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अधिक दूध उत्पादन कैसे करे ? स्वदेशी गौ पशुओं से

अधिक दूध उत्पादन
Written by bheru lal gaderi

स्वदेशी गौ पशुओं से अधिक दूध उत्पादन करना – डेयरी फार्मिंग ग्रामीण परिवारों की आय का मुख्य स्रोत तथा गरीबी उन्मूलन का एक साधन ही नहीं बल्कि ग्रामीणों के भोजन की पौष्टिकता के स्तर को भी बढ़ाती डेयरी क्षेत्र में सतत विकास के कारण पिछले दो दशक से भारत विश्व में प्रथम दूध उत्पादक देश बना हुआ है।

अधिक दूध उत्पादन

Image Credit – saharanpurweb

अपर्याप्त चारे की उपलब्धता, पशु प्रबंधन एवं स्वास्थ्य सेवाओं की कमी तथा डेयरी गौ पशुओं की कम उत्पादकता अभी भी चुनौती बनी हुई है। भारतीय गौपशु नस्लें निम्न कोटि के दाना खाने की क्षमता आंतरिक एवं बाह्य पारीयोजना तथा कीटों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता, बीमारियों से लड़ने की अद्वितीय क्षमता, गर्मी ठण्ड सहने की विलक्षण क्षमता, मातृत्व क्षमता आदि के लिए विश्व विख्यात है।

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स्वदेशी गौ पशुओं से अधिक दूध उत्पादन कैसे प्राप्त हो ?

डेयरी पशुओं से अधिक दूध उत्पादन कैसे प्राप्त हो तथा दूध उत्पादन सस्ता कैसे प्राप्त हो यह कुछ ऐसे प्रश्न है जिनके समाधान के लिए डेयरी प्रजनन, पशु पोषण, शरीर क्रिया विज्ञान के वैज्ञानिक प्रयासरत हैं, दुधारू नस्लों के संवर्धन से देश में दूध उत्पादन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है और परंपरागत डेयरी उद्योग अब आधुनिक डेयरी उद्योग के रूप में परिवर्तित हो रहा है।

उचित प्रजनन, पोषण तथा प्रबंधन के द्वारा साधारणतया दूध उत्पादन को बहुत से घटक प्रभावित करते हैं जिनमें से कुछ निम्नलिखित है।

वृद्धि दर 

देसी गौ पशुओं में जन्म के समय बच्चे का वजन 18 से 23 किलो होता है तथा खिलाई पिलाई के हिसाब से प्रतिदिन 200 से 250 ग्राम औसतन वृद्धि होती है। देसी गायों का शरीर भार 200 किलोग्राम हो जाने पर परिपक्व होकर गर्भित हो जाती हैं। बछड़ों को प्रारंभ से ही अन्तः कृमिनाशक दवा, नमक एवं खनिज मिश्रण युक्त संपूर्ण आहार देना प्रारंभ करने पर 1.5 से 2 वर्ष की उम्र में ही परिपक्व होकर गर्भवती होने लायक हो जाते हैं।

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आयु प्रथम बार ब्याने की उम्र

संपूर्ण दूध पैदावार 6 वर्ष की उम्र तक तक बढ़ती हैं और 8 वर्ष की उम्र या पांचवी ब्यांत के बाद घटना शुरू हो जाती हैं। ब्यांतकाल से  दूध उत्पादन जुड़ा हुआ है। बहुत से प्रयोगों के परिणामों द्वारा यह पाया गया है कि गायों के चौथे, भैंसो के तीसरे ब्यांत काल में अधिक दूध उत्पादन होता है।

प्रारंभ से ही बछड़ियों को समुचित आहार नहीं दिए जाने के कारण अधिकांश देसी बछड़िया विलम से परिपक्व होती हैं एवं कम बार ब्यांति हैं। देसी गांव की बछड़ी प्रथम ब्यांत के समय औसत आयु 4 से 5 वर्ष है। जिसे उन्नत खिलाई एवं प्रबंधन से घटाकर 2.5-3 वर्ष कर सकते हैं।

दोहने के बीच का समय

जैसे-जैसे ग्रंथियों में दूध का दाब बढ़ता है वैसे-वैसे दूध स्त्रवण की दर घट जाती है और अंत में अंत में कुपिका को आच्छादित करने वाली कोशिकाओं में मौजूद स्त्रवण दाब के बराबर हो जाता है और दूध स्त्रवण रुक जाता है। इसलिए अधिक दूध उत्पादन के लिए गादी को बार-बार खाली करना जरूरी हो जाता है।

विभिन्न शोध प्रयोगों द्वारा यह जाना जा चुका है कि प्रतिदिन दो बार दुहने के बजाय तीन बार दोहने से दूध उत्पादन में 15 से 25% की वृद्धि होती है और प्रतिदिन चार बार दुहने से उत्पादन में 5 से 15% की और वृद्धि होती हैं।

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पीक दूध उत्पादन/स्त्रवण की अवस्था

यह देखा गया है कि गायों में जाने के 25 से 35 दिन बाद तक की दैनिक दूध उत्पादन बढ़ता है। कम दूध देने वाली गायों की अपेक्षा ज्यादा समय लेती हैं। इसलिए गायों को प्रसव के पहले के 2 माह में 2 से 4 किलो दलिया एवं सौ ग्राम शतावरी युक्त मिक्सचर (शतावरी, अजवाइन एवम मेथी दाना) 20 ग्राम व मिनरल मिक्सर 40 ग्राम तथा प्रसव के बाद के प्रथम माह में आवश्यकता अनुसार संतुलित आहार अवश्य दें। जिससे गाय जल्दी से जल्दी अधिक दूध उत्पादन शीर्ष पर पहुँच कर उत्पादन को स्थिर किया जा सके।

दो ब्यांत  का अंतराल

देसी गौ पशुओं में दो ब्यांत के बीच का समय एक प्रबंधन समस्या है। जिससे पशुपालकों को उलझना पड़ता है। प्रायः यह देखा गया है कि देशी गौ पशुओं में दो ब्यांत का औसत अंतराल 12 से 14 माह होना चाहिए।

इसके लिए मादा गौ पशुओं को ब्याने के 60 से 90 दिनों के बीच पुनः गर्भित कर भी करवा देना चाहिए। डेयरी व्यवसाय की लाभदायकता के लिए दो तिहाई गायक हर समय दूध में रहनी चाहिए।

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दुग्धहीनकाल/ सूखाकाल

भविष्य में दूध उत्पादन एवं शरीर को स्वस्थ बनाए रखने तथा अगली ब्यांत में अधिक दूध उत्पादन के लिए सूखाकाल महत्वपूर्ण है। सामान्यतया दो से तीन माह का सूखाकाल रखना चाहिए। लेकिन देसी देशी गौ पशुओं को ब्याने के छह से सात माह बाद ग्याभिन करवाने की प्रवृत्ति होने के कारण सूखाकाल 8 से 10 माह एवं दो ब्यात का अंतराल 18 से 24 माह हो जाता है जो डेयरी व्यवसाय के लिए घातक सिद्ध होता है। सूखाकाल कम रखने के लिए देसी गायों को भी ब्याने के 2 से 3 माह बाद ग्याभिन करवा लेना चाहिए।

यह पाया गया है कि सगर्भता का पांचवा महीना शुरू होने तक दूध उत्पादन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और 7 महीने के बाद कम दूध देने वाली गाय का दूध वैसे ही कम हो जाता है। अतः देसी गायों को ब्याने के 2 माह बाद ग्याभिन करवाने में दूध उत्पादन पर किसी भी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ता है।

अल्प आहार

किसी भी गाय में कितनी भी दूध उत्पादन क्षमता हो लेकिन लंबे समय तक निरंतर अल्पाहार में रहने से उसका दूध उत्पादन घट जाता है और कुछ गाय तो दूध देना भी बंद कर देती हैं। जिन गायों का दूध  उत्पादन  घटता है। उनको उचित पोषण द्वारा कुछ सप्ताह में सामन्य किया जा सकता है।

दूध उत्पादन बचे स्रवण काल में सामान्यतया कम ही रहेगा। इसलिए गोपालक को चाहिए कि अपनी गायों को अल्पाहार की स्थिति से बचने के लिए उचित प्रबंधन करें।

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बछड़ों को खिस पिलाना

नवजात बछड़ा बहुत नाजुक होता है इसलिए उसे जन्म के पश्चात 2 घंटे के दौरान लगभग 1 लीटर दूध पिलाना चाहिए। ऐसा करने से उसके शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता उत्पन्न होती हैं तथा दस्तावर होने से बच्चे के पेट की गंदगी भी बाहर निकल जाती हैं।

अतः प्रत्येक बछड़े को जन्म के पश्चात जितनी जल्दी संभव हो खिस पिलाना चाहिए। प्रारंभ के तीन चार दिनों तक बछड़े को नियमित अंतराल पर शरीर भार का 10% दूध पिलाना चाहिए।

नर पशु का बधियाकरण

देश में कम दूध उत्पादन करने वाले, कमजोर व आवारा पशुओं की संख्या बहुत अधिक है। इन्हीं से जनसामान्य अपने गायों को ग्याभिन करा लेते हैं। वस्तुतः शिशु वर्ग में तो बंद किया जा सकता है. ना प्रजनन करने योग्य है। परंतु इन की बढ़ती संख्या को रोकना आवश्यक है अतः ऐसे नर पशुओं को चिन्हित कर बढ़िया करना चाहिए ताकि प्रजनन कर नस्ल खराब ना करें। बधियाकरण का काम करवाने का सबसे अच्छा समय जनवरी से मार्च तथा अक्टूबर का महीना है।

प्रजनन हेतु उत्तम सांड

दूध देने कि क्षमता गाय के पैतृक गुणों पर निर्भर करती हैं तथा वंश परंपरा के गुण सांड द्वारा ही संतति में आते हैं। अतः गौ पशुओं का विकास उन्नत सांडों से प्रजनन करने से ही संभव है। संतति में आधे गुण माता और आधे गुण पिता से आते हैं।

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पशुओं का चयन एवं प्रजनन

स्वदेशी गौ पशुओं का चयन एवं प्रजनन मां एवं पिता के आर्थिक गुणों जैसे- दूध देने कि क्षमता एवं क्षेत्र विशेष की अनुकूलता आदि को ध्यान में रखते हुए ही करना चाहिए। कमजोर बीमार एवं आर्थिक गुणों में कम क्षमता रखने वाले को पशुओं का प्रजनन नहीं कराना चाहिए। क्योंकि ऐसे पशुओं से उत्पन्न होने वाली संतति की अधिक दूध उत्पादन क्षमता कम हो जाती हैं।

आजकल सेक्स सीमन भी उपलब्ध होने लग गया है। जिस के उपयोग से मात्र बछिया ही पैदा होती हैं। जहां तक संभव हो सके कृत्रिम गर्भाधान उन्नत नस्ल के सांड के सेक्स सीमन से ही करवाना चाहिए।

ब्यांत के समय देखभाल

गाय एवं भैसों में जैसे ही बच्चा देने के शुरुआती लक्षण दिखाई दे उसे तुरंत साफ सुथरे स्थान पर स्थानांतरित कर देना चाहिए और जब तक बच्चे का जन्म ना हो जाए तब तक एक व्यक्ति उसके पास जरूर उपस्थित रहना चाहिए।

गंदे स्थान पर प्रसव होने से गर्भाशय के अंदर बीमारी पैदा करने वाले जीवाणु एवं विषाणु प्रवेश कर जाते हैं। पानी की थैली फटने के 2 घंटे के अंदर यदि बच्चे का जन्म नहीं होता है तो तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए अन्यथा पशु एवं बच्चे दोनों के जीवन को खतरा हो सकता है।

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नवजात बछड़ों की देखभाल

बछड़े के प्रथम 15 दिन सबसे महत्वपूर्ण है। इस समय विशेष देखभाल की आवश्यकता है। इस हेतु प्रथम दिन दो चम्मच ओरामयसीन, तीसरे दिन 5.0 मि.ली. पिपराजिन एडिपेट एवं एक टेबलेट सल्फामिडिन तथा सातवें दिन इसी खुराक को दोहराएं, 15 वे एवं 30वे दिन  3-30 मि.ली. एवं 6 माह की उम्र तक प्रतिमाह  30-30 मि.ली. पिपराजिन एडिपेट बछड़ों को देना चाहिए।

बछड़ों की अच्छी बढ़वार के लिए एक महीने की उम्र से उससे बछड़ा प्रवर्तक (राबत) में अच्छी प्रोटीन की मात्रा देने वाले अवयव जैसे- पिसे हुए अनाज, दाल, खली तथा नमक के साथ विटामिन खनिज लवण आदि मिले हुए हों।

इसमें कुल पोषक तत्व 75-80 प्रतिशत व कुल पाच्य प्रोटीन 18-20% होना चाहिए। एक सरल  बछड़ा प्रवर्तक में विभिन्न अवयव होने चाहिए। बछड़े को बछड़ा प्रवर्तक के साथ-साथ इच्छानुसार अच्छा सूखा चारा, हरा चारा भी खिलाना चाहिए।

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स्रोत :-

कृषि भारती

वर्ष- 8, अंक- 02, 16/11/2017

जयपुर

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