अरबी की उन्नत खेती एवं अधिक उत्पादन

By | 2017-05-17

अरबी भूमिगत शाखीय फसलों में से एक महत्वपूर्ण फसल है। अरबी सब्जियों के लिए विभिन्न रूप से उपयोग की जाती है। इसके कंदों को उबालकर सब्जियों के रूप में या उपवास में फलाहार के रूप में उपयोग में लिया जाता है। इसकी चोडी- चोडी पतियों की करेला और पालक की तरह सब्जी बनाई जाती है। पत्तियों को बेसन के साथ मिलकर स्वादिष्ट सब्जी बनाई जाती है। पत्तियों से पकोड़े भी बनाए जाते है इस प्रकार अरबी के पत्ते एवं कंद दोनों ही सब्जी एवं स्वादिष्ट व्यंजन बनाने में काम आते है। अरबी में कार्बोहाइड्रेट, केल्शियम, विटामिन ‘ए’ प्रोटीन तथा केलोरी प्रचुर मात्रा में होता है।

अरबी

जलवायु

अरबी की फसल को गर्म तथा आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है। इसलिए इसे ग्रीष्म एवं वर्षा दोनों ही मोसमो में सफलता पुर्वक उगाया जा सकता है। अरबी की बुवाई के लिए पर्याप्त जीवांश वाली रेतीली दोमट मिट्टी अच्छी रहती है। जिसमे कड़ी परत न हो साथ ही जल निकास की अच्छी पर्याप्त व्यवस्था हो। अरबी के खेतों में पानी अधिक समय तक भरा रहने पर अरबी के पोधे सड़ने की सम्भावना अधिक रहती हें. अतः जल निकास की व्यवस्था होना आवश्यक है।

Read also – अदरक की उन्नत खेती एवं फसल सुरक्षा उपाय

खेत की तेयारी

अरबी फसल रोपण के लिए मेड और नालियों में गड्डे खोदकर अथवा समतल भूमि करके खेत तेयार किया जाता हें. मिट्टी तेयार करते समय कंद के उचित निर्माण तथा जमीन में रुके जल के परीस्रवन को रोकने के लिए मुख्य उद्धेश्य होना चाहियें। जहा पानी उचित मात्रा में उपलब्ध हो वहा पंक्ति व पोधे की दुरी कम की जा सकती हें जिससे प्रति हेक्टेयर अधिक कंद उत्पादन होगा। इसके बाद 2-3 बार हेरो या कल्टीवेटर चलाकर खेत को  समतल एवं भुरभुरा कर ले।

प्रजातियाँ

अरबी में प्रायः स्थानीय किस्मे फेजाबदी, लाघरा, बंसी, बंगाली बड़ा, पंचमुखी, गुरारी काचू आदि उगे जाती है। इसके अतिरिक्त एस-3, एस-11, वार्म-1,2 ग्यानो12,22,36 सी-9 व 266 और गोराय, काशिबुग्गा, कुबेर और कोवलयर उन्नत किस्म की प्रजातियाँ हें. इसके अतिरिक्त नरेंद्र अरबी-1 अच्छे उत्पादन वाली किस्मे है।

Read also – सूरजमुखी की उन्नत खेती एवं फसल सुरक्षा उपाय

बुवाई एवं बिज मात्रा

अरबी की बुवाई साल में दो बार फरवरी-मार्च तथा जून- जुलाई में की जाती है।  इसके लिए पर्याप्त जीवांश वाली रेतीली दोमट भमि अच्छी रहती है।  इसके लिए गहरी भूमि होनी चाहियें, ताकि इसके कंदों का समुचित विकास हो सकें। अरबी के लिए 8-10 क्विंटल बिज प्रति हेक्टेयर उपयोग करें। अरबी को समतल क्यारियों अथवा मेड़ो पर 45 सेमी. कतार से कतार की दुरी तथा 30 सेमी. पोधो से पोधो की दुरी रख कर बिज वाली गाठो को 7.5 सेमी. गहराई पर मिट्टी मिट्टी के अन्दर बो दें।

अरबी का खाद्य मूल्य- प्रति 100 ग्राम

क्र. पोषक तत्व  मात्रा
1. नमी 37.10ग्राम
2. वसा 0.10 ग्राम
3. रेशा 1.00ग्राम
4. खनिज पदार्थ 1.70 ग्राम
5. प्रोटीन 3.00 ग्राम
6. लोहा 1.701 मि.ग्रा.
7. पोटेशियम 555.00मि.ग्रा.
8. थियामिन 0.9मि.ग्रा.
9. कार्बोहाइड्रेट 21.10ग्राम
10. विटामिन ‘ए’ 400.00आई.यू.
11. केल्शियम 40.00मि.ग्रा.
12. सोडियम 9.00मि.ग्रा.

read also – मूँगफली की उन्नत खेती एवं फसल सुरक्षा उपाय

खाद एवं उर्वरक

अरबी के लिए मृदा जाच के उपरांत खाद एवं उर्वरकों की संस्तुत मात्रा का उपयोग करें. जिसमे पक्के गोबर की खाद 25-30 टन, नाइट्रोजन 100 किलोग्राम, फोस्फोरस 60 किलो, पोटाश 80 किलो, प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता रहती है। गोबर की खाद को प्रथम जुताई से पूर्व खेत में समान रूप से फेलाकर जुताई करें ताकि खाद समान रूप से खेत में मिल जाये. नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फोस्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई के समय डालना चाहिए। नाइट्रोजन की शेष आधी मात्रा दो बार में बुवाई के समय 35- 40 दिन और 70 दिन बाद खड़ी फसल में समान रूप से खेत में डालना चाहिए।

सिंचाई एवं निराई- गुड़ाई

जायद की फसल में अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती हें. गर्मियों में 6-7 दिन के अंतर में सिचाई करते रहना चाहिए। बरसात में प्रायः सिंचाई की आवश्यकता नही होती फिर भी खेत में नमी कम होने पर 15- 20 दिन पर सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। बरसात में जून या जुलाई के समय प्रथम सप्ताह तक कंदों पर मिट्टी चढ़ाना आवश्यक है। जिससे कंदों का विकास अच्छा होगा। तने अधिक मात्रा में निकलने पर एक या दो मुख्य तनों को छोड़कर शेष तनो की कटाई करें।

Read also – कालमेघ की वैज्ञानिक खेती एवं औषधीय महत्व

अरबी में लगने वाले मुख्य रोग एवं कीट

व्याधि निम्न हें, जिनसे फसल को बचाना अत्यावश्यक है।

लीफ ब्लाइट- फफूंद फाइटोफ्थोरा- पत्तों के किनारों पर बेंगनी- खाकी रंग के गोल धब्बे बना जाते है।

पिथियम सडन- कंद और जड़ नरम होकर सड़ जाते है।

रोकथाम

फफूंद नाशक जेसे डाइथेन- एम-45 (0.2%) अथवा ब्लाइटोक्स 50(0.3%) के छिडकाव से रोकथाम की जा सकती है।

कीट नियंत्रण

इसमे मुख्यतः बीटल फली बीटल कद्दू के लाल भृंग अरबी लीफ हॉपर, शकरकंद हॉक मोथ व एफिड्स अरबी के मुख्य कीट है। पत्तियां खाने वाले कीटों (सुंडी व मक्खी) से भी अरबी की फसल को हानी अधिक होती है। क्योंकि ये कीट नयी पतियों को खा जाते है, कभी-कभी इन कीटों का अधिक प्रकोप होने पर पूरा पोधा नष्ट हो जाता है। इनकी रोकथाम के लिए मेलाथियान 5% या क्विनाल्फोस 1.5% धुल को 15-20 किलो/हे. की दर से भुरकाव करें। रसचुस्क किट जेसे माहों सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए मेटासिस्टक्स या डायमेथोइट दवा को 1 एम.एल./ली. पानी में गोल बनाकर छिडकाव करें।

उपज एवं भण्डारण

बुवाई के लगभग 3 महीने बाद खुदाई के लिए तेयार हो जाती है। जब पत्तियां सुख जाए तब इनकी खुदाई करनी चाहियें। अरबी का प्रति हेक्टेयर 300-400 क्विंटल उत्पादन प्राप्त होता है। खुदाई के पश्चात् इसे कमरे में फेलाकर सुखा दे जहा गर्मी न हो। कुछ दिन के अंतराल पर पलटते रहना चाहिए।

You may lika also – अश्वगंधा की जैविक खेती एवं औषधीय महत्व

Facebook Comments