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अलसी की फसल में एकीकृत कीटनाशी प्रबंधन

अलसी की फसल
Written by bheru lal gaderi

अलसी(Linseed) तिलहन फसलों में दूसरी महत्वपूर्ण फसल है। यह लिने कुल की सदस्य है जिसका वानस्पतिक नाम लिनम यूसीटेटीसीमम है। यह मुख्य रूप से रबी मौसम की फसल है।

अलसी की फसल

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भारत में मुख्य रूप से मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, राजस्थान, ओडिसा, महाराष्ट्र एवं कर्नाटक आदि देशों में इसकी खेती की जाती है।

केवल मुख्य कीटों द्वारा अलसी की फसल को क्षति होती होती है। अलसी उगाये जाने वाले क्षेत्रों में कीटों द्वारा अधिक हानि होती है। कुछ स्थानीय कीट अलसी की फसल को हानि पहुँचाते है। देश के कुछ भौगोलिक क्षेत्रों में कीटों द्वारा अधिक हानि होती है। अलसी की फसल में बहुभक्षी व एकल भक्षी कीट पाए जाते है।

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कर्तन कीट (एग्रटिस एप्सिलॉन)

पहचान एवं जीवन चक्र

कर्तन कीट का वयस्क गहरा मटियाला या भूरा, अगले पंख प्रायः मटमैले भूरे, गहरे या हल्का धब्बा और वयस्क के पिछले पंख हल्के रंग के होते है। सामन्यतः वयस्क विभिन्न आकार के होते है लेकिन पंख फैलाकर 25-40 मिमी. के होते है। ग्रीष्म के अंत में मादा सम्भोग के बाद अण्डे देती है।

मादा हल्की दोमट भूमि में अण्डे देना पसंद करती है।  अण्डे एकल या गुच्छे में ठीक जमीन के निचले भाग पर देती है। इसकी सुंडी नम या लाल भूरे और 40 मिमी लम्बाई पर पहुँच जाती है।

क्षति के लक्षण

कर्तन कीट अलसी के पौधे को पूर्णतया या पौधे के जमीन के भाग से काट देता है। इसकी सुंडी दिन के समय जमीन के अंदर रहती है और रात के समय निकलकर पड़े को कहती है। पूर्ण विकसित सुंडी लगभग 3-4 सप्ताह तक कहती है व क्षतिग्रस्त पौधा पूर्णतया नष्ट हो जाता है या कमजोर होने के कारण बीमारी से ग्रसित हो जाता है। इस कारण फसल देरी से पकती है और उत्पादन कम होता है। कर्तन कीट के प्रकोप से फसल को 10 से 30 प्रतिशत तक की क्षति पहुंचती है।

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प्रबंधन

  1. खेतों के पास प्रकाश प्रपंच 20 फेरोमोन ट्रैप प्रति हेक्टेयर की दर से लगाकर प्रौढ़ कीटों को आकर्षित करके नष्ट किया जा सकता है। जिससे प्रौढ़ कीटों की संख्या कम की जा सकती है।
  2. खेतों के बीचो-बीच में घास फुस के छोटे-छोटे ढेर शाम के समय लगा देने चाहिए। रात्रि में जब सुन्डिया खाने को निकलती है तो बाद में इन्ही में छिपती है। जिन्हे घास हटाने पर आसानी से नष्ट किया जा सकता है।
  3. प्रकोप बढ़ने पर क्लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी. 1 लीटर पानी में प्रति हेक्टेयर में नीम का तेल 3% की दर से छिड़काव करे।
  4. फसल की बुवाई से पूर्व फोरेट (थीमेट) 10 जी ग्रेन्यूल्स की 20-25 किग्रा. मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें।

अलसी की कली या गालमीज मक्खी (डाईनूरिया लीनियर  बारनस)

पहचान

अलसी की कली वयस्क छोटा (1.0-1.5 मिमी. लम्बा)  शरीर, मक्खी नारंगी व लम्बे पैर और पंख के पीछे वे भाग पर बाल पाए जाते है। वयस्क सुबह जल्दी निकलता है व दिसंबर के अंत में या जनवरी के शुरू में शांत मौसम में एक पौधे से दूसरे पौधे पर मंडराता हुआ दिखाई देता है।

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जीवन चक्र

एक मादा अपने जीवन कल में 100 अंडे तक देती है। अण्डों से एक या दो दिन में फुट कर मैगेट कली में छेद करके अंदर प्रवेश कर जाती है और अंदर से हटी रहती है। काली में 3-4 मैगेट विकसित हो जाते है। कभी-कभी 10 मैगेट भी एक कली में पाए गए है। मैगेट हल्के नारंगी रंग के 7 दिन तक कली को खाते रहते है।

इसकी द्वितीय और तृतीय अवस्था में अधिक क्षति पहुँचाती है। इसकी तीन पीढ़ी जनवरी से मध्य मार्च तक पूरी होती है। जब फसल पक जाती है तो अधिकतर मैगेट भूमि में या पपोड़े के अवशेष में सिल्क कवर बना लेते है और कुछ समय के लिए निष्क्रिय अवस्था में चले जाते है।

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क्षति के लक्षण

काली मक्खी अलसी उत्पादक क्षेत्रों के लिए घातक व हानिकारक कीट है। इसका कीट बीज के उत्पादन को प्रभावित करता है और उपज को कली मक्खी द्वारा क्षति मध्य या उत्तरी मैदानी क्षेत्रों में अधिक होती है।

प्रबंधन

  1. फसल को अक्टूबर के अंतिम सप्ताह व नवम्बर के प्रथम सप्ताह में बोने से गालमीज अवरोधी व फिनोलेन मात्रा वाली प्रजातियों को बोयें।
  2. समय से बुवाई अधिक फॉस्फोरस और सिंचाई व दोनों और शाखा पर केप्सूल से कली के मक्खी के प्रकोप को कम किया जा सकता है।
  3. खाद का संतुलित मात्रा में प्रयोग करना चाहिए।
  4. मैगेट परजीवी चालसीड ततैया सिसटेसिस डेसूनेरी मैगेट की मात्रा को कम करने में सहायक होगा।
  5. आवश्यकतानुसार कीटनाशक रसायन साइपरमेथ्रिन 25% की 350 मिली. मात्रा या इमिडाक्लोप्रिड 8 एस. एल. की 1 मिली. मात्रा या डाइमेथोएट 30 ई.सी. या मेटासिस्टोक्स 25 ई. सी. 1.15-2.0 मिली. प्रति लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।
  6. कार्बरील 10% डी. पी. 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करें।

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लीफ माइनर या पर्ण सुरंगक कीट (फाइटोमाइजा हॉर्टिकोला)

पहचान एवं जीवन चक्र

लीफमाइनर अलसी का बहुभक्षी  कीट है भारत में वयस्क मक्खी चमकीले गहरे रंग की होती है। आकार में लगभग 2 से 3 मिमी. लम्बी होती है पूर्ण विकसित मैगेट पीले रंग की लगभग 3 मिमी. लम्बा और 0.75 मिमी. चौड़ी मैगेट 6-8 दिन खाने के बाद गैलरी में ही प्यूपा में बदल जाती है। एक सप्ताह बाद मक्खी निकलर बाहर आ जाती है।

क्षति

लीफ माइनर अलसी की फसल की 25% पत्तियों को क्षति पहुंचता है। इसका प्रकोप अधिकतर फरवरी व मार्च में होता है। लीफ माइनर के मैगेट पत्ती के निचले व ऊपर के भाग को कहते है और पत्ती की शिराओं में सुरंग बना लेते है।

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प्रबंधन

  1. प्रकोप होने पर 5% एन. एस. के. ई. का छिड़काव करें।
  2. फसल में नाइट्रोजन का अधिक प्रयोग न करें।
  3. अधिक प्रकोप होने पर थायोमिथाक्सोम 25 डब्ल्यू. पी. 100 जी या क्लोथिनिडीन 50% डब्ल्यू. डी. जी. 20-24 ग्राम 500 लीटर पानी में या डायमेथोएट 30 ई. सी. का 1.0-1.5 लीटर या मेटासिस्टोक्स का 1.5-2.0 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

प्लांट बग (बगराडा क्रुसिफेरा)

जीवनचक्र एवं पहचान

प्रौढ़ एवं शिशु दोनों बहुभक्षी कीट है और पौधो का तने,  पत्ती, व कली से रस चूसकर हानि पहुंचते है तथा रास चूसने वाले स्थान  गहरे काले धब्बे दिखाई देते है। मादा कीट अपने अंडे पत्तियों, तने व कलियों पर तथा कभी-कभी मिट्टी में देती है। अण्डों का रंग हल्का पीला होता है। तथा निम्फ जुलाई में निकलते है।

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क्षति

यह कीट अलसी के पौधे को क्षति पहुंचता है। कैप्सूल में विकसित होने से पहले जब निम्फ की संख्या अधिक होती है निम्फ के चूसने के कारण बाह्य त्वचा सुख जाती है व फट जाती है। इस कारण कली व फूल लाल रंग के हो जाते है। क्षति के स्थान पर माल फॉरमेर्शन हो जाता है।

प्रबन्धन

  1. इस कीट के शिशु तथा प्रौढ़ दोनों ही हानि पहुँचाते है। इसके प्रौढ़ तथा शिशु पत्तियों तथा तने से रास चूसते है। सिंचाई करते समय क्रूड ऑयल इमल्सन का प्रयोग करना चाहिए।
  2. प्रकोप दिखाई देते ही नीम तेल 4 मिली. प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। इसमें 5 ग्राम टिपोल या सर्फ भी मिला देना चहिये।
  3. मैलाथियान 5% अथवा कर्बरील धूल का 15-20 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करना चाहिए।
  4. आवश्यकतनुसार मैलाथियान 50  ई. सी. 1 मिली. लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए।

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फल भेदक कीट (हेलिकोवर्पा आर्मीजेरा)

पहचान एवं जीवन चक्र

इस कीट का वयस्क मध्यम आकार का पीले-भूरे रंग का होता हैं। अगले पंखों पर भूरे रंग की का धारिया होती हैं तथा इन पर सेम के आकार के भिन्न-भिन्न नाप के काळा धब्बे पाए जाते हैं। जबकि निचले पंखों का रंग सफेद होता हैं। जिनकी शिराओं स्पष्ट रूप से काली दिखाई देती हैं और उनके बाहरी किनारों पर चौड़ा धब्बा होता हैं।

इस कीट की मादा अलसी की पत्तियों, बाह्यदल पुंज की निचली सतह पर हल्के पिले रंग के खरबूजे की तरह धारियों वाले एक-एक करके अंडे देती हैं। एक मादा अपने जीवन काल में लगभग  500-1000 तक अंडे देती हैं। ये अंडे 3  से 10 दिनों के अंदर फुट जाते हैं और इनसे चमकीले हरे रंग की सुंडिया निकलती हैं।

क्षति

इसकी सुनी चढ़ने वाली सुंडी से अलग होती हैं। नवजात सुंडी फूल, कली और एक समय के लिए केप्सूल में घुस जाती हैं और केप्सूल के अंदर का न्यूट्रिएंट खा जाती हैं सुंडी केप्सूल से बाहर निकलकर पत्ती खाती हैं और फिर दूसरे केप्सूल में घुस जाती हैं। सुंडी की 3 प्रति मीटर पर फसल के उत्पादन में 30% तक की कमी हो जाती हैं।

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प्रबंधन

  1. खेतों की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करनी चाहिए। इससे प्यूपा ऊपर आ जाते हैं। जिन्हे प्राकृतिक क्षत्रु खा जाते हैं। जुताई सुबह के समय ज्यादा उपयुक्त होती हैं।
  2. फलस चक्र में अरहर, कपास आदि फसलें न रखें।
  3. सुंडी ग्रसित भागों को तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए।
  4. खेत में 20 फेरोमोन ट्रेप प्रति हेक्टेयर की दर से लगाये।
  5. खेत में परजीवी पक्षियों के बैठने हेतु 10 ठिकाने प्रति हेक्टेयर के अनुसार लगाए।
  6. सुंडी की प्रथमावस्था दिखाई देते ही 250 एल.ई. का एच एन पी वी को एक किलोग्राम गुड़ तथा1% टिपोल के घोल के साथ प्रति हेक्टेयर की दर से 10-12 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।
  7. इसके अतिरिक्त 1 किग्रा. बी.टी. का प्रति हेक्टेयर प्रयोग करें।
  8. तदोपरांत 5% एन एस के ई का छिड़काव करें।
  9. प्रकोप बढ़ने पर क्विनालफॉस 25 ई.सी. या क्लोरोपायरिफॉस 20 ई.सी. का 2 मी.ली. प्रति लीटर या इमिडाक्लोप्रिड8 एस.एल. की 1 मिली. प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।
  10. स्पाइनोसेड 45  एस.सी. की  1  मिली. प्रति लीटर पानी का प्रयोग करें।

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सेमीलूपर (प्लुसीया औरीचेल्सिया)

पहचान एवं जीवन चक्र

इसका व्यस्क कीट मुख्य रूप से गहरा शरीर, अग्रपंख सिकुड़े और पंख फैलाकर लम्बाई 40  मिमी. इस कीट की सुंडिया गहरे हरे रंग की होती हैं, शरीर के ऊपरी भाग पर लंबवत धारी जो 4 से.मी. लम्बी होती हैं। इस कीट की सुंडी पीट को ऊपर उठाकर अर्थात अर्धलुप बनाती हुई चलती हैं, इसलिए इसे सेमीलूपर कहां जाता हैं यह पत्तियों को कुतर कर खाती हैं।

एक मादा अपने जीवन काल में 400-500  तक अंडे देती हैं। अण्डों से 6-7 दिन में सुन्डिया निकलती हैं जो 30-40  दिन तक सक्रिय रहकर पूर्ण विकसित हो जाती हैं। पूर्ण विकसित सुन्डिया पत्तियों को लपेटकर उन्ही के अंदर प्यूपा बनाती हैं। जिनसे एक से दो सप्ताह बाद सुनहरी रंग का पतंगा बाहर निकलता हैं। अलसी उत्पादन क्षेत्रों में इसकी चार से पांच पीढ़ियां पाई जाती हैं।

क्षति

सुंडी अलसी की फसलों को अंतिम अवस्था फूल, कली व पत्ती को खाती हैं। यह मुख्य क्षतिकार कीट चढ़कर काटने वाला कीट हैं और एक थोड़े समय में अलसी की फसल को क्षति पहुंचाता हैं। चढ़ने वाली सुंडी कर्तन कीट से हमेशा भूमि से ऊपर से पौधे के प्रत्येक भाग को काटती हैं। सेमीलूपर जो भारत के विभिन भागों में पाई जाती हैं यह फल, सब्जी की फसल को अलसी की फसल को भी खाती हैं।

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प्रबंधन

  1. खेतों ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करनी चाहिए व रोग व कीट प्रतिरोधी जातियों की बुवाई करनी चाहिये।
  2. बीज को कीटनाशी व फफूंदीनाशकों द्वारा उपचार करना चाहिये।
  3. खेत में 20 फेरोमोन ट्रेप प्रति हेक्टेयर की दर से लगाए।
  4. खेत में परजीवी पक्षियों के बैठने हेतु 10 ठिकाने प्रति हेक्टेयर के अनुसार लगाये।
  5. प्रकोप बढ़ाने पर एंडोसल्फान 35 ई.सी. (50 से 2.0 मिली. प्रति लीटर) या क्लोरोपायरिफॉस 20 ई.सी. एक लीटर प्रति हेक्टेयर या नीम का तेल 3% की दर से छिड़काव करें।

बिहारी बालदार सुंडी (स्पाइलोसोपा ओबलिक्वा)

इस कीट के वयस्क सफेद पंख वाले होते हैं, जिनपर छोटे-छोटे बिंदु होते हैं। व्यस्क का शरीर नारंगी रंग का होता हैं तथा उनपर काली धारिया पाई जाती हैं। मादा पत्तियों की निचली सतह पर समूह में अंडे देती हैं जो पीलापन लिए हुए सफेद रंग के होते हैं। एक मादा अपने जीवनकाल में 800-1000 अंडे देती हैं।

अंडे 3-4 दिन में फुट जाते हैं अंडो से निकली छोटी सुन्डिया प्रारम्भ में एक स्थान पर झुंड में चिपकी रहती हैं। फिर एक दो दिन बाद अलग-अलग बिखर जाती हैं। पूर्ण विकसित सुंडी गहरे नारंगी या काले रंग की होती हैं, जिसके शरीर पर चारो तरफ घने बाल होते हैं। ये पौधे की पत्तियों की निचली सतह से क्लोरोफिल खा जाती हैं। पौधे की पत्तियां जाल सी दिखाई देती हैं।

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प्रबंधन

  1. खेत की ग्रीष्मकालीन जुताई कर कीट की संख्या को कम किया जा सकता हैं।
  2. अंडो/सुंडी के गुच्छो को हाथ से पत्ती सहित तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए।
  3. प्रथमावस्था में सुंडी दिखाई देते ही एस. ओ.पी.वी. की 250 एल.ई. या 3×1012 पी.ओ.बी. प्रति हेक्टेयर की दर से 7-8 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।
  4. फसल में फॉलिडाल धूल 2% का 20-25 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करना चाहिए।
  5. स्पाईनोसेड 45 एस.सी. इण्डोक्सकार्ब 14.5 एस.सी. व थायोमेक्जाम 70 डब्ल्यू.एस.सी. की 1 मिली. प्रति लीटर का प्रयोग करें।

Author :-

डॉ – ऋषिपाल
सरदार वल्ल्भ भाई पटेल कृषि एवं प्रोद्योगिक विश्वविद्यालय, मेरठ, उ. प्र.

स्रोत :- फसलक्रान्ति पत्रिका

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website – fasalkranti.com

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