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कपास में बूंद- बूंद सिंचाई पद्धति अपनायें

कपास में बूंद- बूंद सिंचाई पद्धति
Written by bheru lal gaderi

कपास में बूंद- बूंद सिंचाई पद्धति 

श्रीगंगानगर एवं हनुमानगढ़ जिले के विभिन्न फसलों में कपास खरीफ की प्रमुख फसल है। यह फसल इन जिलों के सिंचित क्षेत्रों  में लगाई जाती है। इन जिलों में अमेरिकन कपास (नरमा) तथा देशी कपास दोनों को लगभग बराबर महत्व दिया जाता है। देशी कपास की बिजाई ज्यादातर पड़त या चने की फसल के बाद की जाती है जबकि अमेरिकन कपास की बिजाई पड़त, गेहूं, सरसों, चना आदि के बाद की जाती है।

कपास के पौधों की अनियंत्रित वृद्धि, शाखाओं एवं पत्तियों के बनने, पुष्प कलिकाओं तथा कालांतर में टिण्डे बनने की क्रिया सभी एक समयबद्ध चक्र में होती रहती है। जल एवं पोषक तत्वों की कमी, तापमान की प्रतिकूलता तथा कीटों के प्रकोप से पुष्प कलिकाओं तथा टिण्डों का गिरना जारी रहता है। यदि इन कारकों पर प्रभावी नियंत्रण कर लिया जाए तो कपास की अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

कपास में बूंद- बूंद सिंचाई पद्धति

जल आवश्यकता

कपास की फसल को 7 से 9 मिलीमीटर जल की आवश्यकता होती है। सिंचित उत्तर- पश्चिमी क्षेत्र में कपास की फसल के दौरान औसतन 275 मिलीलीटर पानी वर्षा के रूप में प्राप्त हो जाता है। शेष जल की आवश्यकता सिंचाई के द्वारा पूरी की जाती है।

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सिंचाई

कपास में सिंचाईयो की संख्या वर्षा की मात्रा तथा इसके वितरण पर निर्भर करती है। साधारणतया देशी कपास में 4 से 5 तथा अमेरिकन कपास में 5 से 6 सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है। कपास गहरी जड़ वाली फसल है। इसकी जड़े 1 मीटर से भी ज्यादा गहराई तक जाती है। अतः खेत में गहरी जुताई करके खेत को अच्छी तरह से तैयार करें। पलेवा (रोणी) के समय गहरी सिंचाई करे। गहरी रोणी करने पर फसल में गर्मी (लू) सहने की क्षमता बढ़ जाती है तथा पौधे तेज गर्मी में भी कम मरते हैं। जिससे इकाई क्षेत्र में पौधों की पूरी संख्या रहती है और पैदावार अच्छी प्राप्त होती है।

सिंचाई विधि

इस क्षेत्र में कपास में सतही सिंचाई ही प्रचलित है सतही सिंचाई में क्यारों का आकार 5 मीटर लंबा तथा 0.8 से 1 मीटर चौड़ा रखा जाता है। इस क्षेत्र के ज्यादातर मृदाएं रेतीली दोमट है। अतः सतही सिंचाई से रिसाव तथा बहाव द्वारा सिंचाई जल की काफी हानि होती है। क्यारे का तल एकसार न होने के कारण जल वितरण दक्षता सतही सिंचाई से कम होती है। खेत के खाले कच्चे होने के कारण जल वहन में भी काफी पानी रिसाव द्वारा बर्बाद हो जाता है। इन सब कारको की वजह से सतही सिंचाई की दक्षता 4 से 5% ही रह पाती है। लगभग 5 से 6% पानी बेकार चला जाता है। सिंचाई जल की कमी को देखते हुए यह आवश्यक है कि इसका अधिकतम सदुपयोग किया जाये।

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बूंद- बूंद सिंचाई पद्धति

इस जल का उपयोग मंदगति से, बूंद- बूंद करके, फसल के जड़ क्षेत्र में किया जाता है। इसके लिए जिस उपकरण का उपयोग किया जाता है, उसके तीन प्रमुख भाग होते हैं पहला भाग एक पम्पिंग यूनिट है जो लगभग 2.5 किलोग्राम प्रति वर्ग सेंटीमीटर का जल डाब उत्पन्न करती है। इसका दूसरा भाग एक पाइप लाइन होता हैं जो पी.वी.सी. का बना होता है और तीसरा भाग ड्रिप लाइन तथा इस पर ड्रिपर लगे हैं जिनसे पानी पौधों के पास टपकता है। जल को कुए या डिग्गी से उठाकर पाइप लाइन के माध्यम से ड्रिपर तक निश्चित दाब पर पहुंचाया जाता है, जिससे जल बून्द-बून्द करके पौधे के पास टपकता है और भूमि द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है।

इस विधि से पौधों को जल की पूर्ति लगातार जारी रहती है जिससे पौधे की बढ़वार तथा विकास अच्छा होता है। इससे अधिक पैदावार के साथ-साथ उत्पाद की गुणवत्ता में भी वृद्धि होती है। इस विधि में जल का उपयोग वहन द्वारा, रिसाव द्वारा तथा भूमि सतह पर वाष्पन द्वारा जल हानि नहीं होती है। अतः इस विधि में सिंचाई दक्षता अत्यधिक हैं। यह विधि शुष्क क्षेत्रों के लिए अत्यंत उपयोगी है। यह विधि बाग़ों, सब्जियों तथा चौड़ी कतार वाली फसलों जैसे कपास, गन्ना आदि के लिए अत्यंत उपयोगी है।

अमेरिकन (नरमा) कपास में बूंद- बूंद सिंचाई

कृषि अनुसंधान केंद्र, श्रीगंगानगर पर संकर अमेरिकन कपास (एल.एच.एच.-144) में बूंद- बूंद सिंचाई पद्धति पर लगातार 3 वर्षों तक वन अनुसंधान कार्य किया गया। फसल विन्यास, सिंचाई नियमावली तथा उर्वरसिंचन (फर्टिगेशन) पर अलग-अलग प्रयोग किए गए। इन प्रयोगों के परिणाम आशातीत पाए गए।

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फसल वन्यास

इस प्रयोग का उद्देश्य फसल विन्यास को बदलकर कपास में बूंद- बूंद सिंचाई पद्धति के लागत कम करने का था। संकर अमेरिकन कपास (नरमा) में कतार से कतार की दूरी 67.5 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 6 सेंटीमीटर रखने की सिफारिश हैं। इस प्रयोग में नरमा की बिजाई एक एकल लाइन में जोड़े वाली लाइनों में की गई। एकल लाइन में कतार से कतार की दूरी 9 सेंटीमीटर तथा पौध से पौध के बीच की दूरी 6 सेंटीमीटर रखी गई। दोनों विन्यासों में प्रति इकाई क्षेत्र में पौधों की संख्या बराबर रहती है

जोड़े में बिजाई करने पर एकल लाइन की बजाए लगभग 1% अधिक पैदावार प्राप्त हुई है। दोनों के बीच 4 फीट की दूरी होता है होने के कारण हवा तथा प्रकाश का आवागमन अच्छा होता है। साथ ही कीटों से सुरक्षा के लिए ज्यादा ढंग से होने के कारण कीटों का प्रभावकारी नियंत्रण होता है। इसमें लेटरल की संख्या भी आधी रह  जाती है।

उर्वर सिंचन (फर्टिगेशन)

इस विधि में उर्वरकों को जल में घोलकर पौधों की आवश्यकता अनुसार सिंचाई जल के साथ कपास में बूंद- बूंद सिंचाई पद्धति के द्वारा फसल के पास पहुंचाया जाता है। इसका उद्देश्य घुलनशील उर्वरकों (यूरिया एवं म्यूरेट फ पोटाश) कितनी मात्रा में फसल को दिया जाए, यह ज्ञात करना था। संकर नरमा में 15 किलोग्राम नत्रजन, 4 किलोग्राम फास्फेट तथा 2 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की सिफारिश की गई है। यूरिया म्यूरेट ऑफ़ पोटाश घुलनशील होने के कारण उर्वर सिंचन द्वारा फसल को दिए गए। सिंगल सुपर फास्फेट की पूरी मात्रा को 4 तथा 6 बराबर भागों में क्रमशः 21 तथा 15 दिन के अंतराल पर दिया गया।

3 वर्षों के प्रयोग के परिणामों से ज्ञात हुआ कि संकर  नरमा में सिफारिश किए गए उर्वरकों (नत्रजन एवं पोटाश) को 6 बराबर भागों में 15 दिन के अंतराल पर डालने पर सबसे ज्यादा पैदावार मिली। सिफारिश किए गए उर्वरकों (यूरिया एवं म्यूरेट आफ पोटाश) को 15 दिन के अंतराल पर 6 बराबर भागों में डालने पर प्रति पौधे टिण्डों की संख्या, औसत टिण्डे का वजन तथा प्रती बीजों का वजन ज्यादा मिला। इस प्रकार उर्वर सिंचन से सत्य सतही सिचाई एवं सिफारिश किए गए उर्वरकों के प्रयोग की अपेक्षा लगभग 5% अधिक पैदावार तथा लगभग 1.5 गुनी उर्वरक उपयोग दक्षता प्राप्त हुई।

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सिंचाई नियमावली

बून्द-बून्द सिंचाई पद्धति द्वारा सिंचाई की सही मात्रा ज्ञात करने के लिए यह प्रयोग किया गया। इसमें बूंद- बूंद सिंचाई एकांतर दिन पर की गई तथा पानी की मात्रा जल आवश्यकता की 6, 8 एवं 1% दी गई। पंपिंग यूनिट पर पानी का दाब 1.5 किग्रा प्रति वर्ग सेमी रखा गया। ड्रिपर से ड्रिप की दूरी को 2 फुट रखी गई। प्रत्येक ड्रिपर से पानी रिसने की दर 4 लीटर प्रति घंटा थी। ड्रिप लाइन के अंदर ही ड्रिपर लगे हुए थे। इस प्रयोग में 3 वर्ष के परिणाम दर्शाते हैं कि जैसे-जैसे पानी की मात्रा बढ़ाई गई पैदावार में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई, कपास में बूंद- बूंद सिंचाई पद्धति से फसल जल आवश्यकता का 8 एवं 1% पानी देने पर सतही सिंचाई की अपेक्षा पैदावार में क्रमशः 14 एवं 24.2 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई।

सबसे ज्यादा जल उपयोग दक्षता फसल जल आवश्यकता का 6% पानी लगाने पर मिली जो की 8% एवं 1% पानी लगाने पर घटती गई। सतही सिंचाई की अपेक्षा कपास में बूंद- बूंद सिंचाई के प्रत्येक उपचार में जल उपयोग दक्षता अधिक मिली।

उपज की गुणवत्ता

कपास में बूंद- बूंद सिंचाई पद्धति से उपज तो बढ़ती ही है साथ ही रुई भी अच्छी गुणवत्ता की मिलती है। प्रयोगों में यह पाया गया है कि कपास में बूंद- बूंद सिंचाई पद्धति से सिंचाई करने पर रुई के रेशे की लंबाई ज्यादा मिली, रुई ज्यादा मुलायम पाई गई तथा इसमें छोटे तत्वों की मात्रा कम पाई गई।

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कीटों का प्रकोप

कपास में बूंद- बूंद सिंचाई पद्धति में जोड़े में बिजाई करने के कारण कीटनाशकों का छिड़काव ज्यादा प्रभावी रहता है। इसके साथ ही कपास में बूंद- बूंद सिंचाई पद्धति से सिंचाई करने पर सफेद मच्छर और चितकबरे सुंडी का प्रकोप सतही सिंचाई की अपेक्षा कम पाया गया।

बूंद- बूंद सिंचाई पद्धति से लाभ

बूंद- बूंद सिंचाई पद्धति की लागत अधिक होने की वजह से शुरू में किसान को अधिक खर्चा करना होता है। इस पद्धति से अच्छी पैदावार तथा पानी की बचत होने से इसे अपनाना लाभकारी है। सतह सिंचाई द्वारा नरमा की फसल उत्पादन की लागत रु. 15 प्रति हेक्टेयर है जबकि बून्द-बून्द सिंचाई में यह लागत बढ़कर रू. 2877 प्रति हेक्टेयर हो जाती हैं।

बूंद- बूंद सिंचाई पद्धति में पानी की बचत तथा बचे हुए पानी से अतिरिक्त क्षेत्र में खेती करने पर फसल से कुल सकल आय रुपए 62,524 हो जाती है जबकि सतह सिंचाई से सकल आय लगभग इससे आधी 39,240 ही मिल जाती है। यदि कुल शुद्ध लाभ को देखें तो बूंद- बूंद सिंचाई पद्धति एक लाभकारी सौदा है। अनुदान मिलने पर यह लाभ और भी अधिक बढ़ जाता है। अतः इसे अपनाना किसान के हित में है।

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निष्कर्ष

हाइब्रिड नरमा (एल.एच.एच.-144) कपास में बूंद- बूंद सिंचाई पद्धति से सिफारिश किए गए नत्रजन तथा पोटाश (फास्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई के समय) की मात्रा 6 बराबर भागों में 2 सप्ताह के अंतराल पर ड्रिप संयंत्र द्वारा देने से सिंचाई की तुलना में लगभग 5% पैदावार में वृद्धि पाई गई। इस पद्धति से जल बचत द्वारा 35% अतिरिक्त क्षेत्र में नरमा की काश्त की जा सकती है। नरमा कि प्रत्येक कतार में लेटरल डालने की बजाय कतारों के जोड़े में लेटरल डालने से लेटरल का खर्चा तो आधा होता ही है, साथ में कतारों के जोड़े में बुवाई एवं सिंचाई करने से पैदावार में भी वृद्धि होती है।

इसमें पौधे से पौधे के बीच की दूरी 6 सेमी, एक ही जोड़े में कतार से कतार के बीच की दूरी 6 सेमी तथा 1 जोड़े से दूसरे जोड़े के बीच की दूरी 12 सेमी रखें। प्रत्येक जोड़े में एक लेटरल डाली जाती है। इस लेटरल में ड्रिपर से ड्रिपर के बीच की दूरी 6 सेमी रखे। ड्रिपर से पानी रिसने की दर 4 लीटर प्रति घंटा हो। बून्द- बूंद सिंचाई पद्धति में पानी का दबाव 1.5 किलोग्राम प्रति वर्ग सेमी रखें। बुवाई के 15 दिन बाद कपास में बूंद- बूंद सिंचाई शुरू कर देवे।

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प्रस्तुति

डॉ.बी.एस. यादव, डॉ.आर.पी.एस. चौहान, डॉ.एस.आर. भुईंया,

कृषि अनुसंधान केंद्र श्रीगंगानगर, राज

साभार

हरित क्रांति

कपास विशेषांक

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