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अमरूद की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

अमरूद की उन्नत खेती
Written by bheru lal gaderi

अमरूद (guava) फल वाली फसलों में से एक महत्वपूर्ण फसल है। भारत में आम, केला एवं नींबू प्रजाति के फलों के बाद अमरूद का चौथा स्थान आता है। इसकी उत्पत्ति उष्णकटिबंधीय अमेरिका है। इसको कटिबंधों के सेब के रूप में भी जाना जाता है। इस की खेती उष्णकटिबंधीय एवं उप उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में बहुतायत में की जाती है।

अमरूद की उन्नत खेती

अमरूद भारत के कुल क्षेत्रफल में 3.3% एवं उत्पादन में भी 3.3% योगदान है। यह विटामिन सी (एस्कॉर्बिक एसिड) आहार रेशा, प्रोटीन एवं पेक्टिन का अच्छा स्रोत है। इसका उपयोग  जैम, जैली, हॉकी अमृत, रस, केक, टॉफी एवं प्यूरी जैसे उत्पादों के रुप में प्रमुखता से किया जाता है।

अमरूद की उन्नत खेती

विश्व में अमरुद की खेती दक्षिण एशिया क्यूबा एवं भारत में सबसे अधिक गुणवत्ता वाला अमरूद इलाहाबाद में होता है। राजस्थान में इसकी खेती मुख्य रूप से सवाई माधोपुर, कोटा, उदयपु,र जयपुर, झालावाड़ एवं बूंदी जिलों में की जाती है। सवाई माधोपुर का अमरुद सबसे अधिक प्रसिद्ध है।

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जलवायु

अमरुद की खेती उष्णकटिबंधीय एवं उप-उष्णकटिबंधीय जलवायु में सफलतापूर्वक की जाती है। सर्दियों के मौसम में इस की पैदावार बढ़ जाती है और फलों की गुणवत्ता भी बेहतर रहती है। इसकी अच्छी खेती के लिए औसत वार्षिक वर्षा जून से सितंबर तक 1000 मिली मीटर की आवश्यकता होती है। इसके युवा पौधे ठंड एवं सूखे के लिए अति संवेदनशील होते हैं।

भूमि (मिट्टी)

उपयुक्त चुनाव की गई भूमि की गहरी जुताई करके उसको पौधे लगाने के पहले अच्छी तरह से समतल कर लेना चाहिए। 1X3 वर्ग मीटर आकार के खड्डे खोद कर उसमें 25 से 30 किलोग्राम कंपोस्ट खाद मिट्टी के साथ मिला कर देना चाहिए।

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अमरूद की उन्नत किस्में

इलाहाबाद सफेदा

यह उत्तर प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण किस्म हैं। जिसके पौधों की ऊंचाई 5.8 से 6.2 मीटर तक होती हैं। इसके फल मध्यम गोल चिकने एवं पीले सफेद रंग के होते हैं। इसकी रखरखाव, गुणवत्ता सबसे अच्छी रहती हैं।

सरदार अमरूद (लखनऊ- 49)

इलाहाबाद सफेदा के द्वारा चयन करके तैयार की गई किस्म है। इस किस्म के पौधे अर्ध बोने एवं 2.3 से 3.4 मीटर ऊंचाई के होते हैं। जिसके फल बड़े, गोल आकार एवं पीला रंग लिए होते हैं। इसकी रखरखाव, गुणवत्ता भी अच्छी होती हैं।

एप्पल कलर

इसको रंगीन फलों के लिए उगाया जाता है। पौधे मध्यम एवं 4.0 से 5.2 मीटर ऊंचाई तक के होते हैं। इसके फल छोटे गोल एवं चिकने और गुलाबी रंग के होते हैं। इसकी रखरखाव गुणवत्ता भी अच्छी होती हैं।

बनारसी सुरख

इसका का फल मीठा होता है और इसमें अम्लता की कमी होती है। इसका पौधा मध्यम से लंबा होता है। इसकी गुणवत्ता मध्यम होती है।

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प्रवर्धन

व्यावसायिक रूप से अमरूद का प्रवर्धन बीज/अंकुर के द्वारा किया जाता है, लेकिन व्यवसायिक श्रेणी के फलों के लिए मुख्य रूप से शाखाओं द्वारा प्रवर्धन किया जाता है। जिसमें मुख्य रुप से चश्मा चढ़ाना, घुट्टी एवं दाब विधिया प्रमुख है।

पौध लगाना

अमरूद के पौधों का रोपण मानसूनी बारिश के बाद किया जाना चाहिए।

दूरी- 6X6 मीटर

गड्ढे का आकार- 90X90X90

तीन दिनों के बाद प्रत्येक गड्डे में 30 से 35 किलोग्राम अच्छी तरह से साड़ी हुई गोबर की खाद को सतही मिट्टी के साथ मिलाकर भर देना चाहिए।

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अंतराशस्य

अमरुद के बगीचे में आरंभिक अवस्था में मटर, चौलाई एवं टमाटर आदि की खेती की जा सकती है।

साधना

अमरुद के पौधों को उचित अकार एवं  ढांचा देने के लिए स्थाई एवं कांट-छांट की आवश्यकता होती हैं। इसके लिए खुला केंद्र प्रणाली सबसे उपयुक्त है।

सिंचाई

अन्य फसलों की अपेक्षा अमरुद की फसल में सिंचाई की आवश्यकता कम होती है। पौधों की आरंभिक अवस्था में 1 वर्ष में 8-10 सिंचाई करनी चाहिए एवं अप्रैल से जून तक 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। सर्दियों की फसल में सिंचाई करने से फलों की गुणवत्ता बेहतर होती है।

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खाद एवं उर्वरक

अमरूद के पौधों की तालिका 1 के अनुसार खाद एवं उर्वरक देवें।

अमरूद

अमरुद के बगीचे की देखभाल

बाग को खरपतवार से मुक्त रखने के लिए समय-समय पर निराई-गुड़ाई करना आवश्यक है। निराई एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिससे उर्वरक एवं नमी की मात्रा की हानि रोकने में सहायता मिलती हैं।

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अमरुद की फसल में प्रमुख कीट

फल मक्खी

यह मक्खी बरसात के फलों को विशेष हानि पहुंचाती हैं। यह फलों के अंदर अंडे दे देती हैं। जिससे बाद में लटें (मेग्ट्स) फल के अंदर के गूदे को खाने लग जाते हैं। प्रभावित फल अंत में नीचे गिर जाते हैं।

नियंत्रण

  • प्रभावित फलों को इकट्ठा करके भूमि में घाघरा घाट देवे अथवा नष्ट कर देवें।
  • शिरा या शक्कर 100 ग्राम के एक लीटर पानी के घोल में 10 मिलीलीटर मेलाथियान 50% ई. सी. मिलाकर प्रलोभन तैयार कर 50 से 100 मिलीलीटर प्रति लीटर की दर से मिट्टी के प्याले में डालकर जगह-जगह पेड़ों पर टांग देवे।
  • मेलाथियान 50% का एक लीटर घोल बनाकर छिड़काव करें अथवा मिथाइल डिमेटोन का छिड़काव मार्च, अप्रैल एवं सितंबर-अक्टूबर में करें।

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छाल भक्षक कीट

यह कीट अमरूद के वृक्ष की छाल को खाता है तथा छिपने के लिए शाखाओं के अंदर गहराई तक सुरंग बना डालता है। जिससे कभी-कभी शाखा कमजोर पड़ जाती है और अंत में गिर जाती है।

नियंत्रण

  • सूखी शाखाओं को काट कर जला देना चाहिए।
  • डाइमेथोएट या मिथाइल डेमोटोन ०-५% का घोल बनाकर शाखाओं/ डालियों पर छिड़के तथा साथ ही साथ ही सुरंग को साफ करके पिचकारी की सहायता से कैरोसीन 3 से 5 मि.ली. सुरंग में डाले या रुई का फाहा बनाकर अंदर रख देवें एवं गीली मिट्टी से बंद कर देवे।

अमरूद की फसल में प्रमुख रोग एवं प्रबंधन

म्लानि रोग (उखटा, मुरझान,सूखा या विल्ट)

इस रोग के लक्षण दो प्रकार के होते हैं। पहला आंशिक मुरझान, जिसमें पेड़ की एक या अधिक मुख्य शाखाएं रोग ग्रस्त होते हैं और अन्य शाखाएं स्वस्थ रहती है। ऐसे पेड़ों की पत्तियां पीली पड़कर  झड़ने लगती है। रोगग्रस्त शाखाओं पर कच्चे फल छोटे भूरे एवं सख्त हो जाते हैं। दूसरी अवस्था में रोग का प्रकोप पूरे पेड़ पर होता है और वह शीघ्र ही सूख जाता है। रोग अगस्त से अक्टूबर माह में उग्र रूप धारण कर लेता है।

नियंत्रण

  • रोग का प्रभावी नियंत्रण कठिन है। कार्बेंडाजिम एक ग्राम/लीटर पानी की दर से घोल कर 20 से 30 लीटर घोल आवश्यकतानुसार भूमि का भंजन (ड्रन्च) से लाभ होता है।
  • रोग को फैलाने से बचाने व खेत की स्वछता के लिए रोग के बचाव हेतु पेड़ों को जड़ से उखाड़ कर जला देना चाहिए। उस स्थान की मिट्टी को कार्बेंडाजिम 1 ग्राम/लीटर पानी की दर से उपचारित करना चाहिए।
  • प्रतिरोधी मूलवृन्त चाइनीज अमरुद (मीडियम फ्रेन्डरिच थोलिनम) का उपयोग करने पर 2 से 5 गुना उपज बढ़ सकती हैं। इसे राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान संस्थान बेंगलुरु से प्राप्त कर सकते हैं।

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श्याम वर्ण (एन्थ्रेक्नोज)

इस रोग का प्रकोप वर्षा ऋतु में अधिक प्रभावी रहता है। ग्रसित फलों पर काली चित्तियाँ पड़ जाती हैं और उनकी वृद्धि रुक जाती है। ऐसे फल पेड़ों पर लगे रहते हैं और सड़ जाते हैं। रोगी कच्चे फल सख्त व् काकनुमा हो जाते हैं। पेड़ों के सिरे से रोगी कोमल शाखाएं नीचे की तरफ सूखने लगती है। ऐसी शाखाओं की पत्तियां झड़ने लगती हैं और इसका रंग भूरा हो जाता है।

नियंत्रण

इसके नियंत्रण हेतु सुखी टहनियों को काट देना चाहिए और उसके पश्चात मैंकोजेब दवा का 10 से 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करते रहना चाहिए।

जस्ते की कमी

राजस्थान में अमरूद की फसल जस्ते की कमी से सामान्यतया  प्रभावित होती देखी गई है। इससे पत्तियां अत्यधिक छोटी एवं चर्मिल हो जाती है और उनकी शिराओं के बीच का भाग पीला पड़ ताम्रवर्ण का हो जाता है। ग्रसित पेड़ों की बढ़वार रुक जाती है और ऊपर से नीचे की ओर धीरे धीरे मरने लगते हैं। फल सख्त होकर  सुख कर गिर जाते हैं।

नियंत्रण

इसके नियंत्रण हेतु जिंक सल्फेट 6 ग्राम व बजा हुआ चुना 4 ग्राम को एक लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने से अच्छा लाभ होता है।

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प्रस्तुति:-

शंकर लाल कांटवा, भेरू लाल डांगी एवं डॉ. प्रदीप पगारिया

कृषि विज्ञानं केंद्र- दांता

बाड़मेर

स्रोत-

विश्व कृषि संचार

वर्ष -20, अंक-11, अप्रैल-2018

विश्व एग्रो मार्केटिंग एन्ड कम्युनिकेशन, कोटा (राज.)

ईमेल – vks_2020@yahoo.com

मोब. नो.- 9425081638

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