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अदरक की उन्नत खेती एवं फसल सुरक्षा उपाय

अदरक
Written by bheru lal gaderi

अदरक भारत की एक नकदी फसल हैं। विश्व के कुल उत्पादन का 60% उत्पादन भारत में होता हैं एवं इसे विदेशो को निर्यात करके काफी विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सकती हैं। भारत में लगभग 37000 हेक्टेयर भूमि पर इस फसल को उगाकर 45000 टन शुद्ध उतपादन प्राप्त होता हैं। भारत में इस फसल की सबसे ज्यादा खेती केरल में की जाती हैं जहाँ भारत के कुल उत्पादन का 70% भाग यहाँ से उत्पादित किया जाता हैं इसके अतिरिक्त हिमाचलप्रदेश, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उड़ीसा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, आदि प्रांतो में भी इसकी खेती की जाती हैं।

अदरक

अदरक के उपयोग

इसको मसाले के रूप में प्रयोग करने के अतिरिक्त सुखाकर सोंठ बनाया जाता हैं जिसका काफी औषधीय महत्व हैं। इसे अचार, मुरब्बा, चटनी के रूप में प्रयोग किया जाता हैं। प्रति सौ ग्राम भोज्य अंश में पोषक तत्वों की मात्रा सारणी में दर्शाई गई है।

सारणी – प्रति सौ ग्राम भोज्य अंश में पोषक तत्व
पोषक तत्व मात्रा पोषक तत्व मात्रा
नमी 80.8 ग्राम कैल्शियम 20.0  मि.ग्रा.
कार्बोहाइड्रेट 12.3 ग्राम फॉस्फोरस 60.0 मि.ग्रा.
प्रोटीन 2.3 ग्राम लौह(आयरन) 2.6 मि.ग्रा.
रेशा 2.4 ग्राम थायामिन 0.06 मि.ग्रा.
खनिज 1.2 ग्राम राइबोफ्लेविन 0.03 मि.ग्रा.
चर्बी 0.09 ग्राम विटामिन – सी 6.0 मि.ग्रा.
कैलोरी 67 K.C.A.L. विटामिन – ए 40 अ.ई.

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फसल से अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए आवश्यक है। उन्नत किस्मों का चयन करके सघन कृषि पद्धतियों को अपनाया जाए जो निम्न प्रकार है।

उन्नतशील किस्में

उपज एवं गुणवत्ता के आधार पर निम्न किस्मो का चयन किया गया हैं।

रमोडिजनिरो

यह ब्राजील की प्रजाति हैं जिसकी भारतीय जलवायु में अधिक उपज पायी गई हैं। इस प्रजाति की प्रति हेक्टेयर उपज 250-300 क्विंटल पाई गई हैं।

चाइना

यह चीन से ले गई प्रजाति हैं जिसकी उपज 200-250 क्वी./हेक्टेयर हैं।

नादिया

उत्तर भारत में कर्षि हेतु उत्तम प्रजाति हैं इसकी उपज 230-250 कविण्टल प्रति हेक्टेयर हैं। सोंठ बनाने के लिए उत्तम प्रजाति हैं।

वरूआ सागर

यह उत्तर प्रदेश में झांसी की किस्म हैं इस प्रजाति की उपज 140-150 कविण्टल प्रति हेक्टेयर हैं।

अखिल भारतीय समन्वित मसाला परियोजना द्वारा भी निम्न किस्मे विकसित की गई हैं।

1. सुप्रभा 2. सुरुचि 3. सुरभि

इन किस्मों की पैदावार 250-300 कविण्टल प्रति हेक्टेयर पाई गई हैं तथा सोंठ बनाने के लिए सभी किस्में उपयुक्त हैं।

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भूमि एवं जलवायु

भूमि

सामान्यतया अदरक की खेती उन सभी प्रकार की भूमि पर की जाती सकती है जहाँ जल भराव की समस्या न हो परन्तु अच्छी उपज के लिए उत्तम जल निकास वाली जीवांश युक्त दोमट अथवा बलुई दोमट भूमि उत्तम होती है।

जलवायु

गर्मतर जलवायु सर्वोत्तम रहती है। बुवाई से लेकर पौध जमाव तक उत्तम वर्षा,पौधों की बढ़वार के समय अधिक वर्षा एवं फसल पकने के समय शुष्क एवं कम तापमान का वातारण अच्छा रहता है। कम वर्षा वाले स्थानों में भी जहाँ सिंचाई की व्यवस्था उपलब्ध है इसे सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। विशेष रूप से उत्तर भारत के भागो में इसकी अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है। कारण शुष्क मौसम में बागो में कम तापमान का बना रहना है। अच्छी बढ़त के लिए 20-30 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान बहुत उपयुक्त है।

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खेत की तैयारी

भूमि की तैयारी के लिए 2-3 बार गहरी जुताई करें। इस के लिए प्रथम जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से व दूसरी जुताई देशी हल से करनी चाहिए। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा चला कर खेत को समतल कर देना चाहिए इससे भूमि में नमी बनी रहती है तथा कंदो का अंकुरण एवं वृद्धि अच्छी होती है। यदि भूमि में पकी गोबर की खाद अथवा कम्पोस्ट खाद 200 क्विंटल प्रति हैक्टेयर प्रयोग किया जाता है तो भूमि का तापमान एवं नमी बानी रहती है इससे कंदो का अंकुरण आसानी से एवं पौधों की बढ़वार उचित होती है।

खाद एवं उर्वरक तथा प्रयोग विधि

अदरक की खेती हेतु अधिक जीवांश युक्त भूमि की आवश्यकता होती हैं। अतः 250-300 अछि पकी गोबर की खाद अथवा कम्पोस्ट खाद का प्रयोग प्रति हेक्टेयर करना चाहिए। रासायनिक खाद के रूप में 100 किग्रा. नाइट्रोजन, 50 की.ग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना लाभकारी हैं। नाइट्रोजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस व् पोटाश की मात्रा बुवाई के समय खेत में प्रयोग करना चाहिए। शेष बची आधी नाइट्रोजन को खड़ी फसल के चार महीने बाद आवश्यकतानुसार देना चाहिए।

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बुवाई का समय

फसल से भरपूर पैदावार प्राप्त करने के लिए आवश्यक है की बुवाई समय पर की जाए। बुवाई के समय का कंदो के अंकुरण पर सीधा प्रभाव पड़ता है। अदरक की बुवाई का उचित समय अप्रेल से जून तक का माह माना जाता है। अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रो में बुवाई मई माह में तथा मैदानी क्षेत्रों में बुवाई जून माह में करनी चाहिए जिससे तेज धुप से बीज को बचाया जा सके। बुवाई के समय लाइन से लाइन की दुरी 45 सेमि. तथा कंदो के बिच की दुरी 20 सेमी. रखना चाहिए तथा 3-4 सेमि. गहराई तक कंदो को बुवाई करनी चाहिए।

बीज का उपचार

बुवाई से पूर्व बीज को एक ग्राम बाविस्टिन व थाइरम के तीन ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए।

बुवाई की विधि

चयनित एवं उपचारित कंदो को लाइन से बोने के बाद मिटटी से अच्छी तरह से ढक देना चाहिए व गोबर की अच्छी पकी खाद की एक या घास व पत्तियों की तह से ढक देना चाहिए। ऐसा करने से कोमल अंकुरण को निकलते समय कोई नुकसान नहीं होता है व अंकुरण जल्दी एवं अच्छी प्रकार से होता है।

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मल्चिंग

बुवाई के तुरंत बाद हरी पत्तियों, पुआल, भूसा या कम्पोस्ट खाद आदि का प्रयोग करना चाहिए इससे जमीन की ऊपरी सतह ढक जाती है इससे खेत में नमी बनी रहती है तथा अंकुरण शीघ्र होता है तथा फसल की प्रारम्भिक अवस्था में सिंचाई की कम आवश्यकता होती है। इस प्रकार (पलवार) मल्चिंग काफी महत्वपूर्ण है।

सिंचाई

वर्षा ऋतु में प्रायः सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है क्योकि समय-समय पर वर्षा होती रहती है। यदि समय पर वर्षा नहीं होती है तो आवश्यकतानुसार सिंचाई कर देनी चाहिए। सर्दियों में फसल की स्थिति के अनुसार 10-15 दिनों में सिंचाई कर देनी चाहिए।

जल निकास,गुड़ाई एवं मिट्टी चढ़ाना

फसल की प्रारम्भिक अवस्था में खेत को साफ सुथरा रखना चाहिए इससे पौधों की बढ़वार अच्छी तरह से होती है इस प्रकार बुवाई चार माह बाद हल्की मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए। साथ-साथ खेत में जल निकास उचित व्यवस्था करनी चाहिए।

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कंदो की खुदाई

अदरक की फसल बुवाई के 5-8 महीनो बाद तैयार की जाती हैं। अदरक के पोधो के पत्ते जब पिले पड़ कर सूखने लगते हैं तब खुदाई करके कंदो को सावधानी से निकल लेना चाहिए। खुदाई के समय भूमि का नम होना आवश्यक हैं।

पैदावार

उपरोक्त समस्त क्रियाओ को समय से करने से 200-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की उपज प्राप्त की जा सकती हैं।

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रोग, कीट व उपचार

कन्द का सड़ना

यह रोग मुख्य रूप से फुजेरियम आक्सीस्पोरम के कारण होता हैं। इसमें निचे की पत्तियाँ पीली पड़ जाती हैं। बाद में सम्पूर्ण पौधा पीला पढ़कर मुरझा जाता हैं। भूमि के पास का भाग पनीला व् मुलायम हो जाता हैं। पौधों को सींचने पर वह कन्द के जुड़े स्थान से आसानी से टूट जाता हैं बाद में सम्पूर्ण कन्द सड़ जाते हैं।

रोकथाम

  1. रोगग्रस्त भूमि से बीज नहीं लेना चाहिए।
  2. बीज को बुवाई से पूर्व डाइथेन एम-45 दवा की (2.5 ग्राम /लीटर पानी ) के घोल से एक घंटे तक उपचारित करने के बाद छाया में अच्छी तरह सूखा लेना चाहिए।
  3. खेत में पौधों की पत्तियाँ पीली पड़ने पर तुरंत डाइथेन एम-45 दवा की 2.5 ग्राम /लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए।

कीट

तना छेदक

यह कीट तने को छेदकर उसका रस चूसता है। जिससे पौधा कमजोर पद जाता है और अंत में सुख जाता है।

रोकथाम

इस कीट के रोकथाम के लिए रोगोर नामक कीटनाशक दवा का 0.1 प्रतिशत का घोल 2 माह के अंतराल पर छिड़काव करने से नियंत्रित किया जा सकता है।

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