करेले की उन्नत जैविक खेती मचान विधि से

By | 2017-05-16

करेला  एक कद्दूवर्गीय सब्जी है स्वाद में कड़वा होने पर भी लोग करेले को पसंद करते है। सब्जी के रूप में इसका बहुत ही उपयोग होता है।

करेले

जलवायु

करेले के लिए गर्म एवं आद्र जलवायु की आवश्यकता होती है।  करेला अधिक शीत सहन कर लेता है परन्तु पाले से हानि होती है।

भूमि

इसको विभिन्न प्रकार की भूमियों में उगाया जा सकता है किन्तु उचित जल धारण क्षमता वाली जीवांशयुक्त हलकी दोमट मिट्टी इसकी सफल खेती के लिए उत्तम मानी गई है। वैसे उदासीन पी. एच. मान वाली मृदा इसकी खेती के लिए अच्छी रहती है।

खेत की तैयारी

पहले खेत को पलेवा करें जब भूमि जुताई योग्य हो जाए तब उसकी जुताई 2 बार मिट्टी पलटने वाले हल से करें इसके बाद दो बार कल्टीवेटर चलाएँ और प्रत्येक जुताई के बाद पाटा अवश्य लगाएं।

करेले की प्रजातियाँ

पूसा 2 मौसमी, पूसा विशेष, प्रती, प्रियंका, कोनकन तारा, कोयंबटूर लॉन्ग, आर्का हरित, कल्याणपुर बारह मासी, हिसार, सेलेक्शन, सी.- 16, फैजाबादी बारह मासी, आर. एच. बी. .बी. जी. -4, के. बी. .बी. जी.-16, पूसा संकर -1, पी. आई. जी. -11।

बीज मात्रा

5-7 किलोग्राम बीज प्रति हैक्टेयर बुवाई के लिए काफी होता है।

बीज बुवाई

एक स्थान पर से 2-3 बीज 2.5-5.0 मि. की गहराई पर बोने चाहिए। बीज बोने से पहले 24 घंटे तक पानी में भिगोने चाहिए। इससे अंकुरण जल्दी होता है।

बोने का समय

इसकी बुवाई का उचित समय 15 फरवरी से 30 फरवरी (गर्मिया) तथा 15 जुलाई से 30 जुलाई (वर्षाकाल)

बुवाई विधि

करेले की बुवाई दो प्रकार से की जाती है।

1. सीधे बीज से 2. पौध रोपण विधि से

1. सीधे बीज से

इस विधि में खेत तैयार करने के बाद बीजों को सीधे खेत में बो दिया जाता है

2. पौध रोपण विधि से

इस विधि में पहले बीजों से पौध तैयार की जाती है और जब बुवाई का उचित समय आता है तो पहले से तैयार पौधों की बुवाई खेत में कर दी जाती है।

खाद एवं उर्वरक

करेले की फसल की अच्छी उपज के लिए खेत में जैविक खाद, कम्पोस्ट खाद का होना अनिवार्य है। इसके लिए गोबर की अच्छी प्रकार से सड़ी हुई 40-50 क्विंटल खाद साथ में 50 किलोग्राम नीम की खली का मिश्रण कर बुवाई पूर्व समान मात्रा में खेत में बिखेर दे।

फसल उगने के 25-30 दिन बाद नीम का काढ़ा गौमूत्र के साथ मिलाकर मिश्रण तैयार कर छिड़काव करना चाहिए। हर 15-20 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।

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सिंचाई

करेले की सिंचाई वातावरण, मिट्टी, की किस्म आदि पर निर्भर करती है। ग्रीष्म ऋतू में फसल की सिंचाई 5 दिन के अंतराल में करनी चाहिए। जबकि वर्षाकाल में सिंचाई वर्षा पर निर्भर करती है।

पौधे की देखभाल

अधिक उपज एवं फसल बेहत्तर गुणवत्ता के लिए करेले की कतई छटाई बहुत ही आवश्यक है। जैसे करेला में 3-7 गाँठ तक सभी द्धितीय शाखाओं को काट देना चाहिए।

मचान बनाना

करेले की सब्जयों में सहारा देना आती आवश्यक है। इसके लिए लोहे की एंगल या बांस की लकड़ी से मचान बनाते है। खम्भों के ऊपरी सिरों पर तार बांध कर पौधों को मचान पर चढ़ाया जाता है। सहारा देने के लिए दो खम्भों के बीच की दुरी 2 मीटर रखते है लेकिन ऊँचाई फसल के अनुसार अलग-अलग होती है करेला के लिए 4.5 फ़ीट रखते है।

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खरपतवार नियंत्रण

पौधों के बीच खरपतवार उग जाते है उन्हें उन्हें खेत से हटा देना चाहिए। रोपाई के 10-15 दिन बाद हाथ से निराई-गुड़ाई कर लेनी चाहिए। पहली गुड़ाई के बाद जड़ो के आस-पास मिट्टी चढ़ानी चाहिए।

कीट एवं रोग नियंत्रण

करेले की फसल में निम्न कीट एवं रोगों का प्रकोप होता है जिनका उचित समय पर निवारण करना आवश्यक है।

लाल भृंग कीट

पौधों पर 2 पत्तियाँ निकलने पर इस कीट का प्रकोप शुरू हो जाता है।  यह कीट पत्तियों और फलो को खा जाता है। इस कीट की सुंडी  भूमि के अंदर पौधों की जड़ो को कटती है।

रोकथाम

कम से कम 40-45 दिन पुराना गोमूत्र को ताम्बे के बरतन में रखकर  5 कोलोग्राम धतूरे की पत्तियों एवं तने के साथ उबाले। 7.5 लीटर गोमूत्र शेष रहने पर इसे ठंडा करें एवं छान ले मिश्रण तैयार कर 3 लीटर प्रति टंकी पम्प से फसल पर छिड़काव करें।

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फल मक्खी

यह मक्खी फलों में प्रवेश कर अण्डे देती है। अण्डों से बाद में सुंडी निकलती है वे फल को बेकार कर देती है।

रोकथाम

फल मक्खी की रोकथाम के लिए 40-45 दिन पुराना गोमूत्र को ताम्बे के बरतन में रखकर  5 कोलोग्राम धतूरे की पत्तियों एवं तने के साथ उबाले। 7.5 लीटर गोमूत्र शेष रहने पर इसे ठंडा करें एवं छान ले मिश्रण तैयार कर 3 लीटर प्रति टंकी पम्प से फसल पर छिड़काव करें।

सफेद ग्रब

यह करेले के पौधों को काफी नुकसान पहुँचती है। यह मिट्टी के अंदर रहती है और पौधों की जड़ों को खा जाती है जिसके कारण पौधे सुख जाते है।

रोकथाम

इसकी रोकथाम के लिए नीम की खाद का प्रयोग करें।

चूर्णी फफूंदी

यह रोग एरिसाइफी सिकोरेसिएरम नामक फफूंद के कारण होता है। पत्तियों एवं तनो पर सफेद दरदरा और गोलाकार जाल सा दिखाई देता है। पूरी पत्तियां पीली पढ़कर सुख जाती है और पौधों की बढ़वार रुक जाती है।

रोकथाम

कम से कम 40-45 दिन पुराना गोमूत्र को ताम्बे के बरतन में रखकर  5 कोलोग्राम धतूरे की पत्तियों एवं तने के साथ उबाले। 7.5 लीटर गोमूत्र शेष रहने पर इसे ठंडा करें एवं छान ले मिश्रण तैयार कर 3 लीटर प्रति टंकी पम्प से फसल पर छिड़काव करें।

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एन्थेक्नोज

यह रोग कोलेस्ट्रोट्राईकम स्पिसिज के कारण होता हें .इस रोग के कारण पत्तियों और फलों पर लाल काले धब्बे बन जाते हें ये धब्बे बाद में आपस में मिल जाते हें यह रोग बिज से फेलता है।

रोकथाम

बिज के बोने से पूर्व गोमूत्र या नीम का तेल के साथ उपचारित करना चाहियें

तुड़ाई

करेले के फलों की तुड़ाई छोटी व कोमल अवस्था में करनी चाहियें आमतोर पर फल बोने के 60- 90 दिन बाद तुड़ाई के लिए तेयार हो जाते हें फल तोड़ने का कार्य 3 दिन के अन्तराल पर करते रहे।

उपज

इसकी उपज 100-120 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक मिल जाती है।

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