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कंपोस्ट खाद – बनाने की वैज्ञानिक विधि

कंपोस्ट खाद
Written by bheru lal gaderi

कंपोस्ट खाद (Compost manure) – भारतीय कृषि क्षेत्र में लगातार फसल उत्पादन में जो वृद्धि आई हैं उसका मुख्य कारण उन्नत तकनीकों को अपनाया जाना है और अधिक मात्रा में रसायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग है। अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए इन कृत्रिम पदार्थों का भारी मात्रा में प्रयोग किया जा रहा है।

कंपोस्ट खाद

मिट्टी की स्थिति की अनदेखी की जा रही हैं। इसके कई दुष्परिणाम हमारे समक्ष धीरे-धीरे प्रकट हो रहे हैं। मिट्टी के प्राकृतिक गुण धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं। इसके अलावा प्राकृतिक गुण के अभाव में उत्पादन लागत में वृद्धि हो रही हैं। मिट्टी में जीवांश में या कार्बनिक पदार्थों की कमी के कारण गर्मियों में भूमि के ऊपरी भाग का तापमान 60 डिग्री सेल्सियस से ऊपर हो जाता है।

मिट्टी की नमी देर तक नहीं रहती है। इससे खेतों में दरारें पड़ने लगती हैं। निम्न जल धारण क्षमता के कारण सिंचाई जल की आवश्यकता बहुत अधिक बढ़ जाती हैं और संसाधनों का दुरुपयोग होता है। कृषकों को यह बात जानना अति आवश्यक है कि मिट्टी एक भौतिक माध्यम ही नहीं अपितु जीवित माध्यम भी हैं, जिस में लाभकारी सूक्ष्मजीव निवास करते हैं जो विभिन्न तरीकों से पौधों का पोषण करते हैं।

अतः मिट्टी में इसकी संख्या सुनिश्चित करना अति आवश्यक है जो देखा गया है कि जीवांश या कार्बनिक पदार्थ द्वारा ही संभव है। इसके लिए प्रत्येक किसान को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि जिससे उनके फार्म पर या घर में उपलब्ध कूड़ा-कचरा, जानवरों के मल -मूत्र, पोधो के अवशेष आदि का उपयोग एक उत्कृष्ट प्रकार की कंपोस्ट खाद बनाने में कर सकते हैं।

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परंपरागत तरीके से खाद बनाना:-

अधिकांश किसानों के बाड़ी या प्रक्षेत्र में स्वनिर्मित खाद के गड्ढे होते हैं। किसान इस गड्ढे का उपयोग खाद बनाने में करते हैं। यहां घर के अपशिष्ट और फार्म के कचरे का इस्तेमाल खाद बनाने में करते हैं। ठीक प्रकार से न सड़ने के कारण उसमें खरपतवार के बीज और निमेटोड पाए जाते हैं जो फसलों के लिए नुकसानदेह हैं।

खाद बनाते समय इसे खुला छोड़ दिया जाता है और अत्यधिक गर्मी और बारिश से बचाव की सुविधा नहीं होती है। इन गड्डों का उपयोग व्यवस्थित और वैज्ञानिक विधि से ना होने के कारण खाद की गुणवत्ता निम्न स्तर की होती है।

जिसमें जीवाश्म और पोषक तत्वों की मात्रा कम होती हैं । किसान बहुत कम खर्च में स्वयं जैविक खादों का निर्माण कर सकते हैं। इनके पास उपलब्ध खाद गड्डा अच्छी गुणवत्ता वाली कंपोस्ट खाद प्राप्त करने का अच्छा माध्यम हो सकता है। जिसे सड़न की अत्यधिक सरल प्रक्रिया द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

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गोबर और कचरा संग्रहण करने का तरीका:-

खाद के गड्ढों को भरने से पूर्व उसे घर या प्रक्षेत्र पर पहले अलग अलग गड्ढों में एकत्रित करना चाहिए। इसके लिए दो छोटे और गहरे गड्ढे बनाए जाते हैं। इन गड्ढों में मल मूत्र और इनका बिछावन और वनस्पति कचरे को अलग-अलग गड्ढों में इकट्ठा   किया जाता है , पौध अवशेष, डंठल, घर से प्राप्त सब्जी के टुकड़ों को बारीक कर गड्ढे में नियमित रूप से गोबर के घोल से  तर करके मिलाते रहना चाहिए। इन पदार्थों से पत्थर के टुकड़े प्लास्टिक इत्यादि को अलग कर देना चाहिए।

गड्ढे का आकार:-

खाद गड्ढे का आकार 6 मीटर लंबा 10 मीटर चौड़ा और 1 मीटर गहरा होना चाहिए। हालांकि पशुधन की संख्या और आवश्यकता अनुसार आकार को छोटा बड़ा कर सकते हैं।

गड्ढे का आकार यदि बड़ा हो तो उसे दो या तीन बराबर भागों में बांट लेना चाहिए।

खाद भरते समय पहला भाग भूतल से 45 सेमी ऊंचा हो जाए तो उसे ढेर के रूप में बना कर गोबर के गोल व मिट्टी से ढक देना चाहिए। फिर गड्डें के शेष भाग में इसी तरह खाद भरना चाहिए।

इससे वर्षभर खेतों को उच्च गुणवत्ता वाली कंपोस्ट खाद की पूर्ति होती है। गड्ढों का चुनाव छायादार स्थान पर करना चाहिए और खाद बनाते समय नमी प्रयाप्त होना आवश्यक है। गड्ढे के विभिन्न भागों के उपयोग के लिए समय नियोजित करना आवश्यक है, ताकि हर फसल के लिए खाद उपलब्ध हो सके।

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कंपोस्ट खाद बनाने हेतु प्रयुक्त सामग्री:-

पौधों की पत्तियों टहनियों, डंठल, भूसा, पैरा कुट्टी, घर से प्राप्त सब्जियों के टुकड़े आदि को छोटे-छोटे काट कर बांट देना चाहिए। घर और खेत पर उपलब्ध जानवरों के गोबर को उनके मूत्र के साथ एकत्रित करना चाहिए।

जानवरों के बिछावन को इकट्ठा करने के लिए पशुशाला में भूसा, लकड़ी बुरादा या रेत का बिछावन बिछाना चाहिए और इसे 10 से 15 दिनों में हटाते रहना चाहिए। जानवरों के मूत्र को एक सामान्य कंक्रीट टैंक में इकट्ठा करते रहना चाहिए।

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कंपोस्ट खाद बनाने की वैज्ञानिक विधि:-

रॉक फास्फेट का प्रयोग:-

जानवरों के मल मूत्र, बिछावन और वनस्पति कचरों का संग्रहण तब तक इन छोटे-छोटे गड्ढों में करना चाहिए जब तक कि दिए गए गड्ढों के आकार के अनुसार पूर्ति ना हो जाए। गड्ढे भरने के पूर्व इन पदार्थों में प्रति क्विंटल कचरा की दर से 1 किलोग्राम रॉक फास्फेट का प्रयोग करना चाहिए जो कि सस्ता और आसानी से उपलब्ध हो जाता है।

संग्रहित कचरों का उपयोग गड्डों के पहले भाग में भराई हेतु विभिन्न परतों में डालना चाहिए। सर्वप्रथम गड्डों की साफ सफाई कर उसकी सतह को मिट्टी या बालू से दबाकर ठोस बनाएं, फिर उसे गोबर के गोल से तर करें। इसके बाद पहली परत के रूप में वनस्पति कचरे की तीन से चार इंच एक समान परत में बिछाए। इसे गोबर के घोल से तर करें।

इसी क्रम में गड्ढा भराई को पूर्ण करें। भराई का कार्य भूतल सत्ता से 45 से.मी. ऊंचा करें। फिर उसे ढेरी बनाकर मिट्टी और गोबर के गोल से  लिप दे। बिल्कुल यही प्रक्रिया गड्डें के शेष भाग में दोहरानी चाहिए।

ट्राइकोडर्मा विरडी का का प्रयोग:-

जिसके बनाने का क्रम निश्चित करें। कचरा अपघटन की प्रक्रिया के लिए नमी होनी चाहिए। जिसकी पूर्ति के लिए नियमित पानी दे। 20 से 25 दिनों बाद जब गर्मी कम हो जाए, तब खाद की विभिन्न परतों में ट्राइकोडर्मा विरडी का छिड़काव करें। यह बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं। इससे खाद गलन क्रिया और गुणवत्ता में वृद्धि होती है। 6 से 8 दिनों बाद खाद पलटने का कार्य करें। इसमें प्रत्येक परत का पलटा जाना आवश्यक है। खाद पलटने की प्रक्रिया हर पंद्रह दिन में तीन बार करें। यह प्रक्रिया ढाई माह तक करते रहे।

इसके 1 माह बाद खाद का प्रयोग खेतों में करें।  इसे खेतों में समान रूप से फैलाना चाहिए। कंपोस्टिंग या सड़न की प्रक्रिया को जानकर किसान स्वयं अपने परंपरागत गड्डें से कम समय में उत्तम गुणों वाली कंपोस्ट खाद बना सकते हैं। इसमें जीवाश्म और पोषक तत्व भरपूर मात्रा में होते हैं।

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