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अरण्डी की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

अरण्डी की उन्नत खेती
Written by bheru lal gaderi

अरण्डी की खेती राजस्थान में मुख्यतया जालौर, सिरोही, पाली, जोधपुर, बाड़मेर, गंगानगर एवं बीकानेर जिलों में की जाती है। उसके तेल की अत्यधिक मांग की वजह से अरण्डी के बाजार भाव में तेजी से वृद्धि हुई है और इसी वजह से इसकी खेती का क्षेत्रफल राजस्थान में तेजी से बढ़ रहा है। राजस्थान के अलावा गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, उड़ीसा एवं हरियाणा में अरण्डी की खेती की जाती है।

इसके तेल में 20 से 30% रिसिनोलिक अम्ल होता है। अरण्डी का तेल मुख्यता औद्योगिक उत्पादन जैसे ऑयल पेंट, वार्निस, डिस्टेम्पर,  कपड़ा रंगने का रंग, साबुन, प्लास्टिक, ग्रीस, छापने की स्याही, लिनोलियम, घर्षण तेल, पोलिश, मरहम, हाइड्रोलिक ऑयल, चिपकाने वाले पदार्थ, कब्ज हरण औषधियां व श्रंगार उत्पादनों (लिपस्टिक एवं नेल पॉलिश) को बनाने में काम आता है। अरण्डी के तेल का हाइड्रोजनीकरण करके कोल्ड वेक्स बनाया जाता है जो बिजली के तारों में इंसुलेटर के रूप में काम आता है। इन्हीं विशेषताओं की वजह से पश्चिमी देशों में इसकी भारी मांग हैं।

अरण्डी की उन्नत खेती

भारत विश्व में सर्वाधिक अरण्डी उत्पादन करने वाला देश हैं। भारत में वर्ष 2009-10 के दौरान 8.14 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में अरण्डी का उत्पादन हुआ। अरण्डी के तेल व अन्य उत्पादनों के लिए वर्ष 2009-10 में 2000 करोड़ रुपयों से ज्यादा की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई। भारत के आलावा चीन, ब्राजील व इजराइल देशों में अरण्डी की खेती की जाती है।

अरण्डी की खेती एक बेहतर जैविक खाद का काम करती है, इसके अंदर 2-4% नत्रजन, 2.5% फास्फोरस एवं 1.5% पोटाश तत्व पाए जाते हैं। अरण्डी की खली का पशु आहार में उपयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि इसमें जहरीले रसायन होते हैं। अरण्डी के पत्तों से रेशम उत्पादन के लार्वा को भी पाला जा सकता है। अरण्डी का तेल पूर्णतः बायोडिग्रडेबल (जैविक अपघटक) है।

अच्छे फसल प्रबंधन को अपनाकर सिंचित परिस्थितियों में इसकी 35 से 40 क्विंटल प्रति हेक्टर पैदावार आसानी से ली जा सकती है। मगर इसकी खेती के आधुनिक तरीकों को अपनाकर अधिक उपज प्राप्त कर सकते हैं। राजस्थान में इसकी उत्पादकता 1316 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर ही है।

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जलवायु

इसकी खेती सभी प्रकार की जलवायु में की जा सकती है। परंतु मुख्यतया सूखे और गर्म क्षेत्रों में जहां वर्षा 400 से 750 मी.मि. तक होती है, वहां आसानी से की जा सकती है। यह लंबे समय तक सूखे के साथ- साथ अधिक वर्षा को भी सहन कर सकती है। मगर ज्यादा वर्षा होने पर फसल में बढ़वार ज्यादा हो जाती है, जिससे कि रोगों का प्रकोप अधिक होता है और उत्पादन में गिरावट आती है। अरण्डी की फसल पाले से ज्यादा प्रभावित होती है।

किस्में                                      

जी सी एच-4 (1988)

इस संकर किस्म की मुख्य शाखा की ऊंचाई 120 से 170 सेंटीमीटर होती है। इसमें 50 से 60 दिन में फूल आ जाते हैं। दाना भूरा तथा दानें का रंग लाल होता है तथा फल पर अपेक्षाकृत कम कांटे होते हैं। तेल की मात्रा 48% एवं पैदावार बारानी क्षेत्र में 9 से 10 क्विंटल तथा सिंचित क्षेत्र में 20 से 23 क्विंटल होती है लेकिन ऊपर 12 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है, मुख्य शाखा 90 से 100 दिन में पकना प्रारंभ हो जाती है, परंतु पकाव अवधि 210 से 240 दिन है। यह किस्म उखटा एवं जड़ विगलन रोगरोधी हैं।

जी सी एच-5 (1997)

यह संकर किस्म हैं जो सिंचित क्षेत्र में बुवाई के लिए उपयुक्त है। इस किस्म के तने का रंग मटमैला लाला तथा फल पर अपेक्षाकृत कम कांटे होते हैं। तने तथा पत्तियों की नीचे की सतह पर मोमनुमा परत पाई जाती है। पौधों की ऊंचाई लगभग 200 से 230 सेमी तथा मुख्य असीमाक्ष (सिकरे) तक तने पर 15 से 18 गाँठे पाई जाती है। इस किस्म के 100 बीजों का भार लगभग 30 से 32 ग्राम होता है। सिंचित क्षेत्र में उपज 30 से 35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। बीज में तेल की मात्रा 49.6 प्रतिशत होती है। यह संकर किस्म उखटा रोगरोधी है।

आर एच सी-1 (2002)

यह संकर किस्म हैं जो सिंचित तथा असिंचित क्षेत्र में बुवाई के लिए उपयुक्त है। इस किस्म के तने का रंग मटमैला लाल, फल कांटेदार, पर पत्तियों के दोनों तरफ मोमनुमा परत पाई जाती हैं। तने पर मुख्य असीमाक्ष तक 13 से 17 गाँठे होती है। बीज का रंग हल्का चॉकलेटी आकार मध्यम एवं 100 बीजों का वजन 26 से 28 ग्राम तक होता है। सिंचित क्षेत्र में उत्पादन 32 से 36 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। बीज में तेल की मात्रा 49.3% होती है। लवणीय एवं हल्के क्षारीय क्षेत्रों के लिए भी यह किस्म उपयुक्त पाई गई है। यह संकर किस्म उखटा रोगरोधी है तथा इस में हरे तेले का प्रकोप भी कम पाया जाता है।

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डी.सी.एस.-9/ज्योति

इस उन्नत किस्म के तने का रंग गहरा लाल, फल कांटेदार, तने एवं पत्ती की निचली सतह पर मोमनुमा परत पाई जाती हैं। तने पर मुख्य असीमाक्ष सिकरे तक 14 से 15 गांठे होती हैं। तने की मुख्य शाखा की लंबाई लगभग 45 से 55 सेमी एवं सिट्टे की औसत लंबाई 35 सेमी. होती है। इस किस्म के सौ दानों का वजन 26 से 29 ग्राम तथा औसत उपज सिंचित अवस्था में 25 से 27 क्विंटल प्रति हेक्टेयर एवं असिंचित अवस्था में औसत उत्पादन 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होते हैं। बीजों में तेल की मात्रा 45% होती है। यह किस्म उखटा रोग प्रतिरोधक है।

जी.सी.एच.-7 (2006)

इस संकर किस्म के तने का रंग मटमैला लाल तथा कम कांटेदार होते हैं। तने शाखाओं पत्तों तथा फल पर मोमनुमा परत पाई जाती है। तने पर मुख्य असीमाक्ष तक औसत 18 गांठे होती हैं। मुख्य असीमाक्ष में 57 से 60 दिन की अवधि में फूल आ जाते हैं। सौ बीजों का वजन 32 से 34 ग्राम तथा सिंचित अवस्था में औसत उत्पादन 32-36 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है। उखटा रोग व सूत्रकृमि के प्रति उच्च रोधक क्षमता के अलावा हरा तेला का प्रकोप भी कम होता है।

खेत की तैयारी

अरण्डी की खेती सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती है। मगर अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होती है। भराव वाले क्षेत्र एवं क्षारीय भूमि अरण्डी की खेती के लिए उपयुक्क्त नहीं हैं। जल निकास अच्छा नहीं हो तो जड़ विगलन एवं उकठा रोग होने की संभावना बढ़ जाती है।

अरण्डी के लिए ऐसे खेत का चयन करें जहां पिछले 3 साल में अरण्डी नहीं बोई गई है। चयनित क्षेत्र में मानसून की वर्षा के साथ उगने वाले खरपतवारों को दो-तीन गहरी जुताईया कर नष्ट कर दे। अंतिम जुताई के पहले 5 टन गोबर की खाद, 250 किलोग्राम जिप्सम प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिला दे और फिर पाटा लगाकर अरण्डी की बुवाई हेतु लाइने निकाले। जिन खेतों में दीमक की समस्या हो वहां पर मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत पाउडर को 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से अंतिम जुताई के समय मिट्टी में मिला दे।

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बुवाई का समय

मानसून की वर्षा शुरू होने पर पहले बाजरा, मुंग, ग्वार, मोथ इत्यादि फसलों की बुवाई करें। इसके बाद 15 जुलाई से अरण्डी की बुवाई शुरू करें और अगस्त के प्रथम सप्ताह तक पूरी कर दे। मानसून की वर्षा के साथ जल्दी बुवाई करने से सितंबर माह में सेमीलूपर का प्रकोप हो जाता है साथ ही इसके मुख्य असीमाक्ष में नर व मादा पुष्पों का अनुपात भी गड़बड़ा जाता है।

बीज दर एवं बीज उपचार

बीज की मात्रा बीज के आकार एवं कतारों की दूरी पर निर्भर करती है। एक स्थान पर एक ही बीज की चोबाई करें। ऐसा करने से असिंचित परिस्थितियों में 10 से 15 किलो एवं सिंचित परिस्थितियों में 6 से 8 किलो बीज की आवश्यकता होती है। बीज उपचार हेतु बीजों को कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करने के बाद जीवाणु कल्चर से बीजोपचार (100 ग्राम/किग्रा. बीज) कर बुवाई करें।

बुवाई की विधि

बुवाई के लिए तैयार खेत में देशी हल या कल्टीवेटर द्वारा वांछित दूरी पर गहरी कतारें बनाएं। सिंचित क्षेत्र में कतार से कतार की दूरी 3 से 4 मीटर एवं पौधों से पौधों के बीच की दूरी 2 फीट रखें। कतारे बनाते समय डीएपी एवं यूरिया की वंचित मात्रा भी उर दें। इसके पश्चात इन कतारों में एक स्थान पर एक बीज की चोबाई करें। बीज भूमि भूमि में 4 से 5 सेंटीमीटर से अधिक गहरा नहीं बोना चाहिए।

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फसल में समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन

सिंचित अरण्डी की फसल में समन्वित पोषक तत्व प्रबंधन हेतु पोषक तत्वों की सिफारिश मात्रा में नत्रजन का 75% भाग (60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) व 40 किलो फास्फोरस/हेक्टेयर अकार्बनिक उर्वरकों (डीएपी व यूरिया) द्वारा देने के साथ ही शेष नत्रजन का 25% भाग गोबर की पाकी हुई खाद (5 टन/हेक्टेयर) द्वारा पूर्ति करें। एजोस्पाइरिलियम जीवाणु कल्चर के बीजोपचार (100 ग्राम/किलोग्राम बीज) करें और फॉस्फोरस घोलक जीवाणु कल्चर (६०० ग्राम/हेक्टेयर) को करीब 1 क्विंटल गोबर की नम खाद में मिलाकर बुवाई के साथ लाइनों में मिलावें। ऐसा करने से उपज में वृद्धि होती है तथा मिट्टी की उर्वरा शक्ति में बढ़ोतरी होती हैं।

सिंचित अरण्डी की फसल में बुवाई के पहले 20 किलोग्राम सल्फर प्रति हेक्टेयर को जिप्सम (200-250 किलोग्राम/हेक्टेयर) के द्वारा देने से उपज में तेल की मात्रा में सार्थक वृद्धि होती हैं। असिंचित क्षेत्रों में 40 किलोग्राम नत्रजन, 20 किलोग्राम फास्फोरस बुवाई से पूर्व ऊर देवें शेष आधी नत्रजन (40 किलोग्राम) को दोनों में विभाजित करते हुए 35 दिन एवं 90 दिन की फसल अवस्था पर देवे। पोटाश मिट्टी परीक्षण की सिफारिश के आधार आवश्यकता हो तभी दे।

सिंचाई

वर्षा काल समाप्त होने के बाद पौधों की आवश्यकता को देखते हुए सिंचाई प्रारंभ करें। सामान्यतयाः 45 से 60 दिनों तक सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। इसके बाद गर्मी में 12 से 15 दिनों में व सर्दी में 18 से 22 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। इस तरह सिंचाई  करने से कुल 8-10 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। जब फसल बढ़वार से खेत पूरी तरह ढक जाता है, तो पतियों की छाया की वजह से भूमि में नमी लंबे समय तक बनी रहती हैं। ऐसी स्थिति आने के बाद और अनियंत्रित सिंचाई न करें अन्यथा उखटा या जड़ विगलन के प्रकोप की संभावना बढ़ जाती है।

अकाल व अनावृष्टि की हाल में अरण्डी के बुवाई के पश्चात अंकुरण भी सिंचाई देकर करवाया जा सकता है।

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अरण्डी में अंतराशस्य (इंटरक्रॉपिंग)

अरण्डी की फसल में मूंग, मोठ को अंतराशस्य के रूप में लगाकर अतिरिक्त आमदनी प्राप्त की जा सकती है। इसके लिए अरण्डी को 120 सेमी (4 फुट) पर लाइनों में बुवाई करें। और अरण्डी को दो लाइनों के बीच एक लाइन मूंग, मोठ की जल्दी पकने वाली किस्म की बुवाई कर दे। अंतराशस्य के लिए दोनों फसलों की एक साथ बुवाई करें। मूंग के लिए आर.एम.जी.-268 या आर.एम.जी.-60 मोठ के लिए आई.एम.ओ.-435 या आई.एम.ओ.-257 किस्म का चुनाव करें।

अंतराशस्य के रूप में देशी अरण्डी को मिर्च फसल के लिए बनाई गई क्यारियों की मेड़ों पर लगाकर मिर्च को पाले से बचाया जा सकता है। ऐसा करने से मिर्च की फसल पर अरण्डी एक छाते के रूप में काम करती है जो ऊपर आने वाली ठंडी हवाओं से मिर्च की रक्षा करती है। संभाग 1ए के मिर्च के लिए प्रसिद्ध क्षेत्र जैसे तिवरी, मथानिया, सोयला, बालरवा, ओसियां, फलोदी, बालेसर, देचू, फलसुंड, भीयांड आदि में काफी लंबे समय से यह तकनीक काम में ली जा रही है।

निराई गुड़ाई

प्रारंभिक अवस्था में अरण्डी की फसल पर खरपतवारों का अधिक प्रभाव नहीं होता है। जब तक पौधा 60 से.मी. का न हो जाए और पौधे अपने बीच की दूरी को ढक न ले तब तक समय- समय पर निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए। पहली निराई-गुड़ाई 18-20 दिन बाद दूसरी 35 से 40 दिन बाद करने से फसल पूरी तरह खरपतवार मुक्त हो जाती है।

अरण्डी की फसल में रासायनिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण हेतु 1 किलोग्राम पेंड़ीमिथिलीन प्रति हेक्टेयर को 600 लीटर पानी में घोलकर कट नोजल द्वारा अरण्डी उगने से पहले (बुवाई के दूसरे-तीसरे दिन)छिड़काव करें। तथा उसके बाद 40 दिन की फसल अवस्था पर एक हल्की निराई -गुड़ाई करें।

गुड़ाई के लिए बैल चलित त्रिफाली, रोपड़ी या पावर टिलर को भी काम में लिया जा सकता है। अरण्डी की कतारों के बीच की दूरी 4 फीट तक होती है। अतः ट्रैक्टर चलित कल्टीवेटर के हलो को भी आवश्यकतानुसार निर्धारित जगह पर कसकर, दो से तीन बार गुड़ाई की जा सकती है। गुड़ाई करने से भूमि में खरपतवारों का नियंत्रण होने के साथ नमी का संरक्षण भी होता है तथा वायु संचार भी बढ़ता है। ऐसा करने से जमीन नरम रहती है। ऐसी स्थिति में बढ़वार भी अच्छी होती है और बार-बार सिंचाई देने की आवश्यकता भी नहीं रहती है।

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अरण्डी में रोग प्रबंधन

उखटा व जड़ विगलन अरण्डी के प्रमुख रोग है। यह रोग जीवाणु से फैलते हैं, जो या तो जमीन में पहले से ही मौजूद होते हैं या बीज के माध्यम से फैलते हैं। उकठा रोग के प्रकोप से पौधे का तना एक तरफ से सूखता है और धीरे-धीरे पूरा पौधा सूख जाता है। इसके बाद पास में खड़ा दूसरा पौधा भी संक्रमित हो जाता हैं और धीरे-धीरे यह संख्या बढ़ती जाती हैं।

उकठा रोग की रोकथाम के लिए ट्राइकोडर्मा विरिड 10 ग्राम पाउडर प्रति किलोग्राम बीज से बीज उपचार तथा ट्राइकोडर्मा विरिड पाउडर 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर को गोबर की खाद के साथ मिलाकर बुवाई पूर्व भूमि में देना प्रभावी पाया गया है। उखटा रोग रोधी किस्में जैसे जी.सी.एच.-7, जी.सी.एच.-5 व आर.एच.सी.-1 की बुवाई करें। फसल चक्र अपनावे एवं भराव वाले क्षेत्रों में अरण्डी की बुवाई न करें। जड़ गलन रोग के प्रकोप से जड़ गल जाती हैं और पौधा मुरझा जाता है। इसके बचाव के लिए कार्बेंडाजिम 2 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार कर बुवाई करे।

पत्ती धब्बा व झुलसा रोग भी अरण्डी में पाए जाते हैं। इसके आक्रमण से पत्तियों पर भूरे रंग के गोल धब्बे बन जाते हैं जो बाद में सुख जाते हैं। इसकी रोकथाम हेतु 2 ग्राम मेंकोजेब पाउडर को प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। फफूंदनाशक दवा व कीटनाशक दवाओं को मिलाकर छिड़काव किया जा सकता है।

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अरण्डी में नाशी कीट प्रबंधन

सेमीलूपर लट अगस्त-सितंबर माह में पत्तियों के हरे भाग को खाती हैं और शिराओं को छोड़ देती है। 10 से 15 दिन के अंदर लार्वा 8 से 10 सें.मी. लंबा हो जाता है। पूर्ण विकसित सेमीलूपर को छेड़ने से यह लार्वा सांप की तरह फन उठाता हैं। अगर इसका नियंत्रण नहीं किया जाए तो 10 से 15 दिन के अंदर संपूर्ण फसल को नष्ट कर देता है। सेमीलूपर के प्रभावी नियंत्रण हेतु 1 लीटर क्यूनालफॉस 25 ई.सी. दवा को 600 लीटर पानी में घोलकर सेमीलूपर लट की छोटी अवस्था पर ही छिड़काव कर नष्ट कर दे।

अरण्डी की बुवाई 15 जुलाई से अगस्त के प्रथम सप्ताह के बीच करने से और समय पर खरपतवार नियंत्रण करने सेमीलूपर के आक्रमण की संभावना कम हो जाती है। खेत में कीट भक्षी पक्षियों के बैठने हेतु टी आकार की 10-15 लकड़ियां प्रति हेक्टेयर की दर से गाड़ दें।

हरा तेला, सफेद मक्खी एवं लाल मकड़ी भी अरण्डी के पत्तों के नीचे की सतह पर रहकर रस चूसते रहते हैं। इनके आक्रमण से पत्तियों के किनारे सूखकर अंदर की तरफ मुड़ जाते हैं और पौधे की बढ़वार रुक जाती है। रस चूसक कीटों के आक्रमण से पौधे की पत्तियों में चमक खत्म हो जाती है। लीफ माइनर पत्तियों के अंदर सांप के रेंगने जैसे निशान बना देता हैं।

सफेद मक्खी का नियंत्रण

सफेद मक्खी के नियंत्रण हेतु ट्राइजोफॉस 40 ई.सी., 1.5 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें। हरा तेला एवं  लिफ़ माइनर के नियंत्रण हेतु डाइमिथोएट 30 ई.सी. या मोनोक्रोटोफॉस 36 एस.एल. 1 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

फल छेदक लट का नियंत्रण

अरण्डी के सिकरों पर फल छेदक लट का प्रकोप भी कभी-कभी दिखाई देता है। यह लट फलों व तने के अंदर छेद कर घुस जाती है और बीजों को खाती रहती है। यह लट विस्ठा व लार से फल/गाठों पर जाला बना देती है। इसका आक्रमण सितंबर माह में प्रारंभ होता है और नवंबर तक चलता है। उसके पश्चात जनवरी में स्वतः ही ख़त्म हो जाता हैं। फल छेदक लट के नियंत्रण हेतु डायमीथोएट 30 ई.सी. या मोनोक्रोटोफॉस 36 एस.एल. एक लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

लाल मकड़ी का नियंत्रण

लाल मकड़ी के नियंत्रण के लिए इथीयोन 50 ई.सी. या डाइकोफाल 18.5 ई.सी. एक मि.ली. पानी में घोलकर छिड़काव करें। ज्यादा पौध संख्या रखने, अनियंत्रित सिंचाई करने, व अत्यधिक यूरिया छिड़काव से कीट प्रकोप बढ़ता है। अतः ऐसा नहीं करें।

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कटाई 

जब सिकरों का रंग हल्का पीला या भूरा हो जाए तथा उनके दो से तीन फल पूरी तरह सूख जाए तब कटाई कर लें। सिकरों के पूरे सूखने का इंतजार नहीं करना चाहिए अन्यथा फल चटकने से या कटाई करते समय गाँठें झड़ जाने से उपज में हानि होती हैं। पहली तुड़ाई करीब 90-100 दिन में तथा बाद में हर 1 सप्ताह बाद तुड़ाई करें। इसकी औसत उपज असिंचित परिस्तिथियों में 10 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तथा सिंचित परिस्थितियों में 30 से 32 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है।

गहाई 

तुड़ाई के बाद सिकरों को खलिहान में सुखा दें और अच्छी तरह सूखे सिकरों से गाँठें अलग कर ढ़ेरी बना दें। सभी तुड़ाइयों से प्राप्त गाठों की एक साथ थ्रेशर में गहाई करवा दे। थ्रेसर पर गहाई करते समय पूर्ण सावधानी बरतें तथा लटकने वाले कपड़े जैसे मफलर, अंगोछा इत्यादि नहीं पहने। बीजों को उचित आकार की छलनी से छान कर ग्रेडिंग कर दे और दो से 3 घंटे धूप में सुखाकर 8 से 10% नमी के साथ बोरियों में भरकर गोदाम में रख दें और उचित भाव आने पर बेच दे।

गहाई से निकलने वाले कचरे को गोबर के साथ थोड़ा-थोड़ा मिलाकर कंपोस्ट खाद बनाने के काम में लेवें। फसल के अवशेषों को जलाऊ लकड़ी के रूप में काम ले।

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अरण्डी के सिकरे खली रहने की समस्या संबंधित भ्रांति

अरण्डी एक ऐसा पौधा है जिसके एक ही सिकरे पर नर तथा मादा दोनों तरह के पुष्प पर पाए जाते हैं। नर पुष्पों में अंडाशय नहीं होता है ,केवल पुंकेसर होते हैं, जिनमें से परागकण निकलते हैं, जो मादा पुष्पपों को गर्भित करते हैं। यह परागकण बहुत ही सूक्ष्म होते हैं, जो हवा में 500 से 600 मीटर तक उड़ते रहते हैं। नर पुष्प हल्के पीले सफेद रंग के होते हैं जो साधारणतया सिकरे में नीचे की तरफ लगे होते हैं। मादा पुष्प हरे गहरे लाल रंग के होते हैं, जो सिकरे के ऊपरी भाग में पाए जाते हैं। नर पुष्प परागकण पैदा करने के बाद सूख कर गिर जाते हैं और उस जगह सिकरा खाली हो जाता है। यह एक सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया है जिससे भ्रमित होने की आवश्यकता नहीं है।

नर पुष्पों का अनुपात मादा की तुलना में 10:100 तक ठीक रहता है। कभी कभार असामान्य तापक्रम, भूमि में पोषक तत्वों की संतुलित मात्रा, हवा में अत्यधिक सूखापन, जिन संकर बीजों की आपने बुवाई की है, उन्हें बनाने की प्रक्रिया में त्रुटि आदि वजहों से नये निकलने वाले किसी- किसी सिकरे पर नर पुष्प मादा पुष्पों की तुलना में ज्यादा निकल आते हैं। ऐसी स्थिति से बचने के लिए अरण्डी की बताए गए समय पर ही बुवाई करें, अच्छा बीज काम में लें, उचित पोषक प्रबंधन करें और जरूरत के आधार पर ही सिंचाई दें। पौधों को उचित वातावरण मिलने पर यह समस्या ठीक हो जाती है।

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प्रस्तुति

शंकर लाल कांटवा, श्याम दास एवं प्रदीप पगारिया,

कृषि विज्ञान केंद्र, बाड़मेर (राज.)

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