उड़द की उन्नत खेती एवं फसल सुरक्षा उपाय

By | 2017-04-06

उड़द एक दलहनी फसल हैं। उड़द को खरीफ में उगाने के साथ- साथ जायद में भी इसकी सफल खेती की जा सकती हैं। फॉस्फोरस अम्ल अन्य दालों की तुलना में 8 गुना अधिक होता हैं। उड़द में प्रोटीन 24% तथा कार्बोहाइड्रेड 60% पाया जाता हैं। उड़द की खेती करने से 45 किलोग्राम नाइट्रोजन भूमि को प्राप्त होता हैं।

भूमि का चुनाव व तैयारी

उड़द की खेती हर प्रकार की मृदा में की जा सकती हैं। परंतु उत्तम जल निकास वाली हल्की रेतीली या माध्यम प्रकार की भूमि उड़द की खेती के लिए उपयुक्त हैं भूमि की तैयारी के लिए एक जुताई गहरी मिटटी पलटने वाले हल से व 2- 3 जुताइयां देशी हल या कल्टीवेटर से करके करना चाहिए।

बीजदर व बीजोपचार

जायद में उड़द की बुवाई हेतु 25- 30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती हैं। बुवाई से पूर्व 2- 2.5 ग्राम थीरम या केप्टान या 10 ग्राम ट्राइकोडर्मा प्रति किलोग्राम बीज की दर से शोषित करना चाहिए। इसके बाद बुवाई के समय राइजोवियम कल्चर तथा पी. एस. वी. कल्चर से उपचारित करके बुवाई करना चाहिए।

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बुवाई का समय एवं विधि

जायद में उड़द की बुवाई का उचित समय 15 फरवरी  से 15 मार्च तक होता है। उड़द की पौधे से पौधे की दूरी 10 से. मी. तथा पंक्ति की दूरी 30-45 से. मी. तथा 4-5 से. मी. गहरी बुवाई करना चाहिए।

उड़द की प्रजातियाँ

पी. यू.-30, जवाहर उड़द-86, एल. वी.-20, पन्त यू-19, टाइप-9,नरेंद्र उड़द-1, उत्तरा, आजाद उड़द-2, शेखर-2

खाद एवं उर्वरक

उड़द एक दलहनी फसल हैं जिसके कारण नाइट्रोजन की अधिक आवश्यकता नही होती हैं। लेकिन पोधो की प्रारम्भिक अवस्था में जड़ो एवं जड़ ग्रंथियों की वृद्धि एवं विकास के लिए 15- 20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40- 45 किलोग्राम फास्फोरस तथा 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हैक्टेयर देना चहिये।

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निराई- गुड़ाई एवं खरपतवार नियंत्रण

­­­­उड़द की बुवाई के 15- 20 दिन की अवस्था में गुड़ाई हाथो द्वारा खुरपी की सहायता से करनी चाहिए। रासायनिक विधि से नियंत्रण हेतु फ्लुक्लोरीन 1 किलोग्राम सक्रीय तत्व प्रति हैक्टेयर की दर से 800- 1000 लीटर पानी में गोल बनाकर छिडकाव करना चाहिए।

बीज की बुवाई के बाद परंतु बीज के अंकुरण के पूर्व पेन्थिमेथलीन 1.25 किलोग्राम संक्रिय तत्व की दर से 800- 1000 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने से खरपतवारो का नियंत्रण किया जा सकता हैं।

प्रमुख रोग

पिला मोजेक:-

इस रोग के लक्षण पतियो पर गोलाकार धब्बो के रूप में दिखाई देता हैं। यह दाग एक साथ मिलकर तेजी से फैलते हैं। जो बाद में बिलकुल पिले हो जाते हैं। यह रोग सफ़ेद मक्खी द्वारा फैलता हैं इस रोग के नियंत्रण हेतु डाइमेथोएट 30 ई. सी. की एक लीटर मात्रा 800 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

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पर्ण दाग:-

इस रोग के लक्षण सबसे पहले पत्तियो पर गोलाई लिए भूरे रंग के कोणीय धब्बे के रूप में दिखाए देते हैं, जिसके बीच का भाग राख या हल्का भूरा तथा किनारा बैंगनी रंग का होता हैं। इस रोग के नियंत्रण हेतु कार्बेडाजिम 500 ग्राम पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

किट:-

थ्रिप्स:-

इस किट के शिशु एवं वयस्क दोनों पत्तितो से रस चूसकर नुकसान पहुचाते हैं। इस किट के नियंत्रण हेतु डायमेथोएट 30  ई. सी. 1 लीटर दवा 600- 800 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

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हरे फुदके:-

यह कीट पत्ती की निचली सतह पर बड़ी संख्या में पाए जाते है। प्रौढ़  का रंग हरा,इसकी पीठ के निचले भाग में काले धब्बे पाए जाते है। इस किट के नियंत्रण हेतु इमिडाक्लोरपिड का 0.3 मिली दवा प्रति लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए।

फली बेधक:-

इस कीट की सुंडी उड़द की पत्तियों में छेद करके उसमे विकसित हो रहे बीज को खा जाती है। इस किट के नियंत्रण के लिए क्युनोल्फोस 25 ई. सी. की 1.25 लीटर दवा 600- 800 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।

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कटाई एवं मढ़ाई:-

पकने के समय उड़द की फलियाँ हरे रंग में परिवर्तित हो जाती है। ऐसे समय पर फसल की कटाई कर लेना चाहिए। उड़द की कुछ प्रजातियाँ एक समय पर नही पकती अतः इन प्रजातियों की फलियों को 2- 3 बार में तोड़ लेना चाहिए।

उड़द की फसल बौने के 85- 90 दिन में पक कर तैयार हो जाती हैं। उड़द की वो फसलें जो एक साथ पकती हैं उनकी कटाई हासिये की सहायता से करके खलिहान में सूखा देना चाहिए।

 उपज:-

10- 15 क्विंटल उपज प्राप्त की जा सकती हैं।

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