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कटहल की उन्नत खेती एवं सामाजिक वानिकी

कटहल
Written by bheru lal gaderi

कटहल(Jackfruit) एक सदाबहार विश्वविद्यालय वृक्ष हैं जो 12-15 मि. ऊँचा होता हैं तथा इसका फैलाव भी अधिक होता हैं। पौध लगाने के 5से 8 वर्ष में फल प्राप्त होते हैं। वृक्ष अनेक वर्षों तक फल देता रहता हैं। फलों का भार 5 से 30 की.ग्रा. होता हैं फल मुख्यतया तना या मोटी शाखाओं पर लगते हैं। फल मार्च से जून तक प्राप्त हो जाते हैं।

कटहल

कटहल एक दीर्घजीवी, अधिक आय देने वाला तथा सब्जी के रूप में उपयोग किया जाने वाला फल हैं। इसकी उत्पत्ति भारत में हुई हैं। यह विश्व के अन्य देशों में भी उगाया जाता हैं। इसे दक्षिण भारत में प्रमुखता से उगाया जाता हैं। जगदलपुर व बस्तर कटहल उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हैं। इसका उपयोग सब्जी के लिए किया जाता हैं इसका अचार भी बनाया जाता हैं।

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औषधीय महत्व

आयुर्वेद के अनुसार इसका कच्चा फल कसेला, वायुनाशक, बलवर्धक व कफनाशक होता हैं। इसका फल शीतल, बलवर्धक व उत्तेजक, मोटापा बढ़ाने वाला, पितदोष वात, श्वेत कुष्ठ, फोड़े में उपयोगी, कफहारी होता हैं। इसका बीज मीठा बलवर्धक और कब्जकारक होता हैं।

जलवायु

गर्म और आर्द्र नम जलवायु में यह अच्छा फलता-फूलता हैं। लू और पाले से छोटे पौधों को हानि होती हैं।

भूमि

कटहल के लिए गहरी उपजाऊ दोमट भूमि, जहां पानी का निकास अच्छा हो तथा जलस्तर 2 मीटर से निचे हो उपयुक्त होती हैं।

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भूमि की तैयारी

एक मीटर लम्बे चौड़े व गहरे गड्ढे को 10 मीटर की दुरी पर तैयार करें। इनमे 50 की.ग्रा. गोबर की खाद +500 ग्राम सुपर फास्फेट + 500 ग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश +50 ग्राम 5% एण्डोसल्फान चूर्ण मिट्टी में मिलाकर पौधे लगाने के दस दिन पूर्व प्रति गड्ढे में भर दी जाती हैं। गड्ढे अप्रेल-मई माह में खोद लें। पौधे वर्षा ऋतू आरम्भ होने पर जून-जुलाई में लगाए।

कटहल की किस्में

रुद्रासी

फल छोटे तथा काटे वाले होते हैं। इनका भार 4-5 की.ग्रा. तक होता हैं। फल गुच्छो में आते हैं। पूर्ण अवस्था प्राप्त वृक्ष में कभी-कभी ५०० से भी अधिक फल लग जाते हैं।

खाजा

यह सफेद कोये वाली फसल हैं। फल भार 25-30 की.ग्रा. होता हैं। खाने वाली किस्मों में यह सर्वोत्तम किस्म हैं।

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सिंगापूर

वृक्षों में फूल लगने के तीन वर्ष बाद ही फल आने लगते हैं। फल आकार में बड़े होते हैं। वृक्षों पर अधिक समय तक फल आते हैं।

खाद एवं उर्वरक प्रति पौधे के लिए

पौधे की आयु

गोबर की खाद (की.ग्रा.)नाइट्रोजन (ग्राम)स्फुर (ग्राम)

पोटाश (ग्राम)

1 माह100

1 वर्ष1020025075
2 वर्ष20300500275
3 वर्ष404001 की.ग्रा.450
4 वर्ष608002 की.ग्रा.900
5 वर्ष8012002.5 की.ग्रा.1250
6 वर्ष तथा उसके बाद10016003 की.ग्रा.1750

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पौध तैयार करना

बीज द्वारा प्रवर्धन किया जाता हैं। गुटी विधि से भी पौधे तैयार किए जाते हैं।

अच्छे स्वस्थ पके फलों के बीजों को निकालकर उन्हें एक की.ग्रा. पॉलीथिन की थैली में या गमलों में बीज को बो कर तैयार किया जाता हैं। जब पौधे 1 से 2 माह के हो जाते हैं तो उन्हें निश्चित स्थान पर सावधानी से लगा दिया जाता हैं। नवीन रोपित पौधे अधिक मरते हैं तथा वृक्षों में फूल नहीं आते हैं। इसका कारण यह हैं की स्थानांतरण में हुई जड़ों की क्षति पूर्ति को पूरा नहीं कर पते हैं। इसलिए कटहल के बीजों की उचित स्थान पर गड्ढा तैयार कर बुवाई कर देनी चाहिए। एक गड्ढे में कम से कम दो तीन बीज होना चाहिए। जब पौधे विकसित हो जाए तब एक स्वस्थ व ओजस्वी पौधा छोड़ कर अन्य को निकाल देना चाहिए।

सिंचाई

गर्मी के मौसम में फरवरी से जून तक 15 दिन के अंतर से अक्टूबर से फरवरी तक माह में एक बार सिंचाई दें।

देखभाल

नवीन रोपित पौधों को धुप व पाले से सुरक्षा करना आवश्यक हैं। कटहल के उद्यानों में वृक्ष से फल अधिक समय के अंतर् में मिलते हैं। इसलिए 3 से 6 वर्ष तक अन्तः शस्य के रूप में सब्जिया, पपीता आदि लगाया जा सकता हैं प्रतिवर्ष वर्षा ऋतू के पश्चात बोर्डो पेस्ट लगा देना चाहिए।

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