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अश्वगंधा की जैविक खेती एवं औषधीय महत्व

अश्वगंधा
Written by bheru lal gaderi

अश्वगंधा की फसल समस्त शुष्क क्षेत्रों, मैदानी भागों की बेकार भूमियों से लेकर हिमालय में 1800 मी. की ऊंचाई तक पाया जाता हैं। मध्यप्रदेश में, राजस्थान की सिमा सा सटे नीमच एवं मंदसौर में इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जा रही हैं। तथा राजस्थान के नागौर एवं आसपास के क्षेत्र एवं पंजाब के तराई क्षेत्र में, उत्तराखंड, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरप्रदेश में भी इसकी खेती की जा रही हैं।

अश्वगंधा

अश्वगंधा का पौधा

इसका का पौधा शाखित, काँटों रहित, गंदे रंग का, उधर्व, 1.5 मीटर तथा छोटा अर्धक्षुप होता हैं। सम्पूर्ण पौधा करीब, हरे सफ़ेद रोमों से आच्छांदित होता हैं। पतियाँ सरल, अंडाकार व असमान आधार भाग वाली होती हैं। पुष्पक्रम कक्षस्थ छत्रकीय समीमाक्षा, पुष्प प्रायः 5 के झुण्ड में, कभी- कभी एकल हरे पीले, फल छोटें, गोल, बेरी, अरिपरिपक्व फल हरे, पकने पर लाल व अंत में भूरे रंग के हो जाते हैं तथा कागजी अभिवर्धित बाध्यदलपुंज से आवृत होते हैं। पौधे की मुले मांसल, हलके पीले रंग की होती हैं जो पौधे के उपयोगी भाग हैं।

एल्केलॉइड्स

अश्वगंधा की शुष्क जड़ें हल्के पीले रंग की झुर्रीदार, खुरदरी सतह वाली, स्वादहीन व भंगुर होती हैं। ताजा अवस्था में इसमें से घोड़े जैसी गन्ध आती हैं। जड़ों में कई एल्केलॉइड्स पाए जाते हैं इसमें सबसे महत्वपूर्ण सोम्निफ़ेरीन हैं। अन्य एल्केलॉइड्स है- सोम्निफ़ेरीन, निकोटिन अथवा विथेनिन आदि।

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भूमि एवं जलवायु

अश्वगंधा को खरीफ के मौसम में देर से लगाते हैं। जमीन की अच्छी नमी एवं शुष्क मौसम में लगाना उत्तम हैं। भुरभुरी हल्की, काली, दोमट या लाल मिट्टी जिसका पी.एच. 7-8 हो और उचित जल निकास वाली मिट्टी सर्वोत्तम हैं। अधिक लवणीय एवं जल भराव वाली भूमि सर्वथा अनुपयुक्त हैं। राजस्थान, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, हरियाणा एवं पंजाब की भूमि इसके लिए सर्वथा उपयुक्त हैं।

भूमि की तैयारी

इसकी खेती ऐसे खेतों में करते हैं जहां पर सिंचाई का अच्छा प्रबंध नहीं हैं, तथा अन्न वाली फसलें लाभप्रद नहीं हैं। गर्मी के मौसम में वर्षा होने से पूर्व  2-3 बार खेत की जुताई करके पाटा लगा देते हैं।

बीज की बुवाई

प्रायः इसको छिटकवां विधि से बातें हैं। यदि बीज को पंक्ति में बोया जाए तो फसल अच्छी मिलती हैं। बुवाई के बाद बीज को हल्की मिट्टी से ढक देना चाहिएं।

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उर्वरक

बुवाई से पूर्व 15 किग्रा. नीम कोटेड नाइट्रोजन 15 किग्रा नीम कोटेड फॉस्फोरस मिलकर प्रति हेक्टेयर की डॉ से बुवाई की जाती हैं।

सिंचाई

अधिक पानी अश्वगंधा के लिए हानिकारक हैं। वर्षा ऋतू के समय यदि वर्षा उचित समय से होतो इसको अतिरिक्त सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती हैं।

कीट एवं व्याधि प्रबंधन

  • पौधों की जड़ों पर रूट नॉट, निमेटोड (मेलॉइडोगाहनी इग्नोन्नीटा रेस-2) का प्रकोप हो सकता हैं। जिसकी रोकथाम वर्मीकम्पोस्ट तथा ट्राइकोडर्मा के सयुक्त उपचार से होता हैं।
  • बुवाई के समय 5-6 मि. ग्रा. फ्यूराजन ( क्रियाशील तत्व) प्रति हेक्टेयर की दर से मिला देने से फसलों में निमकोटेड के प्रभाव को कम किया जा सकता हैं।
  • जैविक नियंत्रण हेतु पत्ती कीट के नीम का निस्सार एवं निमेटोड के लिए नीम की खली का प्रयोग कर सकते हैं।

प्रमुख रोग

  • अश्वगंधा मे लगने वाले प्रमुख रोग, विचेज ब्रूम, सीडलिंग रॉट, लिफ़ कार्ल, रूट नॉट हैं।

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जड़ों की खुदाई एवं ग्रेडिंग

बीजों के पकने पर एक सिंचाई के उपरांत (3-4 दिन) जड़ों को उखाड़कर इकट्ठा करें। जड़े काटकर तने से अलग कर लें। इसके उपरांत इनकी व्यास के अनुसार इन्हे वभिन्न श्रेणी में ग्रेडिंग कर लें।

ए ग्रेड

इस श्रेणी में मुख्यतया 5-7 सेमी. एवं 10-12 मिमी. व्यास वाला ऊपरी भाग आता हैं, जो चमकीला एवं ठोस होता हैं।

बी ग्रेड

इस श्रेणी में मुख्यतया 3.5 सेमी. एवं 5-7 मिमी. व्यास वाला  भाग आता हैं, इस भाग में एल्केलाइड ज्यादा होते हैं।

सी ग्रेड

एक्सट्रेक्ट निर्माण में सर्वथा उत्तम हैं।

डी ग्रेड

अधिक मोटी काष्ठीय कटी- फटी जड़ें इस श्रेणी में आती हैं।

जड़ उत्पादन

अच्छी पैदावार होने पर प्रति हेक्टेयर 12-15क्विंटल सुखी जड़ प्राप्त होती हैं। इनको नमी रहित जगह पर सुरक्षित रखा जाता हैं।

बीज भण्डारण

बीजों की सफाई करके मिट्टी के घड़ों में थोड़ी खाली जगह छोड़ते हैं, इसमें एक परत नीम की पत्ती लगाकर, राख से पूरा भरकर बंद कर दे एवं ऐसी जगह रखे जहाँ धुप एवं नमी न हो।

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उपयोग

अश्वगंधा की सुखी पीसी हुई जड़ को बराबर भागों में शहद तथा घी के साथ मिलकर प्रयोग करने से नपुसंकता एवं प्रजनन सम्बन्धी कमजोरी में लाभ होता हैं। पत्तियां पेट के कीड़े मारने, फोड़ों को ठीक करने, दुसाध्य अल्सर, टी.बी., तंत्रिका थकान, मस्तिष्क की थकान, उपदंश तथा संघटनात्मक बिमारियों के उपचार में प्रयोग करते हैं।

  1. अश्वगंधा की जड़ें शक्तिवर्धक हैं। इनका चूर्ण अन्य औषधियों के साथ बल्यो के रूप में व्यापक रूप में काम आता हैं। जड़ों से अश्वगंधारिष्ट नामक आयुर्वेदिक युग बनाया जाता हैं, जो स्नायु दुर्बलता, स्नायु रोगों तथा श्वेतप्रदर के उपचार में दिया जाता हैं। इसी प्रकार अश्वगंधा व विधारा की जड़ों से दुर्बल विवाहित पुरुषों के लिए अश्व्गन्धादि चूर्ण बनाया जाता हैं।
  2. बच्चों को दूध के साथ इसका चूर्ण दिया जाता हैं जो पेट के कीड़ों को मारता हैं।
  3. इसकी पत्तियाँ अरंडी के तेल के साथ विषेलें फोड़ों पर बांधी जाती हैं।
  4. यह प्रसिद्ध नारायण तेल का एक गटक हैं। इस तेल की जोड़ों के दर्द में मालिश की जाती हैं तथा बहरेपन में उपयोग किया जाता हैं।

इस लेख में अश्वगंधा के बारे में यदि कोई जानकारी छूट गई हो तो उसे और अपने विचार कमेंट बॉक्स में जरूर लिखे।

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