरे सप्ताह से जुलाई के अंतिम सप्ताह तक (एक महीने का पौधा) पौध रोपण कर देना चाहियें। पंक्ति से पंक्ति की दुरी 30-60 सेमी. एवं पौधे से पौधे की दुरी 15-45 सेमी. रखनी चाहियें।

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प्रजातियाँ

“सिम मेघा” कालमेघ की अधिक उत्पादन देने वाली प्रजाति हैं।

खाद एवं उर्वरक

10-15 टन गोबर की अच्छी पकी हुई गोबर की खाद या 5 टन वर्मीकम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर का प्रयोग खेत की तैयारी के साथ करना चाहियें। अच्छी उपज के लिए नत्रजन की 80 किलो, फॉस्फोरस की 40 किलो एवं पोटाश की 30 किलो मात्रा पर्याप्त हैं। फॉस्फोरस एवं पोटाश का प्रयोग रोपाई से पहले खेत की तैयारी के समय किया जाना चाहियें। नत्रजन की मात्रा 2 भागों में विभाजित करके 30-45 दिन के अंतराल में प्रयोग करना चाहियें।

निराई- गुड़ाई

फसल की अच्छी पैदावार के लिए निराई- गुड़ाई कारण आवश्यक होता हैं। पौधे की अच्छी वृद्धि के लिए 1-2 निराई- गुड़ाई की आवश्यकता होती हैं।

सिंचाई

रोपाई के तुरंत बाद सिंचाई करनी चाहिए। कालमेघ वर्षा ऋतू की फसल हैं, इसलिए ज्यादा सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती हैं, लेकिन वर्षा न होने या वर्षा के पहले 2-3 सिंचाई की आवश्यकता होती हैं।

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कीट एवं बीमारियाँ

इस फसल पर आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचाने वाले कीटों एवं बिमारियों का प्रकोप नहीं देखा जाता हैं।

कटाई

10-100 दिन के बाद शाक उपज प्राप्त करने हेतु पौधे की कटाई जब पत्तियाँ गिरना प्रारंभ हो तब कर लेनी चाहियें। कटाई किये गए शाक को छाया में सुखाना चाहियें।

उपज

उपरोक्त सभी क्रियाओं को समय पर सम्पन करके 3.5-4 टन शुष्क शाक प्राप्त की जा सकती हैं।

फसल चक्र

अगेती मक्का- कालमेघ- गेहूँ

सब्जी- कालमेघ- गेहूँ

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भण्डारण एवं प्रसंस्करण

सक्रिय अवयव सम्पूर्ण पौधे में पाए जाते हैं। इसलिए सम्पूर्ण पौधे के ऊपरी भाग को काटकर छाया में सुखाना चाहियें। सुखाने के लिए शाक को बड़ा ढेर लगाकर नहीं रखना चाहियें। शाक को पतली परत में फैला देना चाहियें एवं समय के अनुसार पलटते रहना चाहियें। सूखे हुए पौधे को पीसकर चूर्ण बना लेते हैं। चूर्ण बनाने से पूर्व शाक को नमी रहित, शुष्क तथा हवादार स्थान पर रखना चाहियें। कालमेघ के चूर्ण को टिन के शुष्क डिब्बों में भंडारित करना चाहियें।

आय-व्यय

आय और व्यय का विवरण प्रति हेक्टेयर की दर से हैं।

  • कृषि कार्यों में व्यय- रु. 1200
  • आय प्रति हेक्टेयर 3.6 टन शुष्क शाकीय पैदावार (10 हजार रूपये प्रति टन)- रु. 36000
  • शुद्ध लाभ प्रति हेक्टेयर – 23500

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ध्यान रखने हेतु महत्वपूर्ण बातें

  • भूमि का चुनाव भूमि की जल धारण क्षमता एवं जल निकास प्रबंधन को देखकर करना चाहियें।
  • फसल में प्रयोग की जाने वाली गोबर की खाद पकी हुई कीड़ों एवं खरपतवार बीजों से मुक्त होनी चाहियें।
  • फसल में खरपतवारों की वृद्धि को रोकने के लिए समय पर निराई- गुड़ाई करनी चाहियें। जिससे फसल का विकास अच्छा हो सके।
  • सिंचाई के दौरान निश्चित करें की खेत में अधिक मात्रा में पानी नहीं देना चहिये।
  • नर्सरी बनाने हेतु क्यारियां 5-6 इंच ऊपर उठा कर बनना चाहियें जिससे क्यारियों में जल भराव न हो।
  • बीजों का अंकुरण ठीक प्रकार से हो इसलिए मल्चिंग का प्रयोग करना चाहियें, मल्चिंग में प्रयोग किये जाने वाले पदार्थ संक्रमण रहित होने चाहियें।
  • फूल निकलते समय कालमेघ की पत्तियों में एन्ड्रोग्रेफेलाइट तत्व अधिक मात्रा में होता हैं तथा यह पौधे के सभी भागों में पाया जाता हैं, इसलिए पौधे के संपूर्ण भाग को काटकर छाया में सुखाना चाहियें।

उपरोक्त बताई गई सभी कृषि तकनीक को अपनाकर आयुर्वेद, होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति में बढ़ रही मांग को पूरा किया जा सकता हैं, तथा इसके साथ ही अच्छी आय प्राप्त की जा सकती हैं।

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