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अंगूर की उन्नत खेती एवं उत्पादन तकनीक

अंगूर की उन्नत खेती
Written by bheru lal gaderi

फल-फ्रूट पोषक तत्वों में प्रमुख माने जाते हैं। वर्तमान परिपेक्ष में अंगूर(grapes) की मांग अधिक बढ़ने से कई तरह की किस्मों की उन्नत खेती की जा रही है।

अंगूर की उन्नत खेती

बीज वाली एवं बीज रहित किस्मों की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:-

अंगूर की बिना बीज की किस्में:-

ब्यूटी सीडलैस:-

पकने में अगेती अधिक पैदावार नम व शुष्क, सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त, गुच्छे दर्मियाने, लंबे ,आकर्षक व अंगूरों से लदे हुए। मई के आखिर में पकती हैं।  अंगूर गहरे बैंगनी रंग के, रस 75% पूर्ण घुलनशील तत्व (मिठास) 18% व खट्टापन 0.07%।  यह अधिक देर तक नहीं रखी जा सकती हैं।

डीलाइट:-

अगेती किस्म, गुच्छे दर्मियाने,  गठे हुए, बेलनाकार व आकर्षक।  अंगूर हरे, छोटे-छोटे व गोल। जून के दूसरे सप्ताह में पकती है।  रस 68% कुल घुलनशील तत्व (मिठास) 20% व खटापन 0.68%। अंगूर खूब लगते हैं।

परलैट:-

अगेती पकने वाली किस्म, गुच्छे दर्मियाने, बेलनाकार खूब गठे हुए, व चमकदार।  अंगूर सफेद से हरे, जून के शुरू में पकती है। रस 75%, कुल घुलनशील तत्व (मिठास) 18 से 19% व व खटापन 0.82%। अंगूर खूब लगते हैं।

थॉम्पसन:-

मध्य मौसमी किस्म,  गुच्छे बड़े, खूब गुंथे हुए, अंगूर सुनहरे, बराबर, रस 69%, कुल  घुलनशील तत्व (मिठास) 22% व खट्टापन 0.63% यह किस्म अपेक्षाकृत कम फल देने वाली है।

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अंगूर की बीज की किस्में:-

अर्ली मस्केट:-

अगेती किस्म, ठीले व असमान आकार के गुच्छे अंगूर बड़े-बड़े, गोल , लालिमा लिए हुए पीले, एक फल में 3 से 5 बीज।  73% रस और 18% कुल घुलनशील तत्व (मिठास) व  0.60 प्रतिशत खटाई की मात्रा। जून के पहले सप्ताह में पकती है।  उपज दर्मियान।

गोल्ड:-

न अगेती व पछेती किस्म, गुच्छे ढीले व दर्मियानि।  अंगूर मोटे, कुछ चपटे, सुनहरे व एक से आठ बीज एक दाने में होते हैं। रस की मात्रा 70%, कुल घुलनशील तत्व (मिठास) 19% व खटाई की मात्रा 0.45% होती है। जून के दूसरे सप्ताह के दौरान पकती हैं। उपज दर्मियानी

बैकुआ आबाद:-

अगेती किस्म। गुच्छे बड़े बेलनाकार तथा हरे रंग के, छिलका पतला, एक पल में दो से चार बीज,  रस 66% प्रतिशत, 19-20 प्रतिशत कुल घुलनशील तत्व (मिठास) व 0.72 प्रतिशत खटाई की मात्रा होती हैं। जून के प्रथम सप्ताह में पकती हैं। उपज दर्मियानी।

कार्डिनल:-

पछेती किस्म, गुच्छे ढीले व दरमियानी, अंगूर बड़े और गोल जामुनी, ऊपर से कुछ दबे हुए। रस 65% कुल घुलनशील तत्व मिठास 20% व खटाई की मात्रा 0.54% होती है। जून के तीसरे सप्ताह में पकती हैं। इस किस्म की उपज मध्यम है।

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बेल लगाने का समय:-

अंगूर की बेल मध्य जनवरी से 29 फरवरी तक अंकुरण से पहले लगा देनी चाहिए।

खाद:-

अच्छी पैदावार व गुणों से भरपूर फसल के लिए खाद डालना अति आवश्यक है। अनुमान है कि लगभग 90 किलो अंगूर देने वाली एक बेल भूमि से 157.4 ग्राम नत्रजन, 41.2 ग्राम फॉस्फोरस, 217.3 ग्राम पोटाश का निष्कासन करती है।

नई बेल लगाने से पहले गड्ढों में गोबर की खाद के अतिरिक्त 250 ग्राम किसान खाद और 250 ग्राम पोटेशियम सल्फेट एक बार अप्रैल में और दूसरी बार जून में पौधे के हिसाब से देनी चाहिए।

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खाद डालने का तरीका:-

  1. गोबर की खाद जनवरी में दें। बेलों की छंटाई के तुरंत बाद में सुपरफास्ट की पूरी मात्रा और किसान खाद एवं पोटाश की बची मात्रा अप्रैल के आखिरी सप्ताह में फल लगने के बाद देनी चाहिए।
  2. पोटेशियम सल्फेट का प्रयोग जहां तक हो सके म्यूरेट ऑफ़ पोटाश से करें।
  3. खाद को मुख्य तने से 2 फिट दूर 15-२० से.मी. गहरा डाले। जिंक सल्फेट (3%) व बोरिक एसिड (0.2%) का छिड़काव फूल आने पर करने से फल अधिक लगते हैं तथा गुणवत्ता बढ़ती हैं। 1% पोटेशियम सल्फेट का छिड़काव दानों के बनाने के बाद करने से मिठास जाती हैं।
नोट:- खाद की मात्रा मिट्टी की जांच की रिपोर्ट के अनुसार निश्चित करें।

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सिंचाई:-

अंगूर की बेल में कटाई छटाई एवं खाद देने के बाद पहली सिंचाई करें अर्थात पहली सिंचाई फरवरी के प्रथम पखवाड़े में तथा दो सिंचाइयाँ मार्च में करें और चौथी सिंचाई फल लगने के बाद अर्थात अप्रैल महीना में 10 से 15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें। फल तोड़ने के बाद अंगूर की बैलों की सिंचाई करें। जुलाई से अक्टूबर तक सूखा पड़े तो सिंचाई अवश्य करें ताकि अंगूर की बेलें स्वस्थ स्थितियों में प्रसुप्तावस्था में प्रवेश करें।

काली अलकाथेन (पॉलिथीन) शीट के प्रयोग से खरपतवार में नमी संरक्षण तथा मृदा उर्वरता शक्ति बने रहने में सहायता मिलती है। खाद एवं सिंचाई देने के बाद मुख्य तने से काली अलकाथेन (पॉलिथीन) शीट को बिछा दें।

बेल चढ़ाने के तरीके व छंटाई:-

बेल चढाने व अंगूर की बैलों की कांट-छांट जनवरी में निम्नलिखित ढंग से करें।

विरलम:-

परलैट किस्म को विरल करना जरूरी है, ताकि बाकी बची शाखाओं का सही विकास हो। 10X10 फुट की दूरी पर लगाई गई बेलों पर 100 से अधिक गुच्छे ना रखें। यह काम अंगूर लगने के तुरंत बाद करें।

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अंगूर की गुण वृद्धि:-

  • बीज रहित अंगूर की किस्मों में दानों की भरमार किए बिना अधिक उपज देने के लिए पूरी तरह फूल आजाने की हालत में 20 पी.पी.एम., जी. ए. व  फल बनने पर 40 पी.पी.एम. का प्रयोग करें। इससे फल का आकार बढ़ता है। इससे गुच्छों में फलों के गिरने की आशंका कम हो जाती है।
           नोट:- यह सिफारिश केवल बीज रहित अंगूर वाली किस्मों के लिए हैं।
  • रंगदार अंगूरों में रंग के समान विकास के लिए इथिफॉन 500 पी.पी.एम. का प्रयोग रंग पलटने के समय करें। इससे फल 7 से 10 दिन पहले पककर तैयार हो जाते हैं।
  • ब्यूटी सीडलैस के गुच्छे को नीचे से विरला करने तथा टहनी पर एक गुच्छे के रहने से अंगूर के दाने बहुत छोटे नहीं रहते तथा अंगूरों के गुणों में भी सुधार होता है।

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अंगूर की खेती- समस्याएं एवं समाधान:-

जीरा दानों( का सामान्य से बहुत छोटा रहना):-

यह समस्या पर परलैट, डिलाइट व ब्यूटी सीडलेस किस्मों में ज्यादा पाई जाती है। इस समस्या से दानों का आकार बहुत छोटा रह जाता है एवं दाने सख्त एवं हरे बने रहते हैं। यह दाने कभी भी अपना पूरा आकार नहीं ले पाते व पूरी तरह से परिपक्व भी नहीं हो पाते है।

इस प्रकार के दाने गुच्छे के कुछ हिस्सों में वह कई बार पूरे गुच्छे में पाए जाते हैं। इस प्रकार के दानों के होने से बड़ा अंगूर का गुच्छा बड़ा अनाकर्षक लगता है। जिससे इस प्रकार के गुच्छों का बाजार में उचित मूल्य नहीं मिल पाता है।  दानों को छोटा रहने का मुख्य कारण है सही प्रकार से कटाई छटाई का ना होना। ज्यादा फसल लेना व पोषक तत्वों की कमी।

इस समस्या के निदान के लिए निम्नलिखित क्रियाओं का करना आवश्यक है:-
  1. कटाई छटाई सिफारिश किए गए आधार पर करनी चाहिए। जैसे परलैट व ब्यूटी सीडलेस किस्म को 2-3 आंख छोड़कर काटना चाहिए व डीलाइट किस्म को 3-4 आँख छोड़कर काटना चाहिए। पंडाल या बावर फैलाव प्रणाली पर लगभग 40 से 50 फल वाली लक्कड़ प्रति बेल रखनी चाहिए।
  2. ज्यादा फसल को फल बनने के समय गुच्छों और दानों के विलीनीकरण द्वारा कम करना चाहिए।
  3. सही तरह से खादों का प्रयोग:- खाद की मात्रा, पौधे की आयु व उसके फैलाव पर निर्भर करती है।

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कली, फूल व फल का झड़ना:-

यह समस्या ब्यूटी सीडलेस, पूसा सीडलेस व गोल्ड किस्मों में अधिक पाई जाती हैं। इन क्षणों में अर्ध खिली कली, फूल व फलों का झड़ना आमतौर पर पाया जाता है।

फलों का झड़ना फल पकने के समय शुरू में होता है। इस समस्या का मुख्य कारण है- कार्बन और नाइट्रोजन का सही अनुपात ना होना। पौधे की वृद्धि के तत्वों में कमी और खुराक, जलवायु व बाग में की जाने वाली क्रियाएं इत्यादि।

इस समस्या के निदान के लिए:-
  1. फूल खिलने से 10 दिन पहले तने से 5 सेमी चौड़ाई का छल्ला उतारे।
  2. ज्यादा फसलें न लें।
  3. नत्रजन वाले खादों का प्रयोग कम करें।
  4. फूल खिलने के समय सिंचाई न करें।

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फल वाले गुच्छों का सूखना:-

यह समस्या ज्यादातर थोम्पसन सीडलेस, गोल्ड व पूसा सीडलेस किस्मों में अधिक पाई गई हैं। इन किस्मों में अर्धखिली कलियां या खिले हुए फूल या तो सुख जाते हैं या गिर जाते हैं। कई बार तो फूल वह पूरा गुच्छा ही सूख जाता है। इस समस्या के मुख्य कारण कार्बन व नत्रजन का सही अनुपात ना होना, परागकण का कम जमना, बीमारी व कीड़ों का प्रकोप तथा किस्मों का चुनाव इत्यादि हैं।

इस समस्या की रोकथाम के लिए निम्नलिखित क्रियाओं की जानी चाहिए:-
  1. सही किस्म का चुनाव।
  2. बाग में पानी की कमी न होने दे।
  3. कीटनाशक व फफूंदनाशक दवाओं का सही मात्रा में व सही समय पर छिड़काव।
  4. 0.2% बोरिक अम्ल व 0.3% जस्ते का फूल खिलने के समय छिड़काव।

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फल लक्कड़ का अपरिपक्व रहना:-

यह रोग उतरी भारत की ओजस्वी किस्मों में पाया जाता है। जैसे थॉम्पसन, सीडलेस, पूसा सीडलेस व अनाबेशाही। इस समस्या के प्रमुख कारण नत्रजन वाली खादों का ज्यादा प्रयोग। ज्यादा व बार-बार सिंचाई, ज्यादा फसल लेना, व पौधे से पौधे की दूरी कम होना है। इस समस्या पर काबू पाने के लिए नत्रजन वाली खादों का कम प्रयोग करें। सर्दी के समय सिंचाई ना करें और पौधे से पौधे की सही दूरी रखे। व सही सही समय पर सिंचाई करनी चाहिए।

फल वाली टहनियों का मरना:-

यह समस्या एन्थ्रेक्नोज बीमारी के कारण होती हैं। यह बीमारी पहले पत्तों और बाद में शाखाओं तथा फलों पर आ जाती है। इस बीमारी से शाखाएं परिपक्व नहीं हो पाती हैं। व शीर्ष से सुखना शुरु कर देती हैं, जिसके कारण या तो शाखाएं पूरी तरह से सूख जाती हैं या शाखाएं मर जाती है। इस बीमारी का उत्पादन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। इस बीमारी के अन्य कारण कुपोषण, ओजस्विता, गहरी पत्तियां, पौधे से पौधे की दूरी कम होना व सही सिंचाई का न ही होना है।

इस बीमारी की रोकथाम के लिए निम्न प्रकार से की जा सकती हैं:-

  • एन्थ्रेक्नोज बीमारी की रोकथाम के लिए फफूंदी नाशक दवाओं का सही इस्तेमाल करें। इसके लिए बेविस्टीन दवाई का 0.2% घोल का छिड़काव कटाई-छंटाई के बाद व 15 दिन के अंतराल पर करें।
  • खादों का सही समय, मात्रा में प्रयोग करें।

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प्रस्तुति:-

वैज्ञानिक ब्यूरों विश्व कृषि संचार

वर्ष -20, अंक-11, अप्रैल-2018

विश्व एग्रो मार्केटिंग एन्ड कम्युनिकेशन, कोटा (राज.)

ईमेल – vks_2020@yahoo.com

मोब. नो.- 9425081638

 

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