agriculture

करौंदा की खेती: आम के आम गुठली के दाम

करौंदा की खेती: आम के आम गुठली के दाम
Written by bheru lal gaderi

करौंदा का पौधा कांटेदार झाड़ीनुमा एवं सदाबहार होता है। जो प्रायः 3 से 4 मीटर ऊंचाई तक बढ़ता है। इसको खेत के चारो और जंगली एवं पालतू पशुओं से सुरक्षा के लिए जीवंत  बाद के रूप में लगाया जाता है। बाढ़ के साथ-साथ पौधों से प्राप्त फलों द्वारा अतिरिक्त आय प्राप्त होती है। करोंदा के कच्चे फलों का उपयोग सब्जी, चटनी, अचार के लिए उपयोग किया जाता है। पक्के फलों द्वारा जेली, मुरब्बा व स्क्वैस जैसे परीरक्षित पदार्थ बनाए जाते हैं। इसका पेड़ होने के कारण पहाड़ी क्षेत्रों में मृदा एवं जल संरक्षण में सहायक हैं। विटामिन सी एवं लौह तत्व का अच्छा स्त्रोत है। इसका उपयोग मिठाई एवं पेस्ट्री को सजाने के लिए रंगीन चेरी की जगह भी उपयोग किया जाता है।

करौंदा की खेती: आम के आम गुठली के दाम

जलवायु एवं मृदा

करोंदा को सभी प्रकार की मृदा में आसानी से उगाया जा सकता है उष्ण एवं उपोष्ण जलवायु वाले क्षेत्र में इसकी खेती उपयुक्त रहती है। करौंदा की खेती संपूर्ण राजस्थान में संभव है। जिन क्षेत्रों में पाले का प्रकोप अधिक होता है वहां प्रारंभिक बढ़वार की अवस्था में प्रयोग करौंदे के पौधों को नुकसान की आशंका बनी रहती है। अधिक लवणीय एवं क्षारीय मृदा करौंदे की खेती के लिए उपयुक्त नहीं रहती है। करौंदा का पौधा एक बार लगने के बाद इसकी विशेष देखभाल की जरूरत नहीं पड़ती है क्योंकि इसमें कीट एवं बीमारियों का प्रकोप नहीं के बराबर होता है।

You may like also – लौकी की उन्नत खेती एवं फसल सुरक्षा उपाय

पादप प्रवर्धन एवं रोपाई

करोंदा का प्रवर्तन प्रायः बीज द्वारा ही किया जाता है जिसमें पौधे बहुत देर से वृद्धि करते हैं। पौधे बरसात के मौसम में गुट्टी द्वारा भी तैयार किए जा सकते हैं। पूर्ण पके हुए फलों से अगस्त-सितंबर महीने में निकालकर क्यारियों एवं पॉलिथीन की थैलियों में बोना चाहिए। इसके पौधों में सुषुप्तावस्था नहीं पाई जाती है अतः पूर्ण पके हुए फलों से ताजा बीज निकाल कर बुवाई कर देनी चाहिए। तैयार किए गए पौधे एक साल बाड़ खेत में लगा सकते हैं। करोंदा की  रोपाई के लिए जुलाई-अगस्त या  फरवरी-मार्च का समय उपयुक्त हैं।

बाढ़ हेतु 4 से 5 फीट की दूरी पर करे। इसके लिए भूमि को 60 से 80 से.मी. लम्बा, चौड़ा एवं गहरा गड्ढा खोदकर उसमें 10 से 12 किलो गोबर की खाद प्रत्येक पौधे के हिसाब से अच्छी तरह मिट्टी में मिला कर गड्डे में भर दे। केवल फल के उद्देश्य से लगाए जाने वाले पौधों को 3 मीटर की दूरी पर 2x2x2 फीट के गड्ढे बनाकर 10 से 15 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद से भर दें तथा पौधों की रोपाई करें। पौधे लगाने के तुरंत बाद पर्याप्त मात्रा में सिंचाई करें।

You may like also – भिन्डी उत्पादन तकनीक एवं फसल सुरक्षा उपाय

किस्मे

रंग के आधार पर किस्मे हरी, गुलाबी, सफेद तथा लाल आदि होती है।

मनोहर पंत- इस किस्म के पौधे मध्यम ऊंचाई एवं घनी झाड़ीनुमा होते हैं।  इसके फल सफेद रंग पर गहरी गुलाब आभा लिए होते हैं।

पंत सुदर्शन-  इस किस्म के पौधे मध्यम ऊंचाई तथा फल सफेद रंग पर गुलाबी आभा लिए होते हैं।

पंत स्वर्ण- इस किस्म के पौधे अधिक ऊंचाई वाले और झाड़ीनुमा होते हैं। फल हरे रंग पर गहरी भूरी आभा लिए होते हैं।

इसके अलावा मैरून कलर, सफेद गुलाबी एवं सी.एच.इ.एस.के.-2 आदि किस्मे प्रचलित है।

You may like also :  कवकनाशी का प्रयोग फसलों में कवक जनित रोगों पर नियंत्रण

खाद एवं उर्वरक

बाड़ के लिए पौधे लगाते समय 20से 25 ग्राम यूरिया प्रति पौधा गड्ढे में लगाने से पूर्व मिलावे, जिससे अच्छी वृद्धि होती है। फल प्राप्त करने के उद्देश्य से लगाए गए पौधों में प्रथम 3 वर्षों में लगभग 10 से 15 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद के अतिरिक्त 100 ग्राम यूरिया व 300 ग्राम सुपर सिंगल सुपर फॉस्फेट प्रतिवर्ष पौधों को दे।इसके बाद लगभग 15 से 20 किलोग्राम गोबर की खाद लगभग 250 ग्राम यूरिया एवं 500 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट प्रतिवर्ष पौधों में फूल आते समय देकर पानी पिलावे। फल वाले पौधों में यूरिया की मात्रा एक साथ न देकर टुकड़ों में देना चाहिए।

सिंचाई

करौंदा में सिंचाई की आवश्यकता गर्मी के महीने में रहती है। इस समय पौधों के फूलने का समय होता है।  अतः आवश्यकतानुसार 10 से 15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें। सर्दी के दिनों में पानी की आवश्यकता नहीं होती है किंतु पाले पड़ने की संभावना के समय हल्की सिंचाई अवश्य करें जिससे पौधों को पाले के प्रभाव से बचाया जा सकता हैं।

You may like also:- अधिक उत्पादन के लिए आधुनिक कृषि पद्धतियाँ

करौंदा की काट-छांट

यदि करौंदा की बाड़ लगाना है तो इस बात का ध्यान रखें कि शुरू से ही नियमित काट-छांट करते रहे, जिससे पौधे नीचे से ज्यादा फैलकर झाड़ीनुमा बन जाए। जब बाड़ बड़ी हो जाए एवं फल आने लगे तब फरवरी से सितंबर तक कांट-छांट बिल्कुल नहीं करें।

तुराई एवं उपज

करौंदा के बीज द्वारा तैयार किए गए पौधों में फल प्रायः पौधा लगाने के 4 से 5 वर्ष के बाद शुरू होते हैं किंतु गुट्टी द्वारा तैयार पौधों में रोपाई के 2 से 3 वर्ष बाद ही फल आना शुरू हो जाता है। फलों की तुड़ाई करते समय इस बात का ध्यान रखें कि सब्जी एवं चटनी के लिए कम विकसित एवं कच्चे फलों की तुड़ाई करें। जेली बनाने के लिए अध पके फलों की तुड़ाई करें। क्योंकि इस समय पेक्टिन की मात्रा अधिक होती है जो जेली के लिए उपयुक्त रहती है। इस प्रकार बीजों के लिए पूर्ण पके फलों की तुड़ाई करें। बाड़ के लिए लगाएं विकसित पौधों से लगभग 2 से 3 किलो तथा फल के उद्देश्य से लगाए गए पौधे 6 से 8 किलो प्रति पौधा की पैदावार आसानी से मिल जाती है।

Read Also-चूहों से कैसे बचाए भंडारण में रखे हुए बीजों को

प्रस्तुति-

बहादुर सिंह, डॉ. एस. एल. मूंदड़ा एवं अनमोल चूक

विद्या भवन कृषि विज्ञान केंद्र, बड़गाव,

एवं राजस्थान कृषि महाविद्यालय, उदयपुर

Facebook Comments

About the author

bheru lal gaderi

Hello! My name is Bheru Lal Gaderi, a full time internet marketer and blogger from Chittorgarh, Rajasthan, India. Shouttermouth is my Blog here I write about Tips and Tricks,Making Money Online – SEO – Blogging and much more. Do check it out! Thanks.