अधिक उत्पादन के लिए आधुनिक कृषि पद्धतियाँ

By | 2017-04-20

कृषि के बदलते परिवेश में, बढ़ते तापमान, पर्यावरण प्रदूषण, मृदा ह्रास एवं बीमारियों के प्रकोप को कम करने के लिए उन्नत एवं स्वच्छ क्रियाओं को अपनाना आवश्यक है। कृषि उत्पादन के प्रत्येक पहलुओं जैसे खेत की तैयारी, खेत का चुनाव, खरपतवार नियंत्रण, पौध सरंक्षण, फसलोत्तर प्रबंधन, फसल कटाई, कृषि पद्धतियाँ महत्वपूर्ण  हैं।

कृषि पद्धतियाँ

सुथरी कृषि पद्धतियाँ  (GAP: Good Agricultural praticees)

कृषि उत्पादन तथा उत्पादन के पश्चात की प्रक्रियाओं के सिद्धातों  का एक संग्रह है जिसे हम सामाजिक पर्यावरणीय और आर्थिक, स्थिरता को ध्यान में रखते हुए सुरक्षित एवं स्वच्छ कृषि उत्पाद प्राप्त कर सकते हैं।

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सुथरी कृषि प्रणाली के मुख्य उद्देश्य

  1. सतत कृषि उत्पादन व उत्पादकता बढ़ाना।
  2. प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर तथा टिकाऊ उपयोग करना।
  3. खाद्य शृंखला के अंतर्गत उत्पाद की गुवत्ता एवं सुरक्षा का लाभ उठाना।
  4. खाद्य आपूर्ति शृंखला के बदलाव से नई विपणन सुविधाओं का लाभ उठाना।
  5. कृषकों एवं निर्यातकों के लिए नई विपणन सुविधाओं का विकास करना।
  6. सामाजिक एवं आर्थिक मांगो की पूर्ति करना।

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चयनित कृषि क्रियाओं के लिए सुथरी कृषि पद्धतियाँ

मृदा स्वस्थ्य प्रबंधन (Soil Health Management) कृषि पद्धतियाँ

कृषि पद्धतियाँ

मिट्टी के भौतिक एवं रासायनिक गुण, कार्बनिक तथा जैविक गतिविधियां कृषि उत्पादन को सतत बनाये रखने के लिए महत्वपूर्ण है। यह एक साथ मिलकर मृदा की उर्वरकता और उत्पादकता को निर्धारित करते हैं।

  • मृदा की जैविक गतिविधियों को बढ़ाकर पौधों को उपलब्ध पानी एवं उर्वरकों के उपयोग में सुधार करना।
  • मिट्टी के कटाव एवं पोषक तत्वों एवं कृषि रसायनों के निक्षालन से होने वाले नुकसान को कम करना।
  • मिट्टी की नमी में वृद्धि करना।
  • भारी भू-परिष्करण क्रियाओं से बचाव करना।
  • मृदा सरंचना में सुधार के लिए कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ाना।
  • फसलचक्र, चरागाह प्रबंधन, समन्वित उर्वरक प्रबंधन यांत्रिक या सरंक्षित।
  • जुताई क्रियाओं को अपनाते हुए मृदा में कार्बनिक पदार्थ को बनाये रखना एवं उनमें सुधार करना।
  • वायु एवं जल से मिट्टी के कटाव को कम करना।
  • कार्बनिक एवं अकार्बनिक उर्वरकों, अन्य कृषि रसायनों का उचित मात्रा में उचित समय पर व उपयुक्त विधि से उपयोग करना जिससे मृदा स्वास्थ्य, पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य को किसी भी प्रकार से नुकसान न हों।

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जल प्रबंधन (Water Management) कृषि पद्धतियाँ

कृषि पद्धतियाँ

गुणात्मक तथा मात्रात्मक दृष्टि से जल संसाधनों के प्रबंधन के लिए कृषि क्षेत्र की अहम जिम्मेदारी है। कार्यकुशल सिंचाई प्रौद्योगिकी एवं प्रबधन निक्षालन तथा लवणता से होने वाली हानि को कम करना आवश्यक है।

  • सतही और मृदा जल का उचित प्रबंधन करें।
  • नमी सरक्षण क्रियाएं अपनाएं।
  • मृदा में जल धारण की क्षमता बढाएँ।
  • फसलवार उचित सिंचाई पद्धतियों का चयन व समयबद्ध क्रांतिक अवस्थाओं पर सिंचाई करना।
  • अत्यधिक निकासी या संचय को रोकने के लिए जल स्तर का उचित प्रबंधन करना।
  • मृदा जैविक पदार्थो की स्थाई परत बनाये रखते हुए जल की कार्यशीलता में वृद्धि करना।
  • पानी की बचत के उपायों जैसे खेत तलाई, जल हौद, डिग्गी, फव्वारा, मिनी स्प्रिंकलर, माइक्रो स्प्रिंकलर रेन-गन एवं बून्द-बून्द सिंचाई पद्धतियों को अपनाना।
  • पशुओं के लिए पर्याप्त, सुरक्षित व स्वच्छ पानी की व्यवस्था करना ।

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पौध संरक्षण कृषि पद्धतियाँ (Plant Protection Methods)

कृषि पद्धतियाँ

फसल खेती में उत्पादन और गुणवत्ता को बनायें रखने के लिए सफल स्वास्थ्य को बनाये रखना बहुत महत्वपूर्ण है। इसके लिए समन्वित किट व्याधि प्रबंधन के सिद्धांतो को ध्यान में रखते हुए रोग एवं किट प्रतिरोधी किस्मों का प्रयोग करना, फसल चक्र अपनाना, ट्रेप फसल उगाना तथा कृषि रासायनिक विधि से खरपतवार, कीट एवं व्याधि का नियंत्रण करना आवश्यक है। इनका प्रयोग पर्यावरण एवं मनुष्य पर इनसे होने वाले संभावित नकारत्मक प्रभावों को ध्यान में रखते हुए पूर्ण ज्ञान एवं उपयुक्त विधियों से किया जाना चाहिए।

  • प्रतिरोधी किस्मों का चयन तथा चक्र व कृषक क्रियाओं से किट बिमारियों से बचाव।
  • जैविक विधि से रोग एवं कीट नियंत्रण को बढ़ावा देना।
  • हानिकारक एवं लाभकारी कीटों के बिच संतुलन को बांये रखना।
  • आवश्यकता पर आधारित न्याय संगत तथा सुक्षित कीटनाशकों का छिड़काव।
  • कीटों की संख्या आर्थिक हानि स्तर से अधिक होने पर ही कीटनाशी रसायनों का प्रयोग करें।
  • किसी भी कीटनाशक का उपयोग दुबारा न करें फसल चक्र की तरह ही कीटनाशी चक्र का उपयोग करें।
  • छिड़काव/भुरकाव सही उपकरण व नोजल का उपयोग करें।
  • किट ग्रसित फसल अवशेष जैसे कपास के टिण्डे, बैंगन, टमाटर,मिर्च आदि के काणे फल, डंठल, टहनियों आदि को जला दें।
  • परभक्षी चिड़िया, मैना,गौरेया मोर,आदि के बैठने हेतु स्टेण्ड बनाए इन्हे खेत में आकर्षित करने के लिए एक दो दिन चुग्गा डाले।
  • कीट एवं बीमारियों के बारे में पूर्वानुमान लगाना एवं प्रबंधन कार्ययोजना बनाना।
  • कृषि रसायनों का भंडारण एवं उपयोग ईंर्धरित मापदंडों के अनुसार ही करें।
  • रसायनों के उपयोग का फसलवार सम्पूर्ण रिकार्ड रखें।
  • मित्र कीटों का सरंक्षण करें,प्रकाशपाश एवं फेरोमोनपाश का उपयोग करें।
  • समन्वित कीट प्रबंधन , समन्वित व्याधि प्रबंधन , समन्वित खरपतवार प्रबंधन को बढ़ावा देंवें।

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उत्कर्ष फसल उत्पादन प्रबंधन कृषि पद्धतियाँ (Crop Production Management Agricultural Practices)

कृषि पद्धतियाँ

फसल उत्पादन में वार्षिक और बारहमासी फसलों एवं किस्मों का चयन स्थानीय उपभोक्ता एवं बाजार की जरूरतों के अनुसार किया जाना चाहिए।

  • उपयुक्त फसल व फसल किस्म का चयन क्षेत्र की जलवायु एवं स्थानीय परीस्थितियों के अनुसार करें।
  • समय पर बुवाई करें जिससे अधिकतम उत्पादन प्राप्त कर सकें।
  • प्रमाणित/उन्नत बीज ही बोयें।
  • बीज जनित रोगो की रोकथाम के लिए बीजोपचार अवश्य करें।
  • उचित बीज दर रखें, कतार में बुवाई करे तथा कतार से कतार व पौध की समुचित दुरी रखें।
  • जुताई- बुवाई ढलान के विपरीत करें जिससे की वर्षा का ज्यादा पानी जमीन में अंदर जाए।
  • फसल चक्र अपनाए इससे किट रोग के प्रकोप में कमी आयेगी। फसल चक्र में दलहनी फसलों को महत्व दे।
  • मिलवां फसल बोऐं।
  • तिलहनी/ दलहनी फसलों में जिप्सम का उपयोग जरूर करे।
  • सिफारिश के अनुसार अगेती, पछेती फसल व किस्म का चयन करे ताकि विषम परिस्थितियों में भी आमदनी बढ़ सके।
  • गर्मी में गहरी जुताई करे तथा खरपतवार, रोग व् किट के प्रकोप में कमी पाए।
  • जैविक खेती अपनाए, रासायनिक उर्वरक से बचे।
  • फसल की क्रांतिक अवस्थाओं पर सिंचाई अवशय करे।
  • फसल की आवशयकता के अनुरूप ही संतुलित मात्रा में पोषक तत्वों एवं सिंचाई जल का उपयोग करें।
  • खरपतवार हटाने के लिए समय-समय पर निराई गुड़ाई करें।
  • उर्वरक उसरकर देवें।
  • फसल पद्धति के साथ पशुपालन का समन्वय करें।
  • सुरक्षा नियमों/सुरक्षा मानकों के अनुसार फसल उत्पादन में उपयोग होने वाली मशीनरी की स्थापना व संचालन करना।

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फसल कटाई एवं भण्डारण कृषि पद्धतियाँ (Harvesting and storage methods of agriculture)

कृषि पद्धतियाँ

उत्पाद की गुणवत्ता कटाई एवं भण्डारण के लिए स्वीकार्य प्रोटोकॉल  के क्रियान्वन पर निर्भर करता है।

  • उत्पाद की कटाई कीटनाशी रसायनों के छिड़काव के बाद प्रतीक्षा अवधि को ध्यान में रखते हुए करें।
  • कटाई के लिए उन्नत कृषि यंत्रों का उपयोग करें।
  •  गोदामों घर में रखने से पहले अनाज को अच्छी तरह से साफ करें।
  • अनाज में यदि टूटे हुए दाने हो तो उन्हें छानकर अलग करें।
  • गोदाम/घर में अनाज को अच्छी तरह सुखाकर (नमी स्तर ८-१० प्रतिशत) व ठण्डा करके रखें।
  • अनाज भरने वाली बोरियों/पात्रों को अच्छी तरह साफ कर धुप में सूखा लें।
  • उत्पाद का भंडारण वैज्ञानिक तरीके से उचित स्थान, तापमान व नमि को ध्यान में रख कर ही करे।
  • अनाज की बोरियो को गोदाम/कमरे की दीवारों से दूर रखें।
  • कमरे/ गोदाम में लकड़ी के पट्टे/ पॉलीथिन सहित पहले बिछाए, उसके ऊपर अनाज रखे।
  • भंडारण में कीड़ो के प्रकोप की रोकथाम हेतु निरोधक उपाय अपनाए।
  • कीड़े लगने पर रासायनिक उपचार प्रशिक्षित विशेषज्ञ की उपस्थिति में करे।
  • चूहों की रोकथाम के लिए जिंक फास्फाइड या ब्रामोडियोलोन का उपयोग करे।

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इस प्रकार कृषक, कृषि उत्पादन में स्वच्छ क्रियाओ को अपनाकर सतत व अधिकतम उत्पादन प्राप्त कर सकता हैं। इन क्रियाओ(कृषि पद्धतियाँ) को अपनाने से कृषि लागत में कमी आने के साथ- साथ पर्यावरण संरक्षण, मृदा स्वास्थ्य व मानव स्वास्थ्य में आशितित सुधार परिलक्षित हैं।

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