agriculture

कपास की फसल में पोषक तत्वों का प्रबंधन कैसे करें

कपास
Written by bheru lal gaderi

कपास के पौधे प्रति हेक्टेयर 40 किलो ग्राम नत्रजन, 10-15 किलो फॉस्फोरस अम्ल और 45 किलो ग्राम पोटाश भूमि से औसत रूप से निकाल लेने के संकेत हैं। कपास के सुचारु पोषण का महत्व इस बात से भी प्रतिलंबित होता हैं की 100 किलो कपास पैदा करने में 7 किलो नत्रजन 2 किलो स्फुर और 8 किलो पोटाश की निम्नतम आवश्यकता होती हैं। साधारणतयाः कपास को दिए जाने वाला उर्वरक पौधों को पूर्णतः उपलब्ध नहीं होता। परिणामस्वरूप नत्रजनीय उर्वरकों का केवल 40% स्फुर युक्त का 35-40% और पोटाश का केवल 40-60% ही कपास के पौधे उपयोग में ला सकते हैं।

कपास

आर्गेनिक खाद

भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने व संरचना को सुधारने के लिए आवश्यक हैं की सकेंद्रिय खाद भी पर्याप्त मात्रा में उपयोग किए जावे। आर्गेनिक खादों का महत्व यह होता हैं की मुख्य तत्वों (नाइट्रोजन, स्फुर, पोटाश) की मात्रा के अलावा उनसे अन्य महत्वपूर्ण पोषक तत्व जैसे तांबा, लोहा, मेगनीज, आदि भी कमावेशी मिल जाते हैं और ये खाद अपनी गुणवत्ता में समतोल रखता हैं। वर्षा आधारित खेती में कम से कम 10-12 गाड़ी प्रति हेक्टेयर तथा सिंचित खेती में 15-20 गाड़ी प्रति हेक्टेयर गोबर का खाद आवश्यक हैं।

Read also – रासायनिक उर्वरक प्रयोग,महत्व एवं उपयोग विधि

मध्य भरी तथा भरी भूमि में नत्रजन की मात्रा का चौथाई भाग तथा स्फुर तथा पोटाश की पूरी मात्रा बोने के समय देना चाहिए जबकि मध्य व हल्की जमीन में शुष्क खेती के लिए नत्रजन एक चौथाई आधा स्फुर एवं आधा पोटाश बोने के समय दें।

कपास की खड़ी फसल में उर्वरक देने की विधि:-

कपास

असिंचित वर्षा आश्रित फसल में जो साधारणतयाः 45-60 सेमी. की दुरी पर बोई जाती हैं उसमे उर्वरक थोड़ा गहरा फड़क द्वारा कतारों के बिच में नाली द्वारा देना चाहिये इन परिस्थितियों में खेत निंदा रहित होना चाहिए विपुल उत्पादन जातियों की खड़ी फसलों में प्रायः नत्रजनीय खाद ही दिया जाता हैं लेकिन यदि स्फुर तथा पोटाश का भी आधा शेष भाग साथ ही दे दिया जाए तो फसलों की बढ़वार में सहायता मिलती हैं शर्त यह हैं की खड़ी फसल में दिए जाने वाले इस तरह के उर्वर भूमि में अंदर जाने चाहिए ताकि वे जड़ों की पहुंच के अंदर हो।

You may like also – मूँग की उन्नत खेती एवं फसल सुरक्षा उपाय

आमतौर पर कपास की जड़े 50-60 दिनों में 100 से 120 सेमी. की गहराई तक जाती हैं सभी जड़े उर्वरक ग्रहण नहीं करती मोटी जड़े तो पौधे के सहारे और पानी व पोषक तत्वों के घोल के परिवहन का काम करती हैं साधारण पद्धति याने रिंग पद्धति से उर्वरक देने से भी उतना ही खर्च आता हैं जितना की कालम पद्धति से आता हैं इसकी पूरी सम्भावना हैं की इस पद्धति से 20 से 50% उर्वरक की बचत हो जाती हैं।

पत्तियों के माध्यम से उर्वरक:-

पौधों को उर्वरक की आवश्यकताओं की पूर्ति में पत्तियों के माध्यम से भी उर्वरकों की पूरक मात्रा दी जा सकती हैं छिड़क कर एक सिमा तक ही पौधे को आवश्यक तत्व दिए जा सकते हैं , इसकी आवश्यकता उस समय होती हैं जब पौधे प्राकृतिक रूप से नत्रजन आदि तत्व पर्याप्त मात्रा में ग्रहण नहीं कर पाता जैसे अधिक वर्षा होने पर या फल फूल बहार कम आने पर।

Read also – अधिक उत्पादन के लिए आधुनिक कृषि पद्धतियाँ

पत्तियों के माध्यम से नत्रजन देने के लिए आवश्यकतानुसार यूरिया के घोल का छिड़काव 1 से 3 बार किया जा सकता हैं पहला छिड़काव कली आने पर तथा उसके बाद दूसरा तीसरा छिड़काव 15 से 25 दिनों के अंतर से किया जा सकता हैं पौधे की पत्तियों को यूरिया के घोल से अच्छी तरह से भिगो दें। यदि छिड़काव के पश्चात वर्षा होने की संभावना हो तो घोल में 1 मिलीलीटर प्रति दो लीटर घोल के मान से कोई चिपकने वाली दवा जैसे सेन्डोबिट, टिपाल या ट्रीईटियान आदि मिलाना न भूले। नत्रजन की तरह ही स्फुर और पोटाश भी पानी के घोल द्वारा छिड़क कर दिए जा सकते हैं इस छिड़काव के लिए डाइमोनियम फास्फेट और म्यूरेट ऑफ़ पोटाश के 1.5% घोल की आवश्यकता होती हैं अन्य बातों के अलावा इसके उपयोग से कलियों फूलों की बहार में अभिवृद्धि हुई हैं।

Read also –   कद्दूवर्गीय सब्जियों में कीट एवं रोग नियंत्रण

संतुलित पोषक तत्व

कपास के संतुलित पोषण के लिए केवल नत्रजन स्फुर एवं पोटाश ही पर्याप्त नहीं होते है। कपास को 16 -17 अन्य तत्वों की भी उतनी ही आवश्यकता होती है जितनी के इन तीन मुख्य तत्वों की। अतः कपास के विकास एवं वृद्धि में इन अलप तत्वों का विशेष महत्व है।

Read also – करेले की उन्नत जैविक खेती मचान विधि से

ये तत्व पौधे में रासायनिक क्रियाओं को तेज करने एवं उन्हें नियंत्रण में रखने वाले एन्जाइम्स के गटक हैं उदाहरण के लिए मेग्नेशियम पत्तियों के हरितपदार्थ का मुख्य घटक हैं इसके अलावा कैल्शियम, जिंक, गंधक, लोहा, तांबा, मेगनीज, बोरोन, मोलिब्डेनम  और क्लोरीन का भी विशिष्ट महत्व हैं साधरणतयाः भूमि में उपलब्ध इन अल्प पोषक तत्वों को जड़े ग्रहण करती हैं किन्तु एक निश्चित सिमा के बाद निश्चित मात्रा में नहीं होने पर पौधों को ये तत्वों की उपलब्धता भूमि के अम्लीय या क्षारीय होने से प्रभावित होती हैं क्षारीय भूमि में जस्ते और मेगनीज की कमी हो जाती हैं किन्तु अम्लीय भूमि में इनका आभाव नहीं होता।

Read also –ज्वार की उन्नत खेती एवं अधिक उत्पादन तकनीक

अल्प पोषी तत्वों का उपयोग

कैल्शियम-मनीशियम आदि तत्व रिस कर और अधिक वर्षा से घुलकर भूमि   कम हो जाते हैं और सिलिकॉन एल्युमिनियम और आयरन इकट्ठे होकर भूमि को अम्लीय बनाते हैं जिससे अन्य तत्वों की कमी होती हैं पी.एच. 6.5 से 7.5 के स्तर तक अल्प पोषक तत्व अधिकतर प्राप्त होते है उर्वरकों का भी इस पी.एच. स्तर की भूमिया अच्छा उपयोग करती हैं।

Read also – अदरक की उन्नत खेती एवं फसल सुरक्षा उपाय

कपास की खड़ी फसल में देने के लिए अल्प पोषी तत्वों के मिश्रण बाजार में आसानी से उपलब्ध होते हैं एक ही सूक्ष्म तत्व के मिश्रण को बार-बार उपयोग नहीं करना चाहिए पहला छिड़काव पूड़ी आने पर और तीसरा कपास खिलने पर करना चाहिए। साधारणतया भूमि में देने के लिए जस्ते, तांबा, बोरोन, मैग्नीशियम, मेगनीज आदि के किसी भी लवण की 10 से 15 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर मात्रा की आवश्यकता होती हैं। लोहे की आवश्यकता 25 किलो ग्राम प्रति हेक्टेयर लोह लवण से पूरी हो जाती हैं। मोलिब्डेनम के लिए केवल आधा किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मालिबडोनिक एसिड पर्याप्त होती हैं।

Read also – ग्वार की उन्नत खेती एवं उन्नत किस्में व उत्पादन तकनीक

 

Facebook Comments

About the author

bheru lal gaderi

Hello! My name is Bheru Lal Gaderi, a full time internet marketer and blogger from Chittorgarh, Rajasthan, India. Shouttermouth is my Blog here I write about Tips and Tricks,Making Money Online – SEO – Blogging and much more. Do check it out! Thanks.