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कहावतों से समझे खेती किसानी की कहानी

कहावतों से समझे खेती किसानी
Written by bheru lal gaderi

कहावतों से समझे खेती किसानी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था – “भारत की आत्मा गांवों में निवास करती है” दिल्ली भारत नहीं है, बल्कि भारत के असली दर्शन देश की संस्कृति में होते है। यहाँ का लोकजीवन खेती पर आधारित है। अच्छी फसल ही उसका सौभाग्य है और फसल नष्ट होना मृत्यु समान है। इसलिए वह सदैव अच्छी फसल की कामना करता है।

कहावतों से समझे खेती किसानी

इस बारे में लोक का अनुभव ही उसकी ज्ञान सम्पदा है। अनुभवी लोग इस बारे में जो कहते आए है वह “कहावत” के रूप में मान्य है। कहावतें ग्राम्य-कथन या ग्राम साहित्य नहीं है। ये लोक जीवन का निति शास्त्र है। संसार के निति साहित्य का विशिष्ट अध्याय है। विश्व- वा ड्ज गम्य में जिन सूत्रों को प्रेरक, अनुकरणीय तथा उदाहरणीय माना गया है, उनका सर तत्व प्रकारान्तर से इनमे मिलता है। कुछ सूत्र स्थानीय या आंचलिक वैशिष्ट्य पर प्रकाश डालते है। कहावते जनमानस के लिए अलोक स्तम्भ है। इनके प्रकश में हम जीवन के कठिन क्षणों में, लोकानुभव से मार्गदर्शन प्राप्त कर सफलता का मार्ग ढूंढते है। वह चिंगारी है, जिसमे अन्ततः ऊष्मा है जो जनमानस को गति, मति और शक्ति प्रदान करती है।

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कहावतें नदी के अनगढ़ शिलाखण्डों की तरह है जो युग-युगान्तर कल के प्रवाह में थपेड़े खा-खाकर शालिग्राम बन जाते है तथा शिवत्व को प्राप्त करते है। इन कहावतों में सबकी पालनकार खेती को आजीविका का सर्व श्रेष्ट साधन माना गया है। खेती-किसानी करने वाले दत्तचित होकर खूब मेहनत करने की सलाह दी जाती है। आलस्य न होना उनका प्रमुख धर्म मन गया है। कहावतों में पशुओं के लक्षण तथा रखरखाव पर भी विचार किया गया है। इन सबका विचार कहावतों में व्यापक रूप से हुआ है।

इन कहावतों में विविधता है तथा रोचकता भी। लोग उन्हें चटखारे लेकर पढ़ते सुनते और सुनाते है। जैसे :-

ठाण्डी खेती, गाभिन गाय                                                         

तब जानौं, जब मौं में गाय

खेत में खड़ी फसल और गाभिन गाय का सुख तभी जानिए, जब उनका परिणाम सामने आ जाए। खेत का अन्न और गाय का दूध मुहं में जाने पर ही सुख मनाना चाहिए। इसके पूर्व इनको देखने भर का ही सुख है।

अक्का कोदों नीम बन, अम्मा मौरे धान।

राय करोंदा जूनरी, उपजै अमित प्रमान।।

जिस वर्ष अकौआ, कोड़ों, नीम, कपास और आम अधिक फुले उस वर्ष धन राय करोंदा तथा ज्वर अधिक मात्रा में पैदा होते है।

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आलू बोबै अंधेरे पाख खेत में डारे कुरा रख।

समय-समय पै करे सिंचाई, तब आलू उपजे मन भाई।।

आलू कृष्ण पक्ष में बोना चाहिए, खेत में कूड़ा, राख की खाद डालकर सिंचाई करनी चाहिए तब आलू भारी मात्रा में पैदा होते है।

खेती उत्तम काज है, इहि सम और होय।

खाबें कों सबकों मिलै, खेती कीजे सोय।।

कृषि उत्तम कार्य है, इसके बराबर और कोई कार्य नहीं है यह सबको भोजन देती है, इसलिए खेती करनी चाहिए।

एक हर हत्या दो हर काज।

तीन हर खेती चार हर राज।।

एक हल की खेती करना अनार्थिक होता है, दो हल की खेती से काम चलाया जा सकता है, तीन हल की खेती से किसानी का सुख मिलता है और चार हल से की खेती करने वाला राजसी वैभव से रह सकता है। इसी बात को (खेती की अधिकता के सुख को) एक अन्य लोकोक्ति में इस प्रकार कहा गया है।

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दस हल राव, आठ हल राना।

चार हलों का, बड़ा किसान।।

खेती धन कौ नास, धनि होवै पास।

खेती धन की आस, धनि जो होव पास।।

खेती से धन की आशा तभी करनी चाहिए जब कृषि कार्य करने वाला स्वामी(धनि) पास में रहे अर्थात स्वयं करे। यदि धनि पास में नहीं रहता है तो खेती से प्राप्त धन नष्ट हो जाता है। साथ में लागत भी नष्ट हो जाती है।

असाड़ साउन करी गमतरी, कार्तिक खाए, पुआ।

मांय बहिनिया पूछने लगे, कार्तिक कित्ता हुआ।

आषाढ़ व सावन माह में जो गांव-गांव में घूमते रहे तथा कार्तिक में पुआ खाते रहे (मौज उड़ाते रहे) वह माँ, बहिनों से पूछते हैं की कार्तिक की फसल में कितना (अनाज) पैदा हुआ। अर्थात जो खेती में व्यक्तिगत रूचि नहीं लेते हैं उन्हें कुछ प्राप्त नहीं होता।

उत्तम खेती आप सेती, मध्यम खेती भाई सेती।

निक्कट खेती नौकर सेती, बिगड़ गई तो बलाय सेती।

उत्तम खेती वह हैं जो स्वयं की जाए (स्वयं द्वारा सेवित हो)। मध्यम खेती वह जो भाई देखे। निकृष्ट खेती वह जो नौकर देखे। जो बला की तरह की जाए, वह खेती बिलकुल बिगड़ जाती हैं।

नित्तई खेती दूजै गाय, जो ना देखे उकी जाय।

खेती करे रात घर सोवे, काटे चोर मुंड धर रोवै।

नित्य खेती और गाय को जो स्वयं नहीं देखते हैं, उसकी (खेती या गाय) चली जाती हैं। जो खेती करके रात्रि को घर पर सोते हैं, उनकी खेती चोर काट ले जाते हैं और वह सर पटककर रोते हैं अर्थात कृषि कार्य और गौ सेवा स्वयं करनी चाहिए, दुसरो के भरोसे नहीं।

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डॉ. लोकेश कुमार चंदेल

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