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ऊसर भूमि प्रबंधन: कारण एवं निवारण

ऊसर भूमि
Written by bheru lal gaderi

भारत में करीब 70 लाख हेक्टेयर भूमि ऊसरता (लवणीय व क्षारीयता) से ग्रस्त हैं और ऊसरता क्षेत्र दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा हैं। इस क्षेत्रफल का 7.2 लाख हेक्टेयर भाग हमारे प्रदेश राजस्थान में हैं, जो की खेती योग्य भूमि का 13% हैं तथा बुरी तरह से ऊसर भूमि की समस्या से ग्रस्त हैं। कोटा संभाग में भी काफी बड़ा क्षेत्र ऊसर भूमि (लवणीयता/क्षारीयता) से अनुपजाऊ हैं, जहां या तो खेती होती नहीं, या यदि होती हैं भी तो उनकी उत्पादन क्षमता नगण्य हैं। हमारा कर्तव्य हैं की ऊसर भूमि का सुधार व उचित प्रबंध करके प्रति हेक्टेयर भूमि से अधिकतम उत्पादन लें।

ऊसर भूमि

ऊसरता (लवणीयता व क्षारीयता) का भूमि व पौधों पर प्रभाव

  1. लवणों की अधिकता से भूमि में पानी होते हुए भी पौधे पर्याप्त मात्रा में इसे घोल का रसाकर्षण दबाव बढ़ जाता हैं। इसलिए पौधे की वृद्धि व उपज पर विपरीत प्रभाव पड़ता हैं।
  2. क्षारीय भूमि में सोडियम की अधिकता के कारण, मिटटी की सरचना बिगड़ जाती हैं। जिससे भूमि में हवा व पानी का संचार सही रूप से नहीं हो पाता हैं। फलस्वरूप पौधों की वृद्धि व उपज कम हो जाती हैं। सोडियम की अधिकता से भूमि का पि.एच. मान भी बढ़ जाता हैं और पौधे की वृद्धि व उपज कम हो जाती हैं। सोडियम की अधिकता से भूमि का पि.एच. मान भी बढ़ जाता हैं और पौधे उचित मात्रा और अनुपात में भोजन प्राप्त नहीं कर पाते।

ऊसर मृदाओं के प्रकार

ऊसर भूमि तीन प्रकार की होती हैं।

  1. लवणीय मृदाएं (सफेद ऊसर)
  2. क्षारीय मृदाए (काली ऊसर भूमि)
  3. लवणीय क्षारीय मृदाएं (सफेद काली ऊसर भूमि)

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ऊसर मृदाओं के चाक्षुष लक्षण

लवणीय मिट्टियाँ

  1. सतह पर गर्मियों में सफेद लवणों की पपड़ी का जमना।
  2. भूमि बंजर दिखाई देती हैं। या तो पौधे उगते नहीं, और उगते हैं तो मुरझा जाते हैं। पत्तियों का रंग हरा नीला व किनारे झुलसे हुए दिखाई देते हैं। पौधों की बढ़वार नहीं होती। बीज अंकुरण में देरी व कमी।
  3. भूमि में पर्याप्त नमी होते हुए भी पौधे जल की कमी दिखाते हैं।

क्षारीय मिट्टियाँ

  1. सतह पर काली पपड़ी का जमना जो की अधिकांशतः छोटे-छोटे टुकड़ों में बिखरी हुई होती हैं।
  2. मिटटी की भौतिक दशा खराब हो जाती हैं तथा पानी का प्रवेश धीरे-धीरे होने से सतह पर कालापन लिए खड़ा रहता हैं। बीज अंकुरण नहीं होता तथा अंकुरित कम बढ़े हुए पौधे हरा नीला रंग लिए होते हैं। लवणीय क्षारीय मिट्टियों की मिश्रित सफेद व काली पपड़ी दिखाई देती हैं।

कोटा खंड में ऊसरता की समस्या के प्रमुख कारण:-

  1. सिंचाई जल का अधिक मात्रा में प्रयोग करना।
  2. असमतल व जल-प्लावित क्षेत्रों (निचले क्षेत्रों) का होना।
  3. खेतों की भूमि से जल-निकास की कमी होना।
  4. भूमिगत जल-स्तर की सतह ऊपर उठना (उच्च भौम जल स्तर)
  5. खारे पानी से सिंचाई करना।
  6. कम वर्षा और अधिक वाष्पीकरण का होना।
  7. अत्यधिक रासायनिक उर्वरीकरण करना।

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ऊसर भूमि प्रबंधन एवं सुधार

लवणीय भूमि में लवणों की अधिकता ही सबसे बड़ी समस्या हैं। इन लवणों की अधिकता को दूर करना ऐसी भूमि के सुधार का सिद्धांत हैं। लवणों को फिर से एकत्रित न होने देने के लिए कृषि संबंधित क्रियाएं जैसे:- सिंचाई, भूमि की तैयारी, पौध संरक्षण, बीज बोन का तरीका, निक्षालन आदि का समुचित रूपांतर ही इस प्रकार की मृदाओं का प्रबंध हैं।

लवणीय मृदाओं में विध्यमान एवं एकत्रित लवणों को तीन प्रकार से हटाया जा सकता हैं:-

  1. खुरचकर
  2. निक्षालन द्वारा
  3. निर्धावन द्वारा

यदि लवणों की सफेद तह पर्याप्त मोटाई लिए हुए हो तो उसे खुरपी या फावड़े से खरोंचकर अलग कर दें या लवणों का सीधा निक्षालन करें। पानी द्वारा घुलनशील सतह से निचे ले जाना चाहिये (निक्षालन विधि)। निक्षालन के लिए खेत के ढलाव के अनुसार छोटे-छोटे टुकड़ों के अनुसार छोटे-छोटे टुकड़ों में 10 से 15 इंच ऊँची मेड-बंदी करके एक समान पानी खड़ा करें। निक्षालन की क्रिया को 2-3 बार दोहराएं, जिससे जड़ क्षेत्र लवणीयता से मुक्त हो सकें, ताकि पानी सतह से निचे बहुत ही धीमी गति से प्रवेश करें, तो पानी को करीब एक सप्ताह सतह पर खड़ा रखने के बाद पास के नाले में निकास नाली बनाकर बहाये।

जल-निकास

मुख्यतः उन स्थानों पर जहां का भूमि स्तर काफी ऊँचा हो या भूमि में कुछ गहराई पर कड़ी तह हो, लवणों को हटाने हेतु जल-निकास (ड्रेनेज) का होना अति आवश्यक हैं। जल निकास 2 तरीकों से किया जा सकता हैं।

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खुला जल-निकास

खेत में गहरी नाली बना देते हैं। बारीक़ गठन की मिट्टियों में नालियों का अंतर 35 से 40 मीटर व मोटे गठन की मिट्टियों में 70 मीटर तक रखना चाहिये।

टाइल/पाइप द्वारा जल-निकास

टाइलों/पाइप के जमाने की गहराई व उनके आपस का अंतर मृदा के प्रकार व पारगम्यता पर निर्भर करता हैं।

लवणीय(ऊसर भूमि) भूमि में प्रबंधीकरण के लिए निम्न प्रविधियां सहायक होती हैं।

  1. खेत को समतल रखे जिससे सिंचाई का पानी समुचित रूप से बराबर बंट जाए।
  2. बीजों के अंकुरण की समस्या लवणीय मिट्टियों में दूर करने के लिए उर्द, ग्वार व चवला के बीजों को बौने से पूर्व 0.1% नमक के घोल में 4 घन्टे भिगोए तथा छाया में सुखाकर फिर बोएं। गेहू व जौ के बीजों को 3 व 2% सोडियम सल्फेट के घोल में 24 घंटे भिगोकर तथा 8-10 बार साफ पानी से धोकर छाया में सुखाकर बोएं। बाजरा के बीज को 1.0% सोडियम सल्फेट के घोल में 12 घंटे भिगोकर, धोकर छाया में सुखाकर बोएं।
  3. बीज की दर 15 से 20% अधिक मात्रा ले।
  4. नत्रजन की 10 से 15% अधिक मात्रा काम में लें।
  5. अधिक से अधिक जैविक खादों (गोबर,कम्पोस्ट एवं हरी खाद) का प्रयोग करें।
  6. साल में एक बार गहरी जुताई करें।
  7. अमोनियम सल्फेट व यूरिया के घोल का प्रयोग करें।
  8. जिनक सल्फेट घोल का प्रयोग करें।
  9. लवणीय मृदा में मेड़ों की दिशा पूरब से पश्चिम की और होनी चाहिए। फसलों को मेड के उत्तरी ढलान की और बोएं क्योंकि इस ढलान पर लवणों की सांद्रता दक्षिणी ढलान की अपेक्षा कम होती हैं।
  10. अधिक लवणीय भूमि में कुंड वाली फसलों को एक कुंड में बोना चाहिए तथा फसलवाली कुंड में ही सिंचाई करनी चाहिए। इससे लवणों का अपेक्षाकृत जमाव असिंचित मेड व कुड पर अधिक होगा और फसल पर कम प्रभाव पड़ेगा।
  11. लवणीय भूमि में बबूल, यूकेलिप्टस, खजूर, इमली, खेजड़ी, बेर, केर इत्यादि पेड़ भी लगा सकते हैं।
  12. लवण-सहिष्णु फसलें बोए- जौ, ढेंचा, चुकंदर, तम्बाकू, शलजम, सरसों, कपास, तारामीरा, पालक, मूली आदि बोएं।
  13. विभिन्न फसलों की लवण सहने वाली किस्में बोएं।

क्षारीय(ऊसर भूमि) भूमि का सुधार एवं प्रबंधन

क्षारीय भूमि में विनिमय योग्य सोडियम की अधिक मात्रा में उपस्थित ही मुख्य समस्या हैं। ऐसी समस्याग्रस्त मृदाओं के सुधार के दो सिद्धांत हैं

  1. सोडियम को मृतिका कणों से हटाना।
  2. हटे हुए सोडियम को निक्षालन द्वारा भूमि की गहरी तहों तक पहुँचाना/या जल-निकास द्वारा भूमि से बाहर करना।

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ऐसी मिट्टियों के सुधार हेतु मिटटी के रसायनिक परीक्षण सिफारिशानुसार जिप्सम आवश्यकता (जी.आर.) के आधार पर निम्न भूमि संशोधकों का प्रयोग करें।

  1. जिप्सम
  2. कैल्शियम
  3. पिसा हुआ चुना
  4. गंधक
  5. गंधक का अम्ल
  6. आइरन सल्फेट

पायराइट जिप्सम अच्छा व सस्ता संशोधन हैं।

जिप्सम वर्षा ऋतू से पहले खेत की जुताई करके फैलाने चाहिए। जुताई द्वारा इसे मृदा में मिला देना चाहिए। इसके पश्चात् खेत में क्यारियां बनाना चाहिए ताकि वर्षा का पानी इकट्ठा होकर सोडियम सल्फेट का निक्षालन कर सके। यदि भूमि में अविलेय कैल्शियम निक्षालन की मात्रा हैं (चूनायुक्त मृदा) तो गंधक या गंधक के तेजाब का प्रयोग करें। गंधक डालने के बाद मिट्टी में नमी बनाये रखें। भूमि सुधार का क्रम चालू करने के बाद जमीन को खाली न छोड़े।

जिप्सम या गंधक डालने के बाद ढैंचा को हरी खाद के लिए बोकर 40-45 दिन की फसल को मिट्टी में जुताई करके अच्छी तरह से मिला देना चाहिये। ग्रीष्मकालीन ढैंचा के बाद धन की बुवाई करें। प्रेसमड 10 टन प्रति हेक्टेयर खेत में प्रयोग करें या अन्य जैविक खाद काम में लें। क्षारीय भूमि में खरपतवार कटाली भी प्रयोग कर सकते है।

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ऊसर भूमि व खारे पानी में उगाई जाने वाली फसलों की किस्में

गेंहू

खारचिया-65, आर-31-1, कलयाण सोना , सोनालिका, सोनारा-64, एस-227, राज-3077 , के.आर.एल., 1-4, डब्ल्यू.एच.-157.

जौ

क-7, बी.एल.-2 (बिलाड़ा-2), आर.एस.-6, ज्योति आर.एस.डी.-29, आर.डी.-17.

चना

जी.-24

बाजरा

चाँदी लोकल, एच. बी.-7, आर.एस.के., एच.बी.-4, बी.जे.-104.

धान

आई.आर.-8, जया, रत्ना, पदमा, पूसा.-2-21.

मक्का

गंगा-5, गंगा-3 विजय, विक्रम.

मुंग

आर.एस.-5, आर.एस.-36, न.-305, टी.-1, न.-2.

ज्वार

मेड़ता, लोकल,सी.एच.एस.-1, आसपुरी.

गन्ना

को.-453,को.-1148.

कुसुम

सं.-18,यु.एस.-10

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सरसों

बी.-28, सो.-54, टी.-59, आर.एस.-3, पोलीमात.

कपास

कल्याण, बीकानेरी नर्मा, एफ.-320.

अरहर

तुर-15,एन-148, एन-141,सी.डब्ल्यू, एल-3.

मूंगफली

फैजपुरी-5.

तिल

पंजाब-1, नं.-3-2, टाइप-13, एम.पी.-5.

ग्वार

आर.जी.सी.-136, आर.जी.सी.-101, आर.जी.सी.-410, दुर्गापुरा, जया, एस.वी.एस.-3.

चुकुन्दर

इरोटाइप-ई, भागों, मेगनोपोली, रोमन संकाया.

खरबूज

दुर्गापुरा मधु, हनीड्यू.

तरबूज

क्रीम ,शुगरबेबी, दुर्गापुरा, केसर.

ऊसर भूमि सुधार के पश्चात क्षार सहिष्णु फसलें उगानी चाहिए

रोड्स घास, गेंहू, कपास, रिजका, जौ, टमाटर, चुकुन्दर, जई, चावल, उलिस घास आदि की फसल लगाए। क्षारीय खेतों में गहरी जड़ो वाली फसलें लगानी चाहिए। जिससे भूमि की जल तथा वायु पारगम्यता बढ़ जाएगी।

लवणीय

क्षारीय मृदाओं(बंजर भूमि) के सुधार के लिए निक्षालन व् रासायनिक संशोधकों का प्रयोग करना चाहिए। ऊसर भूमि की लवणीयता व क्षारीयता की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए उपरोक्त दिए गए उपाय काम में लेने चाहिए।

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