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अरहर की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

अरहर
Written by bheru lal gaderi

अरहर का दलहनी फसलों में प्रमुख स्थान। अरहर की खेती असिंचित एवं सिंचित दोनों दशाओं में की जाती है। 85% अरहर की खेती असिंचित बरानी खेती के रूप में की जाती है। तथा केवल 15%  सिंचित क्षेत्रफल में अरहर की खेती की जाती है। देश की औसत उत्पादकता 678 किग्रा. प्रति हेक्टेयर है जबकि प्रदेश की औसत उत्पादकता 800 किग्रा. प्रति हेक्टेयर है जो देश एवं प्रदेश की औसतन उत्पादकता से अधिक है लेकिन उन्नतशील प्रजातियों की उत्पादकता से एक तिहाई है।

अरहर

दलहनी फसलों में अरहर का उत्पादन सघन सस्य क्रियाओं को अपनाकर बढ़ा सकते है।

भूमि का चुनाव

अरहर की फसल के लिए बलुई दोमट एवं दोमट मिटटी उपयुक्त रहती है। उचित जल निकासी व हल्के ढाल वाले खेत इसके लिए उपयुक्त रहते है। लवणीय एवं क्षारीय भूमि अरहर की खेती सफलतापूर्वक नहीं की जा सकती है।

खेत की तैयारी

खेत की पहली जुताई मिटटी पलटने वाले हल से तथा 2-3 जुताई देशी हल या ट्रेक्टर चलित कल्टीवेटर से करनी चाहिए।

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बुवाई का समय एवं विधि

शीघ्र पकने वाली प्रजातियों को मध्य जून तक बुवाई सिंचित दशा में कर देनी चाहिए। जिससे गेहूँ की बुवाई १५ नवम्बर तक की जा सके।  अरहर की फसल को लाइन से लाइन की दुरी 45-60 से.मी. की दुरी पर मेड़ो पर लगाया जाये तो अधिक उपज प्राप्त की जा सकती है। अरहर के बाद गेंहू की बुवाई जीरो टिलेज सीडड्रील के द्धारा करने से समय से बुवाई हो जाती है तथा उपज अधिक मिलती है। खाद एवं बीज एक साथ उचित गहराई पर गिरते है।

अरहर की उन्नत किस्में

क्र.स.

प्रजाति बोने का समय पकने की अवधि

दिन में

औसत उपज

(क्वि./है.)

1. मानक मध्य जून 140-145 18-20
2. वारस मध्य जून 150-155 18-20
3. यु.सी.ए.एस.-120 मध्य जून 150-155 20-22
4. आई.सी.पी.एल.-88039 मध्य जून 140-145 20-25
5. पूसा-992 मध्य जून 140-142 14-18

बीजोपचार

1 ग्राम कार्बेन्डाजिम को प्रति ग्राम बीज में मिलाकर बीज उपचार करना चाहिए। अरहर के बीज को फफूंदनाशक उपरांत विशिष्ट राइजोबियम कल्चर से उपचारित करना चाहिए। 10 किग्रा. बीज में 1 पैकेट कल्चर पर्याप्त रहता है। कल्चर को आधा लीटर पानी 50 ग्राम गुड़ घोलकर बीज को हल्के हाथ से मिलाकर छाया में सुखाकर सायंकाल बुवाई करनी चाहिए। तेज धुप में बुवाई करने पर जीवाणुओं के मरने की आशंका रहती है।

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बीज की मात्रा

15 किग्रा. शुद्ध एवं प्रमाणित बीज पर्याप्त रहता है। बिवाई के 20 से 25 दिन बाद सघन पौधों को निकलकर 20 से.मी. दुरी निश्चित कर देनी चाहिए।

उर्वरकों का प्रयोग

अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए मृदा का परीक्षण करवाकर, परीक्षण रिपोर्ट की सिफारिश अनुसार उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए। औसत उर्वरक का प्रति हेक्टेयर 20 किग्रा. नत्रजन, 50 किग्रा. फॉस्फोरस, 20 किग्रा. पोटाश एवं 20 किग्रा. सल्फर का प्रयोग करना चाहिए। फॉस्फोरस का प्रयोग सिंगल सुपर फास्फेट के रूप में करना चाहिए। जिससे गंधक की भी पूर्ति हो जाती है। उर्वरकों का प्रयोग कूड़ों फर्टीसीडड्रील से करना चाहिए।

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सिंचाई

यदि समय पर वर्षा न हो तो अथवा कम नमी की अवस्था में एक सिंचाई फलियां बनने के समय अक्टुंबर माह में अवश्य की जानी चाहिए।

खरपतवार नियंत्रण

बुवाई के एक माह के अंदर पहली निराई-गुड़ाई करनी चाहिए तथा दूसरी पहली के 20 दिन बाद करनी चाहिए। रासायनिक विधि से भी खरपतवार नियंत्रण किया जा सकता है। घास एवं छोड़ी पत्ती वाले खरपतवारों  को नियंत्रित करने के लिए पेडीमेथलीन 30 ई.सी. 3 लीटर मात्रा को 500-600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए अथवा इमेजाथापर 10 ई.सी. लीटर की मात्रा प्रति हेक्टेयर 400-500 लीटर पानी में घोल कर बुवाई के 20-25 दिन बाद छिड़काव करना चाहिए।

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फसल सुरक्षा

कीट

फली भेदक कीट

पहचान

इसकी गिंडारे फलियों के अंदर घुस कर नुकसान पहुँचती है। क्षतिग्रस्त फलियों में छिद्र दिखाई देते है।

उपचार

इसकी रोकथाम हेतु निम्न में से एक कीटनाशक का छिड़काव फसल में फूल आने से पूर्व करना चाहिए। यदि आवश्यक हो तो 15 दिन बाद पुनः एक बार छिड़काव करना चाहिए।

  • मोनोक्रोटोफॉस (36 ई.सी.) 800 मी.ली. प्रति हेक्टेयर।
  • फेनवेलरेट 20 ई. सी. 100 ग्राम अथवा साइपर मैथरीन 20 ई.सी. का 80 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर। मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत या क्यूनालफॉस १.५ प्रतिशत अथवा फेनवेलरेट 0.4 प्रतिशत चूर्ण 25 किग्रा./ हेक्टेयर।
  • एन. पी.पी. 350 एल. ई. प्रति हेक्टेयर।
  • निंबोली 5% + 1% साबुन घोल।
  • अरहर के खेत में चिड़ियों के बैठने के लिए बांस की लकड़ी की टी आकार की 10 खूंटी प्रति हेक्टेयर के हिसाब से गाड़ दे।

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पत्ती लपेटक कीट

पहचान

सुंडिया पिले रंग की होती है। जो पौधे की चोटी की पतियों को लपेटकर सफेद जाला बुनकर उसी में छिपी पत्तियों को खाती है। बाद में फूलों एवं फलों को भी नुकसान पहुंचाती है।

उपचार

इसकी रोकथाम हेतु निम्न में से एक कीटनाशक का बुरकाव/छिड़काव करना चाहिए।

  • मोनोक्रोटोफॉस (36 ई.सी.) 800 मी.ली. प्रति हेक्टेयर।
  • मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण 25 किग्रा./ हेक्टेयर।
  • अरहर की फल मक्खी
पहचान

फली के अंदर दाने को खाकर नुकसान पहुँचाती है।

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उपचार

फूल आने के मोनोक्रोटोफॉस 36 ई.सी. या डाइमेथोएट 36 ई.सी. एक लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से फसल पर छिड़काव करें।

रोग

अरहर का उकटा रोग

पहचान

यह फ्यूजेरियम नामक कवक से फैलता है। यह पौधों में पानी व खाद्य पदार्थ के संचार को रोक देता है जिससे पत्तियां पिली पड़कर सुख जाती है और पौधा सुख जाता है। इसमें जड़े सड़कर गहरे रंग की हो जाती है तथा छाल हटाने पर जड़ से लेकर तने की ऊंचाई तक काले रंग की धारियां पड़ जाती है।

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उपचार
  • जिस खेत में उकठा रोग का प्रकोप अधिक हो ऐसे खेत में 3-4 साल तक अरहर की फसल नहीं लेनी चाहिए।
  • ज्वर के साथ अरहर की सहफसल लेने से किसी हद तक उकठा रोग का प्रकोप कम हो जाता है।
  • थीरम एवं कार्बेन्डाजिम को 2.1 के अनुपात में मिलकर 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज उपचारित करना चाहिए।

अरहर का बंझा रोग

पहचान

ग्रसित पौधे में पत्तियां अधिक लगती है, फूल नहीं आते है जिससे दाना नहीं बनता है। पत्तियां छोटी तथा हल्के रंग की हो जाती है। यह रोग माइट द्धारा फैलता है। उपचार इसका अभी कोई प्रभावकारी रासायनिक उपचार नहीं निकला है।

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जिस खेत में अरहर बोनी है उसके आस-पास अरहर के स्वयं उगे पुराने पौधों को नष्ट कर देना चाहिए।

प्रमुख प्रभावी बिंदु

  • बीज शोधन आवश्यक रूप से किया जाय।
  • सिंगल सुपर फॉस्फेट का फॉस्फोरस एवं गंधक हेतु उपयोग किया जाय।
  • समय से बुवाई की जाय।
  • फली भेदक एवं फल मक्खी का नियंत्रण आवश्यक है।
  • विरलीकरण भी आवश्यक है

उपज

उपरोक्त तकनीकी बिंदुओं को अपनाकर अरहर 25 क्विंटल/हेक्टेयर उत्पादन लिया जा सकता है।

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